रामकेश एम. यादव की कविताएं | Ramkesh M. Yadav Hindi Poetry

प्रेमिका

क्या हुआ है इनको मुझे चाहने लगे हैं,
मेरा मयकशी बदन ये निहारने लगे हैं।

प्रेमी:-
ख़ाक होने से मुझको बचा लीजिए………..

खता मेरी क्या है, बता दीजिये,
नजर लड़ गई है, सजा दीजिये।
खता मेरी क्या है, बता दीजिये………

धड़कती हो सीने में मैं क्या करूँ,
छलकती हो दिल में, मैं क्या करूँ।
आँखों से तीर ये, चला दीजिये,
नजर लड़ गई है, सजा दीजिये।
खता मेरी क्या है, बता दीजिये………

लगती है आग जब, उठता है धुआँ,
भरता है प्यार से, देखो वो कुआँ।
ख़ाक होने से मुझको बचा लीजिये,
नजर लड़ गई है, सजा दीजिये।
खता मेरी क्या है, बता दीजिये………

जीवन की राहें न, अकेले कटेंगी,
मांझी के बिना कश्ती कैसे चलेगी।
छूड़ी जिगर पर चला दीजिये,
नजर लड़ गई है, सजा दीजिये।
खता मेरी क्या है, बता दीजिये………

सुबह के स्वागत में

रात की इस कोख से सूरज उगाओ यारों,
सुबह के स्वागत में रोशनी बिछाओ यारों।
मुश्किलें आती हैं, तुम चुनौती स्वीकार करो,
खिंजा के मौसम में गुल नया खिलाओ यारों।

बिछड़े हुए लम्हों की कसक पहिले बंद करो,
कोई हूर तू आसमां से उतारो यारों।
दुनिया कहती थी मेरे देश को सोने की चिड़िया,
फिर उसी मोड़ पे इसे लाओ यारों।

मिसाइलों से भरे न ये अम्बर कहीं,
बूढ़ा हुआ यू.एन.ओ.उसकी सर्जरी कराओ यारों।
इस दुनिया में बहुत दिनों तक कौन टिका है,
बची हुई सांसों को सजाओ यारों।

है ये मिट्टी का पुतला

रोते-रोते जहां में तो आते सभी,
हँसते-हँसते तो जाना ये बस में नहीं।
होती आसान नहीं ये जीवन की राहें,
मौत आ जाये कब, ये पता ही नहीं।

है ये मिट्टी का पुतला, भरोसा नहीं,
सुकूँ के दो पल चुरा लीजिये।
ढह जाएगी साँस की ये दीवाल एकदिन,
बस जीवन का पानी बचा लीजिए।

खरीद ले कोई मुझको उसमें मादा नहीं,
लेकिन मौत से बड़ा मैं भी नहीं।
भेष बदलकर मौत आती है जगवालों,
कोई आजतक उससे लड़ा ही नहीं।

कोई जमीं पे सोये या सोये मखमलों पे,
खाक होने से देखो बचेगा नहीं।
जीते जी बाँट लो प्यार के फूल तुम,
राख होने पर कोई दिखेगा नहीं।

मैं कोई फरिश्ता नहीं

दुश्मन को कलेजे से लगाकर तो देखो,
इंसानियत की दौलत बचाकर तो देखो।
रुसवा करके किसी को मिला ही क्या है,
नफरत की दीवार गिराकर तो देखो।

जब भी मुँह खोलो तुम सच ही बोलो,
खुद को दानेदार बनाकर तो देखो।
साँसें टूटेंगी, छूटेगी वो चाँद की मड़ई,
सच्चाई के तराजू पे चढ़कर तो देखो।

महंगे लिबास नंगा होने से बचा नहीं सकते,
अपने वचन पे क़ायम रहकर तो देखो।
खेल मत खेलो कोई नुकसान पहुँचाने का,
किसी की साँसें तू बढ़ाकर तो देखो।

ये अजीब दुनिया है, एक खेल का मैदान,
अगर इसे जीत न सको, हारकर तो देखो।
मैं अपने वक़्त का कोई फरिश्ता नहीं,
मेरी आँखों को आईंना बनाकर तो देखो।

क्या लेकर आये हो

मेरे हक़ की जमीं वो आसमान तो मिले,
मेरी ख्वाहिशों को एक नई उड़ान तो मिले।

सूख चुके हैं जो डैम, नदी औ तालाब,
ऐ! बादल, उन्हें लहरों का उफान तो मिले।

खड़ी-खड़ी धूप में तप रही हैं जो नील गाएँ,
नहीं बचे जंगल कोई उन्हें बागान तो मिले।

एकदिन टूटकर गिर जायेगा वो चाँद-सितारा,
कोई बरसाए न मिसाइल, रुझान तो मिले।

घर से आजतक खुशबू नहीं गई जैसे माँ जिन्दा है,
उसे शिद्दत से याद रखनेवाली संतान तो मिले।

क्या लेकर आये हो तुम चंद साँसों के सिवाय,
समझानेवाला तुम्हें कोई इंसान तो मिले।

कोर्ट -कचहरी जाते -जाते थक जाते हैं लोग,
कोई सुलह करानेवाला खानदान तो मिले।

तलाशना है तो एक कतरे में समंदर तलाश,
समझ बढ़ाने के लिए कोई ज्ञान की खान तो मिले।

फर्श पे चाँदनी बिछाकर आज भी सोते हैं कुछ लोग,
ऐसे यतीमों को उनका घर-मकान तो मिले।

लाल हुई माटी घाटी की

इंतक़ाम तुम ले लो भारत,
दुश्मन फिर उकसाया है।
लाल हुई माटी घाटी की,
निर्दोषों ने प्राण गँवाया है।
लेफ्टिनेंट विनय की जवानी,
पल भर में वो ढेर हुई।
कहाँ सुरक्षा इंतजामों में,
हमसे भी कुछ देर हुई।
फूलों के खुशबू के ऊपर,
फिर आतंक का साया है,
लाल हुई माटी घाटी की,
निर्दोषों ने प्राण गँवाया है।
इंतक़ाम तुम ले लो भारत,
दुश्मन फिर उकसाया है।

सूरज-चाँद-सितारे कहते,
कब तक धोखा खाओगे?
राफेल तुम्हारी मुट्ठी में हैं,
कब तक अर्थी पे फूल चढ़ाओगे।
खेल- खेल रहे जो घाटी में,
उनको सबक सिखाओ तुम।
सेना को आदेश थमा दो,
नया भूगोल बनाओ तुम।
अमन की माला रटना छोड़ो,
ऐसा दिन अब आया है,
लाल हुई माटी घाटी की,
निर्दोषों ने प्राण गँवाया है।
इंतक़ाम तुम ले लो भारत,
दुश्मन फिर उकसाया है।

दो के बदले बीस शीश तुम्हें,
जिस दिन काटने आएगा।
डरकर चूहा घुसेगा बिल में,
न शेर को आँख दिखायेगा।
तप, त्याग, संयम की गँठरी,
कुछ दिन तुम्हें छुपानी होगी।
इजराइल से जीना सीखो,
गाण्डीव धनुष उठानी होगी।
धधक रही है आग देश में,
ताज़ा सिंदूर मिटाया है,
लाल हुई माटी घाटी की,
निर्दोषों ने प्राण गँवाया है।
इंतक़ाम तुम ले लो भारत,
दुश्मन फिर उकसाया है।

सैल्यूट है सुनीता विलियम्स जी आपको

( नज़्म)

अंतरिक्ष की दुनिया की सुल्तान है सुनीता,
देखो तो अखिल विश्व की शान है सुनीता।

नौ माह रहकर वहाँ,रच दिया तूने नया इतिहास,
स्पेश- वॉक में तेरा ही ऊँचा स्थान है सुनीता।

अंतरिक्ष के मैराथन की दौड़ में भी है पहली,
देखो, विज्ञान की नई बिहान है सुनीता।

चमकता रहेगा तेरे उस चेहरे का सदा नूर,
तू हर मुश्किल से है गुजरी, तू महान है सुनीता।

लोगों की दुआएँ सदा रहेंगी तेरे साथ में,
तू अपने आप में एक आसमान है सुनीता।

हालाँकि सबकी सांसों की डोर है उसके हाथ में,
जन – जन के दिल में तेरा सम्मान है सुनीता।

नारी!

त्याग और साहस से भरी देखो होती नारी,
बुरा वक्त आते लक्ष्मीबाई बन जाती है।
रहती है घिरी कितनी झंझावातों से वो,
ऐन मौके पर प्रत्यन्चा- सी तन जाती है।

नारी को बेचारी कहना भूल जाओ सभी,
देखो हर क्षेत्र में वो लोहा मनवाती है।
स्पेस की दुनिया में बनाई पहचान आज,
फाइटर विमान बड़े स्वाभिमान से उड़ाती है।

सृष्टि नहीं नारी बिना, है जीवन की मूल वो,
गिद्धों की नजर देखो फिर भी मँडराती है।
आता जब बुरा समय बन जाती दुर्गा-काली,
सीधे- सीधे यम से भी देखो टकराती है।

टूटती उम्मींद में आशा की किरण दिखती,
अपनी फटी एड़ियों को साड़ी से छिपाती है।
डालती है बच्चों में संस्कार कूट- कूटकर,
मानों घर-द्वार का वो तीरथ बन जाती है।

जुल्म सहकर भी वो देती है सभी का साथ,
पूरे घर- बार का वो बोझ भी उठाती है।
मानो कोई पहना हो कांँटों से भरा ताज,
सूरज की पीठ पर वो रोटियाँ पकाती है।

शहीदों को नमन!

पुलवामा के शहीदों को मेरा नमन,
मैं चुनके लाया हूँ कुछ श्रद्धा -सुमन।
सूरज नहीं डरता कभी काले मेघों से,
इसलिए महफूज है मेरा अक्खा वतन।

किसी माँ की आँखों के तारे थे वो,
किसी माँ की कोख के दुलारे थे वो।
उजड़ा था कितनी मांग का सिन्दूर,
सींचे हैं खूँ से जमीं सींचेंगे ये चमन,
मैं चुनके लाया हूँ कुछ श्रद्धा -सुमन।

चालीस जवानों की शहादत हुई थी,
गंगा-यमुना की लहरों से चीख उठी थी।
अर्थी को देख-देख ये रोया था गगन,
मैं चुनके लाया हूँ कुछ श्रद्धा -सुमन।
पुलवामा के शहीदों को मेरा नमन,

सदा ही अमर रहेगी उनकी कुर्बानी,
ले लो सलामी तू वीर बलिदानी।
ओढ़े थे तू तिरंगा बनाकर कफन,
हम चुनके लाए हैं कुछ श्रद्धा-सुमन।
पुलवामा के शहीदों को मेरा नमन।

हिंदी !

खून में हिंदी कण कण में हिंदी
हिय में सबके छाई है।
तुलसी इसे रस छंद से सींचे
आजादी दिलवाई है।

ऊँचे -ऊँचे शैल -शिखर से
मानों करती ठिठोली है।
रंग-बिरंगी काया इसकी
कोयल जैसी बोली है।

मानसून के बादल जैसी
प्यासे की प्यास बुझाती है।
बनकर के जल धारा हिंदी
बंजर में फूल खिलाती है।

हवा के जैसे ताजी रहती
संत कबीर की वाणी है।
है साम्राज्ञी स्वर सागर की
इतनी तो ये दानी है।

द्वार मोक्ष का खोले हिंदी
मदमाया भी हटाती है।
जिस कारण हम भू पे आए
जीवन सफल बनाती है।

मैं भारत का संविधान हूँ

मैं कानूनी लक्ष्मण रेखा हूँ,
बाबा साहेब का लेखा हूँ।
आजादी की विजय पताका,
फ्रीडम फाइटर देखा हूँ।

अमर शहीदों के माथे का चन्दन,
लोकतंत्र का उदबोधन हूँ।
देता सबको समता का अधिकार,
धुंधली आँखों का अंजन हूँ।

दंडविधान, न्यायालय मुझमें,
मैं एक सुनहला विधान हूँ।
उखाड़ा मैंने असमानता जड़ से,
मैं सबकी मुस्कान हूँ।

सबके हितों की रक्षा करता,
मैं भारत का विधान हूँ।
न्याय पक्ष उदघाटित करता,
लोकतंत्र का वरदान हूँ।

बोझ उठाओ अपना-अपना,
मैं सबकी पहचान हूँ।
बने देश यह महाशक्ति,
मैं देश की आन हूँ।

चाँद का दीदार!

बाँहों में बीते उनके सारी उमर ये
खंजन की जैसी नहीं हटती नजर ये।
जिधर देखती हूँ बहार ही बहार है
पति मेरे जीवन का देखो आधार है।

सोलह श्रृंगार करती नित्य उनके लिए मैं
आज करवा की व्रत हूँ ये उनके लिए मैं।
वो मेरे चाँद हैं औ मैं उनकी चाँदनी
वो मेरे राग हैं और मैं उनकी रागिनी।

धन वैभव यश कीर्ति ये पल पल बढ़ेगी
मोहब्बत की बेल नित्य नभ को चढ़ेगी।
हाथों में मेंहदी औ माथे पे बिंदिया
चुराऊँगी साजन की नथुनी से निंदिया।

चाँद का दीदार उनकी नजर से करुँगी
मानों स्वयंवर में मैं उन्हें फिर चुनूँगी।
सावित्री सत्यवान जैसा हो मेरा साथ
सुहागनों की मांग का ये पर्व बने ताज।

बादल की ओट से मेरा चाँद इठलाये
भारतीय संस्कृति को ये सदा महकाये।
जीवन का सितार ये ऐसे बजता रहे
मोहब्बत का साज ऐसे सजता रहे।

गांधी जी!

बिखरे देश को बाँधा जिसने
गांधी उसको कहते हैं।
सत्य-अहिंसा के थे पुजारी
दिल में हमारे रहते हैं।

तूफानों से लड़ना उनका
देखो खेल खिलौना था।
सत्य के आगे अंग्रेजों का
कद भी कितना बौना था।

भारत छोड़ो के नारों से
देश में क्रांति आई थी।
क्या नर क्या नारी सब मिलके
वस्त्रों की होली जलाई थी।

यूँ खूब बही खूनों की नदी
फाँसी पे कितने झूल गए।
कांप गए वो जुल्मी फिरंगी
कितने ठिकाने भूल गए।

हुआ देश आजाद हमारा
जय हो अमर शहीदों की।
जब तक सूरज -चाँद रहेगा
बात चलेगी गांधी की।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह!

खेतों    में    बंदूकें   बोकर,

क्रांति का बिगुल बजाये थे।

राजगुरु सुखदेव,भगत सिंह,

दुश्मन   को  धूल  चटाए थे।

तब  कांप  गई अंग्रेजी सत्ता,

वन्दे  मातरम  के  नारों   से।

इंक़लाब की ज्योति जली थी,

ऐसे     नये     सितारों     से।

चमक  रहा  था नया लहू ये,

लिख   रहे  थे  नई  कहानी।

थम-सी गईं दुश्मन की साँसें,

ये    ऐसे    थे      बलिदानी।

बम विस्फोट कर असेंबली में,

खड़े    रहे    वहीं    अकेला।

झूल   गए   फाँसी  के  फन्दे,

चिताओं   पे   लगता   मेला।

घायल भारतमाता को जिसने,

अपना      शीश       चढ़ाया।

अमर   रहेगा  नाम  धरा  पर,

गोरों    को   जिसने   भगाया।

नदियों   खून  बहाकर   हमने,

ये      आजादी      पाई     है।

कितनी    गोंदी    सूनी   करके,

अमर     ज्योति    जलाई   है।

क्या   लोग   थे   वो     दीवाने,

क्या  खूब थी  उनकी  जवानी।

मादरे वतन पे जो मिटने आता,

लहू   से     लिखता    कहानी।

बना  लो  चाहे  जितनी  कोठी,

ये   अदब  कभी   न  पाओगे।

राजगुरु,  सुखदेव, भगतसिंह,

क्या   सोचो    बन    पाओगे?

बलि-   बेदी   पर  चढ़कर  ही,

ऐसा   दिन    तब   आता   है।

अमर शहीदों  की  माँओं  की,

झोली  में   सुख   जाता    है।

आओ  कर  लें आज  प्रतिज्ञा,

अपने  वतन  पर  मिटने  की।

ख्वाब    हमारा  भी   हो  पूरा,

अमर  तिरंगे   में   सजने  की।

पौरुष   को  लकवा   न   मारे,

स्वाभिमान   को   जगने   दो।

भारतमाता     के   चरणों   में,

अपना  शीश  भी   चढ़ने   दो।

नमो!

तन मन है इस देश की खातिर
राष्ट्र की खातिर जान है।
बदल दिया इस देश की सूरत
मेरा नमो महान है।

भारत माँ का वीर पुत्र ये
हुंकार हमेशा भरता है।
महाशक्ति यह देश बने
सृजन के पथ चलता है।

मनमोहक अभिव्यक्ति इनकी
मानों नगमा ढलता है।
भाषण इनका धारा प्रवाह
चहुँ ओर महकने लगता है।

सपने इनके ऐसे सजते,
जैसे तारे खिलते हैं।
नये बीज रिश्तों की बोते
स्नेह के मेघ बरसते हैं।

लावा बनकर दुश्मन का ये
नामोनिशां मिटाते हैं।
नहीं जो संभव काम जहां में
करके उसे दिखाते हैं।

हिंदी!

खून में हिंदी कण कण में हिंदी
हिय में सबके छाई है।
तुलसी इसे रस छंद से सींचे
आजादी दिलवाई है।

ऊँचे -ऊँचे शैल -शिखर से
मानों करती ठिठोली है।
रंग-बिरंगी काया इसकी
कोयल जैसी बोली है।

मानसून के बादल जैसी
प्यासे की प्यास बुझाती है।
बनकर के जल धारा हिंदी
बंजर में फूल खिलाती है।

हवा के जैसे ताजी रहती
संत कबीर की वाणी है।
है साम्राज्ञी स्वर सागर की
इतनी तो ये दानी है।

द्वार मोक्ष का खोले हिंदी
मदमाया भी हटाती है।
जिस कारण हम भू पे आए
जीवन सफल बनाती है।

हिंदी विश्व को प्यारी है

लता की हिंदी रफी की हिंदी
जन जन की भाषा हिंदी है।
रंग बिरंगी तितली जैसी
ये माथे की बिंदी है।

सूर कबीर रसखान की हिंदी
देखो कितनी दुलारी है।
माखन मिसरी जैसी रसीली
हिंदी विश्व को प्यारी है।

ग़ालिब की धड़कन थी हिंदी
खुसरो के मन को भाई थी।
मातृभूमि पर मर मिटने की
जन जन में अलख जगाई थी।

संस्कारों से सजी धजी ये,
मानों एक फुलवारी है।
सहज सरल औ सुगम ये हिंदी
इसमें प्रगति हमारी है।

एक सूत्र में बाँध के रखती
देश की देखो धड़कन है।
दुनियावाले जब बोलें हिंदी
तो लगता अपनापन है।

बरसल मुंबई में पनियाँ ….(कजरी)

बरसल मुंबई में अइसन पनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।

ताजी-ताजी पिया बनवऊनै,
दुल्हन जइसन हमें सजऊनै।
खोजै ओके लड़िका-पुरनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।
बरसल मुंबई में अइसन पनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।

नाला बनल सड़किया सगरो,
पिया न लौटे काम से हमरो।
कइसे पिसाईं आज चटनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।
बरसल मुंबई में अइसन पनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।

बंद पड़ल लोकल कै चक्का,
मायानगरी हक्का -बक्का।
करिहा न केहूँ कउनों नदनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।
बरसल मुंबई में अइसन पनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।

बाईक, बस, ट्रक सब केहू बेबस,
सबकी अपनी-अपनी खुन्नस।
अरे! बाटै आफत ई असमनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।
बरसल मुंबई में अइसन पनियाँ,
बहि गईल हमरी नथुनियाँ ना।

तुम्हें गिनके मिली हैं ये साँसें (भजन )

संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

तकलीफ किसी को मत देना,
खुद उसका दुःख तुम हर लेना।
सुखकर्ता वही, दुःखहर्ता वही,
बस उसके आगे कोई नहीं।
संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

दुष्कृत न होने पाए कभी,
पर कर जाते अपराध सभी।
तुम सौंप दो अपनी नइया को,
उस पतवार के आगे कोई नहीं।
संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

ये धरती पाप से दबे नहीं,
सत्कर्म से कोई थके नहीं।
अतिशय सुन्दर कितनी चीजें,
उस प्रभु से सुन्दर कोई नहीं।
संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

दुर्व्यसन की आदत मत डालो,
लालच का रोग भी मत पालो।
अनंत छिपा जो कण -कण में,
उस अनंत के आगे कोई नहीं।
संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

तुम्हें गिनके मिली हैं ये साँसें,
इसे स्वर्ग बना, न बिछा लाशें।
मत बन तू विश्व-विजेता रे!
उस शाश्वत के आगे कोई नहीं।
संसार को समझो जगवालों,
संसार में अपना कोई नहीं।
जब दुःख का बादल मँडराए,
उस प्रभु के आगे कोई नहीं।

Ramakesh

रामकेश एम.यादव (रायल्टी प्राप्त कवि व लेखक),

मुंबई

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One Comment

  1. आप ऐसे महान कमलकार को देश को गर्व है महाशय, ऐसे ही अपने विवेक से नूतन कविता गढ़ते रहिए ताकि पाठक को प्रेरणा और उत्साह बढ़े..
    ☘️☘️👏👏🫡🫡🇮🇳🇮🇳जय हिंद…

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