ज़िंदगी की रेस | Zindagi ki Race

ज़िंदगी की रेस

( Zindagi ki race ) 

 

ज़िंदगी की रेस बहुत लंबी है,
कभी धूप कभी छांव है,
कभी फूलों भरी राह,
तो कभी कांटों भरी राह में भी नंगे पांव है,
कभी आज़ाद परिंदे सा,
तो कभी हर तरफ़ बेड़ियां है,
कभी हर तरफ़ खुशियों का सवेरा,
तो कभी खुद से खुद की ही लड़ाइयां है,
कभी रूकावटे हजार मंजिल पाने में,
तो कभी हर तरफ बस कामयाबी की सीढ़ियां है,
कभी हार जाओगे अपनो से,
तो कभी बस तुम्हारी ही जयकार है,
मत सोच कब हारे,कब जीते,
क्या खोया, क्या पाया है,
ध्यान दो लक्ष्य पर अपने
और देखो तुमने मार्ग कौनसा अपनाया है।।

 

रचनाकार : योगेश किराड़ू
बीकानेर ( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

मर्द का दर्द | Mard ka Dard

Similar Posts

  • आखिर तुम हो मेरे कौन?

    आखिर तुम हो मेरे कौन? खिलते हो मुरझाते हो,आकर रोज सताते हो।सुन्दर गीत एक सुनाकर,मन बेचैन दर्पण बनाकर ।सुधि आते हो बारम्बार,करते हो मुझपर ऐतबार।बात नहीं कर पाती तेरी,रोकूँ याद न रूकती तेरी।आखिर तुम हो मेरे कौन?? प्रति रोम-रोम स्पन्दित होती,सुधियों में आनन्दित होती।आच्छादित प्रियवर बन कर,आह्लादित उर करते मन भर।अनमोल भाव तेरा ठाकुर,तुमसे मिलन…

  • धन्य हैं किसान | Poem in Hindi on farmer

    धन्य हैं ” किसान “ ( Dhanya hai kisan)    धरती के पालक मित्र किसान तुम से सुसज्जित खेत खलियान गांव में ही बसते हैं जग के प्राण, तुमको हम करे हृदय से प्रणाम ।। गांव की धरती होती उपजाऊ, हीरा, मोती उगले मिटी भी हमारी जब पसीना बहाएं हमारे किसान तब मिलती सबको अन्न…

  • “माँ” आज भी मुझे बाबू कहके बुलाती है

    “माँ” आज भी मुझे बाबू कहके बुलाती है   यशोदा-कौशल्या से ज़्यादा लाड लड़ाती, देख-देख अठखेलियां मंद-मंद मुस्काती, आशीषों की झड़ी लगा के लेती है बलाए, आज भी माथा चूम जी भरके देती दुवाएं, ममता का सागर वो निश्छल बरसाती है ! “माँ” आज भी मुझे बाबू कहके बुलाती है !! १ !! क्या कोई…

  • मन | Kavita Man

    मन ( Man )   मत पूछो ये चंचल मन , भला कहां कहां तक जाएं कभी पुरानी यादों में झांके, कभी कही यूहीं खो जाएं ।। कभी अकेला ही मस्त रहें, कभी ये तन्हां महसूस करें कभी ढूंढे किसी का साथ कभी अलग थलग हो जाएं।। मत पूछो इस मन की तुम ये क्या…

  • Prem ki Holi | कविता प्रेम की होली

    प्रेम की होली ( Prem Ki Holi )   खेलेंगे हम प्रेम की होली। अरमानों की भरेगी झोली। खुशियों की बारात सजेगी, बिगड़ी सारी बात बनेगी। नोंक-झोंक कुछ हल्की-फुल्की, होगी हॅंसी-ठिठोली। खेलेंगे हम प्रेम की होली।   महुए की मदमाती गंध, फूलों की खुशबू के संग। आया है दुल्हा ऋतुराज, चढ़कर फाग की डोली। खेलेंगे…

  • अपनी खिचड़ी अलग पकाना | Kavita Apni Khichdi alag Pakana

    अपनी खिचड़ी अलग पकाना ( Apni khichdi alag pakana )    एक कलम होता कलमकार हथियार, जिसको होता माते शारदे का वरदान। मन की बात लिख देता वह कलम से, सोच-विचारकर यह शब्दों को जोड़ते।। आज अलग थलग सभी रहना चाहतें, सुख दुःख मे भागीदार न होना चाहतें। आज न जाने सभी को यें क्या…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *