तुम्हें जिस घड़ी

तुम्हें जिस घड़ी | Tumhen Jis Ghadi

तुम्हें जिस घड़ी

( Tumhen Jis Ghadi )

तुम्हें जिस घड़ी चश्मे नम देखते हैं।
दिल ए मुज़तरिब में अलम देखते हैं।

निगाहों से दिल की जो देखो तो जानो।
तुम्हें किस मुह़ब्बत से हम देखते हैं

नज़रबाज़ हम को समझ ले न दुनिया।
ह़सीनों को हम यूं भी कम देखते हैं।

अ़दू को भी देखेंगे मिलने दो फ़ुर्सत।
अभी दोस्तों के करम देखते हैं।

कहीं प्यार मिलता नहीं देखने को।
हर इक घर में बस अब रग़म देखते हैं।

रहें दूर या रब वो हर इक बला से।
जो ख़्वाबों में ज़र के इड़म देखते हैं।

फ़राज़ उनके चुंगल से अल्लाह बचाए।
जो अच्छाईयों में भी ज़म देखते हैं।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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