सशक्त मैं समय हूँ
सशक्त मैं समय हूँ
वस्त्र मैं हूँ – अस्त्र मैं हूँ,
शस्त्रों में शशक्त मैं हूं।
धड़ कटे प्रलय मचे जो मैं रुकूं ना हो सके ये,
समय मैं, समर्थ मैं जो रुकूं मैं ना हो सके ये।
हो जाए संभव अगर यह बोलूं ना समय मैं खुदको,
खंजरों-कटारों से जो सर्व शक्तिमानों से।
बेड़ियों से जकड़ लो,
तुम आओ मुझको पकड़ लो ।
रुकूं ना मैं, झुकूं ना मैं, पीछे कभी हटूं ना मैं,
आगे चलूं आगे बढ़ूं मुड़ के कभी देखूं ना मैं।
चाकुओं की धार हो, या तीरों की बौछार हो,
ईट से लड़े ये ईट या देशो का संग्राम हो।
संभव हो तो रोक लो तुम मुझको आओ टोकलो ,
मुड़ के देखूं जो अगर मैं तो भट्टियों में झोक दो ।
दुश्मनी करो ना मुझसे, दोस्ती तुम कर ही लो,
साथ मेरे चलते-चलते आसमान फलक छूओ।
दुष्टो का मैं अंत हूं, संतो का आनंद हूं,
रागिनी का राग हूं मैं, ज्ञानियों का ज्ञान हूं।
रातें थम जाती है, हवाएँ जम जाती है,
चलती हुई सांसें एकदम से थम जाती है।
रुक सके ये सूर्य भी रुक सके ये चन्द्र भी ,
रुक सके ये दिन और रातें लेकिन रुक सकूँ मैं ना कभी।
अंत में यहीं कहूं मैं व्यर्थ मुझको ना करो,
रहना शान से अगर है तो हाथ मेरा थाम यूं लो।
सर्व शक्तिमान हूं, मैं शस्त्रो में महान हूं,
समय हूं कदर करो मैं जग का अभिमान हूं।

अथर्व कुमार
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