Poem khanjar lekar ghoom rahe hain

खंजर लेकर घूम रहे हैं | Poem khanjar lekar ghoom rahe hain

खंजर लेकर घूम रहे हैं

( Khanjar lekar ghoom rahe hain ) 

 

 

खंजर लेकर घूम रहे हैं कुछ अपने कुछ बेगाने।
किसे सुनाऊं कौन सुनेगा हाले दिल ये अफसाने।।

 

कुछ तो भोला कह देते हैं कुछ कहते मगरूर बड़ा
कुछ कहते ये नहीं बराबर, कहते कुछ मशहूर बड़ा
कैसे इनको समझाएं अब, हम गाँधी के दीवाने।
खंजर लेकर घूम रहे हैं, कुछ अपने कुछ बेगाने।।

 

कोई द्वेष छिपा कर मिलता, अधरों में मुस्कान लिए
कोई धन पद वैभव वाला, अपने में अभिमान लिए
कैसे नदियां आकर मिल लें, सागर जब हों मस्ताने।
खंजर लेकर घूम रहे हैं कुछ अपने कुछ बेगाने।।

 

अपनी करनी का फल देखो, इक दिन सबको मिलना है
चाहे आज सफलता पा लो, कब तक छल को टिकना है
इतनी रखो शराफत “चंचल”, खुद से न हों अंजाने।
खंजर लेकर घूम रहे हैं कुछ अपने कुछ बेगाने।।

 

 

कवि भोले प्रसाद नेमा “चंचल”
हर्रई,  छिंदवाड़ा
( मध्य प्रदेश )

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