Poetry of Dr. Kaushal

जमीं अपनी है | Poetry of Dr. Kaushal Kishore Srivastava

जमीं अपनी है

( Zamee apni hai )

 

पार कर कांटो को कली फूल बनी है ।
तपिश मिट्टी की ही तो हीरे की कनी है ।।

 

राह में कांटे बिछे और दूर है मंजिल ।
राह और मंजिल में बेहद तना तनी है ।।

 

झुग्गियां  कीचड़ की तुमको खटकती क्यों हैं ?
तुम्हारी ये नजर ही कीचड़ से सनी  है ।।

 

कौन ये आवाज देता है नहीं मालुम ?
याद की दरिया के ऊपर धुंध घनी है ।।

 

गजल सुनकर आपकी अच्छा लगा हमकों ।
हो महल अपना नहीं पर जमीं अपनी है ।।

 

 

✍?

 

लेखक : : डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

171 नोनिया करबल, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

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