सूरज के क़ज़ा होते ही
सूरज के क़ज़ा होते ही

सूरज के क़ज़ा होते ही

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सूरज के क़ज़ा होते ही चाँद जगमगा उठा होगा

मगर हर घर, हर सेहर सो चूका होगा

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में थक चूका हूँ इस आबरू के सिलसिले से

ये मेरी बेबसी है की यहाँ एक और हादसा होगा

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ज़रा देख हर आँखों में वही छप चूका है

खुदा के आँखों में भी रहनुमा ही दीखता होगा

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जिस लाचारी से में मुहब्बत को ढून्ढ रहा हूँ

कभी मुहब्बत भी उसी तालुकात से हमको ढूंढ़ता होगा

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जो जिंदगी मावरा तक से नहीं गुज़रता है

वह ग़म के सहारे ये बे-बसर ज़िन्दगी गुज़रता होगा

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वो रहगुज़र के सहारे हम तो पहुंचेंगे किसी रोज

मगर वो प्यासा समंदर आब को तरसता होगा

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खोया खोया उदासी से भरा हुआ ‘अनंत’

वो जुस्तुजू से लगेगा तुम्हे की बदल गया होगा

 

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शायर: स्वामी ध्यान अनंता

 

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