sangati ka asar

संगति का असर

मेरा बेटा वंश कक्षा पांच में पढ़ता है। उसकी उम्र लगभग 10 वर्ष होगी। उसका हाल फिलहाल में एक दोस्त बना है। उसका नाम मनीष है। उसकी उम्र लगभग 11 वर्ष होगी। वह तीन-चार बार वंश के साथ घर आ चुका था।

हर बार मुझे उसका व्यवहार बड़ा अजीब लगा। वह मात्र 11 वर्ष का था लेकिन उसकी हरकतें एक वयस्क व्यक्ति जैसी थी। जैसे- बात-बात पर माँ-बहन की गालियां देकर बोलना, छोटी-बड़ी लड़कियों और औरतों के प्राइवेट पार्ट्स पर गलत निगाह रखना, उन्हें एकटक देखते रहना तथा किसी बहाने से उन्हें छूने की कोशिश करना। मेरे साथ भी उसने यही करने की कोशिश की।

शुरू में तो मैने बच्चा समझकर उसकी हरकतों को नजरअंदाज किया। फिर मुझे उसके व्यवहार में गड़बड़ी नज़र आई। वह यह सब जानबूझकर करता था। उसकी ऐसी हरकतें देखकर मैं बहुत घबरा गई। मुझे लगा कि मेरे बेटे ने यह किसको दोस्त बना लिया? यह तो बच्चा लग ही नहीं रहा।

इसकी हरकतें तो एक नौजवान जैसी ही हैं। मैंने उसकी गंदी हरकतें देखकर उसको डाँट भी लगाते हुए कहा कि अपनी गन्दी हरकतों को त्याग दो, अच्छे बच्चे की तरह व्यवहार करो, पढ़ाई पर ध्यान दो.. नहीं तो मैं तेरी मम्मी से शिकायत कर दूंगी लेकिन मेरी धमकी का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

मुझे लगा मामला गंभीर है। यह तो सुधरने वाला है नहीं। मुझे खुद ही अपने बेटे की भलाई के लिए अपने बेटे को उससे दूर करना ही होगा। फिर मन में आया कि पहले एक बार मनीष की मां से बात कर लूं। मैंने वंश की स्कूल मैडम से मनीष की मम्मी का नंबर लिया और उनसे फोन पर बात की।

बातचीत से पता चला कि मनीष के घर का माहौल बेहद खराब है। उसके पापा शराब पीकर रोज घर आते हैं और मनीष की मम्मी के साथ सबके सामने बदतमीजी करते हैं, उनको मारते हैं, गालियां देते हैं और पकड़कर कमरें में ले जाते हैं। मनीष के दो भाई बहन और भी है। वे अपने बच्चों की भी शर्म नहीं करते। मनीष की मम्मी अपने पति से बहुत परेशान हैं।

मनीष की मम्मी ने आगे बताते हुए कहा-

“मनीष के पापा के बहुत सी औरतें से संबंध है। नौकरी से मिलने वाली सारी तनख्वाहवह वे अपनी अय्याशी पर उड़ा देते हैं। हर तरह की गन्दी आदत उन्होंने अपना रखी है।

रोक टोक करने पर गाली गलौज और मारपीट पर उतर आते हैं। घर पर जब पिता ही बच्चों की शर्म ना करेगा, मुझे गलत सलत जगह हाथ लगाएगा और बदतमीजी करेगा, ज़बरदस्ती करके कमरे में ले जायेगा, मना करने पर गाली गलौज करेगा तो कहीं ना कहीं इसका प्रभाव तो बच्चे पर निश्चित ही पड़ेगा।

बच्चा वही तो सीखेगा जो वह देखेगा। अपने बाप के ही सारे गुण मनीष में भी आ गए हैं। आप सही कह रही हो कि मनीष अपनी उम्र से पहले ही जवान हो गया है।

यह मैंने अपनी आंखों से भी देखा है। उसकी खूब पिटाई लगाई भी.. लेकिन बाप की तरह वह भी बेशर्म बन गया है। पुरुष प्रधान समाज होने के नाते वह भी बदतमीजी दिखाने लगा है। मनीष के पिता व दादी का भी उसको सपोर्ट है। इससे उसका हौसला और ज्यादा बढ़ा है।

मनीष के पिता कहते हैं कि लड़का है, कोई बात नहीं है। लड़कों का यह जन्मसिद्ध अधिकार है। आपको तो पता है कि लड़कें चाहें कितनी बदतमीजी कर लें, किसी की लड़की लेकर भाग भी जाएं तो कोई फर्क न पड़ेगा, उनकी तो सौ गलतियां भी माफ हो जाएंगी, जबकि लड़की की एक गलती भी समाज, परिवार द्वारा माफ नहीं हो पाती।

बताओ बहन जी, मैं क्या करूं? मैं तो मनीष को खूब समझाती हूँ, लेकिन मनीष सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा। दिनों दिन बिगड़ता जा रहा है।”

मनीष के घर की स्थिति देखकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मैंने मनीष की मम्मी से कहा-

“बहन जी, आप बुरा तो मानना मत लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मुझे अपने बेटे वंश को ही मनीष से दूर करना होगा क्योंकि संगति अगर अच्छी होती है तो बच्चा अच्छी चीजें सीखता है, अच्छी आदतें उसमें पनपती हैं और वह कहीं ना कहीं एक अच्छा नागरिक, अच्छा इंसान बनकर माँ-बाप के, देश के काम आता है।

लेकिन अगर संगति गलत हो, गन्दी हो, बुरी हो तो बच्चे के अंदर विभिन्न दुर्व्यसन पैदा हो जाते हैं जैसे- बीड़ी-सिगरेट पीना, तम्बाकू-गुटका खाना, शराब पीना, लड़की बाजी करना, अय्याशी करना, गालियां देना आदि। आपकी बातों से मुझे दिख रहा है कि आप मजबूर हैं।

आप मनीष को चाहकर भी सुधार नहीं पा रही हैं, लेकिन मुझे अपने बेटे वंश का भविष्य साफ साफ दिख रहा है। वंश मनीष के साथ रहकर गन्दी आदतें सीख रहा है, अगर मैंने उसको तुरन्त मनीष से दूर न किया, कोई सुधारात्मक कदम न उठाया तो वह बहुत जल्द ही बिगड़ जायेगा।

अगर वह बिगड़ गया तो फिर आसानी से सुधरने वाला नहीं है। गन्दी आदतें, गन्दी बातें, गन्दी हरकतें बच्चें जल्दी सीखते हैं। इसलिए मैंने फैसला किया है कि मैं वंश को मनीष से दूर कर दूंगी, उनकी दोस्ती खत्म कर दूंगी।

यही वंश के लिए और हमारे लिए भी अच्छा होगा। माँ-बाप कभी नहीं चाहते कि उनका बच्चा नालायक निकले, बल्कि माँ-बाप के लिए ही बच्चे सब कुछ होते हैं। अभिभावक बच्चों के लिए ही सब कुछ करते हैं ताकि उनका बच्चा पढ़ लिखकर एक अच्छी नौकरी पा सके, देश का जिम्मेदार नागरिक बनें, अच्छा इंसान बनें तथा बुढ़ापे में वह उनका ध्यान रखे।”

आगे वंश की मम्मी बोली-

“बहनजी, मुझे आपके साथ हमदर्दी है। मैं तो चाहूंगी कि आपके पति सही रास्ते पर आ जाएं, अपनी अय्याशियां छोड़ दें, आपको मान सम्मान और प्यार दें। अपने बच्चों को अच्छी बातें सिखाएं।

लेकिन वर्तमान परिदृश्य देखते हुए यह सब नज़र नहीं आ रहा है। मुझे माफ़ कीजियेगा.. आप बुरा मत मानियेगा। मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं मनीष को अब अपने घर में कदम भी ना रखने दूंगी क्योंकि मेरी एक 7 वर्ष की छोटी बेटी है, मुझे उसकी चिंता है।

मैं अपने बेटे वंश को स्पष्ट रूप से चेतावनी दे दूँगी कि वह आज के बाद मनीष से नहीं मिलेगा, उससे दूर रहेगा, उससे बात भी नहीं करेगा।”

मनीष की मम्मी बोली-
“बहन जी, इसमें आपको कोई गलती नहीं है। जिसका बाप इतना हरामी हो, बदतमीज हो, उसके बच्चों से तो हर कोई दूरी बनाना चाहेगा। आपकी जगह अगर मैं भी होती तो, मैं भी यही करती।” यह कहकर उसने फोन कट कर दिया।

वंश की मम्मी ने वंश को प्यार से गलत संगति के विभिन्न उदाहरण देते हुए समझाया कि किस तरह व्यक्ति गलत संगत में पड़कर अपना और परिवार, दोनों का सत्यानाश कर लेता है।

वंश को अच्छी संगति का महत्व और मम्मी की बात समझ में आ गई। वह जान गया कि मनीष के साथ रहना खतरे से खाली नहीं है। वंश ने अपनी मम्मी का कहना माना और हमेशा हमेशा के लिए मनीष की संगति से दूर हो गया।

एक बच्चे की संगति और पर्यावरण उसके व्यक्तित्व और भविष्य को आकार देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों को सही मूल्यों और आदतों को सिखाएं ताकि वह एक अच्छा और जिम्मेदार नागरिक बन सके।

अगर हम अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और उन्हें सही रास्ते पर रखना चाहते हैं तो हमारे द्वारा शुरू से ही बच्चों की गतिविधियों और दोस्तों पर नज़र रखनी बेहद आवश्यक है। ऐसा करना एक जिम्मेदार और प्यार करने वाले माता-पिता की निशानी है।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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