सिंदूर

सिंदूर

सिंदूर

 

वक्त की चकाचौंधी इतनी भी मंजूर न कर।
तेरा सिंदूर हूं तूं सर मुझे दूर न कर।।

 

दीखता चुटकियों में हूं मगर विशाल हूं मै,
हर एक रंग समेटे हुये पर लाल हूं मै।,
तेरा श्रृंगार हूं तूं कांच जैसे चूर न कर।।तेरा सिंदूर ०

 

नीले गगन मे सूर्य की चमक दिखेगी तुझे,
घूंघट पट खोल के न चल हवा लगेगी मुझे,
बिखर जाऊंगा मुझे हृदय से तूं दूर न कर।।तेरा सिंदूर ०

 

वजन बहुत है मेरा तूं जो सहन करती है,
यही वजह है तूं सबसे बड़ी बनती है,
तूं ममता मयी है नजरों को इतनी क्रूर न कर‌।‌।तेरा सिंदूर ०

 

मृत्यु में प्राण रण में जीत बनता,
निराशाओं के अर्णव में गहन घन प्रीत बनता,
दान की चीज समझकर शेष मजबूर न कर।।तेरा सिंदूर ०

 

 

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कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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जरा सी बात इतनी भारी हुयी

 

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