तुम जो ज़ाहिर अगर ज़रा होते
तुम जो ज़ाहिर अगर ज़रा होते
तुम जो ज़ाहिर अगर ज़रा होते
आने वालों का रास्ता होते
ग़र दुबारा ये राब्ता होता
कुछ न होते तो हमनवा होते
ख़ुद को कितना निहारते हैं वो
काश हम यार आइना होते
आप हम हैं तभी न सब कुछ है
हम न होते तो क्या ख़ुदा होते
रोते रोते यही कहा उसने
ख़ैर इक दिन तो हम जुदा होते
देख लेता वो इक नज़र भी अगर
कौन जाने कि क्या से क्या होते
हिज्र में लोग तो मरे ही नहीं
हमने देखा ये मोजिज़ा होते
हम तेरे तक तो हो न पाए ‘असद’
क्या किसी के तेरे सिवा होते

असद अकबराबादी







