सब मौन क्यों ?
सब मौन क्यों ?

सब मौन क्यों ?

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गिरी जीडीपी! बढ़ी महंगाई,
डीजल पेट्रोल के मूल्य हैं हाई।
कोरोना का हुआ आगमन,
ताली थाली से हुआ स्वागतम!
पहले शर्माया,
फिर पूरी तैयारी कर आया।
अब कहर ढा रहा है,
दिनों-दिन रूला रहा है।
बढ़ी हुई है बेकारी,
चहुंओर है मारामारी।
युवाओं की है फौज बड़ी,
नहीं दिख रही कहीं नौकरी।
धरी रह गई सारी तैयारी,
अनिश्चित भविष्य देख बैठे हैं, हिम्मत हारी ।
जिनकी थी उनकी भी चली गई,
पग पग पर जनता छली गई।
रेल किराया हो गए दुगने,
जगह जगह लगीं हैं रूकने।
रसोई गैस ने चिंता बढ़ाई,
सीमा पर भी चल रही लड़ाई।
एक आफत चीन भी है भाई,
फिंगर 4 से 10 तक है आंख लगाई;
गलवान घाटी में हो चुकी लड़ाई।
हो रही अभी भी वहां छिटपुट हाथापाई,
हमारे 20 उनके 35 सैनिकों ने जान गंवाई।
पाकिस्तान की पूछो ही मत,
चींटी की बढ़ गई है हिम्मत।
नेपाल भी दिखा रहा है आंखें,
फिर भी नेता इधर उधर ही झांके।
वित्तमंत्री ने कह दिया एक्ट आॅफ गाॅड!
ईश्वर जानें कौन है फ्राॅड ?
कहां कहां लोचा है?
नोटबंदी, जीएसटी भी हमने देखा है;
सब कह रहे धोखा है , धोखा है!
टीवी वाले चिल्ला रहे सुशांत सुशांत,
फिर भी रिया नहीं हो रही शांत ।
टीवी पर आकर दिए इंटरव्यू,
रखे मीडिया के समक्ष अपने व्यू।
हम सबकी सुन रहे,
सबकी समझ रहे।
नहीं खोल रहे अपना मुखरा,
भीतर ही भीतर छुपा रहे सब अपना दुखड़ा।
लाॅकडाउन ने भी किया कमाल,
कुछ तो हुए मालामाल;
बाकी हो गए हैं कंगाल।
कुछ बाढ़ में घिरे हैं,
कुछ औंधे मुंह पड़े हैं।
बढ़ी है अपराधियों की सनक,
काम न आवे पुलिसिया हनक।
ऊपर तक पहुंच है भाई,
तो डरने की जरूरत नहीं है साईं।
कुछ अपने हिस्से की ले किए आंखें बंद,
तमाशा देख, मुस्करा रहे मंद मंद।
बचे हैं बहुत थोड़े चंद,
जो देश को लेकर हैं फिक्रमंद।
उन्हीं से होप है,
बाकी सब बिना बारूद के तोप है।
कमर तो जनता की है टूटी,
सुहा नहीं रहे किसी को कौड़ी फूटी।
नेतागण चुनाव में हैं जुटे,
अपनी नेतागिरी चमका रहे।
अगले 5 साल का भी प्रबंध कर ही लें,
क्या पता फिर कुर्सी मिले न मिले ?
वे दशकों से लूट रहे हैं, आगे भी लुटेंगे,
आवश्यकतानुसार कूटेंगे।
जबतक एकजुट न हो हम जुटेंगे,
सब हमें लुटेंगे, कूटेंगे।
बोलना पड़ेगा हल्ला बोल,
ऐ जनता! अब तो आंखें खोल।
जबतक कुर्सी न होगी डांवाडोल,
तब तक बदलेगा न परिदृश्य होल।
जनता जनार्दन!
तू मुंह खोल, अब मुंह खोल!!
कब तक हम अपनी खाट पर लेटे रहेंगे?
वे हमारी कमजोरियों का लाभ लेते रहेंगे।
सब , सब जानते है,
एक-दूजे को पहचानते हैं।
हम भी , वो भी!
फिर भी सब हैं मौन,
पता नहीं सब क्यों हैं मौन?
आखिर इनके पीछे है कौन?
कहीं दुबई वाला तो नहीं है डॉन!
मुझे पता नहीं,पर सब हैं मौन,
खुदा जाने सब क्यों हैं मौन?
कब तक रहेंगे सब मौन?
चुप्पी तो तोड़नी पड़ेगी!
तभी कुछ होगा!
वरना यूं ही सब नष्ट होगा।

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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