Poem khafa
Poem khafa

खूब रहते अपने ख़फ़ा घर में

( Khoob rahte apne khafa ghar mein )

 

ख़ूब रहते अपनें ख़फ़ा घर में !
अपनों की सहते है जफ़ा घर में

 

और तो झूठे है दिखाता सच
आइना जो मेरे लगा घर में

 

ग़म दिल में अश्क़ है निगाहों में
प्यार कब अपनों से मिला घर में

 

कोई तो प्यार से निहारे अब
रोज़ रब से करी दुआ घर में

 

मैं करुं ऐतबार किसपर अब
अपना कोई न बावफ़ा घर में

 

पैसों का अपनों का बड़ा लालच
क़त्ल मासूम का हुआ घर में

 

प्यार से जो देखें मुझे आज़म
कौन अच्छा मगर ज़रा घर में

❣️

शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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