Paryavaran ki Vyatha

पर्यावरण की व्यथा | Paryavaran ki Vyatha

पर्यावरण की व्यथा

( Paryavaran ki vyatha )

 

बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।
सबसे अपनी व्यथा कहती,
कोई सुने इसकी गुहार,
बंद करें इसका संहार।
पल पल पीड़ा को सहती,
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

अपनी जरुरत की खातिर,
क्युॅ॑ चलाते धार हथियार।
इसे भी तो कष्ट होता,
कभी समझें इसका प्यार।
सभी को सुख शांति देती,
बहुत दुखी है आज प्रकृति।

मनमानी अपनी ही करते,
चौखट खिड़की द्वार बनाते।
जब देखो तब काट वृक्षों को,
ईंधन में भी इसे जलाते।
यह दुख की आग में जलती,
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

क्या माॅ॑गती है तुमसे जो,
प्रकृति को तुम इतना सताते।
इसी से मिलती ऑक्सीजन,
फिर क्यों कर आरी चलाते।
यह तो सबको जीवन देती,
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

वृक्ष हीन अगर धरा हुई तो,
जाने कितनी आफ़त आये।
हाथ पर हाथ रख बैठ मनुज,
जीवन में बहुत पछताए।
कटे वृक्ष प्राण वायु कम होती,
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

इक दिन पर्यावरण न मनाऍं,
बात छोटी सी समझ जाऍं।
प्रकृति का है निवेदन सबसे,
वृक्ष काट के इसे न सताए।
यह सब पर ही निर्भर रहती
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

नित-नित एक लगाकर पौधा,
वसुंधरा को सुख पहुॅ॑चाऍं
प्रकृति संग सुखी हो मानव,
पर्यावरण सुरक्षित हो जाए।
मन की बात सभी से कहती,
बहुत दुखी हैं आज प्रकृति।

 

कवयित्री: दीपिका दीप रुखमांगद
जिला बैतूल
( मध्यप्रदेश )

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