Poem in Hindi on Maa

सब तुम जानती हो मां | Poem in Hindi on Maa

सब तुम जानती हो मां

( Sab tum janti ho maa ) 

 

घड़ी की सुई यों के संग तुम भी भागती हो मां
किसे कब क्या चाहिए यह सब तुम जानती हो मां

प्रबंधन के लिए लाखों खर्च करते हैं लोग
कितना बेहतरीन समय प्रबंधन जानती हो मां

पापा के गुस्से को हंस कर पी जाती हो मां
बच्चों की कही सिर हिला कर टाल जाती हो माँ

घर का खाना पानी इस्त्री पूजा सब संभाल जाती हो मां
हर रिश्ते नाते कुशलता से निभा जाती हों माँ

रीति रिवाज परंपराओं को जीवित रखती हो माँ
हर किसी के दर्द को अपना बना जाती हो माँ

घर दफ्तर दोनों में सामंजस्य बना जाती हो मां
कोई माने या ना माने विलक्षण प्रतिभा की धनी हो माँ

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

माँ मुस्कुराओ तुम | Muskurao tum

Similar Posts

  • दो जून की रोटी | Do joon ki roti kavita

    दो जून की रोटी ( Do joon ki roti )   दो जून की रोटी को खून पसीना बहा कर पाना चाहता सुकून दिन भर की थकान से   घर से निकलता मानव दो जून की रोटी को बेहाल हो गया मनुज हालातों के सामने   दो जून की रोटी की दिनोंदिन चिंता खा रही…

  • किस्मत | Kismat kavita

     किस्मत  ( Kismat )     ->अपना काम करता चल ……..|| 1.लोगों की भलाई कर भूल जा, उस पर फिर विचार ना कर | आगे चलकर जरूर मिलेगा तुझे, उसका इंतजार न कर | तेरा साथ पाने वाला भूल जाए, तो कोई ऐतराज न कर | देख रहा है कोई अद्रश्य रुप से, खुद को…

  • हे कान्हा | Hey Kanha

    हे कान्हा ( Hey kanha )   हे कान्हा हे गिरिधर मुरली मनोहर बंशीधर, हम दीन दुखियों पर कुछ कृपा कर। हे गोप ग्वालों के रक्षक हे मधुर मुरली बजैया, हे गोपियों की इच्छा रखने उनके संग महारास रचैया। धरती का बोझ घटाने खातिर लिया था तुमने अवतार, भक्तों की रक्षा करते करते दिखलाए कई…

  • आजादी के शहजादे | Poem in Hindi on Bhagat Singh

    आजादी के शहजादे ( Azadi ke shahzade )    अठाईस सितंबर धन्य हुआ,तेईस मार्च की स्तुति में अठाईस सितंबर उन्नीस सौ सात, शहीदे आजम हिंद अवतरण । रज रज अति उमंग उल्लास, सर्वत्र अप्रतिम खुशियां संचरण । फिरंगी सिंहासन हिला डाला, प्रतिभाग कर क्रांतिकारी युक्ति में । अठाईस सितंबर धन्य हुआ, तेईस मार्च की स्तुति…

  • मानव का उसूल | Kavita manav ka usul

    मानव का उसूल ( Manava ka usul )     चकाचौंध में खो गया नर धन के पीछे भाग रहा आज आदमी नित्य निरंतर व्यस्त होकर जाग रहा   झूठ कपट सीनाजोरी कालाबाजारी रिश्वतखोरी मानव का उसूल कैसा झूठे वादे बस बातें कोरी   प्रलोभन मोह माया के जाल पर जाल फेंक रहा नीली छतरी…

  • पछतावा

    पछतावा *** नहीं हो सका तुझसे कुछ भी अच्छा! रहा बच्चा का बच्चा, दिल का सादा और सच्चा। ईर्ष्या द्वेष वैमनस्य न जाना, ज़माने की दस्तूर न माना; देते हैं लोग अब ताना। मूर्ख ! तू इतना भी न जाना? छल कपट का है जमाना। कुछ कराने को ‘कुछ’ करना पड़ता है, वरना फाइल ठंडे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *