Makar Sankranti Parv

मकर संक्रांति पर्व | Makar Sankranti Parv

मकर संक्रांति पर्व

( Makar sankranti parv )

उड़ी उड़ी रे पतंग देखो उड़ी रे पतंग,
मन हुआ है मतंग देख कर ये पतंग।

कभी इधर चली तो कभी उधर मुड़ी,
आसमान में चहुं ओर ये पतंग उड़ी।

नीले पीले हरे गुलाबी सब रंगों में रंगे,
जैसे आसमान में इंद्रधनुष आज हैं टंगे।

पतंग उड़ाकर लोग खुशियां दिखलाते हैं,
तिल गुड़ के मिठास से यह पर्व मनाते हैं।

इस दिन से ही होता है खर मास समाप्त,
सब शुभ आयोजन करने होता मुहूर्त प्राप्त।

इस पावन अवसर में गंगा सागर से मिलती,
पितृ जनों की तृप्ति हेतु जनता स्नान है करती।

सूर्य उत्तरायण का अवसर इसमें होता प्यारा,
मकर संक्रान्ति का पावन पर्व है सबसे न्यारा।

 

रचनाकार –मुकेश कुमार सोनकर “सोनकर जी”
रायपुर, ( छत्तीसगढ़ )

यह भी पढ़ें :-

हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी | Rashtrabhasha Hindi

Similar Posts

  • होली व शब्बेरात का त्यौहार | Kavita Holi Shab-e-berat

    होली व शब्बेरात का त्यौहार  ( Holi wa Shab-e-berat ka tyohar )    फाल्गुन की पुण्य पूर्णिमा,थी मंगल तिथि सात । हिन्दुओं की होली, मुस्लिमों की शब्बेरात । खेलें खायें मनाये, पूजें  सभी एक साथ-साथ। पूर्वजो  के प्रतीक गुजिया,चिराग की बिसात। आओ मनाये  होली शब्बेरात  का त्यौहार ।।1।।  नाचे गायें  मधुर फाग फैले चहुँओर ।…

  • इसे अपने आप समझिए | Kavita apne aap

    इसे अपने आप समझिए ( Ise apne aap samajhie )     जिंदगी संघर्ष है इसे अपने आप समझिए, बचपन डैस, जवानी कामा मृत्यु को फुलस्टाफ समझिए। जिंदगी दिल्लगी है इसे छोड़ कर ना भागिए, इस हार जीत की जिंदगी में कभी बच्चा तो कभी बाप समझिए। जिंदगी एक दौलत है कभी फुल तो कभी…

  • एक ही भूल | Ek hi Bhool

    एक ही भूल आज बरसों बाद तुम्हारा दीदार हुआ,दूरियाँ बनी हुई थी फिर से प्यार हुआ। लबों को तुम्हारे लबों का स्पर्श हुआ,बदन की महक का यूँ एहसास हुआ। ग़र ये ख़्वाब है तो ख़्वाब ही रहने दो,मैं सो रहा हूँ सोया हुआ ही रहने दो । चली क्यों नही जाती हो मेरी बातों से,जिस…

  • Hindi Poem Makarsankranti – मकर संक्रांति

    मकर संक्रांति ( 2 ) सूर्य देव ने मकर राशि में प्रवेश कर मकर संक्रांति के आने के दी है खबर सोंधी सोंधी गुड़ की वो महक कूटे जाते हुए तिल का वो संगीत मौज-मस्ती बेसुरे कंठो का गीत गंगा स्नान खिचड़ी का वो स्वाद आज होगी आकाश में पतंगबाजी रंग बिरंगी पतंग से भरा…

  • पहचान | Kavita Pahchan

    पहचान ( Pahchan )   हम खामोश ही रहे और वो बोलते चले गए शुरू हि किया था हमने बोलना और वो उठकर चले गए यही हाल है आजकल के अपनों का न गिला रखते हैं न शिकायत करते हैं माहिर हो गए हैं वो वक्त के बस बोलने की कला रखते हैं उम्मीद रख…

  • चांद पर भारत | Chand par Bharat

    चांद पर भारत! ( Chand par Bharat )    आशियाना चांद पे मिलके बनायेंगे, दूसरे ग्रहों पे भी कदम हम बढ़ाएंगे। गिर करके उठना दुनिया की रीति है, हौसले से फासले खुद हम घटाएंगे। अश्कों से जंगल होता हरा नहीं, हकीकत की दुनिया वहां अब बसायेंगे। महकेंगी सांसें पर अभी है तपाना, नए मंजरों पे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *