नारी
( Nari )
( 2 )
हर युग को झेला है जिसने
हार नहीं पर मानी वह नारी।
स्वाभिमान को गया दबाया
सिर नहीं झुका वह है नारी।
जीवन के दो पहलू कहलाते
फिर भी इक ऊँचा इक नीचा।
विष के प्याले पी पी कर भी
अमृत से जग को नित सींचा।
कंटक पथ के चुन चुन काँटे
चली हमेशा आगे ही नारी।
शक्तिमान के हाथों में सत्ता
सदा विजय फिर भी पायी।
कैद रही जो युगों युगों तक
उसने ही इतिहास बनायी।
जननी है वह सृष्टि की सारे
जगजननी कहलाती नारी।
देव झुकें जिसके चरणों में
माता का वह रूप निराला।
फिर भी लोग समझ न पाये
उसके ही हिस्से आती हाला।
अँधियारे में कर दे उजियारा
नाम है उसका जग में नारी।
कांटों पर चलकर भी जो है
परहित पुष्प संजोती रहती।
आँच न आने देती अपनों पे
खुद पर हजार दुख है सहती।
सुन्दरतम दिल से तन से भी
अनुपम सी वह कृति है नारी।
जगती का है सम्मान उसी से
नारायणी कहलाती है नारी।।
डाॅ सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली
( 1 )
नारी प्यासी प्रेम की, वो चाहे सबका मान
रूखी सूखी से संतुष्ट है,मांगे बस सम्मान
पूरे घर का भर उठाए,जूझे दिन और रात
रहे न थकान तब,जब सुनती मीठी बात
करुणा,दया,क्षमा और,है ममता की खान
नारी प्रथम पूज्य है,झुके शीश भगवान
कुछ नर पापी अधम नीच,खींचे नारी चीर
डूबे मद आपने,समझ रहे केवल एक शरीर
भोग्या बन नारी जग मे, नर से भोगी जाय
नर की दात्री नारी, नर से कैसे लाज बचाय
तात, भ्रात, नात सब,तब भी नारी अबला क्यों
पुरुष प्रधान यदि जगत मे,तब नारी निर्बला क्यों

( मुंबई )
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