Faraz ki Ghazal

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़ की ग़ज़लें | Sarfraz Husain Faraz Poetry

विषय सूची

नज़्में कहा करूं न मैं ग़ज़लें कहा करूं

नज़्में कहा करूं न मैं ग़ज़लें कहा करूं।
वो चाहते हैं उन पे क़स़ीदे पढ़ा करूं।

उन पर कहां ये ज़ोर वो मेरी सुनें कभी।
मुझको ये ह़ुक्म है के मैं उनकी सुना करूं।

आंखों की आर्ज़ू है के देखूं जहांन को।
दिल चाहता है उनके ही दर पर रहा करूं।

वो भी तो ऐहतियात रखें कुछ ह़िजाब का।
परहेज़ मैं ही उन से भला क्यों किया करूं।

या रब तू अब तो वस्ल का सामान कर अ़ता।
कब तक मैं उनके चेहरे को छुपकर तका करूं।

आने का उनके वक़्त मुक़र्रर नहीं कोई।
दिल को जला के राह में कब तक रखा करूं।

रहते हैं मेरे सामने साक़ी-ओ-मयकदे।
ऐसे में कैसे जामो-सुबू से बचा करूं।

दिल मेरा ये ही कहता है मुझसे फ़राज़ अब।
हर वक़्त उनके नाम की माला जपा करूं।

फूल खिल उठते हैं हर शौक़ जवां होता है।

फूल खिल उठते हैं हर शौक़ जवां होता है।
कितना दिलकश तिरी क़ुर्बत का समां होता है।

मैं भले दूर-रहूं उन से मगर ऐ यारो।
वो जहां होते हैं दिल मेरा वहां होता है।

चांद-तारों से सजी रहती है कहने को मगर।
रंजो-ग़म रात का शबनम से अ़यां होता है।

वो तो इक हम हैं जो कह देते हैं ऐसे वरना।
दर्दे-दिल हंसके कहां सबसे बयां होता है।

जब भी ज़ंजीर हिलाती हैं हवाएं दर की।
मुझको बस उनके ही आने का गुमां होता है।

संग बाज़ों से नहीं करते वो ह़ुज्जत अक्सर।
जिनका चौराहे पे शीशे का मकां होता है।

कुछ समझ आए तो बतलाऊं भी जान-ए-जानां।
क्या बताऊं मैं तुम्हें दर्द कहां होता है।

उनकी फ़ुर्क़त में फ़राज़ आप न मानो लेकिन।
ज़ह्न जल-जल के मिरा रोज़ धुआं होता है।

कैसे समझेगा वो फ़लसफ़ा प्यार का

कैसे समझेगा वो फ़लसफ़ा प्यार का।
जिसपे गुज़रा नहीं सानेह़ा प्यार का।

तुमने समझा है जितना इसे दोस्तो।
उतना आसां है कब रास्ता प्यार का।

उम्र भर जो रुलाएगा दिल को मिरे।
दाग़ वो दे गया ह़ादिसा प्यार का।

आग नफ़रत की भड़की है हर सू मगर।
फिर भी होता नहीं ख़ात्मा प्यार का।

आ गए तख़्ते-शाही से हम रोड पर।
फिर भी छोड़ा नहीं हौसला प्यार का।

कैसे समझेगा वो दिल के जज़्बात को।
जिसने देखा नहीं आईना प्यार का।

हमको मतलब नहीं बुग़्ज़ो-कीना से कुछ।
सब से रखते हैं हम वास्ता प्यार का।

अश्क बहते हैं आंखों से पैहम मिरी।
जब भी लिखता हूं मैं मर्सिया प्यार का।

उसका जीना नहीं कोई जीना फ़राज़।
जिसने समझा नहीं मर्तबा प्यार का।

शिकवा किया करूं न शिकायत किया करूं

शिकवा किया करूं न शिकायत किया करूं।
वो कह रहे हैं सिर्फ़ मुह़ब्बत किया करूं।

बेगम की चाह है के रखूं सास का ख़याल।
और अपनी मां की रोज़ मरम्मत किया करूं।

दिल खींचता है मेरा मुझे शायरी की सम्त।
वालिद ये चाहते हैं इ़बादत किया करूं।

वो चाहते हैं उनको खिलाऊं ह़लीम रोज़।
और ख़ुद में भिंडियों पे क़नाअ़त किया करूं।

सौग़ात मशवरों की कभी सौंपते नहीं।
फिर भी वो बोलते हैं वकालत किया करूं।

जब देखूं सुर्ख़ मिलती हैं जोरू जलाल से।
ऐसे में कैसे उनको नसीह़त किया करूं।

तस्कीन मुझको मिलती है तदरीस से मगर।
उनका ख़याल है के तिजारत किया करूं।

अब जी में यह ही आता है हर आन ऐ फ़राज़।
हर दम रिवायतों से बग़ावत किया करूं।

निक़ाब रुख़ से ज़रा सा सरक तो जाने दे

निक़ाब रुख़ से ज़रा सा सरक तो जाने दे।
गुलाबे-इ़श्क़ को थोड़ा महक तो जाने दे।

अभी न जा तू मिरी जान सैर-ए-गुलशन को।
ज़रा सा आतिशे-गुल को दहक तो जाने दे।

तुझे भी जाने को कह दूंगा जान-ए-जानाना।
दिल-ए-ख़राब की पहले कसक तो जाने दे।

न ऐसे छोड़ के जा नीम-जां मुझे क़ातिल।
कबूदे-चश्म नज़र की चमक तो जाने दे।

ख़ुशी से कहके चले जाना फिर ख़ुदा ह़ाफ़िज़।
सह़र का वक़्त है गर्द-ए-फ़लक तो जाने दे।

अभी से कैसे तुझे अलविदाअ़ कह दूं मैं।
नज़र से पी के मुझे कुछ बहक तो जाने दे।

बिना खिले ही मिटाने पे तुल गया ज़ालिम।
किसी कली को चमन की चटक तो जाने दे।

मुदावा शौक़ से कर लेना दर्द का लेकिन।
फ़राज़” सोज़े-ग़मे-दिल भड़क तो जाने दे।

वो मुझे अपने कलेजे से लगाए तो सही

दुश्मनी दिल से किसी रोज़ भुलाए तो सही।
वो मुझे अपने कलेजे से लगाए तो सही।

कुछ न कुछ हल तो निकल आएगा मेरे यारो।
बैर क्या है उसे मुझ से वो बताए तो सही।

मैं तो बेताब हूं सुनने को कहानी उसकी।
ह़ाले-दिल अपना किसी दिन वो सुनाए तो सही।

तर्क ख़ुद उस ने किया मिलना-मिलाना मुझ से।
मैं तो आ जाऊंगा वो मुझको बुलाए तो सही।

रास्ता उसको भुला दूंगा मैं मयख़ाने का।
मेरी आंखों से वो आंखों को मिलाए तो सही।

बे-सबब बात बनाने से न होगा कुछ भी।
बाहुनर है तो वो कुछ करके दिखाए तो सही।

कैसे होता है कोई काम समझ जाएगा।
कोई ज़हमत वो किसी रोज़ उठाए तो सही।

मान जाऊंगा मैं सीने से लगा लूंगा उसे।
वो फ़राज़ आ के कभी मुझको मनाए तो सही।

क्या करूं

रास आती नहीं रोशनी क्या करूं।
दिल लुभाती है बस तीरगी क्या करूं।

चैन मिलता नहीं उस के बिन दोस्तो।
याद आती है वो ही परी क्या करूं।

होश अपना ही मुझ को नहीं बा-ख़ुदा।
ख़ैर लेकर मैं अब आपकी क्या करूं।

उनको तकलीफ़ देती है आ़दत मिरी।
तर्क कर दूं मैं अब दिल्लगी क्या करूं।

अब के शायद उठा ले वो नंम्बर मिरा।
कॉल उस को करूं आख़िरी क्या करूं।

दिल तो करता है हंसने-हंसाने मगर।
लब पे आती नहीं अब हंसी क्या करूं।

सख़्तियां उस पे बढ़ने लगीं दम-ब-दम।
छोड़ दूं अब मैं उसकी गली क्या करूं।

दोस्ताने के क़ाबिल वो निकला नहीं।
मैं फ़राज उससे अब दुश्मनी क्या करूं।

शिकवा करें तो कैसे करें

शिकवा करें तो कैसे करें अब किसी से हम।
खाए हैं चोट अपनी ही दरिया-दिली से हम।

लड़ते हैं मुश्किलात-ए-जहां से ख़ुशी से हम।
डरते हैं सिर्फ़ आपकी फ़ित्ना-गरी से हम।

साक़ी के साथ नास़िह़े-मुश्फ़िक़ भी रो पड़े।
निकले जो तौबा करके ज़रा मयकशी से हम।

किडनी निकाल लेते हो दौलत की चाह में।
बचते हैं यूं भी आपकी चारागरी से हम।

बचपन में ऐसा तीर लगा था जनाबे-मन।
सीधे न आज तक हुए पिछली स़दी से हम।

हर शय से बच के आ गए दरिया से दश्त तक।
पर बच न पाए ह़ुस्न की रख़्शन्दगी से हम।

घर-बार क्या है लुट गया ऐश-ओ-तरब मगर।
आए न बाज़ दोस्तो आवारगी से हम।

खुलकर फ़राज़ हंसने ही देती नहीं कभी।
तंग आ चुके हैं अपनी ही संजीदगी से हम।

अपना सा नज़र आता था

अपना सा नज़र आता था अपना भी नहीं था।
जैसा उसे समझा था वो वैसा भी नहीं था।

जिस शौक़ से उस शोख़ ने आंखों में किया घर।
उस शौक़ से उस शोख़ को देखा भी नहीं था।

दिल ही न किया जामो-सुबू मुंह से लगाने।
कहने को कहीं ज़ोह्द का सह़रा भी नहीं था।

जलवे भी दिखाने थे दिखानी थी ह़या भी।
चिलमन से निकल कर उन्हें आना भी नहीं था।

क्यों लिख के हथेली पे दिखाते रहे पैहम।
हमने तो पता आपसे पूछा भी नहीं था।

हर बात के दो पहलू नज़र आते थे उसकी।
रअ़ना सा भी दिखता था वो रअ़ना भी नहीं था।

क्या ह़ुस्ने-नज़र पाया था उस माहे-लक़ा ने।
सहबा सा भी लगता था वो सहबा भी नहीं था।

इक तीर सा छोड़ा था दिखाने के लिए बस।
मेह़फ़िल में उन्हें हम को बुलाना भी नहीं था।

बे-वज्हा के इल्ज़ाम लगाये गये हम पर
हमने तो फ़राज़ उनको यूं परखा भी नहीं था।

जहान-ए-क़ल्ब में हलचल मची है

निगाह-ए-लुत्फ़ क्या उनकी पड़ी है।
जहान-ए-क़ल्ब में हलचल मची है।

हंसी आए तो कैसे आए लब तक।
उदसी रास्ता रो के खड़ी है।

मनाने दो मुझे अब जशने-गिर्या।
न पूछो शामे-ग़म कैसे कटी है।

जो जीना है तो कुछ मज़बूत हो जा।
मिरे दिल यह धमाकों की स़दी है।

न टालो ऐसे हंस के बात मेरी।
मिरी जां यह मुह़ब्बत की घड़ी है।

छुड़ाकर तुम तो दामन चल दिए,पर।
मिरे सीने पे गोली सी लगी है।

नज़र से गिर के हम रोएं तो रोएं।
तुम्हारी आंख में कैसी नमी है।

किनारे कर दिया हम सबको जिसने।
सियासी आबे-ज़र की वो नदी है।

मुह़ब्बत में गले कटते हैं हर दिन।
कहूं कैसे मुह़ब्बत की कमी है।

जो डींगें हांकते रहते हैं हर दम।
फ़राज़ उन से हमारी कब बनी है।

उसने यह जाना नहीं है

वो पागल है उसने यह जाना नहीं है।
ग़म-ए-दिल से बेहतर ख़ज़ाना नहीं है।

ये सह़रा-ए-दैर-ओ-ह़रम है मिरे दिल।
यहां आ़शिक़ों का ठिकाना नहीं है।

मज़ा क्या ग़ज़ल-गोई का मेरे यारो।
अगर आहे-दिल आ़शिक़ाना नहीं है।

वो हंसते हैं अ़र्ज़-ए-तमन्ना पे मेरी।
उन्हें ह़ाले-दिल अब सुनाना नहीं है।

बहाने बनाओ न ऐ आने वालो।
मिरा चांद पर आशियाना नहीं है।

कभी कोई धोखा न खाया हो जिसने।
यक़ीनन वो नादां है दाना नहीं है।

मुलाक़ात की कैसे सोचूं मैं उससे।
मिरा उस तरफ़ आना-जाना नहीं है।

फ़राज़ आप कर लो वफ़ा चाहे कितनी।
मगर यह वफ़ा का ज़माना नहीं है।

ख़ुशी के नाम पे

ख़ुशी के नाम पे कुछ और ग़म बढ़ा देगी।
सियासी आग जो भड़की तो घर जला देगी।

सुकूं के साथ सफ़र तय किया करो वरना।
ज़रा सी चूक ही नाम-ओ-निशां मिटा देगी।

वो जिस हवा से है सांसों की डोर वाबस्ता।
चराग़े-ज़ीस्त किसी दिन वही बुझा देगी।

हमें कहां है ज़रूरत तुझे मिटाएं हम।
तिरी अना ही तुझे ख़ाक में मिला देगी।

इसी ख़याल में सोया न आज भी पल भर।
वो आ के ख़्वाब में नीदें मिरी उड़ा देगी।

वफ़ा,वफ़ा के तरीक़े से ठीक है वरना।
वफ़ा की धुन तुझे हर मोड़ पर झुका देगी।

फ़राज़ दूर ही रहने दो उसको नज़रों से।
के उसकी दीद मिरी बे-कली बढ़ा देगी।

प्यार से

दिल की मिटती रहे बे-कली प्यार से।
यूं ही कटती रहे ज़िन्दगी प्यार से।

अब अमावस है तो क्या हुआ दोस्तो।
घर में उतरेगी फिर चांदनी प्यार से।

नफ़रतों से ज़र्र ही पहुंचता है बस।
सबको मिलती है फ़र्त-ए-ख़ुशी प्यार से।

उसके लहजे की करते हैं तअ़रीफ़ सब।
बात करता है जो आदमी प्यार से।

दुश्मनी दोस्ताने की क़ायल हुई।
उसने की जो ज़रा दिल-लगी प्यार से।

दूर हो जाएंगे सारे वहम-ओ-गुमां।
हम से मिल तो सही तू कभी प्यार से।

आओ ऐसे ही हम भी चलें हर घड़ी।
जैसे चलती है टिक-टिक घड़ी प्यार से।

ज़हनो-दिल में उतर जाएगी ऐ फ़राज़।
पढ़ के देखो मिरी शायरी प्यार से।

तेरी क़सम आइना

छोड़ दे मेरे ज़ुल्मी बलम आइना।
टूट जाएगा तेरी क़सम आइना।

देखले इक नज़र इसकी जानिब ज़रा।
कब से तकता है तुझको सनम आइना।

हिज्र में तेरे कैसे बताऊं तुझे।
दिल पे ढाता है क्या-क्या सितम आइना।

ज़िन्दगी बख़्शता है तिरे रूप को।
तुझपे करता है कितना करम आइना।

जो भी कहता है कहता है मुंह पर ही यह।
दिल में रखता नहीं कुछ रग़म आइना।

तोड़ कर फैंक दे चाहे रस्ते पे तू।
फिर भी चूमेगा तेरे क़दम आइना।

खुलने लगते हैं सच के वरक़-दर-वरक़।
जब दिखाते हैं अहले क़लम आइना।

ख़ुद भी रोता है मुझको रुला कर फ़राज़।
जब मनाता है तेरा अलम आइना।

क्या ग़ज़ल कहें

लब पर है ज़िक्रे-अर्ज़ो-समा क्या ग़ज़ल कहें।
बिगड़ी हुई है आबो-हवा क्या ग़ज़ल कहें।

राफ़ेल है कहीं पे कहीं जेट फ़ाइटर।
सर पर खड़ी हुई है क़ज़ा क्या ग़ज़ल कहें।

ज़ुल्मो-सितम की आंच से झुलसा है हर बदन।
होती है रूह़ अपनी फ़ना क्या ग़ज़ल कहें।

रंग-ए-बहार रंगे-ख़िज़ां एक से हुए।
बे-रंग अब है रंग-ए-ह़िना क्या ग़ज़ल कहें।

रोशन हों दिल के दाग़ तो आए भी लुत्फ़ कुछ।
बुझने को है चिराग़े-वफ़ा क्या ग़ज़ल कहें।

धज्जी उड़ी हुई है उख़ुव्वत की हर तरफ़।
अपने हुए हैं हम से ख़फ़ा क्या ग़ज़ल कहें।

जिस सम्त देखते हैं क़यामत का सीन है।
हमवार ही नहीं है फ़िज़ा क्या ग़ज़ल कहें।

गर मान जाए वो तो करें कोशिशें फ़राज़।
रूठी हुई है जाने-अदा क्या ग़ज़ल कहें।

इस तरह़ उसने मिरे फ़न की पज़ीराई की

इस तरह़ उसने मिरे फ़न की पज़ीराई की।
गर्द उड़ने लगी हर दार में रुस्वाई की।

आज बोला है मिरे ख़्वाब में आने उसने।
ख़ैर हो ऐ मिरे मौला मिरी बीनाई की।

इ़श्क़ की धूप के पड़ जाएं जो साए तुझपर।
और बढ़ जाएगी रौनक़ तिरी अंगड़ाई की।

बैठ जाता हूं सजा कर मैं वरक़ पर मिसरे।
बस यही एक दवा है मिरी तन्हाई की।

मेरे साय से भी जलता है सितमगर इतना।
काट देता है वो गर्दन मिरी परछाई की।

फ़ैज़ हमने तो कभी कोई न पाया उससे।
यूं तो शौहरत है बहुत उसकी मसीह़ाई की।

छू के गैसू जो फ़राज़ उसके ग़ुजर जाए ज़रा।
बात कुछ और ही हो जाएगी पुरवाई की।

आइने में उतर न जाए कहीं

आइने में उतर न जाए कहीं।
ह़ुस्ने-जानां बिखर न जाए कही।

यूं भी रहता हूं मैं ख़मीदा सर।
उसकी जानिब नज़र न जाए कहीं।

क्यों बढ़ाते हो यूं रग़म बाहम।
घर के झगड़े में घर न जाए कहीं।

देख लूं तुझको आ मैं जी भर के।
ज़िन्दगानी ठहर न जाए कहीं।

देखकर तुझको ऐ तबीब-ए-दिल।
मेरी ह़ालत सुधर न जाए कहीं।

बस यूं रखता हूं मैं निहां इसको।
ग़म इधर का उधर न जाए कहीं।

यूं वो रखते हैं फ़ास्ला मुझसे।
मेरी क़िस्मत संवर न जाए कहीं।

मेह़वे-परवाज़ देख कर मुझ को।
वो मिरे पर कतर न जाए कहीं।

ज़िक्र मेरा है,बज़्म है उसकी।
इस ह़सद में वो मर न जाए कहीं।

देखते ही फ़राज़ फिर उसको।
रंगे-कुल्फ़त बिफर न जाए कहीं।

ज़ख़्मी हुआ है क़ल्ब मुह़ब्बत के तीर से

तेग़-ओ-तबर से और न नफ़रत के तीर से।
ज़ख़्मी हुआ है क़ल्ब मुह़ब्बत के तीर से।

मुझको हदफ़ बना के ही मारा गया था जब।
बचता मैं कैसे उनकी अ़दावत के तीर से।

आए तो कैसे आए मुझे सब्र बोलिए।
ख़ून-ए-जिगर हुआ है मुरव्वत के तीर से।

ह़ाजत न होगी उनको कभी बादो-जाम की।
मेह़फ़ूज़ हैं जो ह़ुस्न की नख़वत के तीर से।

इक बार चोट खाके मैं संभला न आज तक।
दिल कांपता है उनकी ज़राफ़त के तीर से।

आसान कब है उनका मुदावा जनाबे-मन।
उजड़ी है जिनकी मांग सियासत के तीर से।

अदना हो,कोई आ़ला हो,मासूम हो,क़वी।
बचना नहीं है कोई भी रह़लत के तीर से।

इस जैसी ज़र्ब देती नहीं कोई शय फ़राज़।
अल्लाह बचाए दिल को जहालत के तीर से।

उनकी बातों में अभी इ़श्क़ की झंकार नहीं

रंगे-अरमां तो है पर जुर्अ़ते-इक़रार नहीं।
उनकी बातों में अभी इ़श्क़ की झंकार नहीं।

मस्त नज़रों से तो झलके है मुह़ब्बत उनकी।
सुर्ख़ होठों पे मगर प्यार का इज़हार नहीं।

लाख तस्वीरें दिखाईं इसे लेकिन यह दिल।
इक सिवा उनके किसी का भी तलबगार नहीं।

वो तो चेहरे से समझ जाएंगे हाय अल्लाह।
उनसे कैसे मैं कहूंगा के मैं बीमार नहीं।

कैसे तस्लीम करूं आ़शिक़े-स़ादिक़ उनको।
ऐशो-इ़शरत से जो इक आन भी बेज़ार नहीं।

यूं परेशान हैं हमसाय हमारे हम से।
अपने आंगन में अभी कोई भी दीवार नहीं।

राहे-उल्फ़त हो यहां या के हो राहे-जन्नत।
कौन सी राह है दुनिया में जो दुश्वार नहीं।

ठोकरें खाईं ज़माने की तो अहसास हुआ।
ऐ फ़राज़ अपना कोई आपसा ग़मख़्वार नहीं।

अगर आप की मह्रबानी रहेगी

अगर आप की मह्रबानी रहेगी।
दिल-ए-मुज़तरिब पर जवानी रहेगी।

चुका जाइए क़र्ज़ बोसे का दिलबर।
ह़सीं रुख़ पे कुछ शादमानी रहेगी।

दरस आप के यूं ही होते रहे तो।
हर इक शाम अपनी सुहानी रहेगी।

नई ज़र्ब दिल पर लगा दीजिए फिर।
मुह़ब्बत की ताज़ा निशानी रहेगी।

बना लीजिए जाविदां जल्द इस को।
फ़क़त चार दिन ज़िन्दगानी रहेगी।

सलामत रहे सर के तन से जुदा हो।
लबों पर मगर ह़क़ बयानी रहेगी।

लुटा दीजिए जान इ़श्क़-ए-वतन में।
मिसालों में ज़िन्दा कहानी रहेगी।

फ़राज़ आप आने में क़ासिर रहे गर।
मिरी हर ख़ुशी बे-मआ़नी रहेगी।

उनकी बातों में अभी इ़श्क़ की झंकार नहीं

रंगे-अरमां तो है पर जुर्अ़ते-इक़रार नहीं।
उनकी बातों में अभी इ़श्क़ की झंकार नहीं।

मस्त नज़रों से तो झलके है मुह़ब्बत उनकी।
सुर्ख़ होठों पे मगर प्यार का इज़हार नहीं।

लाख तस्वीरें दिखाईं इसे लेकिन यह दिल।
इक सिवा उनके किसी का भी तलबगार नहीं।

वो तो चेहरे से समझ जाएंगे हाय अल्लाह।
उनसे कैसे मैं कहूंगा के मैं बीमार नहीं।

कैसे तस्लीम करूं आ़शिक़े-स़ादिक़ उनको।
ऐशो-इ़शरत से जो इक आन भी बेज़ार नहीं।

यूं परेशान हैं हमसाय हमारे हम से।
अपने आंगन में अभी कोई भी दीवार नहीं।

राहे-उल्फ़त हो यहां या के हो राहे-जन्नत।
कौन सी राह है दुनिया में जो दुश्वार नहीं।

ठोकरें खाईं ज़माने की तो अहसास हुआ।
ऐ फ़राज़ अपना कोई आपसा ग़मख़्वार नहीं।

मिलते नहीं ज़रा भी ख़यालात क्या करूं

मिलते नहीं ज़रा भी ख़यालात क्या करूं।
ऐसे में उससे प्यार की मैं बात क्या करूं।

पत्थर है वो न समझेगा अह़सासे-क़ल्ब को।
उसको सुना के दर्द के नग़मात क्या करूं।

वापस करूं तो रूठ न जाए वो फिर कहीं।
भेजी है उसने अश्कों की सौग़ात क्या करूं।

जिस सम्त देखता हूं हैं पहरे लगे हुए।
कैसे करूं मैं उससे मुलाक़ात क्या करूं।

वाइ़ज़ तुम्हारे लफ़्ज़ पे दूं ध्यान किस तरह़।
याद आ रहा है ह़ुस्ने-ख़राबात क्या करूं।

कैसे न मैं चलाऊं क़लम उसके नक़्श पर।
भड़के हुए हैं क़ल्ब के जज़्बात क्या करूं।

इक फूस का मकान है वो भी तबाह सा।
नींदे उड़ाय फिरती है बरसात क्या करूं।

आने को कह गया है वो दो-चार रोज़ में।
कैसे कटेंगे हाय ये लम्ह़ात क्या करूं।

उतरे ख़ुमार कैसे मिरा बोलिए फ़राज़।
नज़रों से वो पिलाता है दिन-रात क्या करूं।

बाल कविता

छुकछुक छुकछुक छुकछुक छुक।
छुकछुक छुकछुक छुकछुक छुक।

आओ बच्चों खेलें खेल।
मिलके बनाएं लम्बी रेल।

जल्दी जल्दी आ जाओ।
छूट न जाए देखो रेल।

देर लगाओगे गर तुम।
हो जाएगी रेलम-पेल।

मुफ़्त चढ़ेगा जो इसमें।
वो जाएगा सीधा जेल।

अगली ग़ाड़ी से अपना।
हरियाना में होगा मेल।

सिग्नल मिलते ही पल में।
चलने लगती अपनी रेल।

छुकछुक छुकछुक छुकछुक छुक।
छुकछुक छुकछुक छुकछुक छुक।

क्या करूं

मौसम-ए-पुर लुत्फ़ की रख़्शन्दगी का क्या करूं।
ऐसे आ़लम में तुम्हारी बे-रुख़ी का क्या करूं।

ज़ख़्म खा कर भी वफ़ा से बाज़ यह आता नहीं।
इस दिल-ए-नादान की दरियादिली का क्या करूं।

देखता हूं जितना तुमको उतनी ही बढ़ती है प्यास।
तुम ही बतलाओ के मैं इस बे-कली का क्या करूं।

ज़ुल्मत-ए-शब तो चिराग़ां कर के कर लूं पुर-ज़िया।
ग़म के मारे दिल में पसरी तीरगी का क्या करूं।

आ तो जाऊं तुम से मिलने को मैं ऐ जान-ए-अदा।
पासबानी पर मुसल्लत़ रोशनी का क्या करूं।

पाक हो रश्क-ओ-ह़सद से तो लगा लूं मैं गले।
जिसमें हो शामिल ख़लिश उस दोस्ती का क्या करूं।

दर-गुज़र करने को तो कर दूं ख़ता उसकी मगर।
दिल पे जो गुज़री गिरां उस दिल-लगी का क्या करूं।

कर ही देती है अ़यां अन्जामे-सोज़-ए-क़ल्ब यह।
मैं फ़राज़ अब इस हंसी की मुख़बिरी का क्या करूं।

सितमगर

न ढा दिल पे ऐसे क़यामत सितमगर।
तरस खा ज़रा बे-मुरव्वत सितमगर।

हमेशा सितम ही किए दिल पे तू ने।
कभी तो तू करता मुह़ब्बत सितमगर।

तुझे ज़र्ब देती थी मेरी फ़ुगां तो।
मुह़ब्बत से करता शिकायत सितमगर।

कहां तक संभालूं मैं क़ल्ब-ओ-जिगर को।
क़यामत है तेरी नज़ाकत सितमगर।

इधर भी है वीरां कोई तेरी ख़ातिर।
इधर भी हो नज़र-ए-इ़नायत सितमगर।

जो करना है कर ह़स्बे-मंशा तू लेकिन।
कभी पूछ मेरी भी ह़सरत सितमगर।

न अब ताबे-मस्ती न अब होशे-हस्ती।
ये ह़ालत है तेरी बदौलत सितमगर।

मुसलसल तिरा रास्ता तकते-तकते।
बिगड़ने लगी दिल की ह़ालत सितमगर।

मिरी बात कैसे सुने यह फ़राज़ अब।
है जब दिल पे तेरी ह़ुकूमत सितमगर।

क़िस्से में मरे हैं न कहानी में मरे हैं

क़िस्से में मरे हैं न कहानी में मरे हैं।
हम लोग यहां दर्दे-गिरानी में मरे हैं।

पज़़मुर्द जहां हो के बचे सैंकड़ों क़ातिल।
कुछ शाह वहां शोअ़ला-बयानी में मरे हैं।

क्या दर्द समझ पाया है उनका कभी कोई।
जो शख़्स़ यहां अ़ह़्दे-जवानी में मरे हैं।

दानाओं न लूटे हैं जहां ऐ़श के गौहर।
नादान वहां रंगे-फ़िशानी में मरे हैं।

ख़ामौश मिज़ाजी ने जिन्हें बख़्शी थी हस्ती।
वो फ़र्द यहां चर्ब-ज़ुबानी में मरे हैं।

ऊला में मयस्सर थी जिन्हें शाने-शहाना।
वो लफ़्ज़ मिरे मिस्रा-ए-सानी में मरे हैं।

जो अहले ख़िरद थे वो रहे होश में लेकिन।
दीवाने तकल्लुफ़ की निशानी में मरे हैं।

इक शौख़ ह़सीना के इशारे पे फ़राज़ आज।
दो ख़ब्ती जवां मौजे-रवानी में मरे हैं।

कोई ग़ज़ल कहो

दिल में हों इज़तिराब तो कोई ग़ज़ल कहो।
शाइ़र हो तुम जनाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

रूठें अगर स़िह़ाब तो कोई ग़ज़ल कहो।
दुश्मन हों बे-ह़िसाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

सिमटें जो बर्क़ो-आब तो कोई ग़ज़ल कहो।
बरसें अगर सह़ाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

बिखरें जो शब के बाब तो कोई ग़ज़ल कहो।
रोशन हो माहताब तो कोई ग़ज़ल कहो।

बढ़ जाएगी कुछ और भी रंगीनी-ए-ग़ज़ल।
बजने लगें रबाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

शाम-ए-ग़म-ए-ह़यात सजाने के वास्ते।
साग़र हों दस्तयाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

अफ़सुर्दा हो के अश्क बहाओ न इस तरह़।
टूटें जो दिल के ख़्वाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

रंग-ए-बहार हो तो मज़े लो बहार के।
मौसम हो गर ख़राब तो कोई ग़ज़ल कहो।

जब तक दिखाई दे न वो चुप ही रहो फ़राज़।
रुख़ से उठे निक़ाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

क्या समा लाजवाब है आ जा

क्या समा लाजवाब है आ जा।
हर कली पर शबाब है आ जा।

ह़ालत-ए-दिल ख़राब है आ जा।
ज़िन्दगानी अ़ज़ाब है आ जा।

इक झलक का तिरी मिरे हमदम।
मुन्तज़िर माहताब है आ जा।

हर तरफ़ ऐ़श के ख़ज़ाने हैं।
देख क्या आबो-ताब है आ जा।

तेरी आंखों की बाद के आगे।
बे-मज़ा हर शराब है आ जा।

फिर से बिखरा दे अपनी ज़ुल्फ़ों को।
सिर पे फिर आफ़ताब है आ जा।

तेरी फ़ुर्क़त में एक मुद्दत से।
कोई ख़ाना-ख़राब है आ जा।

देख ले ख़ुद फ़राज़ नज़रों से।
दिल में क्या इज़तिराब है आ जा।

लब कुशाई करो ज़ुबां खोलो

लब कुशाई करो ज़ुबां खोलो।
क्या तमन्ना है जाने-जां बोलो।

ताब खो दें न दिल जिगर अपनी।
इस तरह़ रूबरू तो मत डोलो।

मैं भी तन्हा हूं तुम भी हो तन्हा।
आओ मेरे ही हमसफ़र हो लो।

मैं तो पागल हूं जागने दो मुझे।
तुम तो कुछ देर ऐ सनम सो लो।

छेड़ कर राग फिर मुह़ब्बत के।
मेरे कानों में रस न यूं घोलो।

गर्द आलूदा है ह़सीं चेहरा।
पानी ले आऊं हाथ मुंह धो लो।

चश्मे-दिल से फ़राज़ देखो तुम।
अपनी नज़रों में मुझको मत तोलो।

नज़र आप से क्या लड़ी चश्मे-बद्दूर

नज़र आप से क्या लड़ी चश्मे-बद्दूर।
बुझी मेरी तिश्ना-लबी चश्मे-बद्दूर।

क़रीब-ए-जिगर आप क्या आए वल्लाह।
खिली मेरे दिल की कली चश्मे-बद्दूर।

अभी आप को दिल से देखा कहां है।
कहां जा रहे हो अभी चश्मे-बद्दूर।

न अपनी ख़बर है न दुनिया की परवाह।
लगन आप की क्या लगी चश्मे-बद्दूर।

बयां हो न पाएगी मेरी ज़ुबां से।
मिली आप से जो ख़ुशी चश्मे-बद्दूर।

तसव्वुर में क्या आप तशरीफ़ लाए।
सजी शहरे-दिल की गली चश्मे-बद्दूर।

फ़राज़ आप के साथ है हर घड़ी अब।
न हों आप तन्हा दुखी चश्मे-बद्दूर।

मुझसे यूं इज्तिनाब मत कीजे

मुझसे यूं इज्तिनाब मत कीजे।
ह़ालत-ए-दिल ख़राब मत कीजे।

वस्ल की शब है ऐ दिल-ए-नादां।
अब सवाल-ओ-जवाब मत कीजे।

तोड़ कर मेरे क़ल्बे-मुज़तर को।
ख़ुद पे नाज़िल अ़ज़ाब मत कीजे।

मैं हूं आ़दी नज़र से पीने का।
मेरी जानिब शराब मत कीजे।

सिलसिला रखिए मिलने-जुलने का।
इतनी जल्दी ह़िसाब मत कीजे।

बोलना है तो बोलिए हंस कर।
मुंह बना कर ख़िताब मत कीजे।

और क़िस्सा सुनाइए कोई।
बन्द दिल की किताब मत कीजे।

इससे बढ़ कर नहीं ख़ता कोई।
ऐ फ़राज़ अब सराब मत कीजे।

यह अंगूरी शराब कम है क्या

यह अंगूरी शराब कम है क्या।
आप की आबो-ताब कम है क्या।

हम को भी कुछ ख़राब रहने दो।
यह ज़माना ख़राब कम है क्या।

क्यों डराते हो हश्र से हमको।
ज़िन्दगी में अ़ज़ाब कम है क्या।

क्यों पढ़ें हम निसाबे-मकतब को।
उन के रुख़ की किताब कम है क्या।

दिल जलाने को ऐ मिरी जानां।
आप की यह नक़ाब कम है क्या।

अहले-दानिश में मज़हबी ह़ुज्जत।
यह तमाशा जनाब कम है क्या।

ख़ुद ही रो लूंगा ह़ाल पर अपने।
मेरी आंखों में आब कम है क्या।

बे-दिली के हज़ार तोह़फ़ों से।
प्यार का इक गुलाब कम है क्या।

क़ल्बे-मुज़तर के चैन की ख़ातिर।
ऐ फ़राज़ उनका ख़्वाब कम है क्या।

तीरगी में हमें रोशनी मिल गई

तीरगी में हमें रोशनी मिल गई।
आप क्या मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।

दिल को घेरे हुए थे अंधेरे बहुत।
दूर थे हमसे सुख के सवेरे बहुत।
आपको पा के ऐसा लगा बा-ख़ुदा।
चांद के साथ में चांदनी मिल गई।
तीरगी में हमें रोशनी मिल गई।
आप क्या मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।

मयकदे में भी वीरान रहता था दिल।
मेह़फ़िलों में भी सुनसान रहता था दिल।
आपकी आंख से पी के ऐसा लगा।
तिश्नगी मिट गई ताज़गी मिल गई।
तीरगी में हमें रोशनी मिल गई।
आप क्या मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।

तन दहकता था तन्हाई में हर घड़ी।
मन बहकता था पुरवाई में हर घड़ी।
आपने मुस्कुरा के जो देखा इधर।
ग़मज़दा दिल को थोड़ी ख़ुशी मिल गई।
तीरगी में हमें रोशनी मिल गई।
आप क्या मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।

तीरगी में हमें रोशनी मिल गई।
आप क्या मिल गए ज़िन्दगी मिल गई।

ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर

( नग़मा )

ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

साथ खलता है दुनिया को अपना।
प्यार डसता है दुनिया को अपना।
दूर हो जाएं फिर से चलो हम।
उंगली उठने लगीं दोस्ती पर।
ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

प्यार होता है दुनिया में जिनको।
ख़ार भी फूल लगते हैं उनको।
जो हैं दीवाने शम्अ़-ए-वफ़ा के।
जां लुटाते हैं वो रोशनी पर।
ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

ह़ुस्ने-जन्नत है वो जलपरी है।
आंख जिस से ये मेरी लड़ी है।
देख लो पहले तुम उसको वाइ़ज़।
बोलना फिर मिरी बेख़ुदी पर।
ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

बह़्र है और न है वज़्न इसमें।
है ग़ज़ल सा मगर ह़ुस्न इसमें।
मैने जज़्बात दिल के लिखे हैं।
तब्सिरे मत करो शायरी पर।
ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

तुमको मेरी क़सम है फ़राज़ अब।
खोल दो इ़श्क़ के सारे राज़ अब।
ख़ामुशी की बदौलत तुम्हारी।
दाग़ लगने लगे ज़िंदगी पर।
ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर।
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

ग़ौर कुछ तो करो बेबसी पर
यूं न भड़को मिरी मयकशी पर।

रूठे हुए सजन को मनाऊं मैं किस तरह़

( नग़मा )

उजड़ा हुआ दयार सजाऊं मैं किस तरह़।
रूठे हुए सजन को मनाऊं मैं किस तरह़।

जिस सम्त देखता हूं ख़िज़ां है खड़ी हुई।
आंधी मुनाफ़रत की है पीछे पड़ी हुई।
बेचैन क़ल्ब होता है यह सोच-सोच कर।
सह़न-ए-चमन में फूल खिलाऊं मैं किस तरह़।
उजड़ा हुआ दयार सजाऊं मैं किस तरह़।

दीवारो-दर के रंग हैं फीके पड़े हुए।
पर्दे भी धुंधले हो गए मोती जड़े हुए।
बे-ह़ाल ज़िन्दगानी है बे-नूर सा है घर।
कैसे गुज़र रही है बताऊं मैं किस तरह़।
उजड़ा हुआ दयार सजाऊं मैं किस तरह़।

होठों पे अब हंसी है न बातों में शौख़ियां।
चितवन में तीखापन है न आंखों में शौख़ियां।
ज़िन्दा थी ह़ुस्ने-यार से आवाज़ में खनक।
उसके बग़ैर गीत सुनाऊं में किस तरह़।
उजड़ा हुआ दयार सजाऊं मैं किस तरह़।

उजड़ा हुआ दयार सजाऊं मैं किस तरह़।
रूठे हुए सजन को मनाऊं मैं किस तरह़।

दो दिलों की ज़रा सी ख़ुशी पर

दो दिलों की ज़रा सी ख़ुशी पर।
उंगली उठने लगी दोस्ती पर।

कजरवी पर न जाने के क्या हो।
दिल फ़िदा है तिरी सादगी पर।

ह़ाले-दिल उनको मेरा बता दो।
जो ख़फ़ा हैं मिरी मयकशी पर।

इसको कहते हैं उल्फ़त,पतिंगे।
जान दे-देते हैं रोशनी पर।

बस यही सोच कर हूं परेशां।
क्या लिखूं मैं तिरी दिल्लगी पर।

ये नजूम-ए-फ़लक भी हैं तो क्या।
चांद ख़ुद है फ़िदा चांदनी पर।

देख लोगे अगर उसको वाइ़ज़।
शेअ़र कह दोगे उस जल-परी पर।

जिस तरफ़ देखिएगा फ़राज़ अब।
तब्सिरे हैं मिरी शायरी पर।

ज़ालिम को मेरे ख़ून की क़ीमत नहीं पता

इस ख़ौफ़नाक ज़ुल्म की उजरत नहीं पता।
ज़ालिम को मेरे ख़ून की क़ीमत नहीं पता।

ख़ुद क़त्ल होगा तब ही समझ आएगी उसे।
क़ातिल को मेरे दर्द की शिद्दत नहीं पता।

घर से तो अपने निकला हूं गुलशन की सैर को।
ले जाएगी कहां पे ये क़िस्मत नहीं पता।

इन्सानियत का क़त्ल वो करते हैं रोज़ो-शब।
ज़ह्नों में उनके क्या हैं कुदूरत नहीं पता।

इक दूसरे के वास्ते देते थे जान हम।
जाने कहां गई वो मुह़ब्बत नहीं पता।

अन्जाम बद का वैसे तो बद ही है दोस्तो।
क्या देगी अब सज़ा उन्हें क़ुदरत नहीं पता।

मज़्हब है उसका कोई न इन्सां है वो फ़राज़।
जिसको के कुश्तो-ख़ून की दिक़्क़त नहीं पता।

हमने जिसको दिल सा गौहर दे दिया

हमने जिसको दिल सा गौहर दे दिया।
उसने हमको ग़म का सागर दे दिया।

ढूंढने से भी नहीं मिलता कहीं।
दर्द उस ने कैसा मुज़मर दे दिया।

अ़नक़रीब-ए-फ़त्ह़ मुझको देख कर।
उसने उसको अपना लश्कर दे दिया।

क्या बुरा हमने किया उसको अगर।
ईंट के बदले में पत्थर दे दिया।

सेज फूलों की दिखा कर ख़्वाब में।
उस ने फिर कांटों का बिस्तर दे दिया।

हाथ रखता ही नहीं ह़ाज़िक़ कोई।
ज़ख़्म कैसा तुम ने दिलबर दे दिया।

हम न कर पाए मना हरगिज़ फ़राज़।
उसने जब भी छू के साग़र दे दिया।

गौहर : मोती
मुज़मर : गुप्त
अ़न करीब : नज़दीक
फ़त्ह़ : जीत
ह़ाज़िक़ : हकीम

हम ने घर को सजा लिया

दिल का दीपक जला लिया आ जा।
हम ने घर को सजा लिया आ जा।

अब न रूठेगा यह कभी तुझ से।
दिल को हम ने मना लिया आ जा।

शौक़ है जिसका तुझको ऐ दिलबर।
हम ने वो सब मंगा लिया आ जा।

दिल न उखड़ेगा अब यहां तेरा।
घर को जन्नत बना लिया आ जा।

कोई ज़ह़मत न होगी अब तुझको।
रुख़ से पर्दा हटा लिया आ जा।

तुझको मैदान मारना है बस।
खेल हम ने जमा लिया आ जा।

रोते – रोते तिरे तसव्वुर में।
होश हम ने गंवा लिया आ जा।

तू ही दे जा दवा ‘फ़राज़’ अब कुछ।
हाथ सबको दिखा लिया आ जा।

निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती

निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।

ह़सीं कोई तुम सा नज़र में न आए।
किसी की भी सूरत न अब मुझको भाए।
नज़र तुम पे पड़ते ही कहने लगा दिल।
लुटा दूं मिरी जां मैं तुम पर ये हस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में बढ़ने लगी कैफ़ो-मस्ती।

तुम्हारे बिना चैन पल भर नहीं अब।
तुम्हीं पर फ़िदा हैं दिल-ओ-जां नज़र सब।
तुम्हारे बिना अब न होगा गुज़ारा।
मिटेगी तुम्हीं से मिरे घर की पस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में बढ़ने लगी कैफ़ो-मस्ती।

हर इक ह़ुस्न-आरा इधर हो के गुज़रा।
मगर कोई भी दिल में ऐसे न उतरा।
तुम्हारे लिए है फ़क़त चांद वरना।
मुह़ब्बत हमारी नहीं इतनी सस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।
निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।

निगाहों में छाने लगी कैफ़ो-मस्ती।
तुम्हें देखकर खिल उठी दिल की बस्ती।

कोई ग़ज़ल कहो

देखा है रंगीं ख़्वाब तो कोई ग़ज़ल कहो।
शायर हो तुम जनाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

छूने से इज्तिनाब करो यह गुनाह है।
देखो ह़सीं गुलाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

अ़हद-ए-मुनाफ़रत में मुह़ब्बत के गर तुम्हें।
लाने हैं इन्क़लाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

रख कर न ऐसे बैठो क़लम अपनी जेब में।
काग़ज़ है दस्तयाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

मिस्ल-ए-क़मर न देखो यूं ख़ुर्शीद की तरफ़।
बनना है आफ़ताब तो कोई ग़ज़ल कहो।

ख़ामोशियों से अच्छा तो कुछ भी नहीं मगर।
मेह़फ़िल हो पुर-शबाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

चुप-चाप मयकदे में न बैठो जनाबे-मन।
साक़ी न दे शराब तो कोई ग़ज़ल कहो।

पा जाएगा सुकून दिल-ए-मुज़्तरिब फ़राज़।
ग़म हो जो बे-ह़िसाब तो कोई ग़ज़ल कहो।

क़रीन : पास
कुर्बत : करीब
सादिक : अमीन सच्चा अमानतदार
तखय्युल : खयाल
अत्फाल : बच्चे
इज्तिनाब : बचके रहना
अहदे मुनाफ़रत : नफ़रत का दौर

मिस्ले-अत्फ़ाल अम्र करना क्या

मिस्ले-अत्फ़ाल अम्र करना क्या।
आइना-आइने पे रखना क्या।

ज़ेब देता है सिर्फ शाहों को।
हम ग़रीबों का सजना-धजना क्या।

जिनमें इंसानियत नहीं कोई।
उन के सांचों में यार ढलना क्या।

सांप क्यों पालने लगे फिर तुम।
छोड़ डाला इन्होंने डसना क्या।

सुब्ह़ होते ही आ गए मिलने।
उन को आया है मेरा सपना क्या।

जिनकी लफ़्ज़ों में दम नहीं कोई।
उनकी बातों को दिल से सुनना क्या।

रोशनी ही नहीं रही जिनमें।
उन चिराग़ों का जलना-बुझना क्या।

बेरुख़ी से जो बात करते हैं।
उन की देहली पे पांव धरना क्या।

याद आती नहीं जिन्हें अपनी।
ऐ फ़राज़ उनको अपना लिखना क्या।

हर नज़ारा ह़सीन होता है

जब वो दिल के क़रीन होता है।
हर नज़ारा ह़सीन होता है।

क़ुर्बत-ए-यार का हर-इक लम्हा।
बा-ख़ुदा बेहतरीन होता है।

जिसको तौफ़ीक़ दे ख़ुदा जग में।
वो ही स़ादिक़-अमीन होता है।

इ़श्क़ फिरता है बेहिजाबाना।
ह़ुस्न पर्दा-नशीन होता है।

कोई डोली में चल दिया अपनी।
कोई ज़ेर-ए-ज़मीन होता है।

जो तख़य्युल परस्त है यारो।
बिल-यक़ीं वो ज़हीन होता है।

अ़क़्ल की यह कभी नहीं सुनता।
दिल बड़ा ही कमीन होता है।

जो बताता है ख़ामियां सबकी।
वो फ़राज़ आबगीन होता है।

वो या तो मुझ को मिला न होता

वो या तो मुझ को मिला न होता।
मिला था तो फिर जुदा न होता।

ख़याल होता जो मेरा उसको।
वो दूर मुझ से ज़रा न होता।

नसीब होती जो चाह उसकी।
हमारा जीना सज़ा न होता।

न होती उसको तलब जो मेरी।
वो मेरे ग़म में फ़ना न होता।

ज़रूर कोई ख़ता है मेरी।
वगरना वो यूं ख़फ़ा न होता।

न होता इज़्न-ए-ख़ुदा तो यारो।
क़लम हमारा चला न होता।

न होती नज़र-ए-करम जो उसकी।
ग़मों से दिल यह रिहा न होता।

जो रंग लाती दुआ़ हमारी।
वफ़ा का बदला जफ़ा न होता।

न बनती बिगड़ी फ़राज़ अपनी।
अगर वो मेह़वे दुआ़ न होता।

बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा

बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा।
निगाहों की जन्नत है चेहरा तुम्हारा।

नज़र तुम न आओ तो बढ़ती है धड़कन।
नज़र तुम से मिलते ही घटती है उलझन।
नज़ारों की ज़ीनत है चेहरा तुम्हारा।
बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा।
निगाहों की जन्नत है चेहरा तुम्हारा।

चमन की फबन हो गुलों की नज़ाकत।
मिलो तुम जो हमको तो बन जाए क़िस्मत।
बहारों की नख़्वत है चेहरा तुम्हारा।
बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा।
निगाहों की जन्नत है चेहरा तुम्हारा।

रहें दूर कैसे भला तुम से दिलबर।
तुम्हीं छाए रहते हो ज़ह्न-ओ-जिगर पर।
सरापा मुह़ब्बत है चेहरा तुम्हारा।
बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा।
निगाहों की जन्नत है चेहरा तुम्हारा।

बहुत ख़ूबसूरत है चेहरा तुम्हारा।
निगाहों की जन्नत है चेहरा तुम्हारा।

तुम जो नज़दीक आ गए होते

तुम जो नज़दीक आ गए होते।
हम ज़माने पे छा गए होते।

हाथ तुम ने अगर रखा होता।
ज़ख़्म आराम पा गए होते।

ज़ीस्त अपनी भी कुछ संवर जाती।
तुम से धोखा जो खा गए होते।

आ तो जाते क़रीबे-दिल चाहे।
तुम क़यामत ही ढा गए होते।

वक़्त ने साथ दे दिया वरना।
तुम भी हाथों से हा गए होते।

बन के मज़दूर देखते जो तुम।
धूप में घी से ता गए होते।

सारा आ़लम फ़राज़ जल जाता।
हम अगर तुमको भा गए होते।

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

अजब दस्तूर लाए जा रहे हैं।
गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं।

परिन्दे चहचहाय जा रहे हैं।
वो बुल्डोज़र चलाए जा रहे हैं।

सभी की बात काटे जा रहे हैं।
वो बस अपनी ही हांके जा रहे हैं।

उधर सब एक होते जा रहे हैं।
इधर फ़िरक़े बनाए जा रहे हैं।

हमीं पर ज़ुल्म ढाए जा रहे हैं।
हमीं क़ातिल बताए जा रहे हैं।

अभी टूटेंगे ख़्वाबों के मह़ल भी।
अभी क़ानून तोड़े जा रहे हैं।

ज़रा सी बात के झगड़े भी अब तो।
अ़दालत में घसीटे जा रहे हैं।

जो मस्का-बाज़ हैं माहिर यहां पर।
उन्हीं के पद बढ़ाए जा रहे हैं।

फ़राज़ अब क़ुव्वत-ए-परवाज़ कब है।
फ़क़त पर फड़फड़ाए जा रहे हैं।

भोली-भाली,प्यारी-प्यारी

भोली-भाली,प्यारी-प्यारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

खाती चारा फीका-फीका।
दूध यह देती मीठा-मीठा।
पल भर में भर देती मटके।
मोटी-ताज़ी,भारी-भारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

ऊंचे-नीचे,गौरे-काले।
तीख़े,चंचल,भोले-भाले।
दूध इसी का पीते हैं सब।
जज साह़ब हों या पटवारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

रूखा-सूखा खा लेती है।
ईंधन से घर भर देती है।
ख़िदमत करते हैं हम इसकी।
मिलजुलकर सब बारी-बारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

बढ़ती इससे रौनक़ दर की।
ज़ीनत है यह ख़ाली घर की।
कोई सताता है जब इसको।
लगती है सीने पे कटारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

यह है किसानों की धन-दौलत।
मिटती जिससे इनकी ग़ुरबत।
खाद भी उ़म्दा मिलती इससे।
जिससे होतीं फ़स्लें भारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

भोली-भाली,प्यारी-प्यारी।
कितनी अच्छी गाय हमारी।

जहां में सभी पर लुटाओ मुह़ब्बत

घटाओ अ़दावत,बढ़ाओ मुह़ब्बत।
जहां में सभी पर लुटाओ मुह़ब्बत।

इसे अपने दिल में बसा कर तो देखो।
सिखा देगी सब रख-रखाओ मुह़ब्बत।

जताना भी इसका ज़रूरी है यारो।
मिले जब भी मौक़ा जताओ मुह़ब्बत।

छुपाने से इसके नहीं फ़ायदा कुछ।
दिखाने की शय है दिखाओ मुह़ब्बत।

करो बन्द अपनी सियासी दुकानें।
न ज़हनों से ऐसे मिटाओ मुह़ब्बत।

पनपने न पाएं कहीं नफ़रतें अब।
सभी के दिलों में जगाओ मुह़ब्बत।

इसी से हैं आबाद शहर-ए-दिल-ओ-जां।
जहां तक निभे बस निभाओ मुह़ब्बत।

सिवा रतजगों के भला इस में है क्या।
नहीं करनी मुझको हटाओ मुह़ब्बत।

इसी से हैं आसानियां ज़िन्दगी में।
फ़राज़ अपना शेवा बनाओ मुह़ब्बत।

इ़श्क़ वालों को

इ़श्क़ वालों को परस्तिश की ज़रूरत क्या है।
इ़श्क़ से बढ़ के ज़माने में इ़बादत क्या है।

आप नख़्वत हैं बहारों की फबन गुलशन की।
आप के सामने फूलों की नज़ाकत क्या है।

अ़क़्ल वाले ही बताएंगे हमें क्या मअ़लूम।
इ़श्क़ बाज़ी में ज़़रर क्या है किफ़ायत क्या है।

हम से मत पूछिए ख़ुद देखिए आकर दिलबर।
आप के हिज्र में इस क़ल्ब की ह़ालत क्या है।

जिस पे पड़ जाती हैं कर देती हैं पागल उसको।
आप की मस्त निगाहों में करामत क्या है।

हम से उल्फ़त के परस्तार न समझेंगे कभी।
दुश्मनी क्या है दग़ा क्या है अ़दावत क्या है।

कुछ तो बतलाइए असबाबे-कराहत वल्लाह।
आप को मुझ से मिरी जान शिकायत क्या है।

मेरे नज़दीक जो आओ तो समझ जाओगे।
दोस्ती क्या है वफ़ा क्या है मुह़ब्बत क्या है।

सारे मसनूई नज़र आते हैं मतले-मक़ते।
ऐ फ़राज आप के शेअ़रों में ह़क़ीक़त क्या है।

बा-ख़ुदा तुम ख़ुदा की खिलअ़त हो

राह़त-ए-जां हो ख़्वाबे-राह़त हो।
बा-ख़ुदा तुम ख़ुदा की खिलअ़त हो।

दुख़्तर-ए-रज़ हो ताबे-नख़्वत हो।
मेरे ख़्वाबों की तुम ह़क़ीक़त हो।

रूह़े-अफ़ज़ा हो रंगे-ह़सरत हो।
चश्मे-पुरनम की तुम ही फ़रह़त हो।

क्यों न हल-चल हो ज़ायरीनों में।
शाहे-ख़ूबां हो तुम क़यामत हो।

सर से पा तक हो मिस्ले-ज़र्फ़-ए-मय।
जामे-जम हो के ख़मर-ए-जन्नत हो।

मुंह लगाते हो आइनों को क्यों।
तुम तो उन से भी ख़ूबसूरत हो।

क्यों न तुम पर फ़िदा हो क़ल्ब-ए-गुल।
तुम बहारों की ज़ेबो-ज़ीनत हो।

हाथ रक्खे रहो मिरे दिल पर।
मेरी धड़कन की तुम ज़रूरत हो।

मुद्दतों बाद तुमको देखा है।
मेरी आंखों को क्यों न ह़ैरत हो।

यह तो सच है उजड़ चुके लेकिन।
तुम फ़राज़ अब भी बेश-क़ीमत हो।

मर न जाएं तुम्हारी मुह़ब्बत में हम

ख़ुश्नुमा ज़िंदगानी की ह़सरत में हम।
मर न जाएं तुम्हारी मुह़ब्बत में हम।

ग़म सताता है हर दम तुम्हारा हमें।
ख़ुश रहें किस तरह़ बोलो ग़ुर्बत में हम।

क्या सुनाएं तुम्हें ह़ाले-दिल दोस्तो।
फंस गए प्यार कर के तवालत में हम।

सब उन्हीं के थे मुंसिफ़ गवाहो-वकील।
देखते किसकी जानिब अ़दालत में हम।

जिसका कोई मुदावा नहीं बा-ख़ुदा।
क़ैद हैं इ़श्क़ की उस मुसीबत में हम।

दूर हर इक क़बाहत से रहने लगे।
ग़र्क़ जब से हुए हैं इ़बादत में हम।

क्या बताएं तुम्हें बात दिल की फ़राज़।
लुट गए फिर तुम्हारी मुरव्वत में हम।

हाय-हाय

ऐसे लगी है चोट कलेजे पे हाय-हाय।
पत्थर लगा हो जैसे के शीशे पे हाय-हाय।

बर्बादियों का मेरी मनाते थे जश्न जो।
करते हैं अब वो अपने नतीजे पे हाय-हाय।

मेह़फ़िल है शायरी की वो करते हैं भद्दी बात।
क्यों कर न होवे उनके लतीफ़े पे हाय-हाय।

देखी मिरी उड़ान उन्होंने तो यह हुआ।
करने लगे वो अपने नसीबे पे हाय-हाय।

कहते थे ज़िन्दाबाद जो ज़ालिम की बात पर।
अब कर रहे वो किस के इशारे पे हाय-हाय।

आता नहीं पसंद किसी को भी आज कल।
सब कर रहें हैं उनके तरीक़े पे हाय-हाय।

उनके ही रहबरों ने दिए उनको ज़ख़्म जब।
करने लगे वो अपने भरोसे पे हाय-हाय।

जो बद्दुआ़एं देते थे कल तक मुझे फ़राज़।
क्यों कर रहे हैं अब वो जनाज़े पे हाय-हाय।

यादे-माज़ी की निशानी हो गए

यादे-माज़ी की निशानी हो गए।
गुल वफ़ा के ज़ाफ़रानी हो गए।

चन्द आंसू आके चश्म-ए-मस्त में।
ह़ाले-दिल की तर्जुमानी हो गए।

ह़ादिसे जो-जो भी गुज़रे इ़श्क़ में।
याद सब मुझको ज़ुबानी हो गए।

इस क़दर भाए वो दिल को बा-ख़ुदा
शह्रे-दिल की राजधानी हो गए।

कल जो रह-रह कर जलाते थे जिगर।
वो ही ग़म अब ज़िन्दगानी हो गए।

जिनको भी पर-दार हम ने कर दिया।
वो परिन्दे आसमानी हो गए।

गुल तो गुल हैं गुल की दूं मैं क्या मिसाल।
ख़ार भी उन के निशानी हो गए।

कह गए जो बेख़ुदी में हम फ़राज़।
लफ़्ज़ वो क़िस्से कहानी हो गए।

क्या ज़रा सा सुधर गया हूं मैं

क्या ज़रा सा सुधर गया हूं मैं।
मिस्ले-गौहर संवर गया हूं मैं।

आपके इ़श्क़ में ग़ज़ल बन कर।
हर वरक़ पर उतर गया हूं मैं।

मुझको ग़र्क़ाब करने वाले सुन।
डूब कर फिर उभर गया हूं मैं।

कुछ तो इनआ़मे-इ़श्क़ दो मुझको।
अपनी ह़द से गुज़र गया हूं मैं।

पहले देखा है रास्ता तेरा।
तब इधर से उधर गया हूं मैं।

देख कर ह़ाले-ज़ार गुलशन का।
मिस्ले-गुलचीं बिखर गया हूं मैं।

रूप की धूप क्या पड़ी उनके।
चाँद जैसा निखर गया हूं मैं।

याद रक्खेगी मुद्दतों दुनिया।
वो दिखा कर हुनर गया हूं मैं।

आप का अ़क्स ही नज़र आया।
शह्रे-दिल में जिधर गया हूं मैं।

उसकी जानिब फ़राज़ जाने से।
सबने रोका मगर गया हूं मैं।

तुम्हारे लिए मैं हुआ दर-ब-दर

मुह़ब्बत की क्या उसने बरसात की।
गली ही भुला दी ख़राबात की।

तुम्हारे लिए मैं हुआ दर-ब-दर।
करो क़द्र कुछ मेरे जज़्बात की।

मुझे उसकी नज़रों से पीने दो बस।
दवाई है यह मेरे स़दमात की।

खुशी से मैं बन जाऊं ख़ादिम तिरा।
मिले कोई बख़्शिश जो ख़िदमात की।

वो आए भी आ कर चले भी गए।
घड़ी मिल न पायी मुलाक़ात की।

अगर आप होंठों से छू दें इन्हें।
बढ़े शान कुछ मेरे नग़मात की।

समझ ही न पाए किसी तौर हम।
फ़राज़ उस ने हर दिन नई रात की।

उसने देखा है ऐसे ह़ैरत से

उसने देखा है ऐसे ह़ैरत से।
जैसे आया हूं मैं विलायत से।

आबो-दाना भी चाहिए साह़िब।
पेट भरता नहीं मुह़ब्बत से।

अब ज़माना नहीं है शोख़ी का।
बाज़ आ जाइए शरारत से।

कुछ तो रक्खो लिह़ाज़ दुनिया का।
मुझको देखो न इतनी ह़सरत से।

मेरा दिल ही बताएगा दिलबर।
तुम को चाहा है कितनी शिद्दत से।

सब्र आए तो किस तरह आए।
उनको देखा नहीं है मुद्दत से।

इतना नादिम हूं मैं गुनाहों पर।
मर न जाऊं फ़राज़ ग़ैरत से।

ज़िन्दगी अपनी

ज़िन्दगी अपनी यूं रो-रो के बसर होती है।
जागते-जागते आंखों में सह़र होती है।

जाल सय्याद बिछा देते हैं हर सू अपने।
जब भी बुलबुल कोई मेहमाने-शजर होती है।

पांव जिस वक़्त निकलते हैं हमारे घर से।
आप की याद ही सामाने-सफ़र होती है।

डूब जाते हैं किनारे पे सफ़ीने उनके।
जिनकी मेह़नत में ज़रा सी भी कसर होती है।

उनकी जानिब भी नज़र डालिए शाह-ए-दौरां।
चन्द सिक्कों पे यहां जिनकी गुज़र होती है।

शिद्दत-ए-दर्द में लाज़िम है फ़ुगां भी यारो।
बिन बताए कहां दुनिया को ख़बर होती है।

संगे-रह रास्ता ख़ुद उनको बताते हैं फ़राज़।
जिनकी हर वक़्त मनाज़िल पे नज़र होती है।

जिगर बेदम है दिल बैठा हुआ है

गुल-ए-रुख़ उसका क्या उतरा हुआ है।
जिगर बेदम है दिल बैठा हुआ है।

उसे आहट से भी पहचान लूंगा।
वो मेरा इस क़दर देखा हुआ है।

न आने की क़सम खा कर गए थे।
कहो कैसे इधर आना हुआ है।

ख़िज़ां भी लूट ले आ कर तो क्या जब।
बहारों में ही घर उजड़ा हुआ है।

ज़रा नाराज़गी उससे हुई क्या।
ज़माने भर से दिल बिफरा हुआ है।

उसी रस्ते पे ले आया मुझे फिर।
अचानक दिल को आख़िर क्या हुआ है।

फ़राज़ आया नहीं वो इस तरफ़ को।
नज़र को आप की धोका हुआ है।

चश्मा

बना दे न अंधा ये नफ़रत का चश्मा।
लगा लो मिरी जां मुह़ब्बत का चश्मा।

दिखेगी उन्हें कैसे ज़म अपने दिल की।
वो रखते हैं आंखों पे नख़्वत का चश्मा।

मई़शत से वाक़िफ़ तो होने दो उसको।
उतर जाएगा ख़ुद नज़ाकत का चश्मा।

नज़र कैसे यकसानियत आए उनको।
वो पहने हुए हैं सियासत का चश्मा।

निकल जाएंगी नफ़रतें ज़ह्नो दिल से।
लगा कर तो देखो उख़ुव्वत का चश्मा।

नज़र उनको बरतर भी आते हैं अबतर।
चढ़ा जिनकी आंखों पे दौलत का चश्मा।

इसी ने किया क़ौम को अपनी ग़ारत।
उठा कर रखो अब जहालत का चश्मा।

कहां ख़ैर फिर बातिलों की जहां में।
अगर सब लगा लें स़दाक़त का चश्मा।

गई उम्र अब दीद-बाज़ी की देखो।
फ़राज़ अब लगा लो शराफ़त का चश्मा।

भेजी जो हमें

भेजी जो हमें आपने तस्वीर पुरानी।
आंखों में उभर आयीं कई पीर पुरानी।

मत पूछिए क्या दिल पे गुज़रती है मिरी जां।
जब देखता हूं आपकी तह़रीर पुरानी।

क्या ख़ूब मुह़ब्बत का करिशमा है ये वल्लाह।
लगती नहीं रांझे को कभी हीर पुरानी।

यह दौर क़लम का क़लम थाम लो कसकर।
अब फैंक दो हाथों से ये शमशीर पुरानी।

अब अ़ह्द है साइंस का साइंस से खेलो।
तदबीरे-नो से हेच है तदबीर पुरानी।

क्यों कर न बहें अश्के-नदामत मिरे हरदम।
रहती हैं नज़र में कई तक़्स़ीर पुरानी।

आ जाओ फ़राज़ अब तो ज़रा होश में तुम भी।
लुट जाए न देखो कहीं जागीर पुरानी।

पल दो पल की लज़्ज़त में

पल दो पल की लज़्ज़त में।
मर मत जाना उल्फ़त में।

याद रखो अहसां उसके।
काम आए जो दिक़्क़त में।

क़ायम है जो नेकी पर।
वो जाएगा जन्नत में।

पांव फिसल जाएगा देख।
चल मत इतनी उजलत में।

चलता है जो बद रह पर।
फंसता है वो ज़िल्लत में।

वो क्या जाने ग़ुर्बत को।
डूबा है जो दौलत में।

ऐसे कैसे जाने दूं।
आए हो तुम मुद्दत में।

कैसे उनको छेड़ें हम।
वो हैं फ़राज़ अब इफ़्फ़त में।

अदाएं तुम्हारी

नज़र खा न जाए अदाएं तुम्हारी।
चलो आओ ले लूं बलाएं तुम्हारी।

कहीं बेल बूटे कहीं फूल कलियां।
ह़सीं किस क़दर हैं क़बाएं तुम्हारी।

ख़ता-बार कैसे मैं ठहराऊं तुम को।
सबाबों के सी हैं ख़ताएं तुम्हारी।

यही सोचकर क़ल्ब रोता हैअक्सर।
भुलाएंगे कैसे वफ़ाएं तुम्हारी।

बुरा मान जाओगी तुम जाने जानां।
तुम्हें बात कैसे बताएं तुम्हारी।

करें क्या ह़ज़ूर ऐसा कुछ तो बता दो।
मिलें जिससे हमको दुआ़एं तुम्हारी।

उन्हें नाम क्या दूं मैं तुम ही बता दो।
जो शौख़ी मिरा दिल लुभाएं तुम्हारी।

इसी सोच में हैं फ़राज़ आजकल हम।
ग़ज़ल कैसे तुम को सुनाएं तुम्हारी।

अमा जाओ भी

सारे जग से बग़ावत अमा जाओ भी।
तुम करोगे मुह़ब्बत अमा जाओ भी।

सब से इतनी मुरव्वत अमा जाओ भी।
लुट न जाए शराफ़त अमा जाओ भी।

किस की बातों में तुम आ गए मोह़तरम।
इ़श्क़ बाज़ी में इ़ज़्ज़त अमा जाओ भी।

प्यार से भी ज़ियादा तुम्हारे लिए।
बेश क़ीमत है दौलत अमा जाओ भी।

ऐ मुजाविर तुम्हें किसने भटका दिया।
बिन इ़बादत के जन्नत अमा जाओ भी।

कोई पागल हैं हम जो के करते फिरें।
सरकशों को नसीह़त अमा जाओ भी।

क्या किसी को मयस्सर हुई है कहीं।
ह़ुस्न वालों से राह़त अमा जाओ भी।

आज ही वीडियो कॉल करते हैं लो।
बस यही है शिकायत अमा जाओ भी।

वो ज़माने गए जब सुकूं था फ़राज़।
दौरे-ह़ाज़िर में फ़ुर्सत अमा जाओ भी।

दोस्तों से दुश्मनी अच्छी नहीं।

दोस्तों से दुश्मनी अच्छी नहीं।
दुश्मनों से दोस्ती अच्छी नहीं।

किजिए इस सम्त भी नज़र-ए-करम।
इस क़दर की बेरुख़ी अच्छी नहीं।

तजरिबा हमको भी अब यह हो गया।
दोस्ती नादान की अच्छी नहीं।

इ़श्क़ दोनों सम्त हो तो ठीक है।
एक तरफ़ा आ़शिक़ी अच्छी नहीं।

दिल के बदले दिल तो देते जाईए।
आप की यह दिल लगी अच्छी नहीं।

गाहे-गाहे कुछ कहा भी कीजिए।
हम से इतनी शर्म भी अच्छी नहीं।

कुछ ज़राफ़त आप भी तो कीजिए।
इस क़दर संजीदगी अच्छी नहीं।

लोग दीवाना समझते हैं फ़राज़।
रात-दिन यह शायरी अच्छी नहीं।

ई़द मुबारक

ऐ माहे-लक़ा रश्के-क़मर ई़द मुबारक।
तुझको ऐ मिरी जाने-जिगर ई़द मुबारक।

हो जाएं दो-चन्दा मिरे सब जश्न-ए-मसर्रत।
कह दे जो तिरी मस्त नज़र ई़द मुबारक।

तू ने ही दिखाई हैं मुझे इ़श्क़ की राहें।
क्यों कर न कहूं तुझको ख़िज़र ई़द मुबारक।

मिल जाएंगे आपस में मुह़ब्बत से मिरी जां।
बोलें जो तिरे गुल से अधर ई़द मुबारक।

मुश्किल से मिली है हमें साअ़त ये ख़ुशी की।
ऐसे में तू कहने से न डर ई़द मुबारक।

हो जाए मिरी ई़द भी ऐ जाने-तमन्ना।
कह दे तू अगर आ के इधर ई़द मुबारक।

मुस्कान न टूटे मिरे होठों की बरस भर।
वो कह दे ज़रा हंस के अगर ई़द मुबारक।

गर वो न कहें हमसे फ़राज़ आ के तो क्या है।
कहने को कहे सारा नगर ई़द मुबारक।

तो क्या करूं

आंखों की मेरी नींद चुराए तो क्या करूं।
दिल से ख़याले-यार न जाए तो क्या करूं।

आने का वादा करके वो आए न आज फिर।
इस ग़म में मुझको नींद न आए तो क्या करूं।

तफ़रीह़ के लिए तो कई जिंस हैं मगर।
तेरी ही फ़िक्र क़ल्ब को खाए तो क्या करूं।

पर-दार कर के इस को उड़ाता तो ठीक था।
बे-पर की बात कोई उड़ाए तो क्या करूं।

मैंने तो कोई तीली न फैंकी जली हुई।
तेरा ह़स़द ही तुझको जलाए तो क्या करूं।

सचमुच में ऐसा हो तो उसे टाल दूं मगर।
ख़्वाबों में आ के कोई मनाए तो क्या करूं।

यूं तो नज़र में रहते हैं लाखों ह़सीं मगर।
तेरा ही ह़ुस्न दिल को लुभाए तो क्या करूं।

कल जो गया था छोड़ के तन्हा मुझे फ़राज़।
अब वो ही आ के हाथ मिलाए तो क्या करूं।

सरापा उसका

जब से देखा है बदन फूल सा प्यारा उसका।
रक़्स करता है निगाहों में सरापा उसका।

उसको देखे बिना मिलता ही नहीं दिल को सुकूं।
कैसा आंखों को लगा है मिरी चस्का उसका।

कैसे इक पल में बिछड़ जाएं बताओ उससे।
एक मुद्दत का है जब साथ हमारा उसका।

वो न आया तो मिरी जान निकल जाएगी।
मेरी नज़रों को कहां हिज्र गवारा उसका।

वो ही पाकीज़ा तबीअ़त का हुआ है ह़ामिल।
जिसने सीने में ज़रा ख़ौफ़ बसाया उसका।

उसके हर दौर से वाक़िफ़ हैं हमारी आंखें।
हमने देखा है हर इक दौर सुहाना उसका।

उसके जैसे मुझे मिलता ही नहीं कोई कहीं।
कैसे भूलूं में भला रूप निराला उसका।

ऐ फ़राज़ और भी शैदाई हैं साक़ी के यहां।
एक तू ही नहीं दुनिया में शनासा उसका।

मुहब्बत की रस्में

सर-ए-राह आंखें बिछानी पड़ेंगी।
मुहब्बत की रस्में निभानी पड़ेंगी।

न समझेंगे ऐसे वो दर्द-ए-जिगर को।
उन्हें अपनी ग़ज़लें सुनानी पड़ेंगी।

तलब है अगर शौहरतों की तुम्हें तो।
नई नित कलाएं दिखानी पड़ेंगी।

बनाने हैं आपस में गर अच्छे रिश्ते।
ख़ताएं सभी की भुलानी पड़ेंगी।

मुरादें तुम्हारी बर आएंगी लेकिन।
लकालीफ़ लाखों उठानी पड़ेंगी।

छुपा कर रखीं एक मुद्दत जो उनसे।
वो बातें उन्हें अब बतानी पड़ेंगी।

वो फिर रास्ता मेरा घेरे हुए हैं।
निगाहें फिर उनसे मिलानी पड़ेंगी।

फ़राज़ उनको हंसके दिखाने की ख़ातिर।
तुम्हें सोज़िशें सब दबानी पड़ेंगी।

क्या करें आइना देख कर

उनका रंग-ए-हिना देख कर।
क्या करें आइना देख कर।

मेह़वे ह़ैरत है डल-झील भी।
उनका तर्ज़-ए-शिना देख कर।

दिल धड़कता है हरपल मिरा।
फ़र्क़े-फ़ुक़्र-ओ-ग़िना देख कर।

आइएगा इधर भी कभी।
कोई ख़ाली दिना देख कर।

वाक़िआ़ हमको इबलीस का।
याद आया मिना देख कर।

रुख़ से चिलमन तो सरकाइए।
इ़ल्म हो क्या बिना देख कर।

तुम परेशान क्यों हो फ़राज़।
मेरा ख़ाली इना देख कर।

मेरे नगर का

सबसे जुदा है जग में शेव: मेरे नगर का।
दिल की नज़र से देखो ख़नद: मेरे नगर का।

महका हुआ है हर इक गोश: मेरे नगर का।
क्या ख़ूब है नज़ारा क़िबल: मेरे नगर का।

वल्लाह क्या फबन है क्या रौनक़ें हैं हर सू।
क्यों कर न हर कहीं हो चर्च: मेरे नगर का।

हर सम्त है सफ़ाई हर शय पे ताज़गी है।
फूलों सा खिल रहा है चेहर: मेरे नगर का।

इसकी चमक दमक से लगता है मुझको ऐसे।
पाकीज़गी है जैसे नअ़र: मेरे नगर का।

पीतल के ज़़र्फ़ ऐसे मिलते नहीं कहीं पर।
करते हैं शह्र सारे चरब: मेरे नगर का।

आब-ओ-हवा है दिलकश क्या मस्त हैं फ़ज़ाएं।
नींदे उड़ा रहा है जलव: मेरे नगर का।

शह्र-ए-जिगर भी है यह,पीतल की भी है नगरी।
फिर क्यों न हर कोई हो रफ़्त: मेरे नगर का।

हर लब पे क्यों न होवे मिदह़त फ़राज़ उसकी।
बदला है जिसने आकर नक़्श: मेरे नगर का।

शेवा : अन्दाज़
ख़न्दा : मुस्कान
बुज़ुर्ग : मान्यवर
चर्चा : ज़िक्र
नअ़रा : नारा
चर्बा : नक़ल करना
ज़र्फ़ : बर्तन

तुम्हें आज जलवा दिखाना पड़ेगा

निक़ाब अपने रुख़ से हटाना पड़ेगा।
तुम्हें आज जलवा दिखाना पड़ेगा।

परेशां बहुत है तुम्हारे बिना दिल।
तुम्हें कुछ मुदावा बताना पड़ेगा।

तमन्ना है गर मुस्कुराने की तुमको।
ग़मों को धुंए में उड़ाना पड़ेगा।

अगर तालिबे-ख़ुल्द हो तो ये सुन लो।
गुनाहों से दामन बचाना पड़ेगा।

बुझाने को दीपक वफ़ा के बुझा दो।
मगर उम्र भर दिल जलाना पड़ेगा।

समझ जाओगे तुम मिरा दर्द यारो।
तुम्हें ज़ख़्म दिल का दिखाना पड़ेगा।

ज़माने में सिक्का जमाने की ख़ातिर।
नया तुमको करतब दिखाना पड़ेगा।

कहां तक फ़राज़ ऐसे मारे फिरोगे।
ठिकाना कहीं तो बनाना पड़ेगा।

ह़ुज़ूर आप का जग में जवाब कोई नहीं

ह़सीन चम्पा,चमेली,गुलाब कोई नहीं।
ह़ुज़ूर आप का जग में जवाब कोई नहीं।

लगे तो कैसे लगे दिल हमारा मकतब में।
यहां पे आप के रुख़ सी किताब कोई नहीं।

पढ़ा जो दिल की नज़र से तो हमने ये जाना।
निस़ाबे-इ़श्क़ के जैसा निस़ाब कोई नहीं।

हज़ार बज़्मे-तसव्वुर में हैं ह़सीं लेकिन।
मिसाल आप की आ़ली जनाब कोई नहीं।

क़दम-क़दम पे न बख़्शा हो तजरिबा जिसने।
हमारी ज़ीस्त का ऐस तो बाब कोई नहीं।

वो अपने ख़र्च को रखते हैं डायरी में सदा।
हमारे ख़र्च का उनपर ह़िसाब कोई नहीं।

पिए जो जाम निगाहों के तो यक़ीन आया।
निगाहे-नाज़ के जैसी शराब कोई नहीं।

फ़राज़’ शेअ़रो-सुख़न मे ही ग़र्क़ रहते हो।
जहां में आपसा ख़ाना ख़राब कोई नहीं।

चुप बैठें या शोर मचाएं

चुप बैठें या शोर मचाएं।
कैसे दिल की पीर दबाएं।

आहो-फ़ुग़ां तो दाब लें लेकिन।
अश्कों को हम कैसे छुपाएं।

मार न डालें जलवे तेरे।
उफ़ यह जवानी उफ़ ये अदाएं।

हंसते हैं सुन-सुन के सारे।
बिपता अपनी किस को सुनाएं।

दाना हो तो मान भी जाए।
नादां को हम कैसे मनाएं।

आजा आजा अब तो आजा।
कब तक दिल का दीप जलाएं।

नस्लों की चाहें जो भलाई।
पानी की हर बूंद बचाएं।

हमने फ़राज़ अब कह ली अपनी।
आप भी अपना ह़ाल बताएं।

दिल तड़पता है यार के मारे

मस्त नज़रों के वार के मारे।
दिल तड़पता है यार के मारे।

क्यों परेशां हैं आप ऐ दिलबर।
मेरे जैसे फ़िगार के मारे।

इ़श्क़ आराम का नहीं तालिब।
फूल रोते हैं ख़ार के मारे।

कितना रोए ख़िज़ां रसीदा दिल।
चार दिन की बहार के मारे।

लाख ग़ुरबत में चैन हो लेकिन।
क़ल्ब रोते हैं दार के मारे।

शेअ़र कहते हैं रात-दिन हम भी।
अपने इक जां-निसार के मारे।

उसने बर्बाद कर दिया हमको।
अपने ऐश-ओ-क़रार के मारे।

कैसे दीदार हो भला उनका।
छुप गए फिर वो आ़र के मारे।

कितने नादां फ़राज़ हैं हम भी।
खेल छोड़ आए हार के मारे।

दिलबर

तुम्हारी आंख का जादू ज़रा सा क्या चला दिलबर।
अजब सा एक फ़ित्ना दिल की बस्ती में उठा दिलबर।

ज़माने भर की करता फिर रहा है तू मसीहाई।
हमारे रंजो-ग़म का भी मुदावा कुछ बता दिलबर।

हमारे होश के ताइर ही बेदम हो गए सारे।
निशाना आपकी नज़रों का दिल पर क्या लगा दिलबर।

तुम्हारा शुक्रिया तुम वक़्त पर तशरीफ़ ले आए।
हमारा दर्दे-दिल कुछ देर को तो घट गया दिलबर।

उठा कर अपनी गठरी को कहां पर चल दिए हाए।
अचानक आपको इक पल में ऐसा क्या हुआ दिलबर।

समझ में कुछ नहीं आता मिरी यह माजरा क्या है।
न जाने किस लिए मैं आपका शैदा बना दिलबर।

मैं उस लम्हे को ही अपनी मता-ए-जां समझ लूंगा।
ज़रा सी देर भी गर साथ मेरे तू चला दिलबर।

अब आगे तेरी मर्ज़ी है यक़ीं कर या न कर हम पर।
हमें जो कुछ भी कहना था वो हमने कह दिया दिलबर।

तुम्हारा रास्ता वो किस लिए देखेगा बतलाओ।
फ़राज़ अब उसनेे अपना चुन लिया है इक नया दिलबर।

बात उन की ज़रा चली है अभी

बात उन की ज़रा चली है अभी।
गर्मी-ए-बज़्म कुछ बढ़ी है अभी।

उन को रोके रहो दुआरे पर।
मेरे नयनों में कुछ नमी है अभी।

और मत दीजिए हवा इस को।
आतिश-ए-तेज़ कुछ घटी है अभी।

क्यों नए तीर फिर चलाते हो।
ज़़र्ब पहली ही कुछ हरी है अभी।

कैसे बोलूं मैं उन के सिरहाने।
आंख उन की ज़रा लगी है अभी।

जिनकी ख़ातिर सजाई है यारो।
बज़्म में उन की ही कमी है अभी।

हम भी अपने गुमान में गुम हैं।
वो भी ज़िद पर अड़ी हुयी है अभी।

कैसे दीदार हो फ़राज़ उन का।
रुख़ पे चिलमन पड़ी हुयी है अभी।

ढूंढता क्या है बे-वफ़ा मुझमें

ढूंढता क्या है बे-वफ़ा मुझमें।
अब तो कुछ भी नहीं बचा मुझमें।

कोई हरगिज़ न टिक सका मुझमें।
तू ही तू बस रहा सदा मुझमें।

तेरी आंखों को जो पसंद आए।
ऐसी कोई नहीं अदा मुझमें।

जो सिखाई है इ़श्क़ ने तेरे।
अब भी बाक़ी है वो वफ़ा मुझमें।

तेरी ख़ुश्बू है या तिरे जलवे।
और क्या है तिरे सिवा मुझमें।

मस्त नज़रों से जो चढ़ा तेरी।
अब भी बाक़ी है वो नशा मुझमें।

ढूंढता कैसे मैं तुझे आख़िर।
मुझको मैं ही नहीं मिला मुझमें।

एक पल भी तुझे नहीं भाया।
क्या कमी थी भला बता मुझमें।

क्या टटोले है नब्ज़ को मेरी।
अब तो कुछ भी नहीं रहा मुझमें।

हर बुराई फ़राज़ है लेकिन।
नाम को भी नहीं अना मुझमें।

फूल दिल का खिला है बरसों में

फिर वो छत पर चढ़ा है बरसों में।
फूल दिल का खिला है बरसों में।

उसका आना हुआ है बरसों में।
घर हमारा सजा है बरसों में।

चैन दिल को मिला है बरसों में।
ग़म का बादल हटा है बरसों में।

एक अदना सा ज़ख़्म उल्फ़त का।
रफ़्ता-रफ़्ता भरा है बरसों में।

किसने घन्टी बजाई है दिल की।
शोर दिल में मचा है बरसों में।

जिसको ऐजाज़े-दर्द कहते हैं।
दर्द वो ही उठा है बरसों में।

उस की बरसों में याद आयी है।
शेअ़र कोई कहा है बरसों में।

देखिए तो फ़राज़ किस का है।
फोन अपना बजा है बरसों में।

चलो खेलें सनम होली

हवाओं में घुला चन्दन चलो खेलें सनम होली।
भुला कर आओ हर अनबन चलो खेलें सनम होली।

सजा लें प्यार का गुलशन चलो खेलें सनम होली।
बना दें ख़ाक को कुन्दन चलो खेलें सनम होली।

बहुत दिन से ख़फ़ा हैं एक दूजे से यहां हम तुम।
मिला लें आओ मन से मन चलो खेलें सनम होली।

न शर्माओ , न लज्जाओ , ह़सीं चेहरा तो दिखलाओ।
हटा लो रुख़ से ये चिलमन चलो खेलें सनम होली।

परेशां तुम भी हो तन्हा पशेमां हम भी हैं तन्हा।
मिटा लें दिल की हर उलझन चलो खेलें सनम होली।

मैं तुम को रंग दूं दिलबर मुझे तुम रंग दो जानू।
डुबो लें रंग में तन मन चलो खेलें सनम होली।

पयाम -ए- इश्क़ ले कर आई है फागुन की यह बेला।
रहें हम किस लिए दुश्मन चलो खेलें सनम होली।

कहां तक हम फ़राज़ आख़िर यूंही शर्माएं बोलो तुम।
ह़या के तोड़ कर बन्धन चलो खेलें सनम होली।

गुलशन खिलाए होली

रंगों के तश्त लेकर जिस वक़्त आए होली।
हर सू मुह़ब्बतों के गुलशन खिलाए होली।

शोअ़ले मुनाफ़रत के पल में बुझाए होली।
नग़मे वफ़ा के जिस दम गा कर सुनाए होली।

रंगों में रंग भर कर हंस बोल नाच गा कर।
अम्न-ओ-अमां से सबको रहना सिखाए होली।

रंजिश हो बैर कीना तफ़रीक़ हो तअ़स्सुब।
सारी क़बाह़तों को जड़ से मिटाए होली।

चालाकियां तो देखो इक आन में ही वल्लाह।
दुश्मन को दोस्ती के मनतर पढ़ाए होली।

देकर पयामे-उल्फ़त चुटकी में हर किसी को।
बुग़ज़-ओ-ह़सद सभी के दिल से मिटाए होली।

हर दम यही दुआ़ है तुझसे हमारी या रब।
ख़ुशियां तमाम ले कर हर साल आए होली।

गुझिया दही बड़े क्या शक्कर नमक के पारे।
पकवान हमको क्या-क्या आकर खिलाए होली।

छलका के जामो-साग़र बरसा के रंगो-उल्फ़त।
दिल को फ़राज़ अपना शैदा बनाए होली।

काम अच्छे करो सदा ह़ज़रत

सबकी लेनी है गर दुआ़ ह़ज़रत।
काम अच्छे करो सदा ह़ज़रत।

चैन तुम भी न पा सकोगे फिर।
दिल किसी का अगर दुखा ह़ज़रत।

बद का अन्जाम बद ही होता है।
क्या कहा हमने कुछ सुना ह़ज़रत।

हम पे पाबन्दियां लगाते हो।
तुम को जायज़ है क्या ख़ता ह़ज़रत।

वो हमारी स़दा भी सुनता है।
आप का ही नहीं ख़ुदा ह़ज़रत।

तुम तो तिमसाल हो मुह़ब्बत की।
तुम को जचती नहीं जफ़ा ह़ज़रत।

बाज़ आ जाओ तुन्द लहजे से।
चाहते हो अगर भला ह़ज़रत।

हो गया वो ह़क़ीर भी आ़ला।
जो सियासत में आ गया ह़ज़रत।

कुछ तो परहेज़ कीजिए वरना।
ऐसे लगती नहीं दवा ह़ज़रत।

क्या करेगी फ़राज़ फिर दुनिया।
आपका भेद गर खुला ह़ज़रत।

ऐ फ़राज़ इतनी सादगी कब तक

ऐ फ़राज़ इतनी सादगी कब तक।
दिल के दुश्मन से दोस्ती कब तक।

और दो-चार पल की मेहमां है।
ज़ुल्म ढाएगी मुफ़लिसी कब तक।

सदमा-ए-हिज्र की मिरे दिलबर।
दूर होगी ये बे-कली कब तक।

इक न इक दिन तो धुन्ध मिटनी है।
रुख़ पे छाएगी तीरगी कब तक।

आप ही पूछ कर बता दीजे।
याद आएगी आप की कब तक।

मौसम-ए-इ़श्क़ में भी ऐ साक़ी।
मेरे होठों पे तिश्नगी कब तक।

चैन तुम से ही आएगा हम को।
ग़म भुलाएगी मयकशी कब तक।

आप ख़ुद ही फ़राज़ बतला दें।
हम से रक्खेंगे दुश्मनी कब तक।

समझ लिया

रौशन था इतना चेहरा के अख़्तर समझ लिया।
धोखे से हमने आपको ख़ावर समझ लिया।

समझेंगे आप क्या हमें यह आप जानिए।
हमने तो अपना आपको मेह़वर समझ लिया।

हम मोम से भी नर्म हैं हमको छुए बग़ैर।
वल्लाह कैसे आपने पत्थर समझ लिया।

हर वक़्त करते रहते हो आहो-फ़ुग़ां ही बस।
क्या सोज़े-ज़र्बे-इ़श्क़ है मिस्टर समझ लिया।

पानी का इक गिलास जो बख़्शा था आपने।
हमने उसे भी ख़म्र का साग़र समझ लिया।

खाई जो चोट दिल पे तो अह़सास यह हुआ।
क्यों अपना हमने आपको दिलबर समझ लिया।

यूं भी सुकूं से आती रही नींद रात भर।
गूदड़ को हमने फोम का बिस्तर समझ लिया।

अपनाइयत का नाम जहां नाम को नहीं।
क्यों कर फ़राज़ हमने उसे घर समझ लिया।

देख तो लूं

ज़रा रुक तो सितमगर देख तो लूं।
तिरा मासूम पैकर देख तो लूं।

अभी देहली पे है या जा चुका तू।
तुझे इक बार मुड़ कर देख तो लूं।

ख़ुदा ह़ाफ़िज़ भी कह दूंगा मैं पहले।
तिरी रुख़्सत के मन्ज़र देख तो लूं।

कहूंगा तो ज़ुबां से कुछ नहीं,पर।
मैं तेरे वार गिन कर देख तो लूं।

मयस्सर हो न हो फिर दीद तेरी।
तिरा चेहरा मैं जी भर देख तो लूं।

ज़रा इतनी तो मोहलत दे मुझे तू।
मैं तेरे तेग़ो-निशतर देख तो लूं।

चला जाऊंगा इन आंखों से पहले।
तिरी फ़ुर्क़त का मेह़शर देख तो लूं।

हटा लेना फ़राज़ इस आइने को।
मैं अपना ह़ाले-अबतर देख तो लूं।

तुम मिरा ऐतेबार तो करते

तुम मिरा ऐतेबार तो करते।
पल दो पल इन्तज़ार तो करते।

चारा करते न करते तुम लेकिन।
ज़ख़्म मेरे शुमार तो करते।

उड़के आ जाता मैं तो ऐ दिलबर।
तुम मुझे कोई तार तो करते।

मैं गले से तुम्हें लगा लेता।
तुम ज़रा जां निसार तो करते।

जो भी होता वो देखा ही जाता।
बात तुम आर-पार तो करते।

क्यों न आता शबाब कलियों पर।
तुम ख़िज़ां को बहार तो करते।

मैं फ़राज़ उन को ही जिता देता।
वो क़ुबूल अपनी हार तो करते।

राह़त-ए-क़ल्ब, मह-लक़ा तौबा।

राह़त-ए-क़ल्ब, मह-लक़ा तौबा।
मान जाओ न दिलरुबा तौबा।

रूठ जाए न जान ही जानां।
आप क्यों हो गए ख़फ़ा तौबा।

फिर बुलाओ उसी मसीह़ा को।
फिर उठा दर्दे-ला-दवा तौबा।

ह़ुस्ने-जानां के रूबरू रोशन।
काकुल-ए-शम्अ़ की घटा तौबा।

आप का तर्ज़े-आ़म देखा तो।
दिल भी ह़ैरत से कह उठा तौबा।

ताबिश-ए-शम्स ख़ूब है लेकिन।
आपके हुस्न की ज़िया तौबा।

नाज़ो-अन्दाज़ हों के नख़रे हों।
ह़ुस्न वालों की हर अदा तौबा।

पानी पी-पी के कोसते थे जो।
अब वो देने लगे दुआ़ तौबा।

कैसे कह दूं फ़राज़ मैं हाय।
अब न होगी कोई ख़ता तौबा।

हो गई क्या

निजी कामों से राह़त हो गई क्या।
तुम्हें आने की फ़ुर्सत हो गई क्या।

तुम्हीं छाए हुए हो ज़ह्नो-दिल पर।
हमें तुम से मुह़ब्बत हो गई क्या।

निगाहों में अजब सी दिलकशी है।
किसी की फिर ज़ियारत हो गई क्या।

ख़ुशी देखे नहीं बनती तुम्हारी।
दवा-ए-दर्दे-फ़ुरक़त हो गई क्या।

कभी भूले से भी आती नहीं अब।
हंसी होठों से रुख़सत हो गई क्या।

तुम्हारे फ़ोन क्यों कर आ रहे हैं।
परेशां फिर तबीअ़त हो गई क्या।

क़स़ीदे गढ़ते रहते हो हमेशा।
क़सीदों में महारत हो गई क्या।

नज़र आते हो खोए-खोए से क्यों।
मुह़ब्बत की ह़रारत हो गई क्या।

कभी हंसकर नहीं मिलते फ़राज़ अब।
तुम्हें हंसने से नफ़रत हो गई क्या।

बद नज़र बेह़िसाब फिरते हैं

बद नज़र बेह़िसाब फिरते हैं।
आप क्यों बेह़िजाब फिरते हैं।

आपकी इक झलक की चाहत में।
सैकड़ों माहताब फिरते हैं।

इक नज़र इस तरफ़ भी हो जाए।
हम भी ख़ाना-ख़राब फिरते हैं।

उनकी गलियों में आप से वाइज़।
कितने इ़ज़्ज़त-मआब फिरते हैं।

हर घड़ी आज भी इन आंखों में।
ह़ुस्ने-जानां के ख़्वाब फिरते हैं।

मुझसे ख़ाना-ख़राब के पीछे।
आप क्यों ऐ जनाब फिरते हैं।

देखे भाले हैं वो फ़राज़ अपने।
क्यों लगा कर निक़ाब फिरते हैं।

दुश्मनी दोस्ती की क़ाइल है

दुश्मनी दोस्ती की क़ाइल है।
तीरगी रोशनी की क़ाइल है।

हार जाती है एक दिन इससे।
ख़ुदसरी आजज़ी की क़ाइल है।

हमने देखा है ग़ौर से इसको।
रहज़नी रहबरी की क़ाइल है।

पल में काफ़ूर होती है रुख़ से।
बेदिली दिल-लगी की क़ाइल है।

इसमें डूबे तो हमने यह जाना।
शायरी आशिक़ी की क़ाइल है।

ना मुकम्मल हैं एक दूजे बिन।
नग़मगी मौसिक़ी की क़ाइल है।

पानी भरती है सामने इसके।
रिन्दगी बन्दगी की क़ाइल है।

आना जाना है आपका जिससे।
हर गली उस गली की क़ाइल है।

कब यह टिकती है सामने इसके।
हर उदासी ख़ुशी की क़ाइल है।

ख़ूब मिसरा फ़राज़ है यह भी।
कजरवी सादगी की क़ाइल है।

तुम्हारे वास्ते मेह़फ़िल सजा लूं

इजाज़त हो तो यह ज़हमत उठा लूं।
तुम्हारे वास्ते मेह़फ़िल सजा लूं।

तुम्हें जिसमें हो आसानी बता दो।
मैं ख़ुद आ जाऊं या तुमको बुला लूं।

तुम्हारा हिज्र अफ़सुर्दा रखे है।
जो तुम आओ तो मैं भी मुस्कुरा लूं।

तुम्हें देखा है जब से यह ही धुन है।
नया इक रोग फिर दिल को लगा लूं।

न गुज़रे गर गिरां तुम पर तो दिलबर।
ज़रा सा मैं भी तुमको आज़मा लूं।

निगाहें फेर कर कल क्यों गए थे।
नज़र तुम से मैं अब कैसे मिला लूं।

फ़राज़ आ कर तुम्हारे पास मैं भी।
किसी दिन ह़ाले-दिल सुन लूं सुना लूं।

आंखों में उभरने लगी तस्वीर किसी की

देखी जो झलक क़ाबिले-तह़रीर किसी की।
आंखों में उभरने लगी तस्वीर किसी की।

पहलू भी बदलने का न वक़्फ़ा दिया मुझको।
कुछ ऐसे गिरी क़ल्ब पे शमशीर किसी की।

क्या ख़ाक संवारेगा वो ख़ुद को के जो अब तक।
सुलझा न सका ज़ुल्फ़े-गिरह-गीर किसी की।

रो-रो के ही कटते हैं शब-ओ-रोज़ फिर उस के।
जब बनके बिगड़ जाती है तक़दीर किसी की।

क्या लुत्फ़ है इसमें यह समझ जाओगे ख़ुद ही।
उर्दू की ज़रा सुनिए तो तक़रीर किसी की।

जब खेल बिगड़ता है किसी शख़्स का जग में।
फिर काम कहां आती है तदबीर किसी की।

उसको भी सुकूं मिल न सकेगा किसी सूरत।
जो शख़्स बढ़ाता है यहां पीर किसी की।

आऊं तो फ़राज़ आऊं मैं कैसे यह बता दे।
रक़्स़ां है मिरे पाऊं में ज़न्जीर किसी की।

आ गए पास वो बुलाने से

आ गए पास वो बुलाने से।
काविश-ए-दिल लगी ठिकाने से।

कोई मौक़ा ही वो नहीं देता।
उससे बोलूं मैं किस बहाने से।

इ़श्क़ में ख़ाक हो गया जो दिल।
क्या मिलेगा उसे जलाने से।

ज़ख़्म देना ही काम है इसका।
क्या शिकायत करें ज़माने से।

क़द्र अन्दाज़ थे अगर तुम तो।
तीर कैसे हटा निशाने से।

भूल बैठा जो मुस्कुराना तक।
वो न हंस पाएगा हंसाने से।

काम आएगा क्या किसी के वो।
जी चुराता है जो कमाने से।

कैसे जागेगा वो फ़राज़ आख़िर।
जो न जागा मिरे जगाने से।

है तअ़ल्लुक़ फ़राज़ अपना भी।
ग़ालिब-ओ-मीर के घराने से।

रफ़्ता-रफ़्ता

रफ़्ता-रफ़्ता मुख़बिरी तक आ गए।
रिश्ता-ए-ख़ूं दुश्मनी तक आ गए।

आ न जाएं देख पलकों पर कहीं।
अश्के-ग़म दिल की गली तक आ गए।

करते-करते हम इ़लाज-ए-बेकली।
आ़शिक़ी से शायरी तक आ गए।

हमने क्या रोशन किया दिल का दिया।
कुल अंधेरे रोशनी तक आ गए।

लड़ते-लड़ते मुश्किलात-ए-ग़म से हम।
ख़ुदसरी से ख़ुदकुशी तक आ गए।

ज़ोह्द के सह़रा से क्या निकले के हम।
रक़्स़े-मय से मयकशी तक आ गए।

इन्तेहा-ए-इ़श्क़-ह़ज़़ के शौक़ में।
फिर पतिंगे जां-कनी तक आ गए।

नैन लाज़िम ही छलकते हैं जहां।
हम फ़राज़ अब उस ख़ुशी तक आ गए।

ये जामे-इ़श्क़

हमारे होश के ताइर उड़ाए रखता है।
ये जामे-इ़श्क़ तमाशा बनाए रखता है।

बत़-ए-शराब में ख़ुद को डुबाए रखता है।
वो अपने ज़ख़्मे-तमन्ना छिपाए रखता है।

उसी के तीर ही होते हैं कारगर अकसर।
नज़र जो अपनी हदफ़ पर जमाए रखता है।

रहेगा दूर सदा उस से पास-ए-रुस्वाई।
जो दिल की पीर को दिल में दबाए रखता है।

उसे पसंद कहां हैं हुजूम-ए-राहे-रवां।
वो भीड़-भाड़ से ख़ुद को बचाए रखता है।

बयान कैसे करूं तुम से ह़ाले-दिल अपना।
ग़म-ए-ह़यात ठिकाना भुलाए रखता है।

निगाहे-शौक़ में अब भी जनाबे-मन देखो।
फ़राज़ आपके जलवे सजाए रखता है।

मह-ए-कामिल समझते हैं

तरब अफ़्ज़ा,निगाह-ए-शौक़ के क़ाबिल समझते हैं।
तिरे कुन्ज-ए-दहन को हम मह-ए-कामिल समझते हैं।

कहां ले आई हम को हाय तेरे फ़िक्र की दुनिया।
कोई मेह़फ़िल हो हम उसको तिरी मेह़फ़िल समझते है।

ज़ुबां खोलूं तो उड़ जाएंगे उनके होश के ताइर।
मिरी ख़ामोशियों से जो मुझे बुज़-दिल समझते हैं।

वो कैसे कर सकेंगे काम कोई पायदार आख़िर।
जो कस्ब-ए-ग़ैर मुस्तह़कम को भी मुश्किल समझते।

फ़राहम जो कराता है दवा फ़रबा दलाली पर।
हम ऐसे चारागर को हमसर-ए-क़ातिल समझते हैं।

मैं कब के सी चुका ज़ख़्म-ए-तमन्ना क़ल्बे-मुज़तर के।
मगर मुझको वो अब भी ताइर-ए-बिस्मिल समझते हैं।

लगा कर ठोकरें इन पर ही बहला लेते हैं ख़ुद को।
वो संग-ए-रहगुज़र को भी हमारा दिल समझते हैं।

जो ख़ुद हैं स़ादिक़-उल-वअ़दा समझते हैं हमें स़ादिक़।
जो ख़ुद बातिल हैं बस वो ही हमें बातिल समझते हैं।

ज़लालत का उन्हें मुंह देखना पड़ता ही इक दिन।
अमीर-ए-शहर के चमचों को जो फ़ाज़िल समझते हैं।

वो भटका कर हमें राहों में ख़ुश हैं तो रहें लेकिन।
फ़राज़ अब भी उन्हें हम रहबर-ए-मन्ज़िल समझते हैं।

कहां तक वो मुझे रुस्वा करेंगे

कभी तो ख़त्म-शुद क़िस्सा करेंगे।
कहां तक वो मुझे रुस्वा करेंगे।

न कर पाए जो ख़ुद अपना मुदावा।
वो मेरा ज़ख़्म क्या अच्छा करेंगे।

बिछड़कर तुझसे ऐ जान-ए-वफ़ा हम।
गुल-ए-दाग़-ए-जुनू देखा करेंगे।

तुम्हारे बाद ये दस्त-ए-तह-ए-संग।
हमारी राह क्या रोका करेंगे।

तसव्वुर में ग़ज़ल आया करेगी।
तुम्हें जिस वक़्त भी सोचा करेंगे।

सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उ़म्रभर अब।
तिरी तस्वीर को चूमा करेंगे।

जो दिन गुज़रे थे उनके साथ कल तक।
फ़राज़ अब उनपे भी रोया करेंगे।

प्यार ह़द से बढ़ा के मारा है

प्यार ह़द से बढ़ा के मारा है।
उसने मुझको रिझा के मारा है।

मौत यूं भी ह़सीं लगी मुझको।
ज़िंदगी ने रुला के मारा है।

आज फिर तेरे शह्र वालों ने।
मुझको पागल बता के मारा है।

कोई जुम्बिश न कर सकूं उसने।
ऐसा बेदम बना के मारा है।

क्यों न जुर्अत को दाद दूं उसकी।
तीर उसने जता के मारा है।

कैसे भूलूंगा मैं उसे जिसने।
मुझपे तोहमत लगा के मारा है।

यह भी अह़सान है फ़राज़ उसका।
उसने अपना बना के मारा है।

ह़सीन रुख़ पे ये ज़ुल्फ़ें

ह़सीन रुख़ पे ये ज़ुल्फ़ें जो तूम ने डाली हैं।
हमारी क़ैदे-क़फ़स की यही तो जाली हैं।

हमारे ह़ाल पे हंसते हैं ख़ार गुलशन के।
तुम्हारे ह़ुस्न से लज्जित गुलों की थाली हैं।

सजा लें आओ मिरी जां ग़रीब-ख़ाने को।
तुम्हें भी वक़्त है और हमभी आज ख़ाली हैं।

इन्हीं में उलझी है मेरे ख़याल की दुनिया।
तुम्हारे शानों पे काकुल जो काली-काली हैं।

करें वो क्यों न भला पढ़ के वाह वा इनको।
तमाम रात ये ग़ज़लें उन्हीं पे ढाली हैं।

सुकून जिनको है ससुराल में भी पीहर सा।
वो बेटियां ही जहां में नसीब वाली हैं।

फ़राज़ आज भी टाला तो क्या हुआ बोलो।
तुम्हारी बातें तो पहले भी उसने टाली हैं।

हो जाऊं

वरक़-वरक़ हूं मुकम्मल किताब हो जाऊं।
अगर मैं आपका आली-जनाब हो जाऊं।

करम की एक नज़र इस तरफ़ भी हो जाए।
ह़ुज़ूर मैं भी कभी लाजवाब हो जाऊं।

बग़ैर आपके अफ़सुर्दगी सी है रुख़ पर।
जो आप आएं तो खिल कर गुलाब हो जाऊं।

मैं तर्क कर दूं तमन्ना-ए-शह्र-ए-दिल सारी।
अगर मैं आपकी आंखों का ख़्वाब हो जाऊं।

ख़राब-ख़स्ता हूं दुनिया में एक मुद्दत से।
नवाज़िश आप की हो तो नवाब हो जाऊं।

बना पड़ा हूं मैं ज़ीनत कबाड़-ख़ाने की।
पढ़ो जो आप तो दिलकश निस़ाब हो जाऊं।

फ़राज़ ख़ुदको समझलूंगा आ़शिक़-ए-सादिक़।
सवाले-ह़ुस्न का गर मैं जवाब हो जाऊं।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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One Comment

  1. बहुत सुंदर दादा बहुत बेहतरीन और अद्भुत गजलें हैं सारी मैं आपकी तक़रीबन 90% गजलें वैसे पटल पर भी पड़ी पड़ी है लेकिन यहां तो इनका जब संकलन देखने को इकट्ठा मिला है मुझे तो क्या गुलदस्ता सजा है अद्भुत है बहुत ही सुंदर तारीफ के लिए मेरे पास शब्द नहीं है या फिर ऐसा कहूं कि हक्का-बक्का रह गया हूं इतनी सुंदर गजलें पढ़ करके अद्भुत मोहब्बत का गुलदस्ता सजाया है आपने लाजवाब लाजवाब

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