मोहब्बत

( Mohabbat )

मोहब्बत कैसी होती हैं
जुदाई कितनी रोती है ।।
चैन आए नहीं रैन जाए नहीं
रात बेबसी में नीद आए नहीं
कटती नहीं है रात जल्दी
सुबह नहीं होती है ।
मोहब्बत ……

प्यार जलता रहे दिल पिघलता रहे
हर घड़ी ख्वाब में फूल खिलता रहे
जलती रहे वफा कहीं
बेवफा बन सोती है ।
मोहब्बत……

उजाले में भी जलती अंधेरे में भी जलती
रात दोपहर और सवेरे में भी जलती
बुझती नहीं है लौ कभी
यह कैसी ज्योति है ।
मोहब्बत ……

सच्ची खूब लगती कभी अच्छी खूब लगती
कभी टूट कर प्रीत कच्ची खूब लगती
लगती है कभी आग सी
कभी “रूप” की ए मोती है ।
हाय मोहब्बत……

🌻

कवि : रुपेश कुमार यादव
लीलाधर पुर,औराई भदोही
( उत्तर प्रदेश।)

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