हाथरस की भीड़ में

हाथरस की भीड़ में

हाथरस की भीड़ में

हाथरस की भीड़, में शून्य हुआ जीवन रस

अंधविश्वासी बनकर बाबा के दरबार में

मैं तो नत मस्तक करने गई थी।

अपनों के पास पहुंचने से पहले
मैं बाबा धाम पहुंच चुकी थी।

सुलझाने कुछ समस्या
उलझन में सांसे फस गई थी

अंधविश्वासी बनकर मैं तो बाबा के दरबार में गई थी।

चरणों की धूल चटकार जिसने हमको धूल में मिलाया।

उस बाबा के दरबार पर उलझन को सुलझाने गई थी।

वही भीड़ में कहीं मेरी सांसे अटकी थी ,

आंखें खुली आसमान पर अपनों को ढूंढ रही थी।

मैं अंधविश्वासी कोसो दूर पैदल चलकर बाबा के दरबार पर पहुंची थी।

घर में सुख समृद्धि लाने आर्थिक स्थिति को सुधारने ,

कुछ तंत्र मंत्र पढ़कर अपनी विपदाओं को दूर कराने गई थी।

मैं अशिक्षित अज्ञान के अंधकार में डूबी

भूखी प्यासी बाबा के दरबार पर पहुंची थी।

उस भगदड़ में आखिरी सांस बस परिवार देखने को तरस रही थी ।

अंधविश्वास की गहरे कुएं का अब अंत होना चाहिए,

अपने से ज्यादा और किसी पर विश्वास नहीं होना चाहिए।

ना कोई बाबा ना कोई ईश्वर तुम्हारी किस्मत बदल सकता है

चाहो तो अपना नसीब खुद हर व्यक्ति लिख सकता है।

लेखिका :- गीता पति ‌(प्रिया)

( दिल्ली )

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