Mere Khatir

मेरी खातिर | Mere Khatir

मेरी खातिर

( Mere khatir ) 

 

सुनो इक ख़ूबसूरत घर बनाना तुम मेरी खातिर
धनक के रंग सब उसमें सजाना तुम मेरी खातिर।

मसर्रत रौशनी एहसास से तामीर हो छत की
मुहब्बत से सनी ईंटे लगाना तुम मेरी खातिर।

वहां राजा रहोगे तुम वहां रानी रहूंगी मैं
किसी को दरमियां अपने न लाना तुम मेरी खातिर।

यकीं इक दूसरे पर हम करेंगे आख़िरी दम तक
मगर जो रूठ जाऊं तो मनाना तुम मेरी खातिर।

गमों की धूप में बन जाना मेरे सायेबां हमदम
गुलों को राह में मेरे बिछाना तुम मेरी खातिर।

कभी फीका पड़े जो रंग रुख़ का ये गुजारिश है
हटा अफसुर्दगी मुझको हॅंसाना तुम मेरी खातिर ।

गुजारिश है नयन की ये नहीं तुम छोड़ना दामन
ये बंधन सात जन्मों का निभाना तुम मेरी खातिर

 

सीमा पाण्डेय ‘नयन’
देवरिया  ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

https://thesahitya.com/bas-aaj/

Similar Posts

  • आजमाने लगे हैं | Aazamane Lage Hain

    आजमाने लगे हैं ( Aazamane Lage Hain ) जिन्हे दोस्त अब तक खजाने लगें हैं । वही दोस्ती आजमाने लगे हैं ।। हरिक झूठ जिनकी मुझे है अकीदत। मिरे सच उन्हे बस बहाने लगे हैं ।। नही मोल गम आसुओं की,तभी तो । बिना वज़्ह हम मुस्कुराने लगे है ।। शजर काटता वो बड़ी जालिमी…

  • चाहिए | Ghazal Chahiye

    चाहिए ( Chahiye )   जब से दिल धड़का है वो गुलफ़ाम तबसे चाहिए एक बस हां एक ही वो शख़्स रब से चाहिए। मेरी ज़िद है वो निगाहों से समझ ले बात सब उस दिवाने को मगर इज़हार लब से चाहिए। भर ले तू परवाज़ लेकिन क़ैद होना है तुझे बस बता बांहों की…

  • दिल को राहत है इस बहाने से

    दिल को राहत है इस बहाने से तेरी ग़ज़लों को गुनगुनाने सेदिल को राहत है इस बहाने से दिल में कितने ही उठ गये तूफांइक ज़रा उनके मुस्कुराने से लुत्फ़ आने लगा है अब मुझकोनाज़ नखरे तेरे उठाने से प्यार के सिक्के हैं बहुत मुझ पररोज़ लूटा करो खज़ाने से ढह गया है महल उमीदों…

  • मेरे ख़ुलूस को | Mere Khuloos ko

    मेरे ख़ुलूस को मेरे ख़ुलूस को चाहो अगर हवा देनामेरे ख़िलाफ़ कोई वाक्या सुना देना कभी तो आके मेरी ख़्वाहिशें जगा देनावफ़ा शियार हूँ तुम भी मुझे वफ़ा देना तमाम उम्र ये मंज़र रहेगा आँखों मेंनज़र मिलाते ही तेरा ये मुस्कुरा देना जिधर भी देखिए रुसवाइयों के पहरे हैंमेरे ख़ुतूत मेरे साथ ही जला देना…

  • कालिख़ मल जाएँगे | Kalikh mal Jayenge

    कालिख़ मल जाएँगे ( Kalikh mal jayenge )    ये बेहूदे लफ्ज़ अग़र जो खल जाएँगे लोग मुँह पे आकर कालिख़ मल जाएँगे देख ख़िज़ाँ की ज़ानिब मत नाउम्मीदी से रफ़्ता-रफ़्ता गुजर सभी ये पल जाएँगे मत आया कर छत पर यूँ तू रोज़ टहलने चाँद सितारे शम्स नहीं तो जल जाएँगे छोड़ो अब ये…

  • “जैदि” की ग़ज़ले | Zaidi ki Ghazlein

    अजनबी मुसाफिर थे तन्हा राहों में प्यासी जमीं को, जीवन मिल गया, बूंद गिरी पानी की बदन खिल गया। ==================== अजनबी मुसाफिर थे तन्हा राहों में, चंद मुलाकात में कोई ले दिल गया। ==================== मुझको हाल ए दिल की ख़बर न थी, न जाने कैसे पैदा कर मुश्किल गया। ===================== सब कुछ लुटा देख मैं…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *