In Ankhiyon ko

इन अँखियों को समझाओ तो | In Ankhiyon ko

इन अँखियों को समझाओ तो

 

किसे नहीं खेलें होली बताओ तो
पुछती है कोयल बताने आओ तो
सभी आये लेकिन वो नहीं आए
इन अँखियों को भी समझाओ तो।

इंतजार के दिन दिखाए बहुत तुम
नहीं चाहिए था, सताए बहुत तुम
कैसे करें तारीफ झूठे हम बोलो
कहाँ कहकर अपनाए बहुत तुम।

जैसे तैसे मेरे लट बिखरे पड़े हैं
दरवाजे पर हम तेरे लिए खड़े हैं
तुम तो आओगे हर हाल में घर
सपने एक नहीं मैंने कितने गढ़े हैं।

Vidyashankar vidyarthi

विद्या शंकर विद्यार्थी
रामगढ़, झारखण्ड

यह भी पढ़ें :-

चकई की वापसी | ललित

Similar Posts

  • प्रणय उत्संग | Pranay Utsang

    प्रणय उत्संग ( Pranay Utsang )   प्रणय उत्संग,उत्सविक हावभाव जीवन पथ अभिलाष प्रभा, आनंदिका स्पर्श अनुभूति । पर वश श्रृंगार विहार, चाल ढाल सम अरुंधति । मधुर मृदुल स्वर लहरियां, उष्ण विराम शीतल छांव । प्रणय उत्संग,उत्सविक हावभाव ।। आचार विचार व्यवहारिकी, स्व पालन नैतिक संहिता । अवांछित संकीर्णता पटाक्षेप, सकारात्मक सोच अंकिता ।…

  • खाली | Kavita Khali

    खाली ( Khali )   गगन को छु रही आज की इमारतें, मगर…इंसान हुआ ज़मीन-बोश है, इन इमारतों में ढूंढता वजूद अपना, वो क्या जाने सब कर्मों का दोष है, ईंट पत्थरों पर इतराता यह इंसान, है कुदरत के इंसाफ से ये अनजान, जब पड़ती उसकी बे-आवाज़ मार, पछताता रह जाता फिर ये नादान, जब…

  • अन्तर्मन का दीया

    अन्तर्मन का दीया दीपावली के दीये तोबुझ जाएँगेएक रात के बाद किन्तु अन्तर्मन का दीयासदैव जलाए रखना तांकि मिट सकेनिराशाओं का तिमिरचमकता रहेआशाओं का शिविर जगमगा उठेयह दिवस ओ निशाभावनाओं की हर दिशा यदि हो सके तोजलानाकिसी असहाय केबुझे हुए दीयेरौशनी के लिए। डॉ जसप्रीत कौर फ़लक( लुधियाना ) यह भी पढ़ें :-

  • नरेन्द्र सोनकर की कविताएँ | Narendra Sonkar Poetry

    रोटी बड़ी या देश बड़ा? संसद गूंगीसांसद गूंगान्यायालय गूंगान्यायाधीश गूंगासत्ता गूंगीशासन गूंगादल-दल गूंगागण-गण गूंगाबस्ती गूंगीघर-घर गूंगाजन-जन गूंगाकण-कण गूंगाधरम-करम का परचम गूंगापढ़ें-लिखें का दमखम गूंगाइस देश का सिस्टम गूंगा अशिक्षा का ग्राफ न पूछो?महंगाई की भाप न पूछो?बेरोज़गारी ज़िंदा डसतीछात्र लटकते हैं फांसी परहताशा, निराशा इतनी खून, मांस, लोग बेचें किडनी! नगर-सिटी क्या,बस्ती क्या,लोग भटकते दर-बदररोटी…

  • पुरवा बयार बहे | Purwa bayar bahe

    पुरवा बयार बहे ( Purwa bayar bahe )   केतकी गुलाब जूही चम्पा चमेली, मालती लता की बेली बडी अलबेली। कली कचनार लागे नार तू नवेली, मन अनुराग जगे प्रीत सी पहेली।   पुरवा बयार बहे तेज कभी धीमीं, बगियाँ में पपीहे की पीप रंगीली। बारिशों की बूँदे बनी काम की सहेली, रागवृत रति संग…

  • तेरी शिकायत | Teri Shikayat

    तेरी शिकायत ( Teri Shikayat ) तेरी मेहरबानी का किस्सा सबको सुनाया।अंधा समझ हाथ पकड़ तूने रास्ता दिखाया। अब तो तेरी शिकायत करें भी तो किससे।सबके दिलों में तुझे हमने ही बसाया। तू चाहे अब जितने सितम कर ले इस पर।सहता चल बस यही दिल को समझाया। हर बार दिखाते रहे तुम आईना हरेक को।हर…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *