तुम बिन अधूरे हैं हम

तुम बिन अधूरे हैं हम

तुम बिन अधूरे हैं हम

तेरी यादों में हर रोज़ जलते रहे,
तेरी राहों में उम्मीदें पलते रहे।
दिल में बस एक ही है ग़म,
दिकु, तुम बिन अधूरे हैं हम।

चाँद भी खोया है, रातें भी है सूनी,
बिखरी हुई साँसों में ख्वाहिशें मैंने है बुनी।
हर धड़कन लगती है जैसे भरम,
दिकु, तुम बिन अधूरे हैं हम।

सावन की बूँदें तुझको बुलाएँ,
पंछियों की बोली तेरा ही नाम गुनगुनाएँ।
हर मौसम लगे अब अलम,
दिकु, तुम बिन अधूरे हैं हम।

गीतों में अब ना वो लय रही,
आँखों में भी ना कोई चमक रही।
बिन तेरे प्रेम का हर लफ्ज़ है कम,
दिकु, सच में तुम बिन अधूरे हैं हम।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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