विनय साग़र जायसवाल की ग़ज़लें पार्ट 2
मुलाक़ात कम नहीं होती
अजीब बात है यह रात कम नहीं होती
मेरी निगाह से ज़ुल्मात कम नहीं होती
मुझे भी उनसे मुहब्बत है कह नहीं सकता
मुहब्बतों पे मगर बात कम नहीं होती
वो एक दिन तो मुहब्बत के तीर छोड़ेंगे
हमारी उनसे मुलाक़ात कम नहीं होती
तेरे हुज़ूर वफाओं का तज़करा क्या हो
तेरे करम की करामात कम नहीं होती
किसी को अपनी इबादत पे है ग़ुरूर तो हो
मेरी नज़र में तेरी ज़ात कम नहीं होती
किसी के खेले हुए हम भी हसीं खिलौने हैं
नसीब इतनी इनायात कम नहीं होती
सुनायें क्या तुम्हें साग़र किसी के बारे में
हमीं से उसकी शिकायात कम नहीं होती
ज़ुल्मात – अँधेरे ,तीरगी
ऐशो इशरत देखकर
जो भी करते हैं मुहब्बत ऐशो-इशरत देखकर
हो ही जाते हैं किनारे वो मुसीबत देखकर
कितना भी बचकर रहो पर इन से बच सकते नहीं
दोस्ती होती है अक्सर अब ज़रूरत देखकर
उनकी नज़रों में हया औ’र सादगी का नूर है
हो गई हमको मुहब्बत ऐसी सीरत देखकर
मशवरा अच्छा था उनका हमने भी अपना लिया
काम कुछ करिये जहां में अपनी इज़्ज़त देखकर
वो कभी तन्हा नज़र आते नहीं हैं क्या करें
बात कहनी है हमें उनसे तो ख़िलवत देखकर
बाम पर आते ही उनके क्या नज़ारा हो गया
चाँद शरमाने लगा है उनकी सूरत देखकर
मेहरबां साग़र वो हम पर दिन ब दिन होने लगे
सैकड़ों दिल जल उठे उनकी इनायत देखकर
हिमायत में आ गये
सारे अज़ीज़ उनकी हिमायत में आ गये
मजबूर होके हम भी सियासत में आ गये
हाँलाकि ख़ौफ़ सबको सितमगर का था बहुत
कुछ लोग फिर भी मेरी वकालत में आ गये
इतने हसीन जाल बिछाये थे आपने
हम ख़ुद शिकार होके हिरासत में आ गये
सोचा नहीं नशे में हुकूमत के आपने
अहबाब इतने कैसे बग़ाबत में आ गये
हम तो इसी गुमान में लुटते रहे कि वो
आवारगी को छोड़ शराफ़त में आ गये
इतना फ़रेब उसकी निगाहों में था छुपा
उस पर यक़ीन करके मुसीबत में आ गये
शीशे में हमने उनको उतारा ही इस तरह
इनकार करते करते मुहब्बत में आ गये
साग़र हमारे बारे में क्या उड़ गई ख़बर
सुनते ही जिसको आज वो हैबत में आ गये
ग़रीबों की नज़रों में भगवान हैं
ऐसे ऐसे भी दुनिया में इंसान हैं
जो ग़रीबों की नज़रों में भगवान हैं
प्यार होने के क्या यह ही इम्कान हैं
जानते बूझते भी वो अंजान हैं
एक भी वो इशारा न समझे मेरा
शक्ल से तो नहीं लगते नादान हैं
देखते हैं वो नज़रें बचाकर हमें
हम इसी बात पर उन पे क़ुर्बान हैं
अपनी मर्ज़ी चलाने की ज़िद है उन्हें
हम दबाये हुए अपने अरमान हैं
एक बंदा वहांँ भूख से मर गया
रहने वाले जहाँ सब ही धनवान हैं
हमने देखे हैं साग़र बशर ऐसे भी
पास दौलत है फिर भी परेशान हैं
किस से इन्कार करूं
इस बात पे कब तक मैं ख़ुद से तकरार करूँ
किस- किस को प्यार करूँ किससे इनकार करूँ
वैसे तो हसीं सब हैं वो अपनी निगाहों में
जो दिल में उतर जाये उससे इज़हार करूँ
छुप-छुप कर मिलने में दोनों की भलाई है
दुनिया की नज़र में क्यों इसको अखबार करूँ
अब फोन के ज़रिए ही होती हैं मुलाकातें
यूँ फोन का शुकराना मैं सौ सौ बार करूँ
कुटिया में मेरी आये यह मुझ पे इनायत है
क्यों नाज़ नहीं तुम पर मेरी सरकार करूँ
यह हक़ है तुम्हें हासिल अब खुल के कहो मुझसे
जो ख़्वाब तुम्हारा हो उसको साकार करूँ
माझी ही ख़फ़ा साग़र मझधार में हो बैठा
ऐसे में भला कैसे कश्ती को पार करूँ
मुश्किल कुशा नहीं
माना कि मेरे दर्द की कोई दवा नहीं
ज़ख़्मों पे यूँ तो कीजिये लेकिन हवा नहीं
मुश्किल के वक़्त मिलता है मुश्किलकुशा नहीं
तेरी क़सम है तुझसे मुझे कुछ गिला नहीं
क्यों कर तिरे ख़याल ने दिल को छुआ नहीं
ऐसा तो कभी आज से पहले हुआ नहीं
क्यों कर रहा है दिल तू उसी गुल की आरज़ू
जो मालिक-ए-जहान ने तुझको लिखा नहीं
ऐ दोस्त आप से थी हमें और ही उमीद
यूँ तो हमें जहान से क्या-क्या मिला नहीं
हम तो हरेक हाल में रौशन ज़मीर हैं
क्या फ़र्क जो उमीद का सूरज उगा नहीं
लड़ने का वक़्त से है अभी दिल में हौसला
माँगी ख़ुदा से आज भी हमने दुआ नहीं
ऐ दोस्त तेरी चश्मे-इनायत का शुक्रिया
मुझको तो अपने ज़ख़्म का चलता पता नहीं
“साग़र मैं चीख-चीख के ख़ामोश हो गया
लेकिन मिरी सदाओं पे कोई रुका नहीं
एहतराम सावन का
हुआ है जब से चमन में क़याम सावन का
गुलों ने ख़ूब किया एहतराम सावन का
हुस्ने-मतला—
बहार आई है लेकर पयाम सावन का
सुनाओ आज कोई तुम कलाम सावन का
कली कली पे ही भंवरें हैं तान छेड़े हुए
नुमाया रंग है हर सू तमाम सावन का
बहार देख तबीयत जवान होती है
पिला दो आज निगाहों से जाम सावन का
सभी हैं ख़ुशियों के आलम में यूँ भी डूबे हुए
था मुंतज़िर हरिक खासो-आम सावन का
बहुत दिनों से उदासी है बज़्म में साक़ी
करो तो आज ज़रा इंतज़ाम सावन का
फ़िज़ाएं देख के दिल बाग़ -बाग़ होता है
बड़ा हसीन है साग़र निज़ाम सावन का
मिटाने से दुश्मनी
मिट जायेगी ज़रूर मिटाने से दुश्मनी
अच्छी नहीं है यार ज़माने से दुश्मनी
आदत को कोई नाम न दे दे ग़ुरूर का
होती है सर भी ऊँचा उठाने से दुश्मनी
मैं चाहता था बेवफ़ा उसको न सब कहें
बस हो गई ये बात जताने से दुश्मनी
हर शख़्स उनकी बात को जायज़ क़रार दे
करते हैं लोग ऐसे बहाने से दुश्मनी
अब मशवरा भी दोस्तो हर्गिज़ न दीजिए
होती है रास्ता भी दिखाने से दुश्मनी
जा तो रहे हो और बुलंदी की ओर तुम
कुछ और बढ़ न जाये ज़माने से दुश्मनी
बढ़ती है इस जहान में कहते हैं चंद लोग
यूँ रोज़ रोज़ जश्न मनाने से दुश्मनी
आने लगे हैं सैकड़ो पत्थर मेरी तरफ़
ऐसी हुई है पेड़ लगाने से दुश्मनी
साग़र अजीब दौर ये आया है क्या कहें
होती है रस्म राह बढ़ाने से दुश्मनी
पंख को परवाज़ देते हैं
ग़ज़ल को इस हुनरमंदी से हम अल्फाज़ देते हैं
परिंदे जिस तरह से पंख को परवाज़ देते हैं
छुपाओगे कहाँ तक तुम मुहब्बत के सबूतों को
ये आँखें और चेहरे खोल दिल का राज़ देते हैं
हमारी ख़ासियत को जानता सारा ज़माना है
जिसे छू लें बना उसको ही हम मुमताज़ देते हैं
मुहब्बत में कशिश यह सब तुम्हारी ही बदौलत है
तुम्हारे नाज़ ही इसको नया अंदाज़ देते हैं
हमारे लम्स से उस जिस्म में बजती है यूँ सरगम
कि जैसे मीर की ग़ज़लों को मुतरिब साज़ देते हैं
हमारी ख़्वाहिशें भी क़ैद कर लीं उसने कुछ ऐसे
परों को बाँध जैसे कुछ कबूतरबाज़ देते हैं
हवेली दिल की इस खातिर ही बस आबाद है सागर
वो लम्हें दौरे-माज़ी के मुझे आवाज़ देते हैं
खुशियां कहां से हम
क्या तुमको अब बतायें ये अपनी ज़ुबां से हम
लायें हैं ढूँढ -ढूँढ के ख़ुशियां कहाँ से हम
ऐसा किसी की ज़ुल्फ़ का साया नसीब है
महफ़ूज़ आज तक रहे दौर-ए-ख़िज़ां से हम
हैं दिल फ़रेब कितने तरक़्क़ी के रास्ते
देखें कभी निकल के तो अपने मकां से हम
रख्खेंगे लाज अपने बुज़ुर्गों की हम सदा
मुकरे नहीं हैं आज भी अपने बयां से हम
नेकी के बदले जो ये दुआएं कमाई हैं
वो साथ लेके जायेंगे इक दिन जहां से हम
मारे ख़ुशी के सबने गले से लगा लिया
गुज़रे हैं जब भी दोस्तों के दर्मियां से हम
शिकवा गिला न कोई शिकायत हुई हमें
उठकर नहीं गये जो तेरे आस्तां से हम
साग़र उमीद का ही फ़कत आसरा लिए
गुज़रे क़दम-क़दम पे किसी इम्तिहां से हम
दुआ में सलाम में
वो बात ही नहीं है दुआ में सलाम में
घुलने लगा है ज़हर मुहब्बत के जाम में
हर आँख रो रही है हरिक दिल बुझा – बुझा
कुछ तो कहीं कमी है यक़ीनन निज़ाम में
क्या हो गया है दोस्त ज़माने को आजकल
हर शख़्स मुब्तिला है किसी इंतकाम में
अम्न -ओ- अमां से खेलते हैं सरफिरे यहाँ
दहशत सी भर गई है हरिक खास-ओ-आम में
कब तक निगाह फेरें हक़ीक़त को देखकर
कटती हैं अपनी गर्दनें बस एहतराम में
महफूज़ किस तरह हो मुहब्बत का यह क़िला
हैं सैकड़ों दरारें जो दीवारों – बाम में
साग़र तू रहबरों का करिश्मा तो देख ले
उठता है इक गुबार सा हर सुब्हो – शाम में
आज़माने की बात करते हो
आज़माने की बात करते हो
दिल दुखाने की बात करते हो
सारी दुनिया उदास लगती है
जब भी जाने की बात करते हो
हमने देखा है अपनी आँखों से
तुम ज़माने की बात करते हो
मंज़िलों की सदा पे तुम हमसे
लड़खड़ाने की बात करते हो
मुझको ज़ख्मों की देके सौग़ातें
मुस्कुराने की बात करते हो
छेड़ कर साज़े-दिल को तुम हमसे
भूल जाने की बात करते हो
अपने हाथो से फूंक कर साग़र
आशियाने की बात करते हो
गर्दे – कारवां की तरह
तेरा फ़िराक़ है इक मौजे जाँसितां की तरह
बिखर न जाऊँ कहीं गर्दे-कारवां की तरह
न डस लें मुझको ये तारीक़ियाँ ये सन्नाटे
उजाला बन के चले आओ कहकशां की तरह
मेरे फ़साने में रंगीनियां ही हैं इतनी
सुना रहे हैं इसे लोग दास्तां की तरह
ये बेख़ुदी का तकाज़ा नहीं तो फिर क्या है
वो पूछते हैं मेरा हाल राज़दां की तरह
हज़ार बार इसी रहगुज़र से गुज़रा हूँ
तेरी तलाश में मैं गर्दे-कारवां की तरह
जो शख़्स थक गया दो चार ही क़दम चलकर
मैं रो रहा हूँ उसे उम्रे-जाविदां की तरह
तुम्हारे साथ तो जंगल में भी हमें हमदम
ये आसमान भी लगता था आशियां की तरह
तेरी निगाह में रानाइयाँ कहाँ साग़र
कि प्यार अब भी है नौख़ेज़ गुलसितां की तरह
फ़िराक़ – वियोग
जांसितां– जान लेवा
तारीकियां– अंधेरे
कहकशां – आकाशगंगा
उम्रे – जाविदां – अमरता, हमेशा रहने वाली
रानाइयां – रमणीकता, सुंदरता,
नौख़ेज़ – नया नया
शिव की बहती कृपा है सावन में
शिव की बहती कृपा है सावन में
जाम भर – भर पिया है सावन में
हो रहीं सबकी मन्नतें पूरी
द्वार शिव का खुला है सावन में
हर कोई कह रहा है बस्ती में
जो भी मांँगा मिला है सावन में
पेड़ पौधे ख़ुशी से झूम उठे
खोली शिव ने जटा है सावन में
लेके कांवड़ चले हैं मस्ताने
सब पे शिव का नशा है सावन में
शिव पे गंगा का जल चढ़ाने को
हर कोई चल पड़ा है सावन में
शिव के दर्शन को चल दिये साग़र
दिल न रोके रुका है सावन में
कब से था इंतज़ार सावन का
है ये रंग-ए-बहार सावन का
हर सू आया निखार सावन का
जिसको देखा उसी की आँखों में
चढ़ रहा है ख़ुमार सावन का
मौसम-ए-गुल का यह तकाज़ा है
आ चुका दें उधार सावन का
जिसकी साँसों में है ज़रा गर्मी
वोही होता शिकार सावन का
अब तो वादा निभा दे तू हमदम
जो था पिछला क़रार सावन का
प्यार बरसाओ खुल के तुम साग़र
कब से था इंतज़ार सावन का
हँस कर भुला दिया
कुछ दोस्तों ने प्यार ही इतना जता दिया
दुनिया का दर्द हमने भी हँस कर भुला दिया
हर फूल में सुगंध है अपनी अलग-अलग
रिश्तो को बस ये सोच के हमने निभा दिया
मैं मुंतज़िर था देगा कोई तो जवाब वो
उसने मेरे सवाल पे बस मुस्कुरा दिया
ऐ दोस्त मुझको लाके ख़यालों की भीड़ में
इस ज़िन्दगी ने और भी तन्हा बना दिया
दुनिया से जाके आँख मिलाऊँ तो किस तरह
इल्ज़ाम उसने ऐसा मेरे सर लगा दिया
परछाईं मेरी आके मेरे पाँव पड़ गई
सूरज को अपने सर पे जो मैंने बिठा दिया
साग़र फ़ज़ाएं आज हैं क्यों कर धुआँ-धुआँ
शायद किसी ने मेरा नशेमन जला दिया
मुझको संभालते क्यों हैं
हजारों ऐब वो मुझ में निकालते क्यों हैं
मैं गिर रहा हूँ तो मुझको संभालते क्यों हैं
दिखा है जब भी अंधेरा उन्हें मेरे घर में
चिराग़ आके हमेशा वो बालते क्यों हैं
किसी की बात चले या किसी से हो शिकवा
हरेक तंज़ वो मुझ पर ही ढालते क्यों हैं
जवाब आप ने अब तक नहीं दिया मुझको
मेरे सवाल को हर बार टालते क्यों हैं
ज़माने वालों की फ़ितरत समझ नहीं आती
ज़रा सी बात को इतना उछालते क्यों हैं
वो जब भी लड़ते हैं हमने ये उनसे पूछा है
हमारे ख़्वाब निगाहों में पालते क्यों हैं
वो जब भी मिलते हैं मुझ से कहीं तो ऐ सागर
मेरी निग़ाहों को पहले खंगालते क्यों हैं
घर को सजा लिया जाये
इसी बहाने से घर को सजा लिया जाये
संदेशा भेज के उनको बुला लिया जाये
वो आ रहे हैं अंधेरा उन्हें न खल जाये
चराग़ राह में उनकी जला लिया जाये*
सुना है रूठ के मुझसे उदास रहते हैं
मैं सोचता हूँ उन्हें अब मना लिया जाये
तड़प उठेंगे वो ज़ख़्मों को देखकर मेरे
कि दर्द आह को अपनी दबा लिया जाये
इसी में मुझको नज़र आ रही समझदारी
फ़रेबे – यार से ख़ुद को बचा लिया जाये
बनेगी कैसे ये बिगड़ी समझ नहीं आता
कि चल के उनसे ही क्या मशवरा लिया जाये
सर-ए-शाम ही मैख़ाना बंद है साग़र
सदाएं देके क्या दर खटखटा लिया जाये
मुलाक़ात इन दिनों
बेकैफ़ हो गई है मुलाक़ात इनदिनों
बरसे नहीं है उनकी इनायात इनदिनों
उठते हैं दिल में ऐसे सवालात इन दिनों
मिलते नहीं हैं जिनके जवाबात इनदिनों
सूरज से छेड़ दी है सितारों ने जंग क्या
सरगोशियों में महव हैं ज़र्रात इनदिनों
अब तितलियों का ख़ून भी पीने लगे हैं फूल
कितनी बदल गईं हैं रिवायात इनदिनों
जुगनू भी कर रहे हैं अंधेरों में ख़ुदकुशी
बदली हुई है सूरते-हालात इन दिनों
अहल-ए-सितम भी पढ़ने लगे मेरी दास्ताँ
अच्छी लगी है उनको मेरी बात इनदिनों
बच्चे तो अब तरस गये पानी के खेल को
होती थी वर्ना शहर में बरसात इनदिनों
साग़र हमारे दौर के बच्चों की जुस्तजू
करते हैं देखो कितने तजुर्बात इनदिनों
रोज़ मिलना यार सावन में
लिया वादा है उसने रोज़ मिलना यार सावन में
करेंगे ख़ूब हम तुम प्यार की गुफ़्तार सावन में
बड़े दिन से तमन्ना थी इलाही बस यही मेरी
वो कर दें काश मुझसे प्यार का इज़हार सावन में
तलब को देखकर मुझको पिलाना जाम भर भर के
नहीं करना कभी इनकार तुम दिलदार सावन में
गुज़र जाये न सावन पूरा यूँ लड़ते झगड़ते ही
क़सम खाओ नहीं करना है अब तकरार सावन में
फ़कत मैं ही नहीं तुम ही नहीं कहता ज़माना है
अज़ल से मन रहा है प्यार का त्यौहार सावन में
जिधर देखो उधर ही रोज़ बादल गश्त करते हैं
बड़ी मुश्किल से होता चाँद का दीदार सावन में
मुहब्बत की घटा उमड़ी है साग़र उनकी आँखों में
यक़ीं है रोज़ होगी प्यार की बौछार सावन में
तलवार दी गई
ख़ुद पर ही वार करने को तलवार दी गई
थाली में यूँ सजा के हमें हार दी गई
गर्दन हमारी यूँ तो सर-ए-दार दी गई
फिर भोंकने को जिस्म में तलवार दी गई
कहने को हम खड़े थे अज़ीज़ों के दर्मियां
मंज़िल हमीं को और भी दुश्वार दी गई
हमने बड़े हुनर से सजाया था गुलसितां
तोहमत हमारे सर पे ही सरकार दी गई
महफ़िल में सब की आँख से आँसू निकल पड़ें
गीतों में इस शऊर से झंकार दी गई
हम भाइयों के दर्मियां दूरी बनी रहे
ऐसी हमारे बीच में दीवार दी गई
जिनके सितम की लिख्खी थी हर सू ही दास्तां
उनके ही सर पे दोस्तो दस्तार दी गई
तशनालबी का राज़ न खुल जाये इसलिए
हमको बड़े गिलास में हर बार दी गई
साग़र तमाम उम्र मिले पेचोख़म हमें
कोई भी राह हमको न हमवार दी गई
मुझे पूजती रही
दीवारो-दर से जिसकी सदा गूँजती रही
मेरी निगाह घर में उसे ढूँढती रही
अहसास था ख़याल तसव्वुर यक़ीन था
किस किस लिबास में वो मुझे पूजती रही
मैं काम की तलाश में परदेस में रहा
वो ग़मज़दा ग़मों से यहीं जूझती रही
मैं लिख सका न उसको तबस्सुम की चिट्ठियाँ
लिख लिख के क़हक़हे वो मुझे भेजती रही
बच्चों की ज़िद में उसने कभी की कमी नहीं
ख़्वाहिश वो अपने दिल की सदा टालती रही
दीवार जब उठाई तो सबको सुकून था
पुरखों की आन-बान मगर टूटती रही
साग़र रह-ए- हयात में आयेंगी मुश्किलें
तेरी ग़ज़ल ये सच ही अगर बोलती रही
सुकूं माँगने फ़क़ीरों से
ये बात आज भी साबित है कुछ नज़ीरों से
गये हैं शाह सुकूँ माँगने फ़क़ीरों से
क़दम बढ़ाने से मंज़िल करीब आती है
उलझ रहा है तू क्यों हाथ की लकीरों से
बहुत दिनों से है बरबाद ज़िन्दगी अपनी
लड़ाई कितनी लड़ें अपने हम ज़मीरों से
किया है सामना कुछ यूँ भी तंग दस्ती का
लिबास पहन के निकले सदा अमीरों से
ये किस्से आज भी मौजूद हैं किताबों में
लड़े थे प्यादे कभी किस तरह वज़ीरों से
खिले थे फूल मुहब्बत के जिस जगह अपनी
हवाएं आती हैं रह -रह के उन जज़ीरों से
भटक रहे हो अँधेरों में तुम कहाँ साग़र
ये कौन पूछता हम जैसे राहगीरों से
प्यार का रख लें भरम
तुझको तेरी ही क़सम
प्यार का रख ले भरम
इस कदर हो मेहरबां
बात क्या है मोहतरम
कह दिया तुझको ख़ुदा
देखकर दैर-ओ-हरम
वो हमारे प्यार में
भूल बैठे हर सितम
ऐसे में बरसे अगर
टूट कर अब्र-ए-करम
तेरी नज़रों के ये ख़त
हो रहे दिल पर रक़म
प्यार से देखो अगर
आज भी हैं पास हम
ख़त लिखू् तो किस तरह
हैं ख़फ़ा लफ़्ज़-ओ-क़लम
पास मंज़िल आई तो
जाने क्यों ठहरे क़दम
उनके साग़र आते ही
भागे हैं दर्द-ओ-अलम
अब्र-ए-करम— कृपा का बादल
रक़म–लिखना
अलम–ग़म ,दुख
मोम किये कितने पत्थर मैंने
मीठे लफ़्ज़ों के रख्खे लश्कर मैंने
मोम किये ऐसे कितने पत्थर मैंने
बदले हैं उसके पल में तेवर मैंने
करता हूंँ मैं प्यार कहा खुलकर मैंने
उसने जब जब डाली थीं नज़रें मुझ पर
महसूस किए चुभते से खंजर मैंने
उसकी रंगत और निखर कर आई है
पहनाये जब ग़ज़लों के ज़ेवर मैंने
क़िस्मत को था शायद यह मंज़ूर नहीं
कोशिश तो की छूने की अम्बर मैंने
हर रस्ता अब तक मेरा आसान कटा
ढूंँढ लिए हर रस्ते में रहबर मैंने
मेरे दिल में इक तूफानी हलचल है
देखा उसको जब से चश्म-ए- तर मैंने
लिख डालीं कितनी ग़ज़लें नज़्में साग़र
उसकी आंँखों के पढ़ कर अक्षर मैंने
वफ़ा ज़रूरी है
रह- ए हयात अगर खुशनुमा ज़रूरी है
तो इसमें प्यार मुहब्बत वफ़ा ज़रूरी है
नशीली आँखें हैं चेहरे पे नूर है लेकिन
गुरूरे- ए- हुस्न की शामिल अदा ज़रूरी है
सदाये- दिल यही आती है बार बार मुझे
मिज़ाजे- हुस्न में कुछ तो हया ज़रूरी है
बनाना चाहो जो पुरकैफ़ ज़ीस्त के लम्हे
कभी कभी सही होना ख़फ़ा ज़रूरी है
हवस की आग जला दे न यह नशेमन ही
यूँ तशनगी का गला घोंटना ज़रूरी है
फ़कत दुआओं से चलता नहीं है काम कोई
महाज़े- जंग में लड़ना बड़ा ज़रूरी है
बुलंदियों की है चाहत तुम्हें अगर सागर
समझना वक़्त की फिर तो हवा ज़रूरी है
मुहब्बत से गिरफ़्तार करें है
पहले तो नज़र दिल को तलबगार करे है
फिर उसको मुहब्बत से गिरफ़्तार करे है
हुस्ने-मतला–
पतझार का मौसम भी वो गुलज़ार करे है
छुप छुप के मेरा रोज़ ही दीदार करे है
है मौजे-तलातुम में उम्मीदों का सफ़ीना
इस पार करे है न वो उस पार करे है
यह सोच सवालों की किताबें नहीं खोलीं
हुशियार है इतनी कि पलटवार करे है
क्या उसका इरादा है समझ में नहीं आता
इकरार करे है न वो इनकार करे है
मुश्किल में हुआ जाता है घर बार चलाना
हर चीज़ यहाँ मँहगी जो सरकार करे है
रह -रह के हिला जाती है वो दिल की इमारत
यह काम भी क्या कोई वफ़ादार करे है
लाँघी नहीं जाती है कभी हमसे वो साग़र
तामीर वो लफ़्ज़ों की जो दीवार करे है
मौजे-तलातुम –तूफान की लहरें
सफ़ीना–नाव, कश्ती
होगा अपना कल लगता है
आशाओं में बल लगता है
होगा अपना कल लगता है
एक तुम्हारे आ जाने से
यह घर राजमहल लगता है
सींच रहा जो मन मरुथल को
पावन गंगा जल लगता है
हम तुम साथ चले हैं जब से
जीवन मार्ग सरल लगता है
यह कहना आसान नहीं है
तेरा कौन बदल लगता है
इतने मीठे बोल तुम्हारे
बोल रही कोयल लगता है
घेर उदासी बैठी हमको
दूर कहीं अब चल लगता है
सहता तरुवर कितने पत्थर
जब-जब उसमें फल लगता है
इतना विष का पान किया अब
पग-पग पर ही छल लगता है
तेरे भुजबंधन में साग़र
जंगल में मंगल लगता है
ज़माने की हुक्मरानी है
भरी दिमागों में जिन जिन के बेइमानी है
उन्हीं के बस में ज़माने की हुक्मरानी है
बना रहे हैं ये नेता सियासी मोहरा हमें
नशे में मस्त मगर अपनी नौजवानी है
सितम शिआर मेरा हौसला तो देख ज़रा
कटी ज़बान है छोड़ी न हक़ बयानी है
खड़े हैं अपने ही ऐबों की हम वकालत में
हमारी सोच में इस दर्जा बदगुमानी है
हो फ़ैज़याब ज़माना हमारी काविश से
मिसाल दुनिया में ऐसी हमें बनानी है
वतन परस्तों उठो और अब बढ़ो आगे
बहार उजड़े चमन में हमें ही लानी है
क़फ़स की तीलियां तोड़ी हैं इसलिए साग़र
पहुँच से दूर परिंदों के दाना-पानी है
सितम शिआर – ज़ालिम,अत्याचारी
फ़ैज़याब – लाभान्वित होना
क़फ़स – जेलख़ाना , पिंजरा
मेहरबान थोड़ी है
उसी के दिल में बसी मेरी जान थोड़ी है
अकेली मुझपे वही मेहरबान थोड़ी है
हँसी-मज़ाक है , वो बदज़बान थोड़ी है
कि मुझसा उसका कोई क़द्रदान थोड़ी है
सभी ने हुस्न की मलिका उसे कहा है यहाँ
हमारा एक ये तन्हा बयान थोड़ी है
खुलूस प्यार मुहब्बत से काम लेते हैं
यहाँ पे एक हमारी दुकान थोड़ी है
ये तुम हो प्यार से मुझको बिठाये रखते हो
तुम्हारे जैसा ही सारा जहान थोड़ी है
तमाम दोस्त मेरा हौसला बढ़ाते हैं
ये मेरे पीछे मेरा खानदान थोड़ी है
शऊर हमने भी पाया है शेर गोई का
क़लम है हाथ में तीर-ओ-कमान थोड़ी है
मैं आज़माऊं उसे किस लिए मेरे साग़र
जुनूने-इश्क है यह इम्तिहान थोड़ी है
मनमानी करने दे
मुझको सारी रात सुहानी करने दे
आँखों को मेरी मनमानी करने दे
मस्ती वाले गीत सुनाकर अब मुझको
दूर दिलों की यह वीरानी करने दे
इस गुलशन के फूल न मुरझाने पायें
इसकी मुझको तू निगहबानी करने दे
सूरज की आमद होने ही वाली है
अब तो मुझको ख़त्म कहानी करने दे
ख़ुशियाँ लौट के ख़ुद घर में आजायेंगी
बच्चों को फिर दादी नानी करने दे
बंद ज़ुबां सबकी पल में हो जायेगी
इनको मुझको पानी पानी करने दे
आँखों से हर दिन बातें हो जाती हैं
आज तो साग़र बात ज़ुबानी करने दे
हालात पानी में
दिखाई दे रहे हैं फिर वही हालात पानी में
गयी फिर ज़िन्दगी की आज भी सौग़ात पानी में
हुस्ने मतला–
पता चल जायेगा होते हैं क्या असरात पानी में
ग़रीबों से कभी तो पूछिये हालात पानी में
उठीं ग़म की घटाएं फिर कहीं दिल के समुंदर से
लिखेंगी फिर कहीं आँखे कई नग़मात पानी में
सभी चेहरों पे घबराहट सभी की आँख रोती है
कोई पूछे भी अब कैसे किसी की बात पानी में
वो दिल में आज भी महफ़ूज़ हैं ताज़ा गुलाबों से
गुज़ारे थे कभी जो पल तुम्हारे साथ पानी में
कभी आँखों में शोले थे कभी पहलू में अंगारे
लगाये आग रहते थे कभी दिन रात पानी में
कहीं बोतल खुलेगी औ’र कहीं छलकेंगे पैमाने
कोई रिन्दों के तो देखे ज़रा जज़्बात पानी में
निकालो हसरतें दिल की सजा लो दिल के काशाने
मुबारक हो तुम्हें साग़र मिलन की रात पानी में
दिखाने की क्या ज़रूरत है
अदा – ओ- नाज़ दिखाने की क्या ज़रूरत है
हमारे होश उड़ाने की क्या ज़रूरत है
करीब हद से ज़ियादा ही आ गये दोनों
निगाहें फिर यूँ चुराने की क्या ज़रूरत है
किये हैं तुमने दिल – ओ – जान मुझ पे न्योछावर
ये राज़ सबको बताने की क्या ज़रूरत है
जमा लिया है मेरे दिल पे तुमने हक़ अपना
तुम्हें यूँ पूछ के आने की क्या ज़रूरत है
हैं एक दूजे से हम दोनों बेतकल्लुफ़ जब
हवा में तीर चलाने की क्या ज़रूरत है
ख़ुमारे – इश्क़ में डूबे हैं सर से पा तक हम
हमें यूँ और लुभाने की क्या ज़रूरत है
हमारी बज़्म तो रोशन तुम्हीं से है साग़र
चराग़ हमको जलाने की क्या ज़रूरत है
अपनी कहानी लिखना
दिल के औराक़ पे जब अपनी कहानी लिखना
दूध को दूध मगर पानी को पानी लिखना
पढ़ तो लेता हूँ मैं तहरीर तेरे चेहरे की
दास्ताँ फिर भी कभी दिल की ज़ुबानी लिखना
तेरे हाथों में है अब मेरे मुक़द्दर का वरक़
मेरी रातों में उजालों की रवानी लिखना
कैसे जलते हैं मेरे होंठ तेरी फ़ुर्क़त में
मेरे होंठो पे कोई शाम सुहानी लिखना
मैं महकती हुई आऊंगी किसी शाम ढले
यह भी उम्मीद कभी रात की रानी लिखना
हमने भी अहदे-मुहब्बत की क़सम खाई थी
याद हो तुमको कोई बात पुरानी लिखना
उम्र भर तेरी मुहब्बत का यक़ीं पाले रहूँ
राहे-उल्फ़त में कोई ऐसी निशानी लिखना
जिसको पढ़ते ही महक जायें फ़ज़ायें साग़र
बात कुछ ऐसी मेरे दोस्त सुहानी लिखना
किसकी ज़िम्मेदारी है
तुम्हारे इश्क़ की इस वास्ते ख़ुमारी है
तुम्हीं ने प्यार से दुनिया मेरी संवारीं है
न चैन मिल के न फ़ुर्क़त में ही क़रार मुझे
तेरी अदाओं की तलवार ही दुधारी है
चला के तीर मेरी सिम्त देखता हूँ उसे
सुरूरो – कैफ़ में डूबा हुआ शिकारी है
तेरे करम का ख़ुदा शुक्रिया तह-ए- दिल से
परी ज़मीं पे मेरे वास्ते उतारी है
सवाल पूछ के देखो ये आइने से कभी
ये किस के प्यार ने रंगत तेरी निखारी है
हज़ारों बार ये हारा है मानता ही नहीं
हमारा दिल हमें लगता बड़ा जुआरी है
हकीम वैध सभी मुझसे आज हार गये
अजीब रंग के आलम में बेक़रारी है
सुकून चैन अगर चाहते हो तुम साग़र
बताओ तुम ही मुझे किसकी ज़िम्मेदारी है
बोलता है कोई
हमारे दिल के दरीचों से बोलता है कोई
ये फ़ासला भी हक़ीक़त में फ़ासला है कोई
मिली है जब भी नज़र मेरी उनकी नज़रों से
हरेक बार लगा उनसे राब्ता है कोई
ख़मोश रह के ही करना है गुफ़्तगू हमको
हमारे बीच में लगता है तीसरा है कोई
ख़ुदा ही जाने भला दिल में उसके क्या होगा
बहुत ही देर से रह रह के तक रहा है कोई
तमाम लोग मुझे देख कर ये कहने लगे
अभी भी शहर में मौजूद बावफ़ा है कोई
हमारे उनके दिलों की दरार पट जाये
किसी के पास में क्या ऐसा मशवरा है कोई
ख़ुशी छलक पड़ी आँखों से मेरी यूंँ साग़र
वफ़ा का कौल निभाने को आ गया है कोई
रंगत मिलेगी हर सू
रंगत मिलेगी हर सू मेरी ही दास्ताँ की
देखेगा जब भी कोई तारीख़ गुलसिताँ की
हसरत है इस अदा से देखे वो मेरी जानिब
तकती हैं जैसे नज़रें धरती को आसमाँ की
बे – कैफ़ दर्दे-दिल की तक़दीर कोई देखे
आती है पुरसिशों को बारात कहकशाँ की
परदेश में ख़ुशी से आये थे हम मगर अब
आती है याद हमको क्यों अपने आशियाँ की
गर यह ग़ुमान होता रहबर रक़ीब होंगे
राहों में रोक लेता रफ़्तार कारवाँ की
इक शख़्स पूछ बैठा मुझसे मेरी कहानी
जब खा चुकी थी दीमक तहरीर दास्ताँ की
जब उम्रे-मुख़्तसर का यह रंग है तो साग़र
माँगें दुआएं क्यों कर फिर उम्रे-जाविदाँ की
तारीख़ – इतिहास
बे- कैफ़ – उदासी, आनंद विहीन
पुर्सिशों – कुशलक्षेम, ख़ैर ख़बर
कहकशाँ-आकाश गंगा,
मुख़्तसर – थोड़ी,अल्प
उम्रे – जाविदाँ – लम्बी आयु
दिल को राहत है इस बहाने से
तेरी ग़ज़लों को गुनगुनाने से
दिल को राहत है इस बहाने से
दिल में कितने ही उठ गये तूफां
इक ज़रा तेरे मुस्कुराने से
लुत्फ़ आने लगा है अब मुझको
नाज़ नखरे तेरे उठाने से
प्यार के सिक्के हैं बहुत मुझ पर
रोज़ लूटा करो खज़ाने से
ढह गया है महल उमीदों का
सिर्फ़ उनके नज़र चुराने से
बेवफ़ा मत कहो उसे कोई
वो था मजबूर इस ज़माने से
अब भी उठती हैं ख़ुशबुएं साग़र
उसकी मेरे ग़रीबख़ाने से
पानी पानी हर तरफ़
दिख रहा है आज हमको पानी पानी हर तरफ़
कर रहा है ख़ूब बादल मेहरबानी हर तरफ़
बेतकल्लुफ़ होके दोनों मिल न पाये इसलिए
बज़्म में बैठे थे मेरे खानदानी हर तरफ़
तोड़कर वो बंदिशें वादा निभाने आ गया
कर रहे थे लोग जब के पासबानी हर तरफ
तेरे जैसा दूसरा पाया नहीं हमने कहीं
ढूँढ कर देखा है हमने तेरा सानी हर तरफ़
इक ग़लतफहमी को उसने तूल इतना दे दिया
फैलती ही जा रही है यह कहानी हर तरफ़
जिस तरफ़ भी मन किया हम उस तरफ़ ही चल पड़े
जेब में पैसे हैं तो है दाना पानी हर तरफ़
बस यही इक बात अपने दुश्मनों को चुभ रही
कर रहे कैसे तरक्क़ी हिंदुस्तानी हर तरफ़
तोड़ डाला सूर्य ने जब बादलों का चक्रव्यूह
छा गई हर रुख पे साग़र शादमानी हर तरफ़
पयमाना हमारे आगे
लाइये साग़रो-पयमाना हमारे आगे
छोड़िये आप ये शर्माना हमारे आगे
हुस्ने-मतला —
क्या पियेगा कोई पयमाना हमारे आगे
अब भी शर्मिंदा है मयखाना हमारे आगे
हमने हर रुख से ज़माने का चलन देखा है
सोच के कहियेगा अफ़साना हमारे आगे
रोक क्या पायेंगे राहों के अंधेरे हमको
शम्अ रौशन है फ़कीराना हमारे आगे
हम वफ़ादार हैं उल्फ़त है हमारा ईमाँ
चाल चलिये न हरीफ़ाना हमारे आगे
हम परिंदे हैं जो करते हैं फ़लक से बातें
ज़िक्र कीजे न असीराना हमारे आगे
हर तमन्ना है रह-ए-ज़ीस्त की नज़्र-ऐ -महबूब
अब रहा और क्या नज़राना हमारे आगे
उम्र भर दिल की हिदायत पे अमल करते रहे
कैसे टिकता कोई फ़रज़ाना हमारे आगे
हम पुजारी हैं जलाते हैं तख़य्युल के चराग़
है हमेशा रुखे-जाँनाना हमारे आगे
ऐशो-आलाम को समझे जो बराबर वाइज़
है कहाँ आज वो दीवाना हमारे आगे
सुर्ख लब रेशमी ज़ुल्फ़ें हैं नशीली आँखे
आ गया जैसे कि मयखाना हमारे आगे
रूठ के क्या गया इक शख़्स भरी महफ़िल से
हो गया चार सू वीराना हमारे आगे
हम तो हैं शम्अ उजाले के सिवा क्या सोचें
लाख जलता रहे परवाना हमारे आगे
डर है शोले न लपक जायें इधर भी साग़र
आग ही आग है रोज़ाना हमारे आगे
हरीफ़ाना–शत्रुतापूर्ण
असीराना–क़ैदियों सा
नज़्र-भेंट
फ़रज़ाना–बुद्धिमान
तख़य्युल –कल्पना
परेशान हो रहा
इस बात से मैं और परेशान हो रहा
बिछड़ा ख़ुशी से जो था पशेमान हो रहा
जिस शख़्स ने हमेशा सितम ही सितम किये
क्योंकर उसी से मिलने का अरमान हो रहा
साक़ी शराब जाम सजे हैं शऊर से
क्या फिर से मेरी मौत का सामान हो रहा
जब उसने ये कहा तुम्हें ढूँढा कहाँ कहाँ
हर शख़्स उसकी बात से हैरान हो रहा
मँहगी हरेक चीज़ है बाज़ारे-ज़ीस्त में
सस्ता इसी से शहर में ईमान हो रहा
ऐ बाग़बान देखो तो फूलों की रंगतें
सारा चमन ही आज बियाबान हो रहा
जिसकी ख़ुशी के वास्ते आँसू भी पी लिए
साग़र मुझी से आज वो अन्जान हो रहा
ख़ुद हवा दे रही है
यही बात दिल को गिज़ा दें रही है
मुहब्बत को वो ख़ुद हवा दे रही है
न आदाब मालूम थे ज़िन्दगी के
मुहब्बत तरीक़े सिखा दे रही है
है किस दर्जा उसमें मुहब्बत का जज़्बा
ज़माने को ख़ुद वो बता दे रही है
मैं क्या उससे पूछूँ है क्या उसका मंशा
निगाहों से सब कुछ जता दे रही है
ये किस मोड़ पर आ गई है मुहब्बत
जफ़ा भी किसी की मज़ा दे रही है
इनायत है यह मेरी क़िस्मत की मुझ पर
बुलंदी मुझे ख़ुद सदा दे रही है
बढ़ाऊं क़दम क्यों नहीं आज साग़र
कि तक़दीर जब हौसला दे रही है
घर की इज़्ज़त
यह हुनर दिल में ढाल कर रखना
घर की इज़्ज़त सँभाल कर रखना
हर तरफ़ हैं तमाशबीन यहाँ
कोई परदा भी डाल कर रखना
मैं भी दिल में तुम्हारे रहता हूँ
अपने दिल को सँभाल कर रखना
हर ग़ज़ल अंजुमन में छा जाये
दर्द दिल का निकाल कर रखना
मैं हूँ शायर ये मेरी ख़ूबी है
ज़हनो-दिल को खँगाल कर रखना
कामयाबी सभी से कहती है
हर क़दम देखभाल कर रखना
जो दिया मैं जलाये जाता हूँ
उम्र भर उसको बाल कर रखना
फिर किसी मोड़ पर मिलें साग़र
ऐसी सूरत निकाल कर रखना
हम भी निहाल करते हैं
बड़े खुलूस से जब वो ख़याल करते हैं
इसीलिये उन्हें हम भी निहाल करते हैं
हमें भी दिल पे नहीं रहता अपने फिर काबू
अदाओ नाज़ से जब वो धमाल करते हैं
जवाब कोई मुझे सूझता नहीं उस दम
वो बातों बातों में ऐसा सवाल करते हैं
खँगाल लेते हैं चुपचाप मेरा मोबाइल
वो इस तरह से मेरी देखभाल करते हैं
पकड़ में आती हैं जब जब भी ग़लतियाँ उनकी
वो उस घड़ी ही मुझे अपनी ढाल करते हैं
ख़ुदा भी उनके गुनाहों को बख़्श देता है
पशेमाँ होके जो दिल से मलाल करते हैं
बड़े बुज़ुर्ग भी हैरत में आज हैं साग़र
ये दौरे नौ के जो बच्चे कमाल करते हैं
पानी पानी हुई
तयशुदा कागज़ों पर बयानी हुई
हम ग़रीबों की क्या ज़िंदगानी हुई
एक पागल ने खोले थे दिल के वरक़
सारी दुनिया मगर पानी-पानी हुई
तेरी आँखों में अब भी है रंग-ए-हिना
इतनी संजीदा कैसे कहानी हुई
उनसे मिलते ही इतने दिये जल उठे
शहरे-दिल भी लगा राजधानी हुई
हम पतंगो के सारे ही पर जल गये
प्यार में किस कदर बेइमानी हुई
उसने आकर तसव्वुर में की गुफ्तगू
जब भी मुझको ग़ज़ल गुनगुनानी हुई
मेरे ख़्वाब-ओ-तखय्युल में आता रहा
उसकी कितनी बड़ी मेहरबानी हुई
ख़ूबसूरत परिंदे भी आने लगे
कितनी सुंदर यहाँ बाग़बानी हुई
मेरी आँखें तो साग़र फटी रह गयीं
बात बच्चों मे इतनी सयानी हुई
रात भर जागना मनाना है
प्यार का मेरे यह फ़साना है
रात भर जागना मनाना है
तुझसे मिलकर ही मैंने जाना है
कितना आसान मुस्कुराना है
इक तेरे प्यार की बदौलत ही
मेरा हर दिन हुआ सुहाना है
उस बदन की मिसाल क्या दूँ मैं
वो मुजस्सिम शराबखाना है
छोड़ आया हूँ.दीन दुनिया को
तेरा पहलू ही अब ठिकाना है
नोच देता है शोख सी कलियाँ
कितना बेदर्द यह ज़माना है
दौरे-मँहगाई देखिये साहिब
कितनी मुश्किल से आबोदाना है
राहे-मंज़िल के पेचोख़म साग़र
सोचकर हर क़दम उठाना है
वफ़ादार नहीं थे
कुछ दोस्त हमारे ही वफ़ादार नहीं थे
वरना तो कहीं हार के आसार नहीं थे
ख़ुद अपने हक़ों के हमीं हक़दार नहीं थे
हम ऐसी सियासत के तलबगार नहीं थे
झुकने को किसी बात पे तैयार नहीं थे
क्यों हम भी ज़माने से समझदार नहीं थे
हर ज़हर पिया हमने मुहब्बत का ख़ुशी से
उन पर तो ये भी रंग असरदार नहीं थे
करते भी ज़माने से भला कैसे शिकायत
जब वो ही मुहब्बत में वफ़ादार नहीं थे
कुछ दिल की ख़ताएं थीं तो साज़िश कहीं उनकी
हम सिर्फ़ अकेले ही ख़तावार नहीं थे
यह सोच लिया हमने भी उस हार से पहले
हर बार हमी जीत के हक़दार नहीं थे
सुनते हैं ज़माने की इनायत है उन्हीं पर
जो लोग कभी साहिबे-किरदार नहीं थे
बाज़ारे-मुहब्बत का ये आलम है कि तौबा
ज़रदार हज़ारों थे खरीदार नहीं थे
इक हम ही ग़ज़ल तुझको सजाने मेंं लगे हैं
क्या और जिगर मीर से फ़नकार नहीं थे
साग़र यूँ हमें शौक से सुनता है ज़माना
हम कोई गये वक़्त की सरकार नहीं थे
नये वक़्त के ढलानों में
जो ढल रहे हैं नये वक़्त के ढलानों में
उन्हीं के रंग उभरते हैं आसमानों में
जला है जिनका लहू तेरे कारखानों में
कभी तो झाँक ले उन बेज़ुबां मकानों में
बदल गयीं हैं हुकूमत यहाँ कई लेकिन
ग़रीब और ऊलझते गये बहानों में
वो लोग जिस्म को कुछ और नोच लेते हैं
जो बैठ जाते हैं सरकार की दुकानों में
उन्हीं के हक़ में ही होते हैं फ़ैसले अक्सर
उछाल देते हैं टुकड़े जो हुक़्मरानों में
हरेक बात ही बाहर निकल के जाती है
छुपा ज़रूर है कोई तो राज़दानों में
वज़ीर इनका है औ’र शाह भी इन्हीं का है
यही कमाल है सदियों से कुछ घरानों में
सँभाले रखते हैं किरदार की जो अज़मत को
उन्हीं को फ़ख्र भी हासिल है क़द्रदानौ में
हर दिन मुलाक़ात थी
वो यक़ीनन ही मजबूरे-हालात थी
टालती रहती हर दिन मुलाकात थी
उसका चेहरा नज़र आता चारों तरफ़
इश्क़ था या कि कोई करामात थी
दिल फ़िदा होके सब कुछ लुटाता रहा
उसकी मासूमियत में अजब बात थी
सर से पा तक सराबोर रहता था मैं
प्यार की इतनी करती वो बरसात थी
प्यार से उसने जादू सा क्या कर दिया
मेरे सारे ग़मों की हुई मात थी
उसके लफ़्जों से दिल का चमन खिल उठा
यह ग़ज़ल थी या कोई मुनाजात थी
जिसकी तारीफ़ करते न साग़र थका
इस जहां में अकेली वही ज़ात थी
दिल की चादर
दिल की चादर ज़रा बड़ी कर ली
घर की बगिया हरीभरी कर ली
ग़म के सारे पहाड़ ढहने लगे
दिल्लगी से जो दोस्ती कर ली
दिल में इक चाँद को बिठा कर के
हमने हर रात चाँदनी कर ली
जिसको दिल में बसा के रख्खा है
रोज़ उसकी ही बंदगी कर ली
जैसी महबूब की रही ख़्वाहिश
हमने वैसी ही ज़िन्दगी कर ली
जब भी शाख-ए-गुलाब मुरझाई
सींच कर अश्क से हरी कर ली
तेरे वादे का था यक़ीं साग़र
पार इससे ही इक सदी कर ली

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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