Dabi Kuchli hui Kalam

दबी कुचली हुई कलम | Dabi Kuchli hui Kalam

दबी कुचली हुई कलम

( Dabi kuchli hui kalam )

 

दबी कुचली हुई कलम, कभी असर दिखा देगी।
पीर गर बना सैलाब, सिंहासन सारा हिला देगी।

कलम का काम चलना है, मशाल बनकर जलना है।
दर्द दुनिया का स्याही, कागज पे शब्दों में ढलना है।

आहत जो कलम हुई, कभी खड़ा तूफान हो जाता।
कलम रुकती नहीं कभी, गर कहीं शासन सो जाता।

दीपक बनकर जल उठती, मचे अंधकार चारों ओर।
लेखनी हो जाती खड़ी, कलम कहती चोरों को चोर।

दुश्चक्रों का बन जाती तोड़, तोड़ती हर बुराई को।
बैरी भ्रष्टाचार की भारी, बुलाती कलम भलाई को।

कलम जब खोलती जुबां, दिग्गज हिल जाते सारे।
कलम का करिश्मा ऐसा, चमके सब भाग्य के तारे।

दबी कुचली गई कलम, उग्र रूप धरकर आएगी।
लहर लेखनी लाई तो, सब कुछ बहा ले जाएगी।

 

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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