Poem Rama Sugriva
Poem Rama Sugriva

राम सुग्रीव मिताई

( Ram Sugriva Mitai )

 

सीता माता की सुधि लेने चल पड़े राम लक्ष्मण भाई।
शबरी के मीठे मीठे बेर खाए चब चख श्री रघुराई।

 

आगे जाकर रघुवर की जब भक्त हनुमान से भेंट हुई।
सुग्रीव से जाकर करी मिताई और सभी पहचान हुई।

 

किष्किंधा का राजा बाली सुग्रीव भ्राता बड़ा बलशाली।
कही कथा श्रीराम को बंधक भ्रात भार्या को कर डाली।

 

बाली वानर मतवाला है भाई नहीं वो तीखा भाला है।
आधा बल सारा ले लेता महारथी वरदानों वाला है।

 

बोले रामचंद्र सखा सुनो मित्र धर्म निभाऊंगा‌
दुष्ट बाली दमन होगा खोया राज्य दिलाऊंगा‌

 

तुम जाओ बाली से लड़ो में वृक्षों की ओट लेता हूं।
निर्लज्ज पापी बाली के बाणों से प्राण हर लेता हूं।

 

दोनों भाई समरूप शक्ल राघव भी ना जान सके।
कौन बाली कौन सुग्रीव रघुवर भी ना पहचान सके।

 

श्रीरामचंद्र ने सुग्रीव को जब सुमन हार पहनाया।
जय सियाराम बोलो सखे बाली पुनः लड़ने आया।

 

प्रभु श्री राम ने तीर चला महाबली बाली को मारा है।
मित्रधर्म मर्यादा धर राम ने भूमि का भार उतारा है‌‌।

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रचनाकार : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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