Kabhi Ruko Zara

कभी रुको जरा | Kabhi Ruko Zara

कभी रुको जरा

( Kabhi ruko zara )

 

जिंदगी दौड़ती, भागती

कहती है रुको थमो जरा

पलट के तुम  देखो जरा

पद चापो को सुनो जरा

 फिर बचपन में आओ जरा

 दरख़्त दरवाजे, खिड़कियां

 सीढिओ को पहचानो जरा

एक दिन बचपन जी लो जरा

खिलखिलाहटों को सुनो जरा

लगता है जैसे सब मिल गया

यादों का मेला सा लग गया

बीता हर लम्हा फिर मिल गया

बेशक खंडहर है तुम्हारे लिए

मुझे बाबुल का घर मिल गया

चुपचाप खड़ी में रह गयी

 दिल अपनों से जा मिल गया

वीराने टूटे दरो, दीवार थे मगर

लगा कोई खजाना मिल गया

स्मृतियों का पुलिंदा खुल गया

झरोखे से झांकता लड़कपन

 खुशियों का समंदर मिल गया

 

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

पता नहीं क्यों | Pata Nahi Kyon

Similar Posts

  • महाकवि गोस्वामी तुलसीदास | Tulsidas ji par Kavita

    महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ( Mahakavi Goswami Tulsidas )    महाकवि और महान-संत थें आप तुलसीदास, श्रीराम कथा लिखकर बनें आप सबके ख़ास। जिनका जप करता है आज विश्व का नर नार, प्रेम-सुधारस भरा है जिसमें आपनें यह ख़ास।। बचपन का नाम रामबोला एवं कहतें तुलाराम, हुलसी इनकी मैया का नाम पिता-आत्माराम। महाकाव्य ऐसा रचा-रामचरितमानस था…

  • कहने को नया साल है

    कहने को नया साल है   कहने को नया साल है, मेरा तो वही हाल है। वही दिन महीने वही खाने-पीने वही मरना जीना जिंदगी का जहर पीना वही जी का जंजाल है .. कहने को नया साल है.. वही मन में सपने जो पूरे नहीं अपने जिसके लिए मन प्यासा हर साल नयी आशा…

  • Kavita Aise Manayein Holi | कुछ ऐसे मनाएं होली

    कुछ ऐसे मनाएं होली ( Kuch Aise Manayein Holi )   आओ मनाएं मिलजुलकर खुशियों की होली, जर्रा जर्रा खिलखिला उठे दे हम ऐसी गोली। बढ़े भाईचारा रहे न कोई बेसहारा पकड़ हाथ ले साथ किनारे सबको लगाएं चेहरे सभी के खिल जाएं कुछ इस तरह हम होली मनाएं रंगत हमारी देखकर गुलाल भी शरमा…

  • सुमा मण्डल की कविताएं | Suma Mandal Poetry

    हमें संग ले जाइए आपसे दूर और रहा न जाए।दर्द कितना होवे कहा न जाए।हे दयासागर! आ जाइए।हमको सदा के लिए संग ले जाइए।। श्री चरणों से दूर प्रयोजन नहीं कहीं हमारा।निष्प्राण देह यह विरह का मारा।परमानंद की ज्योति जगाइए।हे दयासागर! आ जाइए।हमको सदा के लिए संग ले जाइए ।। कितनी बहाएंगी और आंसू अंखियां।ताना…

  • नवभिहान | Navabihan

    नवभिहान ( Navabihan )   बीती रात अब हुआ सवेरा नवभिहन का अभिनंदन हो नव रचना से श्रृंगार करो फिर जग भर भारत का वंदन हो मानो,आरंभ के गुजरे वर्ष 76 नव स्फूर्ति से आगे अब साल 77 नव उदय मन हो नव कीर्तिमान ठोस धरा पर हो भारत महान त्यागो ईर्ष्या द्वेष भेद भाव…

  • तुम साधना हो

    तुम साधना हो तुम ईश्वर की अनुपम संचेतना होरचित ह्दय प्रेम की गूढ़ संवेदना होक्या कहा जाए अद्भुत सौन्दर्य वालीतुम सृष्टि की साकार हुई साधना हो । घुँघराले केश, मृगनयनी, तेज मस्तकअंग सब सुअंग लगें यौवन दे दस्तक।ठुड्डी और कनपटी बीच चमके कपोलकवि सहज अनुभूति की तुम पालना हो । तुझसे जुड़कर कान की बाली…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *