संजय जैन की कविताएं | Sanjay Jain Poetry

विषय सूची

जिंदगी की जंग

जीवन के दो राह पर
जिंदगी आकर ठहर गई है।
मौत की देहलीज पर
जिंदगी आकर रुक गई है।।

अनुकूल स्थितियाँ न होने पर
जिंदगी डग मगा गई है।
बनी बनाई व्यवस्थाएँ
जीवन की बिगड़ गई है।।

मौज मस्ती से जिये है
जिंदगी में आनंद लिये है।
इसलिए पीड़ा को अब
सही नही पा रहे है।।

जिंदगी की हर जरूरत को
मिलकर हम पूरे किये है।
आज कल की जिंदगी को
बिना तुलना किये जीये है।।

देख जग की घटनाओं को
जीने की कला सीखे है।
असफलताओं को सफलता में
मेहनत से परिवर्तित किये है।।

राम भक्त हनुमान जी ( गीत )

राम कृष्ण हनुमान की
करते सब बातें।
करे नहीं अमल पर
उनके आचरणों को।।

आये जब संकट तो
याद आये हनुमान।
हे संकट मोरचन तुम
हरो हमारे कष्ट।
मैं अर्पित करूँगा
तुम्हें घी और सिंदूर।
सुख शांति मुझे दो
मेरे पालन हार।।

बात करे जब भी
हम मर्यादाओं की।
याद आ जाते है
श्रीराम चंद्र जी।
उन जैसा कोई और
नहीं हैं मर्यादापुरूषोत्तम।
इसलिए हर नारी पूजे
उन्हें श्रध्दाभक्ति से।।

अब हम बात करें
स्नेहप्यार मोहब्बत की।
मनमें याद आ जाते
हमें मुरली वालेजी।
कितनी लीलाएं रची
प्यार मोहब्बत की।
इसलिए अमर है जगमें
राधा कृष्ण की जोड़ी।।

राम कृष्ण हनुमान की
करते सब बातें।
करे नहीं अमल पर
उनके आचरणों को।।

ऐसा भी होता है

गुजरी है जिंदगी जो
तेरे इश्क में जो।
बेदाग बना रहा जो
तेरे ही प्यार में जो।
चाहत मेरी बड़ी जो
मिलते रहने से जो।
आदत सी हो गई जो
रोज मिलने की जो।।

पल भर भी ओझल
आँखो से मत होना।
दिल की बातों को
बस दिल से समझना।
जो कुछ भी हुआ है
तेरी मेरी क्या खता है।
सच कहें हम तो
दो जान एक हुये है।।

जिंदगी की जुदाई देखो
अब सही नही जाती।
उनके बिना जिंदगी अब
बिल्कुल जीये नही जाती।
कल तक जो साथ थे
तो जिंदगी खिली-खिली थी।
क्योंकि प्यार की डोर से
हम दोनों जो बंधे थे।।

हमारे दोस्त और घर वाले
आज कल बहुत दुखी है।
हम दोनों के बिछड़ने का
सबसे ज्यादा गम उन्हें है।
किसी की गलतियों का
परिणाम ये निकला है।
इसका अब तक पता
किसी को नही चला है।।

मेहबूब का स्वागत

चाँद भी आज न जाने
क्यों शर्मा रहा है।
जबकि उसे पता है की
मेरा मेहबूब आ रहा है।।

धरा पर बिखेर दो फूलो को
हे बाग़ीचे की रानी तुम।
मेरे मेहबूब के स्वागत
और उसके सत्कार में।।

घटाओं तुम भी बिछा दो
अपनी कालि घटाओं को।
और वर्षा दो आकाश तुम
मेहबूब के आने की खुशी में।।

चाँद तारे तुम भी निकल आओं
पूर्णिमा की रात आज बनकर।
और महक उठो रात की रानी
मेहबूब के आने से पहले तुम।।

मिलन होगा मोहब्बत का
शमा के जलने पर आज।
चिराग बुझे पड़े थे जो दिलके
मिलन से आज जल उठे वो।।

लगाये आँख बैठी है स्वागत में
बसुन्धरा ओस बनकर बरसाने को।
बिछा दी मोती की चादर उसने
मेहबूब के लिए हरी हरी घास पर।।

ज्ञान का उपयोग करे

जिंदगी को व्यर्थ में गमा रहे हो।
ज्ञान को क्यों नही बाँट रहे हो।
हासिल की है शिक्षा तो बाँटो।
वरना ज्ञानी होने का मतलब क्या है।।

ज्ञान बाँटने से ज्ञान और बढ़ता है।
देते हो तुम जिसको शिक्षा ज्ञान।
वो शिक्षित और काबिल बनता है।
जो आपका नाम रोशन करता है।।

ज्ञान का कभी बाटबारा नही होता।
जो कुछ भी हमने हासिल किया है।
वो जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत है।
जिसे चाहकर भी छीन नही सकता।।

बिना पैसे के भी शिक्षित इंसान।
कभी भी भूखा नही रह सकता है।
ज्ञान में बहुत बड़ी ताकत होती है।
जो बुध्दि से सब हासिल कर लेता है।।

खता किसकी है

मोहब्बत हम कर तो बैठे है।
परंतु करने का तरीका नही पता।
नहाना तो समुंदर में चाहता हूँ।
पर तैरना बिल्कुल आता नही।।

शाम-ऐ तो बहुत रंगीन होती है।
जिसमें मोहब्बत हसीन दिखती है।
ऐसा किताबों में पढ़ रखा है।
परंतु आज उसे देख लिया है।।

रातों में वो ही वो दिख रही है।
जिसमें उसकी क्या खता है।
दर्द और तड़प मुझे हो रहा है।
अखिकार वो मेरी कौन है।।

नदी तालाब समुंदर में नशा है।
तो मोहब्बत एक एबादत क्यों है।
मिलन की रात को तो देखो।
इतनी लम्बी और हसीन क्यों हो गई है।।

दिल की आदत

न लगे दिल अगर
प्यार मत कीजियें।
दिलको तकलीफ में
आप मत डालियें।
देखना एक दिन
प्यार हो जायेगा।
दिलमें फिर फूल सा
प्यार खिल जायेगा।।

आज माना की मैं
हूँ अकेला बहुत।
दिलमें फिर भी हमारे
दीप जलते है।
एक दिन तन्हाईयाँ
रंग लायेगी जरूर।
रंग मोहब्बत का कोई
इसमें भर देगा।।

बहुत सुना और पढ़ा था
प्यार मोहब्बत के बारे में।
जिसमें दिलसे पहले
आँखे मिल जाती है।
जिसके कारण ही
मन भटकने लगता है।
प्यार का बीज दिलमें
अंकुरित होने लगता।।

प्यार होता प्यार से
दिल मिलते है दिलसे।
दर्द दिलको होता है
रोती है आँखे पर।
बेंचैनी दोनों को
होने लगती बहुत।
प्यार मोहब्बत में ये
होना निश्चित है।।

महिला प्रबंधक

बिना वेतन जो काम करे
न कोई छुट्टी न कोई गम।
बस समय पर काम करे
और लोगों को खुश रखे।
बता सकते हो ये कौन है
जो निस्वर्थ भाव से करती है।
ये और कोई नहीं घर की
एक महिला हो सकती है।।

हर मौसम की ये आदि है
सबसे बाद में सोती है।
पर सबसे पहले उठती है
और सबका ख्याल रखती है।
नित्य क्रियाओं से निवृत होकर
दिया भोग प्रभु को लगती है।
जिसे घर में सुख शांति
और बरकत बहुत होती है।।

यह सब अकेली महिला
हर दिन नियम से करती है।
खुद की चिन्ता कम पर
सब का ख्याल रखती है।
घर की कारंदा होकर
अपना फर्ज निभाती है।
बिना प्रबंधन की शिक्षा के भी
प्रबंध अच्छे से करती है।।
ये सब एक महिला ही
कर सकती है. . . ।।

राम श्याम एक ही है

राम ही श्याम है, श्याम ही राम है।
दोनों में ही बहुत, है समानतायें जो।
राम मर्यादा पुरुषोत्म, श्याम प्रेम के प्रतीक।
दोनों की गाथाएँ, है बहुत अनेक।।

राम वचन के थे, बहुत ही पक्के।
पूरी निष्ठा से उन्हें, पूरे करते थे वो।
श्याम ने धर्मयुध्द, को रचा धर्महित में।
दोनों ही भूमिका को, निभायें है एक ने।।

धर्म और युग को, बचाया दोनों ने।
राम ने अंत किया, राक्षस वंश का।
कृष्ण ने अंत किया, कंश वंश का।
दोनों ने ही देखो, धर्म को रखा जिंदा।।

आज फिर से हमें, है जरूरत दोनों की।
क्या फिर से लेंगे, ये अवतार पृथ्वी पर।
देश और धर्म को, बचाने के लिए।
सतयुग को फिर से, लाने के लिए।।

सारा विश्व पूजता, आज भी दोनों को।
दोनों की अपनी-अपनी, है मर्यादाएं जो।
राम राज्य के गुण, गा रहे लोग आज भी।
कृष्ण की लीलाएं, खेल रहे आज भी।।

कल आज का प्यार

सुकून मिले किसी को।
किसी के प्यार से तो।
प्यार आप जरूर कीजिये।
दिलकी गैहराईयों को दिलसे।
कम से कम मेहसूस कीजिये।।

है मोहब्बत कमवक्त ऐसी चीज जो।
कोशिस करने के बाद भी नही होती।
पर किसी से अगर नजरे मिल जाये।
तो फिर मोहब्बत शुरू होने लगती।।

दिलका चैन और रातों की नींद।
इसमें फिर पूरी लगने जो लगती।
पर प्यार की बातें पूरी नही होती।
सच में क्या मोहब्बत ऐसी होती।।

आज का अंदाज बहुत अलग है।
जिसमें जिस्म की भूख ज्यादा है।
और प्यार मोहब्बत दिलसे कम है।
बस देखा देखी में बहुत ज्यादा है।
और दिलों में प्यार कम रहता है।।

बेटी की विदाई

बेटी तू मेरी प्यारी
और सबकी है दुलारी।
बस भूल नही तुम जाना
अब जाके हमें सुसराल में..।।

कुल की तू लाज बाचना
अपनों का साथ निभाना।
दादा-दादी नाना-नानी का भी
तुम नाम रोशन करना।
ऐसा ही आशीर्वाद हम..
देते है अब तुझको।
बस भूल नही तुम जाना
अब जाके हमें सुसराल में..।।

घर में जब से तू आई
सुख शांति वैभव लाई।
घर में फिर लक्ष्मी की
कमी कभी न आई।
इसलिए सब कहते है..
घर की लक्ष्मी तुझको।
पर अब छोड़कर हमको
तू जा रहे सुसराल में।।
बस भूल नही तुम जाना
अब जाके हमें सुसराल में..।।

घर आंगन होगा सूना-सूना
गूंजेगी नही अब गलियाँ।
सूना-सूना हो जायेगा
अब भाईं बहिन का कमरा।
माँ बेटी की प्यारी बातें..
नही मिलेगी अब सुनने।
फिर तुझको याद करके
खो जायेंगें यादों में ।।
बस भूल नही तुम जाना
अब जाके हमें सुसराल में..।
बेटी तू मेरी प्यारी
और सबकी है दुलारी।।

कान्हा की लीलाएं

हम अब तक कान्हा की।
भूला न सके लीलाएं।
दिखाई जो भी उन्होंने।
मथुरा और वृन्दवन में।।

कभी वो प्रेम बरसाते।
कभी नटखट नाटक करते।
कभी मैया को सताते तो।
कभी गोपियों की मटकी फोड़ते।।

खेल-खेल में नारायण बनकर।
वो अपने अवतार दिखाते।
और अपने गाँव और घर की।
रक्षा खुद वो आकर करते।।

मामा को तो सोते जागते।
आकर बार-बार डराते।
कानो में आवाज़ देकर।
फिर धीरे से छुप जाते।।

पूरा वृंदावन और मथुरा।
दिवाना था कान्हा का।
सखा और सखियों का।
अलग अंदाज था सबका।
इसलिए तो सारी दुनियां
पूज रही है श्रीकृष्ण को।।

पुरानी यादों का साथ

आज कदम फिर से मेरे
चल पड़े बाग की तरफ।
जहाँ मिलते थे हम दोनों
अक्सर हर शाम को।
और करते थे घंटो बातें
प्यार मोहब्बत की दिलसे।
इरादा नेक था दोनों का
इसलिए जिंदा रख पाये यादे।।

पर अब हालत हमारी
बहुत ही बदल गये है।
कसम जिनकी हम खाते थे
उन्हें जमाना खा गया है।
गलतियाँ इंसान करता है
जिसे वो खुद भोगता है।
फिर बसे बसाये घरों को
वो बर्बाद कर देता है।।

अब अल्फाज ही बचे है
जिन्हें हम गुन गुनाते है।
पुरानी यादों में फिर से
स्वंय को ले जा रहे है।
कभी उनको कभी खुदको
बस यादों में देख रहे है।
और अपने दिलके दर्द को
कम कर रहे है।।

हमारा दुख दर्द देखकर
नदी तालाब भी रोते है।
बाग के फूल पत्ती भी
सुख कर बस खड़े है।
न हिलते न झूमते है
बस बिखकर ये खड़े है।
जो हमारे दुख दर्द को
दिल से बाट रहे है।।

नारी की कहानी

छोड़कर बाबुल का घर।
जाती है पिया के घर।
सौपकर खुद को उन्हें।
समा जाती है उनके अंदर।।

कितना कष्ट और वियोग को।
झेलकर छोड़ा बाबुल का घर।
करके भरोसा एक अंजान पर।
हो गई उनकी सदा के लिए।।

बात की गहराईयों को अब।
हमें बहुत समझना है।
दिलकी बातों को भी हमें।
प्यार से उनको कहना है।।

आज की रात बहुत अंधेरी है।
जिसमें चिराग को जलाना है।
दिलकी गहराईयों में उनको।
आज हमें जो उतारना है।।

पिघलकर मोम का अश्क।
गिरा है जो हमारे दिल पर।
तरान्नुम सा छा गया है।
अब हमारे जो बदन पर।।

पराया होकर भी अब
जो हमें सबसे प्यारा है।
हमारा दिल भी अब जो।
उसी का बहुत दिवाना है।
उसी का बहुत दिवाना है।।

प्यार का असर

हमारा और तुम्हारा हाल
बहुत बेहाल हो गया।
जमाने वालों की नजर
हमारे प्यार को लग गई।
इसलिए तो लोग हमें
अब ताना मारते है।
पर जमाने वाले खुदको
क्यों देख नही पाते है।।

हर जवा दिल में
देखो आग होती है।
सब को प्यार की
बहुत जरूरत होती है।
बिना प्यार के जिंदगी
हमारी नीरस होती है।
इसलिए हम सब को
साथी की जरूरत होती है।।

जब से हमें लगा है
ये मोहब्बत का रोग।
तब से हमारी जिंदगी
बेहाल हो गई है।
दर्द की भी सारी
सीमायें पार हो गई है।
पर सुकून भी बहुत है
क्योंकि हमको मोहब्बत हो गई।।

प्यार मोहब्बत का खेल
बहुत ही निराला होता है।
कभी धूप तो कभी
इसमें छाया होता है।
नजरिया तो देखने और
समझने वालों का होता है।
पर मोहब्बत करने वालो को
खुद पर भरोसा होता है।।

उपलब्ध है…

मन से कुछ निकलता नही।
दिल किसी पर आता नही।
दौर ही कुछ ऐसा आ गया है।
जिसमें किसी की जरूरत नही।।

प्यार मोहब्बत खेल बन गया है।
जिसे करने की अब जरूरत नही।
क्योंकि हर चीज बाजार में मिलती है।
जिसे खरीदने की बस जरूरत है।।

बहुत से शहरों में क्लब आदि है।
जहाँ सब कुछ बिकता और मिलता है।
जिसको लोग आधुनिक दुनिया कहते है।
जिसमें जन्नत का आनंद मिलता है।।

हर चीज अब उपलब्ध है।
बाजार में खुलें रूप से।
जो चाहो लेकर जा सकते हो।
और खुदको भी बेच सकते हो।।

गुरु का उपकार

तुम्हीं हो गुरुवर तुम्हीं प्रभु हो।
तुम्हीं हमारे पालन हारी।।
तुम्हीं हो पिता तुम्हीं गुरुवर हो।
तुम्हीं हमारे पालन हारी।।

तुम्हीं ने मुझको क ख ग पढ़या।
तुम्हीं ने मुझको लिखना सिखाया।
तुम्हीं ने मुझको काबिल बनाया।
तुम्हीं ने मुझको लड़ना सिखाया।।
तुम्हीं हो गुरुवर तुम्हीं प्रभु हो…।।

तुम्हीं ने मुझको पैदा किया है।
तुम्हीं ने मुझ पर एहसान किया है।
तुम्हीं ने मुझको चलना सिखाया।
तुम्हीं ने मुझको दौड़ना सिखाया।।
तुम्हीं हो गुरुवर तुम्हीं प्रभु हो…।।

जो फूल खिलकर महक रहा है।
उन्हें महकना तुमने सिखाया।
तुम्हीं हो मेरे कर्ता और धर्ता ।
तुम्हीं हो मेरे जीवन के खावैया।।
तुम्हीं हो गुरुवर तुम्हीं प्रभु हो…।।

दया की दृष्टि सदा तुम रखना।
तुम्हारे आशीर्वाद जीवन अधूरा।
बिना तुम्हारे दिये ज्ञान के।
मैं इतना काबिल कभी न बनता।।
तुम्हीं हो गुरुवर तुम्हीं प्रभु हो।
तुम्हीं हमारे पालन हारी।।

खुद की तुलना..

वर्तमान को देखकर हम
आतित को याद कर रहे।
अपनी करनी का भी देखो
कैसे फल अब भोग रहे।
दोनो युग के कामों का
तुलना जो आज कर रहे।
और अपने बच्चों को हम
पुरानी बातें याद करा रहे।।

ले ले कर उधार पैसे
देखो निकम्में बन गये।
भेड़ चाल में दौड़ कर
अपना विवेक खो रहे।
मुफ्त के खाने पीने की
अब तो आदत बन गई।
जिसके कारण देखो अब
काम धाम को भूल गये।।

धीरे धीरे दीमक जैसे
संस्कारो को चट कर रहे।
बहिन बेटी बहू आदि को
संस्कारो से नंंगा कर रहे।
हराम खोरी का आलम देखो
कैसे सिर चढ़कर नाच रहा।
अपनी संस्कृति का देखो
खुद ही हत्या करा रहा।।

याद बहुत जब आती है
तो अतीत में खो जाता हूँ।
अपने पारिवारिक संस्कारों में
फिर सोचकर डूब जाता हूँ।
तब खुली आँखों से फिर देखो
अपने आँसू बहता रहता हूँ।
और कुल की मर्यादाओं को
दिलसे बहुत याद करता हूँ।।

चिंता चिता है

वर्तमान को छोड़कर
कल को जीते हो।
देखा नही जिसे फिर भी
उस कल को जीते हो।
कल को देखकर भी
कल को जिये रहे हो।
और वर्तमान में यह गलती
बार-बार कर रहे हो।।

डर मृत्यु का तो
सब को लगता है।
जबकि सबको पता है
कि मरना एक दिन है।
फिर भी मृत्यु से क्यों
तू भागता फिरता है।
जबकि हकीकत को
अच्छे से समझता है।।

उम्र हो चुकी है
अब तेरी सौ की।
पर फिर भी जीने की
बहुत चाहत रखता है।
बहू बेटी दामाद और
नाती पोते देख चुका है।
फिर भी कल के लिए
आज में बहुत चिंतित है।।

कल को आज में जियो

हम आप जैसों की कहानी
बिल्कुल एक जैसी ही है।
कल के चक्कर में पड़कर
हम आज को खो रहे है।
जिंदगी जीने की कला को
छोड़कर कल में जी रहे है।
जो आज तक नही आया
फिर क्यों भ्रम में जी रहे है।।

कल हर किसी का काल
बनकर जिंदगी में आता है।
जो सबकी जिंदगी को
एक दम से बिखेर देता है।
वर्तमान के खुशी के पलों को
छोड़कर कल के लिए दुखी होते।
और परिवार को हम सब
कल के लिए लड़ने छोड़ते देते।।

जो भी आज को छोड़कर
भूत और भविष्य में जीते है।
उनकी दुनियाँ बिल्कुल भी
न आगे बढ़ती न चलती है।
बस एक ही जगह ठहरकर
खुशियों के पलों को रोकती है।
जो की हमारे जीवन के लिए
अच्छे संकेत नही होते है।।

इतिहास को पढ़कर आगे बढ़ो
न की पीछे की तरफ चलो।
वर्तमान को जी कर देखो
और सफल शासक बनो।
और देश दुनियाँ में अपना
नाम बहुत रोशन करो।
न की अपनी सोच को
कल के लिए बचाकर रखो।।

दुनिया मेला है

दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को।
कुछ हम सब अब करके ही
इस दुनिया से जायेंगे।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

मुझसे पहले इस दुनिया में
कितने आये कितने चले गये।
कुछ ने तो अच्छे कर्म किये
कुछ बदनाम होकर चले गये।
वो भी दुनिया का एक सच था
ये भी दुनिया का एक सच है।
जो दुनिया ने हमको दिखा दिया
हम भी दुनिया का हिस्सा है।।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

कल और आज के अंतर को
दुनिया को अब समझना है।
दुनिया की हकीकत को अब
दुनिया को ही बतलाना है।
कल भी ऐसा होता था
आज भी ऐसा ही होता है।
दुनिया वालों की करनी का
दुनिया को ही फल मिलेगा।।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

संजय का गीत ये भजन
तुम को दिलसे गाना है।
अच्छे बुरे के फलों को
तुम को बस याद रखना है।।

दिल की बातें है

मोहब्बत क्या बला होती है।
जब किसी से होती है ।
तो रातों की नींद उड़ती है।
दिन का सुकुन छीनती है।।

आँखों ओठो से रस पिलाती है।
दिल में कंपन को बढ़ती है।
जो दिन रात तड़पती है।
मोहब्बत का एहसास करती है।।

सांसो की आहट से वो
दिल की धड़कने बढ़ती है।
अपना प्यार बरसाती है।
फिर जन्नत दिखती है।।

फूलों की तरह महकती है।
कमल की तरह खिलती है।
खुद का एहसास करती है।
मोहब्बत का दीप जलाती है।।

अब आँखों की जगह ये।
जुवा से बोलने लगती है।
हाल ए दिल का राज भी।
अब ये खोलने लगती है।।

दिलकी पीड़ा को लिखती है।
अपना हाल बताती है।
हाल तुम्हारा पूछती है।
मिलने की चाह करती है।।

दिलकी बातों का कुछ तो।
तुम अपना इजहार करो।
दिलमें अगर प्यार है तो
कहने का साहस करो।।

कितना प्यार किया मैंने
तब से लेकर आज तक।
पर क्या ये इतिहास के
पन्नो में ही जीवित रहेगा..।
या जमाने के साथ यारों
वर्तमान में भी जिंदा रहेगा।।

संगनी का प्रभाव

मेरा भरोसा तोड़ कर
क्या तुमने पाया है।
बेसहारा छोड़ कर
क्या खुशी पाई है।
हिसाब किताब लगाओं
लाभ हानि फिर बताओं।
और जीवन का सत्य
जमाने को बताओं।।

जीवन संगनी के कारण
घर की दुनियां बदलती है।
मूरझाये हुए फूल भी
फिर से खिल उठते है।
घर में संस्कृति झलकती है
क्योंकि लक्ष्मी के कदम पड़ते है।
इसलिए सुख समृध्दि शांति
घर में बढ़ने लगती है।।

देखो तकदीर हमारी तुम्हारी
नारी के कारण बदलती है।
नरक जैसा घरवार भी
स्वर्ग जैसा बनने लगता है।
क्योंकि देवी-देवताओं का
वास घर में होने लगता है।
जिससे सुबह शाम घर में
दीया बत्ती होने लगती है।।

भूलकर भी कभी तुम
नारी का अफमान मत करना।
चाहे सम्मान मत देना
पर उसकी वद-दुआ मत लेना।
इतिहास भी गवाह है की
नारी ने क्या क्या किया है।
तब जाकर देश समाज और
खुदका घर बच सकी है।।

आशीर्वाद से

तेरा आशीष पाकर हमने,
सब कुछ पा लिया हैं।
तेरे चरणों में हमने,
सर को झुका दिया हैं।
तेरा आशीष पाकर …….।

आवागमन गालियां
न हत रुला रहे हैं।
जीवन मरण का झूला
हमको झूला रहे हैं।
आज्ञानता निंद्रा
हमको सुला रही हैं।
नजरे पड़ी जो तेरी,
मेरे पापा धूल गए है।
तेरा आशीष पाकर……।।

तेरे आशीष वाले बादल
जिस दिन से छाए रहे हैं।
निर्दोष निसंग के पर्वत
उस दिन से गिर रहे हैं।
रहमत मिली जो तेरी,
मेरे दिन बदल गये है।
तेरी रोशनी में विद्यागुरु,
सुख शांति पा रहे है।।
तेरा आशीष पाकर …..।।

मोक्ष पथ

छोड़ दो मिथ्या दुनियां,
सार्थक जीवन के लिए।
इससे बड़ा सत्य कुछ,
और हो सकता नहीं।
चाहत अगर प्रभु को पाने की हो ।
तो ये मार्ग से अच्छा कुछ,
और हो सकता नहीं।।
छोड़ दो…….।।

मन में हो उमंग प्रभु को पाने की।
करना पड़ेगा कठिन तपस्या तुम्हें।
मिल जाएंगे तुमको प्रभु एक दिन।
बस सच्ची श्रध्दा से उन्हें याद करो।।
छोड़ दो……..।।

आत्म कल्याण का पथ ये ही हैं।
बस इस पर चलने की तुम कोशिश करो।
मोक्ष का द्वार तुम को मिल जाएगा।
और जीवन सफल तेरा हो जाएगा।।
छोड़ दो…….।।

आस्था से मानते है

ईश्वर को सब मानते है
पर उसे जानते नही है।
देखा है उसको सब ने
बस पत्थर की मूरत में।।

जब भी हुआ कोई कष्ट
पहुँच जाते है उसके सामने।
करते है उससे प्रार्थना
की दूर कर दो कष्ट।
फिर बड़े आदर भावों से
रखते है चरणों में पुष्प।
और लोभ देते है उसको
चढ़ाएँगे आकर के श्रीफल।।

भूल हमेशा वो जाता है
किससे क्या बोल रहा है।
जिसने तुझे पैदा किया
तू उसको लोभ दे रहा है।
और खुदको श्रेष्ठ श्रावक
उसके संमुख मान रहा है।
शर्म कर हे आदि मानव
किसके सामने मूल्यांकन कर रहा है।।

सिर्फ कल्पनाओं से ईश्वर को
तू उस पत्थर में देख रहा है।
और अपने भावों से तू
बस श्रध्दा से पूजा रहा है।
हुआ कार्य सिध्द अगर तो
भक्ति तेरी बहुत बढ़ जायेगी।
पर कर्म किया है जो तूने
फल उसका तो मिलेगा ही।
संजय का गीत तुम्हें ये
आस्था का पाठ पढ़ायेगा।।

गुरुदेव का साथ

जन्म जन्म का साथ है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।
अब आगे भी मुझको
गुरु देना आशीर्वाद अपना।
जन्म जन्म का……।।

जब से आये हो तुम
मेरी जीवन में।
जीवन ही बदल गया
साथ रहने से।
अब मैं क्या माँगू तुमसे
दिया है सब कुछ तुमने।
जन्म जन्म का साथ है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।।

मानव धर्म की परिभाषा
सिख लाई तुमने।
मानव धर्म तुमने
दिख लाई हमको।
इसी तरह से साथ निभाना
जीवन भर अपना।
जन्म जन्म का साथ है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।।

पहली पहली गुरुभक्ति में
होता है कुछ अलग।
गुरुदर्शन से मिलता है
हम सबको आंनद।
प्रभु चरणों में समर्पित
कर लिया अपने को।
इसलिए बदल गया है
जीवन अब हमारा।
जन्म जन्म का साथ है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा…..।।

शब्दों का महत्व

जाने अंजाने में मेरे से
हुई जो भी गलतियाँ।
मन वचन और काय से
मांगता हूँ उत्तम क्षमा।
बड़ा ह्रदय रखकर के
माफ हमें कर देना।
और पर्यूषण महापर्व को
दिलसे अपना लेना।।

भावनाएं तुम दिलमें
अच्छी रखकर देखो।
नाजुक और कोमल ह्रदय
को समझकर देखो।
पर्यूषण महापर्व पर
मान कसाये को छोड़ो।
जिससे अपने पराये की
कड़वाहट कम हो जाये।।

जैनों का होता है
सबसे बड़ा धर्म।
खुद जियो औरो को भी
तुम जीने दो।
कर सके अमल तुम तो
जीवन तेरा बदलेगा।
और जैन समाज में तू
सम्मान निश्चित पायेगा।।

गणेश वंदना

मन मोहक प्रतिमा है तेरी , मजबूर करे मंदिर आने के लिए , गणेश दर्शन के लिए ,
मन मोहक प्रतिमा है तेरी ……….
हर कोई तरसता रहता है , तेरी एक झलक दर्शन के लिए , गणेश दर्शन के लिए ,
मन मोहक प्रतिमा है तेरी ……….

तस्वीर बनाए क्या कोई, क्या कोई करे तेरा वर्णन।
रंगो छन्दो मे समाए ना , किस तरह तेरी मन मोहकता , मन मोहकता।।
मन मोहक प्रतिमा है तेरी ……….

एक आस है आत्मा मे मेरी , कोई जान न सके इस भेद के लिए।
एहसास मेरे दिल में आता , दर्शन में करूँ सदा तेरा।
मन मोहक प्रतिमा है तेरी , मजबूर करे लाल बाग़ आने के लिए , गणेश दर्शन के लिए।
मन मोहक प्रतिमा है तेरी ……….
मजबूर करे लाल बाग़ आने के लिए , गणेश दर्शन के लिए।।

खुद का बाजूक

दिलकी हलचल को देखो
क्या कुछ कह रही है।
प्रेम गीतों की धुन पर
भाव झलक रहे है।
जो लोगों का ध्यान
अपनी तरफ खीच रहे है।
और प्यार के सागर का
गुण-गान कर रहे है।।

मन के भावों को क्या
कोई पढ़ सका है।
दिलकी बातों को क्या
कोई कह सका है।
दूर से तो देखते हो
क्या पास आ सकते हो।
या देखा देखी में ही
समय निकाल रहे हो।।

इतना गुमराह मत हो कि
ढूँढना मुश्किल हो जाए।
हार जीत के चक्कर में
कही लक्ष्य से भटक जाये।
जो लेते है संकल्प दिलसे
वो ही मंजिले पा लेते है।
और अपनी दुनिया को
खुदके बूते पर बना लेते है।।

खुश रहने का आधार

प्यार का रिश्ता बहुत नाजुक होता है।
दिलकी बातों का एहसास होता है।
इसलिए प्रेम मोहब्बत दिलसे होता है।
जो रिश्तों की मर्यादाओं को दर्शता है।।

हर हाल में खुश रहना हमें आता है।
जिंदगी को अच्छे से जीना आता है।
स्नेह प्यार को जीवित रखना आता है।
सच कहें तो उम्मीदों से जीना आता है।।

दिलकी रुसबाई क्या होती है।
किसी दिलवाले से तुम पूछो।
इंसानित का क्या मोल होता है।
किसी बेईमान इंसान से पूछो।।

सच में मोहब्बत बहुत बड़ी होती है।
प्यार से लोगों की तकदीर बदलती है।
जो इन बातों को जीवन में अपनाता है।
वो ही इंसान कलयुग में खुश रहता है।।

बंधन और संबंध

बंधन और संबंधों का
जो अंतर समझता है।
वो ही इंसान इस जग में
सबको प्यारा लगता है।
वो ही इंसान इस……।।

कोई कह यदि दिलकी बातें
महफिल या उत्सव आदि में।
तो तुरंत नहीं देना चाहिए
उस को अपनी प्रतिक्रियाँ।
वैसे तो दिल वाले जन
पड़ लेते है उसकी आँखे को।
क्या कुछ वो बोल रहे और
किस संदर्भ में कुछ पूछ रहे।।
बंधन और संबंधों का
जो अंतर समझता है….।।

आज मिली है महफ़िल में नजरे
जिसके लिए तरस रहे थे वर्षो से।
चहाकर भी वो मनकी बातें
कह न पा रहे थे वर्षो से।
आज गीत मनहर का गाकर
दिया उन्होंने कुछ नया संदेश।
अब तो तुम भी गाओ जी
प्रेम प्रीत और मिलन के गीत।।
बंधन और संबंधों का
जो अंतर समझता है….।।

समझो अब तुम इन बातें को
कब तक न समझ बने रहोगे।
कितने दिनों से लगा रखी है
आपस में हम दोनों ने प्रीत।
हम तुम्हें देखे तुम हमें देखो
कब तक और चलेगा ऐसा।
और प्रेम पूजारन बनने का
क्या मुझे सौभाग्य मिल पायेग।।
बंधन और संबंधों का
जो अंतर समझता है।
वो ही इंसान इस जग में
सबको प्यारा लगता है,
सबको प्यारा लगत। है।।

मौत से डर क्यों

घर का महौल हंसी खुशी का है।
सभी का स्वाभव भी अच्छा है।
न घर में कोई कलह आदि है।
बस सभी में आदर भाव है।।

आज मन बहुत विचलित है।
न कोई गम है और न दुख है।
न ही सोच में कोई अंतर है।
फिर भी न जाने क्यों उदास है।।

बैठे बैठे एक दम से आज
ऐसा कुछ हो गया।
जिसे देख घर वाले हिल गये
पर मुझे समझ नहीं आया।
देखते ही देखते घरवाले
जो खुशी से खिलखिला रहे थे।
मुझे पसीना पसीना होते देख
वो सब घबराकर देखने लगे।।

आज सत्य का एहसास हो गया
की जीवन का कोई भरोसा नहीं।
कब किस वक्त और कहाँ पर
किसी का भी बुलवा आ जाये।
जो जीना चाहता है जिंदगी को
उसे मौत से डर लगता है।
पर मौत का साया भी
उन्हें के आस पास डोलता है।।

लोग अक्सर कहते रहते है
बैठकर अपनो के साथ।
जो आया है उसे जाना है
फिर क्यों इससे घबराना है।
कहने और सुनने में तो
बहुत अच्छा लगता है।
पर सच में मौत से तो
उन्हें भी डर लगता है।।

कही लगता नही

एक पल भी तुम बिन
रहा नही जाता।
तुम्हारा एक दर्द भी
मुझसे सहा नही जाता।
क्यों इतना प्यार दिया
तुमने मुझ को।
की तुम बिन अब
जिया नही जाता।।

तुम्हारी याद आना भी
कमाल होता है।
कभी आकर देखना
क्या हाल होता है।
सपनो में आकर
तुम चले जाते हो।
फिर पूरा दिन
बेचैन सा कर देते हो।।

इससे अच्छी तो
तन्हाईयाँ होती है।
जो सदा ही हमें
तन्हा ही रखती है।
और प्यार ब्यार से
हमें बचती है।
और हकीकत से
रूबारु कराती है।।

इश्क करना कोई
आसान बात नही।
लैला मँजूनू बनकर
रहना आसान नही।
पागल कर देता है
अच्छे भले इंसान को।
कुछ इसी तरह का
ये रोग होता है।।

धर्म का विचार

थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चंद्राप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।
आरती के दियो से करो आरती।
और पावन सा कर लो ह्रदय अपना।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।।

मन में उमड़ रही है ज्योत धर्म की।
उसको यूही दबाने से क्या फायदा।
प्रभु के बुलावे पर भी न जाये वहां।
ऐसे नास्तिक बनाने से क्या फायदा।
डग मगाते कदमो से जाओगे फिर तुम।
तब तक तो बहुत देर हो जायेगा।।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चंद्राप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।।

नाव जीवन की तेरी मझधारा में पड़ी।
झूठ फरेब लोभ माया को तूने अपनाया था।
जब तुम को मिला ये मनुष्य जन्म।
क्यों न सार्थक इसे तू अब कर रहा।
जाकर जिनेन्द्रालय में पूजा अभिषेक करो।
और अपने पाप कर्मो को तुम नष्ट करो।।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।

थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चंद्रप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।
आरती के दियो से करो आरती।
और पावन सा कर लो ह्रदय अपना।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।।

जन्माष्टमी

कितना पवन दिन आया है।
सबके मन को बहुत भाया है।
कंस का अंत करने वाले ने,
आज जन्म जो लिया है।
जिसको कहते है जन्माष्टमी।।

काली अंधेरी रात में नारायण लेते।
देवकी की कोक से जन्म।
जिन्हें प्यार से कहते है।
कान्हा कन्हैया श्याम कृष्ण हम।।

लिया जन्म काली राती में,
तब बदल गई धरा।
और बैठा दिया मृत्युभय,
कंस के दिल दिमाग में।
भागा भागा आया जेल में,
पर ढूढ़ न पाया बालक को।
रचा खेल नारायण ने ऐसा,
जिसको भेद न पाया कंस।।

फिर लीलाएं कुछ ऐसी खेली।
मंथमुक्त हुए गोकुल के वासी।
माता यशोदा आगे पीछे भागे।
नंदजी देखे तमाशा मां बेटा का।।

सारे गांव को करते परेशान,
फिर भी सबके मन भाते है।
गोपियाँ ग्वाले और क्या गाये,
बन्सी की धुन पर थिरकते है।
और मौज मस्ती करके,
लीलाएं वो दिख लाते है।
और कंस मामा को,
सपने में बहुत सताते है।।

प्रेम भाव दिल में रखते थे,
तभी तो राधा से मिल पाए।
नन्द यशोदा भी राधा को,
पसंद बहुत किया करते थे।
गोकुल वासियों को भी,
राधा कृष्ण बहुत भाते थे।
और प्रेमी युगलों को भी,
कृष्ण राधा का प्यार भाता है।।

दुनिया के रंग

हमारी और तुम्हरी एक
कहानी लिखना है हमको।
मुलाकातो का वो दौर
जिसे वर्षो से जिये है हम।
दिल की धड़कनों को भी
दिल से हमने मिलाया है।
इसलिए तो हम दोनों
दो जान एक आत्मा है।।

रूह को आत्मा से,
अलग तुम मत करो।
वरना आत्मा भी
रूठकर भट जायेगी।
स्नेह-प्यार से चलने वाली
दुनिया को चलने दो।
जिसके तुम भी एक
नागरिक और बासिंदे हो।।

आग से खेलोगें तुम तो
तुम्हारे हाथ जलेंगे।
आज नही तो कल
तुम इसमें फसोगे।
तुम्हारा खेल तुमको
समझ में निश्चित आयेगा।
इरादा भी तुम्हारा फिर
फिसल भी जायेगा।।

बने है हम दोनों देखो
दुनिया में एक हमसफर।
लिखी है विधाता ने देखो
हमारी तुम्हारी किस्मत को।
जो समयानुसार चलती और
उसके अनुसार बदलती है।
इसलिए तो इस दुनिया के
रंग भी भिन्न भिन्न जो है।।

व्याकुलता

सोच सोच कर मन
व्याकुल कितना हो गया।
भेजा जिसने मुझको
क्या वो ही पालेगा।
प्रश्न बहुत जटिल है
पर हल करना होगा।
इसलिए आस्था हमें
उस पर रखना होगा।।

बैठ दुनियां के मंच पर
देख रहा दुनियां को।
क्या क्या तेरे सामने
आज कल हो रहा है।
फिर भी मन तेरा
नहीं पिघल रहा है।
और खुदको तू मानव
कैसे कह रहा।।

बदलो खुदको तुम तो
दुनियां भी बदलेगी।
जो कुछ तुम कहते हो
खुदको करना होगा।
देखेगा जो तुम को
वो भी निश्चित बदलेगा।
देखते ही देखते हमारा
ये समाज बदलेगा।।

परिभाषा मानव की
क्या कोई समझायेगा।
मानव का मानव से
रिश्ता जोड़ पायेगा।
या खुद ही इस प्रश्न का
उत्तर बन जायेगा।
तब जाकर शायद तू
मानव परिभाषा बता पायेगा।।

भारत का हाल

जन्म लेकर भारत देश में।
आये थे भगवान स्वयं।
कितनी लीलाएं दिखाई
उन्होंने भारत देश में।
इसलिए कहते भारतवासी की
कण कण में भगवान बसे है।।

कितने ऋषि मुनियों ने भी
जन्म लिया इस भारत में।
और रक्षा इसकी करने को
योध्दा भी जन्में भारत में।
प्रकृति ने भी भारत को
बिन मांगे सब कुछ दिया।
क्या नदियाँ क्या तालाब
और हिमालय जैसा पहाड़।।

कितने देवी-देवताओं का
भारत में स्थायी बास है।
इसलिए होते रहते है
अतिशय और चमत्कार यहाँ।
जिन पर नहीं कर सकते
हम आप विश्वास?
फिर भी भारत में देखो
सबसे ज्यादा मन्दिर बने है।।

भारत की ये गौरव गाथा
सबको आज सुनाता हूँ।
सोने की चिड़िया वाले
भारत का हाल बताता हूँ।
कितना बेबस और
कितना आज लाचार है।
कितना कुछ था भारत में
फिर भी कितना कर्जदार है।।

कलयुग के डोंगी बाबा और
भगवान कहने वालों ने।
कुछ ही वर्षो में देखों
क्या हाल बना दिया।
न कही अमन चैन है
और न बची है शांति।
नारद मुनि जैसा करके
आपस में लड़वा रहे है।।

सत्ता का सुख देखो वो
किस तरह से भोग रहे।
अनुभवहीन होते हुए भी
शीर्ष शिखर पर बैठे है।
जिसके चलते ही भारत का
सत्यानशा कर रहे है।
खुद जिंदा होते हुए भी
पत्थर नाम के लगा रहे है।।।

भाई बहिन का बंधन

भाई बहिन का बंधन,
जिसको कहते रक्षाबंधन।
स्नेह प्यार से बंधा रहे,
भाई बहिन का रिश्ता।
इसलिए तो आता है,
हर साल ये रक्षा बंधन।
बहिना सबसे मिलती है,
मायके में इसदिन आकर।
दिल सबके खिल उठाते है,
बहिना से जो मिलकर।
भागम भाग की जिंदगी से,
मिल नही पाता हम सब।
इसलिए तो कृष्ण ने,
बना दिया ये रक्षा बंधन।
ताकि मिल सके भाई-बहिन,
इस बंधन के कारण ही।
और याद करे वो मिलकर,
अपने बचपन की यादों को।
श्रेष्ठि निर्माता ने ही तो,
रचा संसार कुछ ऐसा।
जिसमे सभी को दिया,
कुछ न कुछ तो ऐसा।
जिससे सभी में बना रहे,
स्नेह प्यार के संबधं बंधन।
और मिलजुल कर मनाते रहे,
होलो दिवाली और रक्षा बंधन।
रक्षा बंधन रक्षा बंधन।।

वतन से मोहब्बत

निभा गये मोहब्बत हम
वतन से कुछ इस तरह।
छक्के छुड़ा दिये हमने
दुश्मनों के जंग में।
पड़ गया भारी उसे
कायराना हमला ये।
जब जवाब से पहले ही
टेक दिए घुटने उसने।
आओ मिलकर हम सब
खाये एक कसम।
झुकने देंगे नही हम
अपने तिरंगे को।।

छोड़ कर सारी हदें
हम पार कर जाते है।
जब आती है वतन की
रक्षा की बात।
तब लगा देते है
जिंदगी दाव पर हम।
पर गुसने देते नही
दुश्मनों को हम।
आओं मिलकर ले
एक शपथ हम सब।
आंच आने नही देंगे
अपने वतन पर हम।।

जान जाये तो जाये
इसका कोई गम नही।
पीछे हटेंगे नहीं
अपने फर्ज से हम।
आएगी मरने मारने की
बात जब भी समाने।
खोलकर सीना अपना
हम डट जाएंगे।
पर वतन पर कोई
आंच आने न देंगे।
और इस तिरंगे को
झुकने देंगे नही।।

देश के वीर सैनानियों को मेरी रचना समर्पित है।
जय हिंद, जय भारत

रक्षा बंधन

रिश्तों में सबसे प्यारा,
है राखी त्यौहार हमारा।
बना रहे स्नेह प्यार,
भाई-बहिन में सदा।
राखी के कारण ही बहिना,
मिलने आती भाई से।
और याद दिला देती
रक्षा के उन वचनों को।
रक्षा के उन वचनों को।।

संबंध हमेशा बना रहे,
रिश्तों की डोर से बंधे रहे।
बना रहे अपास में प्यार
मायके के सब जनो से।
इन्ही सब को जोड़ने
आता है रक्षाबंधन।
मिलना मिलाप हो जाता
हर साल में एक बार।
हर साल में एक बार।।

कैसे रक्षा की थी कृष्ण ने
अपनी बहिन द्रोपती की।
सब की आंखों में वो
दृश्य झलकता आज भी।
धागे के बंध से ही कृष्ण
बहिन रक्षा को आये थे।
और दिया वचन रक्षा का,
बहिन प्रति निभाये थे।
तभी से रक्षा बंधन का,
हम सब त्यौहार मानाते।
हम सब त्यौहार मानाते।।

सावन में सखी से बातें

अरी सखी सुन ना
मेरे दिल का हाल।
कैसे रहती हूँ मैं
उनके बिना यहाँ।
जब से आई छोड़कर
माता-पिता के घर।
जीना दूवर हो रहा
उनके बिना यहाँ।।

लग रही आग सावन में
कैसे बुलाऊ प्रीतम को।
मन डोल रहा आज मेरा
उन्हें दिलमें बुलाने को।
अब दिलकी पीड़ा और
नहीं सही जा रही सखी।
बेहाल कर दिया है
उनकी मदहोश बातों ने।।

बड़े व्रत उपवास करके
इन्हीं सावन के दिनों में।
करके सोहलय सोमवार
मांगा था शिव-पर्वतीजी से।
अरि सखी फिर आ गया
वो ही सावन का महीना।
कैसे बुलाऊ उन्हें फिरसे
इस बेचैनी को मिटाने को।।

मित्रता

चेहरा भूल जाओगे तो,
शिकायत नहीं करेंगे।
नाम भूल जाओगे तो,
गिला नहीं करेंगे।
और मेरे मित्र,
मित्रता कि कसम है तुझे।
जो मित्रता भूल जाओगे,
तो कभी माफ़ नहीं करेंगे।

ख़ुशी से दिल,
आबाद करना मेरे दोस्त।
और गम को दिल से
आज़ाद करना।
हमारी बस इतनी,
गुजारिश है मेरे दोस्त।
कि दिल से एक बार,
याद हमें जरूर ही करना।

जिन्दगी सुन्दर है,
पर मुझे जीना नहीँ आता।
हर चींज मैँ नशा है,
पर मुझे पीना नहीँ आता।
सब जी सकते है,
मेरे बिना दोस्त।
पर मुझे ही किसी के,
बिना जीना नहीँ आता।

आज भीगी है मेरी पलके,
तेरी याद में।
आकाश भी सिमट गया है,
अपने आप में।
ओस की बूंदे,
ऐसे बिखरी है पत्तो पर।
मनो चाँद भी रोया है,
मेरे दोस्त कि याद में।

हो नहीं सकता मुझे,
आपकी याद न आये।
भूल के भी वो,
एहसास न आये।
आप भूले तो आप पे,
आच न आये मेरे दोस्त।
में भुला तो खुदा करे मुझे,
अगली सांस ही न आये।

छोटी सी बात पर कोई,
शिकवा न करना।
कोई भूल हो जाए,
तो माफ़ करना।
नाराज़ जब होना,
हम दोस्ती तोड़ देंगे।
क्योकि ऐसा तब होगा,
जब हम दुनिया छोड़ देंगे।।

प्यार का आनंद

देखो देखो मन कैसे उछल रहा है।
उम्मीदों का आसमान झूम उठा है।
चाँद सितारे आकाश में चमक उठे है।
देखकर दृश्य मौसम भी मचल उठा है।।

कुछ उनकी और हमारी मजबूरी है।
जैसे पृथ्वी और आकाश की दूरी है।
बरसता है जब भी आकाश से पानी।
तो धरा भीगकर खिल उठती है।।

जिंदगी की गाड़ी दौड़े जा रही है।
मन की उम्मीदें बहुत लहरा रही है।
दूर होकर भी मंजिल पास आ रही है।
सच मानों तो नई सुबह होने जा रही है।।

हरी हरी घास कालीन जैसी बिछी है।
जिस पर देखो चांदनी बिखरी पड़ी है।
सच मानो आज जन्नत दिख रही है।
इसलिए तो मोहब्बत उछल रही है।।

मौसम अगर खुश मिजाज हो तो।
ये दिल सच में ढोल उठता है।
साँसे गर्म होकर आहे भरती है।
और मेहबूब से लिपट जाती है।।

मुकुट सप्तमी और मोक्ष कल्याणक दिवस

हारे के सहारे आ जा,
तेरा भक्त पुकारे आ जा।
हम तो खड़े तेरे द्वार,
सुन ले करुणा की पुकार।
आओ नाथ पार्श्वनाथ
आओ नाथ पार्श्वनाथ।
आओ नाथ पार्श्वनाथ।।

कोई सुनता नहीं,
अब में क्या करूँ।
दर्द दिल की दसा
जा के किस से कहुँ।
तेरे होते मेरी हार,
कैसे करूँ स्वीकार, पार्श्वनाथ।
अब आके धीर बंधा जा।।
हम तो खड़े तेरे द्वार,
सुन ले करुणा की पुकार।
हारे के सहारे आ जा,
तेरा भक्त पुकारे आ जा।।

लाख कोशिश करूँ,
काम बनता नहीं क्या करू।
बीच भवर में नैया,
आ फसी, क्या करूँ।
टूट गई पतवार,
कैसे होगा भव पार, पार्श्वनाथ।
अब आके पार करवा जा।।
हम तो खड़े तेरे द्वार,
सुन ले करुणा की पुकार।
हारे के सहारे आ जा,
तेरा भक्त पुकारे आ जा।।
आओ नाथ पार्श्वनाथ।
आओ नाथ पार्श्वनाथ
आओ नाथ पार्श्वनाथ।।

जय जिनेन्द्र देव बंधुओ,

आ मुझे प्यार कर ले

बहुत दिनों से हमारी
देखा देखी चल रही है।
वो मुझको हम उनको
दूर से रोज देख रहे है।
कभी वो हंसते देखते है
तो हम भी मुस्कारा देते है।
और कहते आ मुझे प्यार कर ले
सावन के इस महीने में।।

खेलते हुए बालों की चोटी से
लुभाते हुये इशारे करती है।
और अपनी तरफ हमारा
ध्यान आकर्षित वो करती है।
धारणकर नये परिधानों को
श्रृंगार वो अपना करती है।
और अपने पास बुलाने का
सांकेतिक संदेश वो देती है।।

हृदय मेरा भी देखो अब
धीरे धीरे पिघलने लगा है।
दिल और मन भी मेरा अब
बहुत बैचेन सा रहने लगा है।
न देखूँ उनकी सूरत को तो
खाली खाली सा लगता है।
बस एक झलाक उनकी
अब देखने का मन करता है।
और दिल मेरा कहता है
आ मुझे तू प्यार कर ले सावन में।।

अनोखा प्यार

आँखो से आँखे मिलाते हो।
मन से मन की बातें करते हो।
दिलकी बातें दिलसे कहते हो।
इसे क्या मोहब्बत कहते हो।।

अलग अंदाज है मोहब्बत का।
एक एहसास है ये जीने का।
जो किसी से किसी को होता है।
पर ऐसा प्यार दिखता नही है।।

दूर से देखकर पास में होकर।
लोग प्यार मोहब्बत करते है।
पर इस अनोखी मोहब्बत का।
एहसास दिल में ही रखते है।।

रूठना मनाना और इतराना।
मन के अंदर ही चलता है।
कभी ये दिल पिघलता है।
तो कभी कभी बहाक जाता है।।

धर्म साधना का महीना

सावन का महिना है
विचारो में आस्था जगी है।
धर्म की ज्योति भी देखो
दिलों में जल उठी है।
इसलिए सावन में देखो
मंदिरो में भीड़ लगी है।
सभी में होड़ लगी है
प्रभु के दर्शन पाने की।।

झूका कर सिर अपना
प्रभु चरणों में रखते हैं।
और मन के भाव वो
प्रभु जी से कहते हैं।
फिर पवित्र कलश से
शिवजी पर जल ढालते है।
और अपनी आत्मा को
सावन में शुध्द करते है।।

धर्म का और कर्मो का
असर जीवन पर पड़ता है।
ये मानव जीवन है अपना
जो कर्मों से ही चलता है।
इसलिए तो ऋषि मुनिगण
कर्मों की बातें कहते है।
और सावन के महीने में
एक स्थान पर रुकते है।।

चाँद हो या

आज न चाँद निकला है।
न चाँदनी ही खिली है।
पर सितारों की महफिल।
तो फिर भी जमी है।।

अंधेरे और धुंधले में
एक चाँद चमक रहा है।
जिस पर ही निगाहें
सब की टिकी हुई है।
जिससे वो चाँद भी
शर्माए जा रहा है।
और अपने चेहरे को
दुप्पटे से छुपा रहा है।।

चमकते आकाश में सितारे
तरंगे बिखेर रहे है।
दिलों की धड़कनों को
बढ़ाये जो जा रहे है।
पर किसी से तो वो
दिलको लगा रहे है।
शान ये महफिल में
रंग वो जमा रहे है।।

चमक भरी दुनिया में
दिल को बहला रहे हो।
सुने पढ़े घर में भी
दीप जला रहे हो।
उदासी और निराशा को
अदाओं से निखर रहे हो।
और अपने रंग रूप से
शान-ए-महफिल जमा रहे हो।।

अस्तित्व का संघर्ष

लड़ते हो समझते हो।
संघर्ष को दिखाते हो।
अस्तित्व कैसे बना रहेगा
चित्र उसका दिखाते हो।।

दौर एक सा चलता नही है।
इसलिए रुकना पड़ता है।
करके आत्म मंथन फिर से।
चलना धीरे धीरे पड़ता है।।

हँसते रोते उछल कूंदकर।
चलना सबको पड़ता है।
जीवन के इस चक्र को।
पार तो करना पड़ता है।।

एक लड़ाई लड़ना है हमको।
अस्तित्व अपना बचाने को।
इसलिए चलना पड़ सकता है।
कांटे भरे आगे के पथ पर।।

लुका छुपी

बुलाते हो लुभाते हो
दिलको कष्ट तुम देते हो।
मगर जब देखते हो
तो क्यों कतराते हो।
न सामने तुम आते हो
न ही चेहरा दिखाते हो।
बस तुम सपनो में ही
तुम आते जाते रहते हो।।

कभी हकीकत को समझो
सपनों की दुनियाँ से निकलो।
तुम्हें सब कुछ नजर आयेगा
चेहरा उसका दिख जायेगा।
फिर दिलमें तेरे और उसके
अलग एहसास जागेंगे।
मोहब्बत का दिलमें फिर
निश्चित अंकुर उपजेगा।।

बहुत तन्हाईयों में रहकर
उदासी में ही जिया हूँ।
और सपनों को सपनों में
सदा ही देखता रहा हूँ।
अब तुमको हकीकत में
प्यार मिलने जा रहा है।
तो क्यों तुम मोहब्बत से
अब भाग रही हो।।

मोहब्बत को अब तक
एक खेल ही समझा है।
जो दिलों से खेलने का
तुम्हारा एक खिलौना है।
माना की तुम सुंदर हो
और हुस्न की मालिक हो।
इसलिए उछल रही हो
पर उम्र ढलते क्या होगा।
तुमने कुछ क्या सोचा है।।

ईश्वर में आस्था

ईश्वर को सब मानते है
पर उसे जानते नही।
देखा है उसको सब ने
बस पत्थर की मूरत में।।

जब भी हुआ कोई कष्ट
पहुँच जाते है सामने।
करते है उससे प्रार्थना
की दूर कर दे हमारे कष्ट।
फिर आदर भाव से
रखते है चरणों में पुष्प।
और लोभ देते है उसको
चढ़ाएँगे आकर के श्रीफल।।

भूल हमेशा वो जाता है
कि किससे क्या बोल रहा है।
जिसने तुझे पैदा किया
तू उसको ही लोभ दे रहा।
और खुदको श्रेष्ठ श्रावक
उसके संमुख मान रहा।
शर्म कर हे मानव तू
किसके सामने मूल्यांकन कर रहा।।

कल्पनाओं से ईश्वर को
तू पत्थर में देख रहा।
और अपने भावों से तू
बस श्रध्दा से पूजा रहा।
हुआ कार्य सिध्द अगर तो
भक्ति श्रध्दा तेरी बढ़ जायेगी।
कर्म किया है जो तूने तो
फल उसका मिले जायेगा।

अटूट प्रीत

हर दिन करता हूँ
मैं प्रभु से प्रार्थना।
की मेरे जाने से पहले
तू निकल जाए।
क्योंकि बड़ा बेदर्दी है
ये कलयुग वाला जमाना।
मेरे जाने के बाद तुझे
जीने और न मरने देगा।।

पग पग पर तेरे को
अब बिछे मिलेंगे काँटे।
फूलों पर चलने वाली
काँटों पर चलना पड़ेगा।
इसलिए तो मुझे तेरे को
कहना पड़ रहा है।
की मेरे मरने से पहले
तेरा जाना हो जाये।।

दिलकी दुआओं का कुछ तो
तेरे जीवन पर असर होगा।
मेरी प्रभु से कही बातों का
प्रभु पर कुछ असर पड़ेगा।
क्योंकि प्रभु के घर में देर है
पर अंधेर तो बिल्कुल नही।
इसलिए तो सारी दुनियां
आस्था और श्रद्धा रखती है।।

मोहब्बत से जीने का हमारा
अंदाज बहुत अलग है।
दिल की दिल से बातें
कहने का अंदाज अलग है।
इसलिए तो एक दूसरे बिन
हम जी नही सकते।
क्योंकि हम दो जान और
एक आत्मा जो है।।

उलझनें

मन मेरा यहाँ लगता नही।
धन मेरे पास बचा नही।
दिल यहाँ वहाँ भटक रहा है।
पर तन रिश्तों से बंधा हुआ है।।

उलझनें इतनी बड़ रही है।
अपने पराये उलझ रहे है।
रास्ते हमारे अलग अलग है।
पर मंजिल हमारी एक है।।

जीवन के सघर्ष में डूबे है।
हर दिन की उलझनें बड़ी है।
हल होते ही देखो यारों।
दूसरी फिर वही खड़ी है।।

संघर्ष बिना जिंदगी का।
दुनियां में कोई आधार नही।
लक्ष्य को पाना ही यारों।
जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष है।।

दुनिया में आना जाना तो।
इंसानों का लगा रहता है।
मायावी दुनिया का खेल बड़ा है।
जो समयानुसार बदलता रहता है।
जीवन का चक्र ऐसे ही चलता है।।

मन भावन सावन

मधुर मिलन का ये महीना।
कहते जिसे सावन का महीना।
प्रीत प्यार का ये महीना,
कहते जिसे सावन का महीना।
नई नबेली दुल्हन को भी,
प्रीत बढ़ाता ये महीना।
मन भावन का है महिना
कहते जिसे सावन का महिना।।

ख्वाबों में डूबी रहती है,
दिन-रात सताती याद उन्हें।
रिमझिम वारिश जब भी होती,
दिलमें उठती अनेक तरंगे।
पिया मिलन को तरस उठती,
सावन के इस महीने में वो।।

रोग लगा है नया नया,
क्योंकी ब्याह हुआ है अभी-अभी।
करें इलाज कैसे इसका,
मिट जाए ये रोग नया।
पिया मिलन तुम करवा दो,
सावन के इस महीने में।।

यही प्रार्थना लेकर वो
रोज जाये शिव मन्दिर में।
अर्पण जल बेल पत्ती करके
मन मे भाये एक बात को।
पिया मिलन तुम करवा दो
सावन के इस महीने में।।

हे शिव-प्रभु मेरी सुन लो
मेरी मुरादे पूरी कर दो।
दिलकी पीड़ा को समझो
और हल उसका कर दो।
पिया मिलन तुम करवा दो
सावन के इस महीने में।।

खुशी से दर्द की जलन

खुशी की मुझसे मुलाकात हो गई।
सुहानी रातों की शुरूआत हो गई।
हंसी खुशी से जीने की आदत हो गई।
क्योंकि हमारे साथ खुशी जो आ गई।।

देखकर हमारी खुशियों से
दर्द को जलन सी हो रही।
इसलिए बीच बीच में अब
वो भी दस्तक देना शुरू की।
तभी खुशी ने दर्द को कुछ
नसीयत देने की कोशिश की।
पर दर्द ने खुशी की नही सुनी
और वेबजह दाखिल ही गई।।

देख अपनी खुशी के दर्द को
खुश रहने वाला घबराने लगा।
इसलिए मन्दिरों में घंटी और
अपना सिर झूकाने लगा।
करके प्रार्थना ईश्वर से वो
खुशी की फार्याद करने लगा।
और दर्द से निजात पाने की
गुहार तन मन धन से करने लगा।।

आचार्यश्री के शिष्य की

घर वार छोड़कर हम
घर से निकल पड़े।
आत्म कल्याण करने अपना
हम वन को चुन लिये।
करके आचार्यश्री की वंदना
कुछ नियम व्रत ले लिए।
फिर लीन उसमें होकर
खुदको समझने लगे।।

जब देखा गुरुवर ने मेरी
कठिन साधना तपस्या को।
तो देखकर बस वो
थोड़ा सा मुस्कारा दिये।
फिर इतनी शक्ति का
संचार शरीर में हुआ।
लेकर कुछ प्रतिमायें
अमल उन पर करने लगा।।

सेवा भक्ति और तपस्या का
रिपोर्ट कार्ड गुरुवर तक पहुॅंचा।
फिर एक दिन गुरुवर ने
मुझको बुला लिया।
देकर गुरु उपदेश और
अमल करने को कहा।
कुछ समय के उपरांत
गुरुवर ने प्रश्न ने किये..।।

सुनकर मेरे जबाव तब
गुरुवर प्रसन्न बहुत हुये।
शिष्य को परखने की
क्रियां धीरे-धीरे समाप्त हुई।
फिर दीक्षा देने की उन्होंने
तिथि तारीख चुनी गई।
नैनागिरी में ब्रा वीरेंद्र को
क्षुल्लक दीक्षा दी गई।।

सोचो जा तुम सब
श्रावको और पूण्यात्माओं।
किस मुनि की कहानी
सुनना रहा हूँ मैं।
आचार्यश्री के उस शिष्य का
तुम्हें नाम बताना हैं।
और सच्चे जैन श्रावक
होने का प्रमाण देना है।।

सावन और प्रिय

तेरे हुस्न के मैंने प्रिये
बहुत किस्से सुने है।
जब हँसती हो तुम तो
फूल खिल उठते है।
तुम्हारी आँखे भी तो
कयामत खूब ढाती है।
जब चलती हो सड़क पर
तो सड़क भी शर्मती है।।

सावन में जब नाहती हो
तो महक उठता घर।
सुखाती हो जब बालों को
तो लगता है घटाये घिर आई।
और जब पड़ती पानी की बूंदे
तो दिल मेरा मचल उठता।
तुम्हारी ये ही अदायें तो
सावन में घायल करती है।।

कमर के ऊपर जो तुमने
पहन रखी है कर्धोनी।
और माथे पर बिंदिया भी
माथे को चमका रही है।
और हाथो की चूड़ीयों की
खनक दिलको बहला रही।
लचकती बल खाती चाल
दिलों की धड़कने बड़ा रही है।।

युवास्था की पीड़ा

दिलकी और मन की बातें।
बहुत परेशान कर रही है।
और ह्रदय की पीड़ा जो।
बहुत ही बड़ा रही है।।

स्थिर नही है मन पर खिलता हुआ तन।
जिसके कारण से विचलित हूँ बहुत।
पर खुशियों की लहरे उछल रही है।
और दिलकी परते खुल रही है।।

ह्रदय में अगल ही लहरें दौड़ रही है।
और जिज्ञासायें भी परेशान कर रही है।
मन भी मेरा अब स्थिर नही रहता है।
शायद नई शुरुआत का संकेत दे रहा है।।

होता है ये सब उम्र के इस पड़हाव पर।
बेचैनियाँ भी बड़ती है इस अवस्था में।
शायद ये मोहब्बत होने का संकेत है।
इसलिए ह्रदय मेरा उलझने बड़ा रहा है।।

विकास की दौड़

दुनियाँ तो चाँद पर पहुँच गई है।
पर हम तो पहली बारिस में ही।
खुदके घर तक नही पहुँच सके।
क्योंकि सड़को पर पानी भरा है।।

विश्व के शिखर पर कितने देश पहुंचे है।
और उनमें हमारी गिनती का पता नही।
विकास की गति रुकी है या विकास…।
इसके बारे में न पूछो तो ही अच्छा है।।

चीन अमेरिका समुद्र में रोड बना रहे।
हम तो नदियों को सड़को पर बहा रहे है।
कार मोटर की जगह बोट चला रहे है।

और विश्व में प्रगति का डंका बजा रहे।।

नये नये अविष्कार करके चीन-अमेरिका।
अपने अपने देश की गति को बढ़ा रहे है।
हम उनके कल पूर्जो को यहां जोड़कर।
बस लेबल अपना उस पर लगा रहे है।।

एक वो जमाना था जब हम बनाते थे।
खुदको गौरांवित मेहसूस करते थे।
क्योंकि अपना बनाया उपयोग करते थे।
देश का पैसा देश में ही रखते थे।।

समयानुसार चलों

समय की मांग को देखो
क्या वो तुमसे चाह रहा है।
सफलता की कुंजी को
वो तुमसे मांग रहा है।
खुदको तुम देखो तो
कहां जा रहे हो।
क्या समय की पुकार को
सच में पहचान रहे हो।।

अगर खुश तुम्हें रहना है
तो समयानुसार चलो ।
बिना बजह के तुम
किसी से मत उलझो।
बस अपने कर्मो पर ही
तुम सदा ध्यान दो।
फिर परिणाम तुम देखो
बहुत अच्छे मिलेंगे।।

जीवन की सफलता के लिए
आत्म-कल्याण के पथ को चुनो।
और मानव जीवन का
तुम कल्याण करो।
छोड़ मोह माया से नाता
ईश्वर से नाता जोड़ो।
जिससे सोच तेरी बदलेगी
और सुख की अनुभूति होगी।।

चतुर्मास

प्यार मोहब्बत करने का
देखो महिना आ गया।
नर मादाओं के मिलन का
देखो मौसम जो आ गया।
गिरती बारिस की बंदो से
कमल सा फूल खिल उठा।
सोये मुरझाये चेहरे पर भी
लहर खुशी का दौड़ पड़ा।।

चार माह का ये मौसम
सबको बहुत ही भाता है।
देवादी देव भी इन दिनों में
विश्राम करने चले जाते है।
और श्रृष्टि का भार महादेव
पर पूरा छोड़ जाते है।
इसलिए चौमासे में देखो
शिव-पार्वती पूजे जाते है।।

देखो देखो नर नारीयों को
जो शिव-पार्वती से मांगते है।
और इसके लिए व्रत उपवास
और तपस्या साधना करते है।
और मन चाहा वरदान भी
जीवन साथी के रूप में मांगते है।
क्योंकि दोनों ही बहुत दयालू है
जो वरदान सबको देते है।।

पास से दूर को देखो

नजरे पास की धूंधाली हो गई।
पर दूर का अच्छा देखती है।
इसलिए पास वालो से ज्यादा
दूर वालों को पढ़ लेती है।।

भरोसा पास वालों पर करते है।
पर दूर वालों से कन्नी कटते है।
जबकि इतिहास गवाह है।
की पास वालों ने ही लूटते है।।

दूर वाले दिलके करीब होते है।
और सदा दिलसे याद करते है।
पास दूर का फर्क करते हो।
पर खुदको ही नहीं समझते हो।।

बिना चश्मे के दुनिया को देखे हो।
पर जब चश्मा लगते हो तो क्या।
दुनिया को अलग तरह से दिखते हो।
बस चश्मे से रंगीन दिखती है।।

मदद जब भी किसी की करो।
तो खुदको पता नही होना चाहिए।
की हमने क्या कुछ क्यों किया है।
बस करके भूल जाना अच्छा है।।

घर परिवार

सुख दुख की परिभाषा
हम सबको समझा दो।
सुख दुख क्या होता है
दुनिया को बता दो।
माना की मानव जीवन
संघर्षमय होता है।
पर इस संघर्ष में भी
सुख ज्यादा ही मिलता है।।

संसार का ये चक्र
ऐसे ही चलता है।
दुख सुख के साथ ही
जीवन में आनंद आता है।
देखो जरा इस समय को
जो कैसे दौड़े जा रहा है।
और सबकी यादों को ये
पीछे छोड़े जा रहा है।।

कम थी आमदनी तब
परिवारों में खुशियाँ बहुत थी।
अब हर चीज पास है
पर दिलसे सब दुखी है।
न मिलने का और न
बैठकर बातचीत का समय है।
बस अब कहने को ही
घर परिवार बचा है।।

पाठशाला की यादें

देखो देखो फिर से अब।
कैसे स्कूल खुल रहे है।
देख बच्चों को स्कूल जाते।
बचपन याद आ रहा है।।

बचपन की अपने यादों को
फिर से याद करता हूँ।
अपनी प्रारम्भिक शिक्षा को
फिर से आज दोहराता हूँ।
और अपने जीवन को
सही दिशा में ले जाता हूँ।
सर्व-प्रथम उन गुरुओं का
आभार व्यक्त करता हूँ।।

पाठशाला का ज्ञान बहुत
जीवन में काम आ रहा है।
कोरे जीवन पर लिखा गया
क ख ग एक दो तीन…।
पढ़ाने वालों का ज्ञान
जीवन को बहुत भा रहा।
जिसके चलते ही जीवन की
शिखर को कैसे छू रहा।।

जन्म देकर हमको जो
लाये इस पृथ्वी पर।
वो है मेरे पहले गुरु
और जीवन के पालनहार।
शिक्षा मुझको देकर जिन्होंने
काबिल इतना बना दिया।
वो है मेरे इस जीवन के
असली कर्ता और धर्ता।।

बारिस की बूंदे

बारिस की रिम-झिम बूंदो से
मौसम ठंडा-ठंडा हो गया।
हर किसी के चेहरे पर
लहर खुशी की दौड़ पड़ी।
गिरते ही पानी की बूंदे
भूमि भी खुशी से झूम उठी।
फिर होकर वो हरी-हरी
हरियाली को बिखेर दी।।

गर्मी से तुम देखो अब
हमको निजात मिल गया।
तन पर पड़ती बूंदे पानी की
वदन कमल सा खिल उठा।
हर किसी का चेहरा देखो
कैसे फूलों सा खिल उठा।
बारिस का आनन्द लेकर
सबका दिल जो डोल उठा।।

मनभावन के सपने देखो
सोते जगते आने लगे।
कल्पनाओं के सागर में
देखो हम सब डूबने लगे।
लहर खुशी की दिल पर
कैसे देखो दौड़ पड़ी।
बारिस के चलते ही देखो
खुशबू चारों तरफ फैल गई।।

दिल का हाल

अपने दिल का हाल
मैं दिलसे बताता रहा हूँ।
उन्हें देखे बिना आँखे
मेरी कही ठहरती नही।
धड़कने भी दिल की
क्यों कही रुकती नही।
सोचता हूँ जब भी ये मैं
कि दिल क्यों लगता नही।।

मोहब्बत का रंग दिल पर
कभी कभी चढ़ता नही।
बातें दिल की भी
कभी कभी निकलती नही।
माना की मोहब्बत सभी को
कलयुग में मिलती नही।
पर जिसे मिलती है मोहब्बत
वो बड़े नसीबवान होते है।।

मिलन नजरों से होना ही
मोहब्बत का संकेत नही।
दिल में किसी की सूरत
उतर जाना भी मोहब्बत नही।
खेल खेल में प्यार होना
आज कल आम बात है।
इसलिए मोहब्बत को समझपाना।
हर किसी के बस की बात नही।।

मिथ्या से बचे

गुजरते वक्त ने मुझको
बहुत कुछ सिखा दिया।
लोगों की फितरत को
जमाने ने दिखा दिया।
समझ नही पाता में
अगर लोगों को पढ़ना।
तो मेरी दुर्दशा भी
भारत के जैसी होती।।

लोगों को सपनों में जीने की
अगर आदत लग जाये।
और कल्पनाओं में भी
डूबने की आदत हो जाये।
तो हकीकत को कभी भी
ये स्वीकार नही करते।
और व्यवस्थाओं को भी
जीवन में उतार नही सकते।।

निकालो खुदको बाहर तुम
कल्पनाओं के सागर से।
हकीकत के तभी तुमको
दर्शन मिल जायेंगे।
दिलों की धड़कनो को
फिर शायद पढ़ पाओगें।
और मानव जीवन के भी
गुण-दोषों को समझ पाओगें।।

सभी का कर्तव्य बनता है
मिथ्याओं से बचकर रहने का।
प्रलोभन आदि से भी
हमें बस बचकर रहना है।
हमारी मेहनत ही लोगों
हमारी तकदीर होती है।
इसलिए कर्म हमें करना है
फल तो अच्छे मिल जायेंगे।।

इरादा

अधूरा मन अधूरा दिल
मोहब्बत कर नही सकता।
कामयाबी की शिखर पर
कभी भी चढ़ नही सकता।
जीवन में बहुत देखा है
लोगों को निराश होते।
उनका लक्ष्य पर ध्यान
कभी भी रहता नही था।।

करो दिल और मन पर
तुम अपना ध्यान केंद्रीत।
और अपनी इंद्रियों पर भी
रखो तुम अपना नियंत्रण।
अगर तुम ऐसा कर पाये
तो हर जंग तुम जीतोगे।
नही तो निराशा में ही
सदा तुम जीवन जीओगें।।

जिंदगी मौका देती है
सभी को कुछ करने का।
इरादा हो अगर पक्का
तो जंग जीत लेता है।
और अपनी मेहनत से
जीवन में रंग भरता है।
सफलता ऐसे लोगों की
सदा ही चूमती कदम।।

रखो खुद पर भरोसा तुम
हमेशा अपने जीवन में।
लचीलापन भी दिखलाओं
मिलने जुलने वालों पर।
मगर विचिलित मत होना
कभी भी लक्ष्य से अपने।
नही तो मेहनत तेरी ये
बेकार ही चली जायेगी।।

जगाते है

मैं अपने बारे में आज
सभी को कुछ बताता हूँ।
मेरी लेखनी के भी
मैं गुण दोष बताता हूँ।
भले ही लोग मुझको
पसंद कम करते है।
मगर मेरी निष्ठा पर
सवाल कोई नही करते।।

मैं मन से तो बहुत ज्यादा
अमीर इंसान हूँ लोगों।
मगर धन से मेरे जैसा
कोई कंगाल नही होगा।
मैं तन से भी बहुत ज्यादा
खुशाल इंसान हूँ लोगों।
मगर मेरी लेखनी में
समावेश इनका नही होता।।

इरादा हम अगर कर ले
तो सब कुछ कर सकते है।
अंधेरो में भी हम लोगों
रोशनी फैला सकते है।
मैं अपनी लेखनी से
जगाता हूँ सोये लोगों को।
उन्हें पुन: जीवित करके
खोई प्रतिष्ठा हासिल करवाते है।।

यही तो काम होता है
हम सब लेखको का।
जो पुरानी सभ्यता को
नये सांचे में डालते है।
और सोये और खोये को
जगाते और मिलाते है।
सभी में प्रेम-भावों की
लहर संचार कराते है।।

जीवन का सत्य

सफर जिंदगी का देखो
अकेले कट नही सकता।
बिना दिलों के मिलन से
कोई अपना नही बनता।
इरादा नेक हो तो ही
मिल जाता है साथी।
फिर जिंदगी को जीने का
मजा ही और आता है।।

ये दुनिया चलती है देखो
सदा हिल-मिल जुलकर।
जो इसके रंगो को समझे
वो ही खुशाल होता है।
नजरिया तो बस आँखो का
उसके देखने का है।
जो जिंदगी की राह को
दिखती सही तरीखे से।।

सब कुछ खोकर भी तो
बहुत कुछ पाया जा सकता।
सफल जीवन जीने का
इरादा बनाया जा सकता।
पहल बस थोड़ी सी करना
तुम्हें अपनी इच्छा शक्ति पर।
तुझे जीवन का असली सत्य
फिर समझ आ जायेगा।।

खुदको समझ

कब तक धर्म की आड़ में
हे मानव खुदको को बचाओंगे।
खुदकी करनी का फल भी
हे मानव तुझको ही मिलेंगा।
बस खुद पर ही अपनी कृपा
हे मानव तुम बनाये रखना।
वरना मौत का डरावना चेहरा
हे मानव तू भूल ना पायेगा।।

अंदर की कलह ही तेरी
करना बनेगी पतन का।
मुक्ति का मार्ग तुझको
खुदके ही अंदर मिलेगा।
बस सोचना है अब तुमको
क्या क्या तुझे है करना।
जीवन की सच्ची ज्योती
तुझको ही जलना पड़ेगा।।

कल्पनाओं के सागर में
क्यों तुमको डूबना है।
भावों की अपनी तुमको
बस अब गणना करना है।
भेद न कोई तुझे पायेगा
जब तू धर्म से जुड़ जायेगा।
मोक्ष का सच्चा मार्ग फिर
तुमको निश्चित मिल जायेगा।।

मौसम का अंदाज

मौसम का मिजाज अब
कुछ ठंडा सा हो रहा है।
गर्मी से हम सबको अब
निजाद मिल रहा है।
पहली बारिस में भीगने का
मजा कुछ अलग होता है।
गिरती पानी की बुंदो से
दिलमें कमल खिल उठते है।।

गर्मी के कारण वातावरण
चारों तरफ का गरम था।
खाने पीने के पदार्थो का
पकने का यही मौसम था।
तभी तो खाने और पीने को
फलो के राजा व प्रजा मिली थी।
जिससे हमारा शरीर एक दम
तरल सा बना गया है।।

वैसे तो हर मौसम का
अपना अपना महत्व होता है।
बारिस से भूमि गिली होकर
सर्दी में बीज अपने अंदर लेती है।
और ग्राष्मी में सबको पकाकर
हमें खाने पीने के लिए देती है।
जिससे मनुष्य जीवजंतु और
पेड़ पौधों आदि जिंदा रहते है।।

बारिस की बूंदे

बारिस की बूंदो ने
वातावरण प्रफुल्लित कर दिया।
सूखी भूमि मुरझाये पेड़
पानी की बूंदे गिरते ही।
भूमि एक दम नम होकर
पेड़ पौधों को खिला दिया।
और इंसानो और पशुओं को
गर्मी से छुटकारा दिला दिया।।

बारिस की गिरती हुई बूंदे
कमाल का काम करती है।
पृथ्वी को ठंडा और नदियों में
जल भर देती है।
जो इंसानो और जानवरों की
प्यास बुझती है।
और भूमि को नमी देकर
खाध पदार्थ पैदा करती है।।

बारिस का मौसम सबको
बहुत ज्यादा भाता है।
जो पृथ्वी को हाराभरा करके
नदी तालाबों में जल भर देता है।
पहाड़ों से पानी के झरनों को
गिराकर रमणीय स्थल बना देता है।
जो प्यार करने वालो को
ऐसे स्थान अच्छे लगते है।।

बेटी पर बाप की भावनाएं


( गीत )

सच बात मैं फिर से
मैं बोल रहा हूँ ।
हाँ बोल रहा हूँ
बेटी की याद आती बहुत।।

मेरी बस एक ही संतान है वो।
चाहे उसे बेटा कहे या बेटी कहे।
घर की जान और शान वो ही है।
मेरी जिंदगी का अभिमान वो ही है
हाँ अभिमान वो ही है।
हम जीते है अब उसके लिए।।
सच बात मैं फिर से
मैं बोल रहा हूँ ।
हाँ बोल रहा हूँ
बेटी की याद आती बहुत।।

जिस दिन उसका जन्म हुआ
वो दिन भी था बहुत शुभ।
घर में बहुत खुशियाँ और दिन था बड़ा।
मार्च का महिना और तारीख 21 था।
विरागसागर जी पड़हगान चल रहा था
हाँ पड़हगान चल रहा था।
तभी शानू जन्म हो रहा था।।
सच बात मैं फिर से
मैं बोल रहा हूँ ।
हाँ बोल रहा हूँ
बेटी की याद आती बहुत।।

एक वर्ष पूर्व ही तेरा
हम ब्याह किये है।
अपने ही घर की शान को
हम विदा किये है।
कैसे तुम रहती हो वहा
माँ बाप के बिना
हाँ माँ बाप के बिना।
कुछ तो मुझे बता दो जरा।।
सच बात मैं फिर से
मैं बोल रहा हूँ ।
हाँ बोल रहा हूँ
बेटी की याद आती बहुत।।

कैसी ये रीत है
और कैसा रिवाज है।
जिसको जन्म दिया
उसको ही किया विदा।
अपने जिगर के टुकड़े को
सौपा किसी और को।
क्या इस तरह से ही ये
संसार चल रहा
हाँ संसार चल रहा।
मुझे याद बहुत आती हो तुम।
सच बात मैं फिर से
मैं बोल रहा हूँ ।
हाँ बोल रहा हूँ
बेटी की याद आती बहुत।।

जीना तो सीखे

जिंदगी को मौत से
मैं वापिस लाया हूँ।
कर्तव्य की चोटी को
फिर से चुरा लाया हूँ।
बहुतो ने मेरी मौत पर
आँसू न बहाये हो।
पर जिंदा मुझे देकर
रोने लगे है अब।।

बहुतो की नींद अब
फिर से बिगड़ ने लगी।
लूटी हुई खुशियाँ अब
फिर से फिसल ने लगी।
देखा जो मौत का रूप
जिन्होंने भी करीब से।
उन्हें अपनी मौत इसमें
न जाने क्यों दिखने लगी।।

मौका सभी को मिलता है
जीवन में सुख-दुख बाटने का।
पर खुशियाँ उन्हें ही मिलती है
जिन्होंने दूसरों के लिए कुछ किया।
जीवन के इस महासागर में
जीना है देखो हम सभी को।
मरते तो वो लोग है जनाब
जिन्होंने जीना ही न सीखा।।

आपरेशन सिंदूर

जगा दिया भारत को देखो
माँ ने अपने सब बच्चों को।
अपनी मांग के सिंदूर को
चढ़ा दिया भारत माँ पर।
देख हाल ये माताओं का
डर कर भागा पाकिस्तान।
क्या बूढ़े और क्या बच्चें
सब ठान लिया था इस बार।।

मिटा देंगे अब हम फिर से
मुल्क आतंकी पाकिस्तान को।
बहुत सह चुके गुस्ताकियों को
अब तो सबक सीखना है।
और अपने स्वाभिमान को
अब तो जिंदा रखना है।
भले चढ़ जाये अब सिंदूर
माँ बेटी और बहिनों का।।

भारत माँ की रक्षा करने
अब तो आगे आना पड़ेगा।
खून बहाकर हम सब अपना
देश का मान बढ़ायेंगे।
अमन शांति स्थापित करने
पाकिस्तान को मिटायेंगे।
लेते है संकल्प अब हम सब
आँच न भारत पर आने देंगे।।

मानव के गुण दोष

मानवता के मानव को मैं
गुण सिखलाता हूँ।
संसारिक ये कालचक्र को
मानव को समझता हूँ।
वैर-भाव और दोषों को
बस दिलसे मिटा लो तुम।
साधुव्हिक जीवन जीने के
बारे में सोच बस तुम।।

राग-द्ववेश और मोह-माया के
मैं भेद बताता हूँ।
संसारिक व्यवहारिक जीवन की
मैं कला समझता हूँ।
समझ गये तो सरल हो जायेगा
ये तेरा मानव जीवन।
और मानव जीवन जीने का
फिर फल मिल जायेगा।।

मानव जन्म फिर से मिलना
हे मानव बहुत कठिन है।
कर्म तुम्हें अब इस जीवन में
बस अच्छे ही करना है।
सोच विचार करके ही अब
कर्म तुझे करना है।
सफल मेरा ये जीवन हो
यही कामना बस भाना है।।

अनुभव का खेल

जिंदगी अब वीरान हो गई है।
देखने वाले भी हैरान हो गये है।
भूल गये सुख दुख की सोच भी।
क्योंकि लोग परेशान हो रहे है।।

हाल बेहाल है इस मौसम का।
खगशास्त्री फेल है गणना करने में।
जो भी बोलता है इस समय।
उल्टी पड़ रही गणना उसकी।।

गर्मी भीषण जब होनी थी।
तब तो तापमान सामान्य रहा।
होना था जब तापमान सामान्य।
तो तापमान बरदास से बहार हुआ।।

पहले अब की शिक्षा में।
यही तो अंतर दिख रहा।
पहले अनुभव ज्यादा होता था।
अब सिर्फ रटा का काम बचा।।

माँ ने दिया ज्ञान

बंधन और संबंध बतलाये
हे माँ तुमने ही मुझको।
फर्क दोनों का समझाया
समय समय पर आपने।
रिश्तों की परिभाषा को
हे माँ तुमने ही बतलाई।
कैसे कब और किससे
मिलना जुलना है तुमको।।

अपने पराये का फर्क
तुमने ही तो समझाया।
प्रीत प्रेम की डोरी को
कैसे बंधना है तुमको।
पग पग पर चलने में
तुमको मिलेंगे कांटे ही।
सोच समझकर चलना बेटे
अपने ही लूटते है अपनो को।।

देख जमाने के दस्तूरों को
तुमको अब अपनना है।
पराई बेटी को भी तुमको
अपनी संगानी बनाना है।
कल तक जो अपने थे
उनमें से कुछ अलग हो जायेंगे।
संसारिक रीति रिवाजों से
तेरे नाते अब जुड़ जायेंगे।।

आधार हो घर की

माँ कहे बुआ कहे
या कहे अब मौसी।
जो कुछ भी अब
कहना है ये माँ तुम्हें।
कोई कहे दादी तुम्हें
कोई कहे नानी जी।
सभी रिश्तें में अब
तुम्हीं बड़ी बूढ़ी हो।।

बना रहे अब सब पर
सदा आपका आशीर्वाद।
सरल स्वभावि और
मधुर भाषी हो तुम।
शांत और धैर्य की
हे माँ तुम मिसाल हो।
इसलिए तो तुम सबकी
प्यारी बुआ मौसी और माँ हो।।

मम्मी जी के चरणों मे समर्पित।

बैंक की राम कथा

मुझे तो लूट लिया लोगों
मेरे ही अपने बैंक ने।
जिसने धोकाधड़ी के लेनदेन में
साथ दिया उन हैकरो का।
कितनी भी शिकायतें कर लो
इस डीजिटल वाले युग में।
जिसमें सिर्फ मूर्ख बनते है
हम सब ग्राहक जन ही।।

बड़े बड़े वादे और विज्ञापन
करते है हम सबको लुभाने।
पर हकीकत कुछ और होती है
जब खाते से फ्राड होता है।
लीपा-पोती करती है बैंक
और उसका सिस्टम बस।
फिर ग्राहक के विपरीत ही
अपना निर्णय थोप देते है।।

न सुनते है न ही पढ़ते है
सिस्टम जनरेट मेल भेजता है।
हम बताते लिखते घटना को
और वो सिस्टम की बात करते।
इसलिए खातेदारी सिर पिट लेते
और धोकाधड़ी को भूल जाते।
इस तरह बैंक कर्मचारी अधिकारी
बिना जाँच के केश बंद कर देते।।

बिक रहे

रिश्ते नाते बिक रहे
देखो अब पैसों में।
बात नही बची अब
व्यवहार और शिष्टाचार की।
सब कुछ निर्भर करता है
बस अब तो पैसे पर।
इसलिए बिखर रहे है
रिश्ते नाते पैसों के अनुसार।।

समय चक्र की चाल भी
कैसे बदल रही।
भेष बदलकर अपने भी
अब रंग बदल रहे।
रिश्ता हो चाहे खून का
पर रिश्ता अलग बता रहे।
और कलयुग का एहसास
हम सबको करा रहे।।

कलयुग सतयुग का भी
अलग होता है महत्व।
सतयुग में सब कुछ
चलता था धर्मानुसार।
पर कलयुग में सब कुछ
चलता रावण राज्य जैसा।
इसलिए आज कल में
देखो कितना अंतर है।।

कलयुग में देखो तो
कोई नही है अपना।
सब के सब अवसरवादी है
इस कलयुग में।
ज्ञान बहुत पर बाटते
करते नही खुद अमल।
कहनी करनी का बस
खेल खेलते रहते।।

समय को समझे

वक्त की रफ्तार ने
रोक दिया हम सबको।
देख जमाने की चकाचोंध को
हम इसमें बहक गए।
रोक सको तो रोक लो
अपनी बेमुनियाद मांगो को।
जीवन तेरा बदलेगा फिर
इंद्रो पर बस करने पर।।

मन तो बहुत चंचल है
जो स्थिर नही रहता है।
होती है इच्छाएं आनंत
जिस पर रोक लगाना है।
कर्म करके ही तुमको
हासिल लक्ष्य को करना है।
मनाव जीवन का ये सत्य
जन-जन तक पहुँचना है।।

बैठे सहारे भाग्य भगवान के
कुछ भी नही मिलता है।
बिना कर्म किये हे मानव
पेट कभी नही भरता है।
इसलिए हे मानव तुमको
अपना कर्म बस करना है।
देने वाला तुमको देगा
बस संभलकर तुम्हें रखना।।

कर्म प्रधान जीवन है

वक्त की रफ्तार को
हम रोक नही सकते।
देख जमाने की चकाचोंध को
इसमें बहते हम रहते।
रुक सको तो रोक लो
अपनी महत्वकांक्षाओं को।
जीवन चक्र तेरा बदलेगा
अमल कर पाये इस पर।।

मानव मन चंचल होता है
जो स्थिर नही रहता है।
बैठे बैठे भी हमारा मन
भागता दौड़ता रहता है।
कर्म साधना कर ले तू
अपनी इस जीवन में।
काया तेरी बदलेगी
ये बात तू समझ ले।।

आवश्यकताएं तो होती है
हम सब की देखो अनेक।
पर कम में गुजरा क्या
हम कर सकते नही।
ऐसे ही प्रश्नो का हमें
उत्तर खोजना होगा।
अपने जीवन को बस
धैर्य से जीना होगा।।

भाग्य सहारे हम बैठकर
क्या हासिल कर पाएंगे।
अपने जीवन के लक्ष्यों को
क्या प्राप्त कर पाएंगे।
जीवन ये निश्चित छोटा है
जिसमें सब कुछ पाना है।
और अपने मानव जीवन को
बस सार्थक हमे करना है।।

सागर तट की यादें

मन को शांत करने हम
समुद्र किनारे आते थे।
मन की व्यथा को हम
सागर से कहते थे।
और घंटो तट पर बैठकर
सागर से बातें करते थे।
और कल्पनाओं के सागर में
खो जाते थे।।

सागर सम और चंचल है
जो सबको खूब भाता है।
अपनी उठती लहरों में वो
सबके दुख दर्द हर लेता है।
दिल को शांत और खुश
सदा ही वो करता है।
और अपने नीले जल से
सबको मोहित करता है।।

समुद्र किनारे बैठकर
सोच रहा हूँ मैं ।
वर्षो से हम आते रहे
इस सागर तट पर।
न ये बदला न हम बदले
पर बदल गये वो।
सबकी अपनी सोच है
सबकी अपनी दुनिया।।

मंत्र सुख शांति का

कभी हम गर्व करते है
कभी गमों को पीते है।
खुशी के पलों को भी
गमों से नीचे रखते है।
इसलिए तो हम सबसे
अगल ही दिखते है।
समानता के भावों को
सदा ही दिलमें रखते है।।

जिसे मान मर्यादाओं का
विचार दिलमें आता है।
वो इंसान सुखो से देखो
बहुत ही दूर होता है।
उठाकर देख लो इतिहास
अभिमान के चलते हारे है।
और अपनी सुख शांति को
सदा ही भंग करते है।।

संभलकर और समझकर के
जो इंसान जीते जिंदगी।
सदा ही हंसी खुशी से
भरा रहता है उनका घर।
सफलता भी इन्हीं के
सदा ही चूमती कदम।
और सुख समृध्दि भी
इन्हीं के घर में रहती है।।

वीर जवानों का आपरेशन सिंदूर

दिखाया फिर से जौहर
हमारे वीर जवानों ने।
किया परास्थ फिर से
पाकिस्तान के मसूबो को।
बाप बाप ही होता है
समझ लो बेटे तुम इसको।
अगर की फिर से गुस्ताकी
तो इस बार मिट जाओंगे।।

सियासी खेल में तुम क्यों
बेगुनाहों को मर रहे हो।
और छुप छुप कर पीछे से
तुम क्यों बार कर रहे हो।
यदि हो असली मर्द तुम तो
आ जाओं आमने समाने।
तुम्हारी असली औकात भी
तुम्हें मैदान में दिख जायेगी।।

वैसे तो अमल और शांति का
मार्ग सदा ही अच्छा होता है।
जो देशों की प्रगति का
सबसे बड़ा हथियार होता है।
जिसे हर देश को इस
हथियार को अपनाना चाहिए।
और अपने देश को सदा
दुनिया में ऊँचा रखना चाहिए।।

कहें लूट रहे

( बुंदेली गीत )

अपनो बनके देखो तो
अपनो खो ही लूट रहे।
मान सम्मान अपनो खोकर
अपने ही घर क्यों फूक रहे।।

बाँट रहे हो अपने आपखो
फिर भी गलती मनात नईयों।
देश की कमजोरीयों पर तुम
खूब ही बार करत हो।
गलत बात खो भी तुम देखो
कैसे सही बातलात हो।
अपनी गलतियों खो तुम
कैसे खूब छुपात हो।।

देश हमारो सोने जैसे
और स्वर्ग जैसे सुंदर है।
फिर भी अपनो देश छोड़कर
औरों के तुम गुणगान करत।
तनक शर्म भी आत नही तुमखो
ओइ देश की करो बुराई।
जोन देश में रहत और खाऊत
ओहि देश की करो बुराई।।

अपने और अपनो खो देखो
कैसे तुमने लूट लिया।
लूटका माल रखकर अपने
दोस्तो में ही बाँट दिया।
अमन चैन से रहने वालों के
घर में आग तुमने लगा दिया।
कैसे तुम इंसान हो और
कैसी तुम्हारी इंसानियत।।

अपनो बनके देखो तो
अपनो खो ही लूट रहे।
मान सम्मान अपनो खोकर
अपने ही घर क्यों फूक रहे।।

कल और आज में

चका चौन्ध की दुनियां में
दिखाना आदत है सबकी।
जो दिखा न सके तुम तो
लोग समझेंगे तुम्हें बेकार।
इसलिए इस दुनिया का
नही है अब कोई मालिक।
तभी तो देखो लोगों को
चलाते रहते अपनी अपनी।।

आज के युग में देखो
सभी परेशान बहुत है।
घर और परिवारों की
हालत बहुत बुरी है।
न प्रेम भाव और आदर है
और न कोई संस्कार।
बस दिखावे में ही सब
बहुत ज्यादा मस्त है।।

पहले और अब में तुम
समझ लो अंतर अब।
पहले तो एक कमाता था
और आठ दस खाते थे।
सभी लोग हँसते खेलते
जीवन मस्ती से जीते थे।
मगर अब खुद तुम देखो
क्या हालत है तुम्हारे।।

आचार्य श्री से जाने दुनियां ( गीत भजन )

( तर्ज चाँद सी मेहबूबा बहो में )

आचार्य श्री से जाने दुनियां,
ऐसे गुरु हमारे हैं I
नयनों में नेहामृत जिनके,
अधरों पर जिनवाणी है ।।

कर का पावन आशीष जिनका,
कंकर सुमन बनाता है I
पग धूली से मरुआंगन भी,
नंदनवन बन जाता है।
स्वर्ण जयंती मुनिदीक्षा की,
रोम रोम को सुख देती I
सारे भेद मिटा, जन जन को,
सुख शांति अनुभव देती।।
आचार्य श्री से जाने दुनियां,
ऐसे गुरु हमारे हैं I
नयनों में नेहामृत जिनके,
अधरों पर जिनवाणी है।।

अकिंचन से चक्रवर्ती तक,
चरण शरण जिनकी आते I
कर के आशीषों से ही बस,
अक्षय सुख शांति पाते I
योगेश्वर भी, राम भी इनमें,
महावीर से ये दिखते I
सतयुग, द्वापर, त्रेता के भी,
नारायण प्रभु ये दिखते I
युग युग तक रज चरण मिले,
यही संजय मन नित मांगे।
आचार्य श्री विद्यासागर का,
सदा हो आशीष मम माथे।।
आचार्य श्री से जाने दुनियां,
ऐसे गुरु हमारे हैं I
नयनों में नेहामृत जिनके,
अधरों पर जिनवाणी है।।

आचार्य श्री से जाने दुनियां,
ऐसे गुरु हमारे हैं I
नयनों में नेहामृत जिनके,
अधरों पर जिनवाणी है ।।

जीवन का आनंद

मोहब्बत करने वालों का
अलग ही जीना होता है।
समय की सीमाओं का
अलग आगाज होता है।
जो दोनों को समझते है
वो ही खुशी से जीते है।
और जिंदगी के हर पलों का
बहुत ही आनंद उठाते है।।

खुशी का आगाज होता है
दुखो का अंत करके।
सहन शीलता का ही
प्रमुख कारण है खुशी।
समावेश हर तरह का
जीवन में होना चाहिए।
तभी जिंदगी को जीने का
आनंद मेहसूस होता है।।

समय के चक्र को देखो
निरंतर चलता रहता है।
कद्र जो इसकी करता है
वो ही सुखी भी रहता है।
जो इसकी कद्र नही करता
जीवन भर उलझा रहता है।
इसलिए तुम सब जन
समय के बंधन में बंधो।।

हमारा और तुम्हारा प्रिये
बहुत बहुमूल्य है जीवन।
जो हम दोनों समझेंगे
तभी सुखी रह पाएंगे।
जीवन का मूलमंत्र भी
लोगों को समझा पाएंगे।
और अपने जीवन में
बहुत आनंद उठाएंगे…।।

कुछ करने का

बहुत कुछ करने का
हम संकल्प लेते है।
सोई हुई जिंदगी को
जगाने का प्रयास करते है।
जो हम समझ न पाये थे
उसे अब समझ रहे है।
और अपनी कि भूलों को
अब हम सुधार रहे है।।

हमारे निजी स्वार्थों ने
अलग लोगों से कर दिया।
मिली विरासत को भी
मिट्टी में हमने मिला दिया।
दिया कितना कुछ था
हमारे मात-पिता ने।
पर उनके संस्कारों को
जीवन में उतार नहीं पाये।।

बहुत पढ़ लिखकर भी हम
संसार को समझ नहीं पाये।
जो व्यवहारिक और स्नेह से
निरंतर चलता रहता है।
और एक दूसरे के रिश्तों से
समाज और देश बनता है।
जिसमें सभी को भूमिका
निभाना अपनी पड़ता है।।

भले ही हमारे पूर्वज
रहे हो अनपढ़ चाहे।
पर संसार को चलाने का
वो बहुत ही ज्ञान रखते थे।
इसलिए तो लाखों का
कारोबार भी करते थे।
और देश समाज में अपना
ऊँचा नाम भी रखते थे।।

मानव धर्म

बहुत कुछ करने की
हम इच्छा रखते है।
कहाँ से शुरू करू
कहाँ पर अंत करू।
मिला है जीवन हमको
हमारे पूर्व कर्मों के कारण।
इसलिए फिर से हमको
अच्छे कर्म करना है।।

जो हम कर न सके
अपने पूरब जन्म में।
वो हम करना चाहेंगे
अब इस जीवन में।
इसलिए तो हम अपने
सुधारेंगे कर्मों को।
ताकि मानव जन्म हमको
फिर से मिल जाये।।

दया धर्म का भाव हम
सदा ही दिलमें रखते है।
मानव धर्म को भी हम
अच्छे से जानते है।
इसलिए हम स्वयं को
मानव सेवा में लगाते है।
और मानव होने का
हम धर्म निभाते है।।

रिश्ता बनाया

किसी के दर्द का
तुम्हें क्या एहसास होता है।
किसी की जिंदगी का
तुम्हें अंदाज है रहता है।
बहुत कुछ खोकर हमने
तुम्हें जो पाया है।
बड़ी किस्मत से हमने
तुमसे दिल लगाया है।।

कभी रिश्ते भी हमने
निभाना तुमसे सिखा था।
मोहब्बत होती है क्या
सिखाया करना तुमने।
जो मैं कर नही पाता
तो जीवन निरस रहता।
जो रस तुमको दिख रहा
वो तुमने ही तो भरा।।

भला हो अब तुम्हारा
जो तुमने चाहा मुझको।
मैं भी दिलसे तुमको
बहुत ही चाहता था।
पर कहने की कभी
मैं हिम्मत कर नही पाया।
पर तुम्हारी हर अदा का
मैं था बहुत दिवाना।।

राम भक्त हनुमान जी

राम कृष्ण हनुमान की
करते सब बातें।
करे नहीं अमल पर
उनके आचरणों को।।

आये जब संकट तो
याद आये हनुमान।
हे संकट मोरचन तुम
हरो हमारे कष्ट।
मैं अर्पित करूँगा
तुम्हें घी और सिंदूर।
सुख शांति मुझे दो
मेरे पालन हार।।

बात करे जब भी
हम मर्यादाओं की।
याद आ जाते है
श्रीराम चंद्र जी।
उन जैसा कोई और
नहीं हैं मर्यादापुरूषोत्तम।
इसलिए हर नारी पूजे
उन्हें श्रध्दाभक्ति से।।

अब हम बात करें
स्नेहप्यार मोहब्बत की।
मनमें याद आ जाते
हमें मुरली वालेजी।
कितनी लीलाएं रची
प्यार मोहब्बत की।
इसलिए अमर है जगमें
राधा कृष्ण की जोड़ी।।

राम कृष्ण हनुमान की
करते सब बातें।
करे नहीं अमल पर
उनके आचरणों को।।

गाँव के प्रति नही बदला

वर्षो बाद आया हूँ
आज अपने गाँव।
सब कुछ बदल गया
पर बदला नही दिल।
इसलिए तो आ गया
आज पुन: अपने घर।
देख घर की हालत को
याद आ गये पुराने दिन।।

नदी किनारे बैठकर
सोच रहा था आज।
कैसे दिन थे वो
वर्षो पहले वाले।
मिलते जुलते रहते थे
हम अपनो से तब।
मनकी बातें करते थे
अपने मन मीत से।।

अब तो बिछड़े हो गये
कितने महीने और साल।
फिर भी याद वो आते है
मन जब होता उदास।
भाग दौड़ में जिंदगी
कैसे निकल रही।
पैसा तो पास बहुत है
पर दिलको नही सुकून।।

पढ़ लिखकर तो मिल गया
पैसा नाम और सोहरत।
पर इसके बदले खो दिया
अपनो का स्नेह और प्यार।
चैंन नही है दो पल का भी
बैठ सकू अपनों के पास।
जिसके लिए सब कुछ किया
मोड़ रहे मुँह वो ही आज।।

बैंक पुलिस ने कर्तव्य निभाया

मेरे कर्मों के फल के कारण।
मुझे मिला उनका अच्छा फल।
लगी थी जो कुछ दिन पहले चोट।
आज मिल गया निजाज उससे।।

हमारा और मिलने वालों का
काम आ गया आज पुण्य।
और वापिस मिल गया धन
जो कुछ दिन पहले उड़ाया था।
सराहना करता हूँ बैंक पुलिस की
जिन्होंने निभाई भूमिका अपनी।
और पकड़कर अपराधियों को
जिम्मेदारी निभाई उन्होंने अपनी।।

मैं दिलसे दुआएँ देता हूँ उनको
जिन्होंने प्रार्थना की हमारे लिए।
और हमारा हौसला आदि भी
बढ़या साथ हमारे रहकर।
जिसके कारण टूट नहीं पाया
और सार्थक प्रयास करता रहा।
जिसका फल मुझे आज
बिना किसी परेशानी के मिला।।

संस्कार

मैं दिल से भी सुंदर हूँ
मैं मन से भी सुंदर हूँ।
मेरे किस्मत का द्वार
तेरे से ही तो खुला है।
बहुत आये और गये
मेरे जीवन से देखो।
मगर मेरे किस्मत में
लिखा है तेरा ही साथ।।

कद्र करना मुझे आता
अपने जीवन साथी की।
जो पग-पग पर देती है
हमारा साथ हर हालात में।
इसलिए मैं रखता हूँ
सदा ही ख्याल उसका।
क्योंकि हम दोनों जन्में है
सिर्फ एक दूसरे के लिए।।

बहुत खुशी मिलती है
जब बच्चें देते है सम्मान।
तब हमें भी याद आते है
हमारे माता-पिताजी तब।
ये उनके ही थे संस्कार
जो दिला रहे हमें सम्मान।
मैं उनके चरणों में अपना
सदा ही सिर झूकता हूँ।।

साइबर क्राइम का शिकार हुये

मैं भी हो गया देखो आज
साइबर क्राइम का शिकार।
बहुत सतर्क होकर भी
मैं बन गया उनका शिकार।
मेरे मोबाइल और खाते को
किया उन्होंने चलकी से हैक।
और चार मिनिट में उड़ाये
मेरे खाते से दो लाख।।

जब आया मुझको मेसेज
मेरे रजिस्टर्ड मोबाइल पर।
की मेरे खाते से एक दम
निकल गए दो लाख।
तुरन्त मैंने फिर इसकी
शिकायत बैंक पुलिस में कराई।
और अपने खाते को भी
ब्लाक भी करा दिया।।

मगर फिर भी अपराधियों की
जरा हिम्मत तो देखो।
पुन: फिर से उन्होंने ने
पैसे निकलने की कोशिस की।
पर इस बार वो लोग
सफल नही हो पाये।
ये है अब हमारा आधुनिक
जिसे लोग कहते है भारत।।

बहुत बेबस और लाचार
अभी तक तो बना हुआ हूँ।
अब काम पुलिस बैंक को
ही सब कुछ करना है।
जिससे मिल सके पैसे
मेरी मेहनत की कमाई के।
मातारानी जी से प्रार्थना करते है
की मिल जाये मेरे पैसे।।

मिले श्रीरामजी

चलते चलते मुझे, श्रीराम मिल गए।
बातों ही बातों में, वो पूछने लगे।
क्या करते हो तुम, मैने कहाँ की कवि हूँ।
सुनकर श्री रामजी, जोर से हँस पड़े।
मैने पूछा उनसे, क्या हो गया जी।
कहने वो लगे, डरते है कवियों से।
मैने कहाँ जी, क्यों डरते हो?
कवि भी तो, एक इंसान है।
फिर इंसान से, भला क्यों डरते हो।
वो कहने लगे, कवि वो होता है।
जहां न पहुँचे रवि, वहां पहुँचे कवि।
फिर हर बातों का, विश्लेषण करके।
लोगों को कवि, हर वक्त सुनता है।
इसलिए हम भी, डरते है उससे।
मैने पूँछा क्या, कवि झूठ लिखता है।
वो बोले क्या जरा सुन लो तुम सब:-
मैं श्रीराम हूँ।
जिसको तुम सब जन,
कहते हो मर्यादा पुरुषोत्तम।
पर क्या मेरे नाम को
सार्थक तुम लोग कर रहे?
कुछ तो बोलो
पृथ्वी के वसन्दे।
कोई उत्तर हमें
नही मिला उनसे ।
इसलिए में कहता हूँ सदा
मत करो बदनाम
मेरे नाम को तुम।
छोड़ दो मुझे
मेरे ही हाल पर।
हिंसा के बीज मत
वोओ मेरे नाम पर।
अपनी स्वार्थ के लिए
कुछ भी किये जा रहे।
हे कवि वर मुझे
तुम बचा लीजिए।
और जन जन तक
मेरा सही संदेश
तुम पहुँच दीजिये।
में समझ गया
श्रीराम का दर्द।
और लिख दिया मैने
मानो तो में भगवान
जानो तो भगवान
आस्था ही बची है
मन में लोगो के
पर दिल में नही है
अब मर्यादापुरुषोत्तम राम।।
सोते सोते ही छोड़ गये
हमें बीच में ही श्रीराम।
और हो गई सुबह
देखते ही देखते।।

( राम नवी की सभी देशवासियों को बहुत बहुत शुभ कामनाएं और बधाई, आप सभी रामजी के आदर्शों को माने और उसी पथ पर आगे चले। यही गीत सभी लोगोंको मेरा समर्पित है। )

दुर्गा का चंद्रघंटा स्वरूप

चैत्र नवरात्रि में मातारानी
बुलाती है दरबार में।
कहानी किस्से भी खूब
सुनती है भक्तों को।
मगर वो दर्द सबका
स्वयं ही हर लेती है।
दया का भाव रखकर
सभी को माफ करती है।।

जगत जननी उन्हें हम
सदा ही कहते जो है।
अगर हो कृपा उनकी
तो बन जाते है काम।
इसलिए चैत्र नवरात्रि में
भक्ति भाव से पूजते है।
और प्रसन्न होकर माँ भी
चंद्रघंटा स्वरूप में देती है दर्शन।।

माँ का उपकार

करो उपकार खुद पर तुम
रोज माँ के दर्शन करके।
तेरी श्रध्दा और भक्ति से
खुले भाग्य तेरे मानव।
रखो विश्वास माँ पर तुम
तुझे शुभ फल ही मिलेगा।
चैत्र नवरात्रि में करके पूजा
तेरा मनोबल बढ़ेगा।।

जिसे दिखते है माँ के रूप
उसका कल्याण निश्चित है।
नौ रूपो में माँ का
तुम्हें गुण गाना करना है।
जो श्रध्दा और भक्ति से
कर पाये नौ दिन पूजा।
तो जन्मों जन्मों तक
तुम्हें मिलता रहेगा फल।।

कहते है इन दिनों में माँ
भृमण करती है पृथ्वी का।
जो अपने बच्चों पर
बरसती है सदा कृपा।
जिससे बच्चों का भी
मातृ प्रेम बढ़ रहता है।
और माँ-बेटे के रिश्तों की
बंधी रहती है डोर।।

माता के दर्शन करके

करे जो पूजा और भक्ति
चैत्र नवरात्रि के दिनों में।
और करते है साधना
माता की उपासना करके।
तो मिलता है सूकून
उन्हें अपने जीवन में।
और हो जाती इच्छाएं
उसकी इन दिनों में पूरी।।

माता के नौ रूपों को
जो नौ दिन पूजते हैं।
उन्हें हर रूप का दर्शन
अपनी साधना में दिखता है।
और माता रानी उसकी
हर मुराद पूरी कर देती है।
क्योंकि वो माँ है इसलिए
अपने बच्चों पर दया करती है।।

यदि कोई ईर्ष्या भाव रखकर
माता के दरवार में आता है।
तो उसे फल वही पर मिल जाता है।
चाहे वो राजा हो या रंक उसपे
मातारानी की नज़रे समान होती हैं।
इसलिए पूरी श्रध्दाभाव से उनकी
पूजा करके पाये सदा शुभफल।।

चैत्र नवरात्रि और विक्रम संवत 2082
शुभ अवसर पर मातारानी के चरणों
में मेरी यह रचना समर्पित है।।
जय माता दी

विक्रम संवत 2082

न करो कोई गम अब
संवत 2081 जाने का।
बीत गया सो बीत गया
अब गुजर गया साल।
पर हमको सिखा गया
प्रेम भाव का सम्मान।
आया नहीं विपत्ति में
धन दौलत अब की बार।।

भूला कर सारे गम अपने
करो नई सोच की शुरूआत।
तन मन धन से करो अब
तुम लोगों की मदद ।
तेरे संग ये ही जायेगा
रखा रहेगा सारा धन।
याद किये तुम जाओंगे
सदा अपने कामो से तुम।।

नया साल दे आपको,
मन माफिक परिणाम।
सभी ख्वाब पूरे हो तेरे,
करते प्रार्थना ईश्वर से ।
सभी को रिद्धि दे, सिद्धि दे,
वंश में वृद्धि दे।
ह्रदय में ज्ञान दे,
चित्त में ध्यान दे।
अभय वरदान दे,
दुःखो को दूर कर।
सुख भर पूर दे,
सपनो को संपूर्ण करे।
सज्जन जो हित दे,
कुटुंब में प्रीत दे ।
जग में जीत दे,
माया दे, साया दे ।
और निरोगी काया दे,
मान-सम्मान दे।
सुख समृद्धि और ज्ञान दे।
शान्ति दे, शक्ति दे,
और भक्ति भरपूर दें…।
ऐसी मैं देता हूँ,
शुभ कामनाएं दिलसे।
रहे अमन और शांति
अपने इस मुल्क में।
हिल मिल कर रहे
हम अपने भारत देश में।।

जीवन का संघर्ष

जिंदगी का मुझे अब
विश्लेषण करना होगा।
मन की उदासियों का
हल खोजना होगा।
दिल की वेताबियों का
हल खोजना पड़ेगा।
तब जाकर जिंदगी को
सुकून से जी सकूंगा।।

दिल की धड़कनो को
पढ़ना तुम सीखो।
बेचैनी दिल की तुम
मिटा करके देखो।
जिंदगी की हर पहेली
सुलझेगी फिर तेरी।
काया तेरी जीवन की
बदलेंगी फिर निश्चित।।

मत सोच तू इतना
क्या पाया क्या खोया है।
हर हालात में जीना
मैने सीख लिया है।
कैसा भी समय हो
डरता नही मैं उससे।
खुद पर है विश्वास
इसलिए लड़ता हूँ हालातों से।।

संघर्ष की ये लड़ाई
खुद ही लड़ रहा हूँ।
अपने अनुभवों से ही
मैं बार कर रहा हूँ।
जीवन के चक्रव्यूह को
मैं भेद अब रहा हूँ।
जीने के अंदाज को
बदल मैं नही रहा हूँ।।

सहनशीलता

जिंदगी का मुझे अब
विश्लेषण करना होगा।
मन की उदासियों का
हल खोजना पड़ेगा।
दिल की वेताबियों का
हल खोजना पड़ेगा।
तब जाकर जिंदगी की
सहीनशीलता समझ सकूंगा।।

दिल की धड़कनो को
पढ़ना तुम सीखो।
बेचैनी दिल की तुम
मिटा कर तुम देखो।
जिंदगी की हर पहेली
फिर सुलझेगी तेरी।
काया तेरी जीवन की
निश्चित ही बदलेंगी।।

मत सोच तू इतना
क्या पाया क्या खोया है।
हर हालात में जीना
मैने सीख लिया है।
कैसा भी समय हो
डरता नही मैं उससे।
खुद पर है विश्वास
इसलिए सहीनशील बना हूँ।।

संघर्ष की ये लड़ाई
खुद ही लड़ रहा हूँ।
अपने अनुभवों से ही
मैं वार कर रहा हूँ।
जीवन के चक्रव्यूह को
मैं भेद अब रहा हूँ।
जीने के अंदाज को
सहीनशीलता से झेल रहा हूँ।।

कर्मों का फल

हृदय की कोमलता का
अलग एहसास होता है।
जीवन में सुख शांति का
अटूट भंडार बढ़ता है।
जो स्नेह प्रेम रखते है
उन्हें प्रेम भाव मिलता है।
जमाने में रहने का
अलग अंदाज होता है।।

कमाना धमाना जीवन में
लगा ही रहता है।
लोग की नवज जान लेना
ये अनुभव अलग होता है।
जो भावनाओं से खेलते है
थोड़े दिन तो खुश रहते है।
मगर फिर अंतराल के बाद
दुखो में डूब जाते है।।

समय का चक्र तुम देखो
कैसे ये घूमता रहता है।
कभी छाया देता है
तो कभी फल भी देता।
तुम्हारे कर्मों के अनुसार
ये जीवन चलता रहता है।
इसलिए करो तुम अब
अच्छे और सही कर्म।।

नई परिभाषा

भूल गये लोग अब
प्यार की परिभाषा ..।
आ गया दौर कैसा
देख रहा है जमाना।।

एक वो दौर था
मिलते थे लोग जब।
सुख दुख की बातें
किया करते थे तब।।

अब ये कैसा जमाना
देखो कैसे आ गया।
जहाँ रिश्तों का मतलब
लोग समझते नहीं।।

घर बड़ा है बहुत
पर वो खाली पड़ा।
अपनों को रहने का
दिल ये रखते नही।।

दिल धड़कता बहुत
केवल स्वार्थ के लिए।
मतलब का जमाना और
लोग है भी मतलबी।।

देखो तो अब ये
रिश्तों के मयाने।
है जहाँ सब अपने
पर दिलमें है नही जगह।।

भूल गये लोग अब
प्यार की परिभाषा।
आ गया दौर कैसा
देख रहा है जमाना।।

जल ही जीवन

पानी है अनमोल,
समझो इसका मोल।
जो अभी न समझोगे,
तो सिर्फ पानी नाम सुनोगे।

आने वाले वर्षों में,
पानी बनेगा एक समस्या ।
देख रहे हो जो भी तुम,
अंश मात्रा है विनाश का।
जो दे रहा तुमको संकेत।
जागो जागो सब प्यारे,
करो बचत पानी की तुम।
बूंद बूंद पानी की बचत से,
भर जाएगा सागर प्यारा।।

बिन पानी कैसे जीयेंगे,
पड़े पौधे और जीव जंतु।
और पानी बिना मानव,
क्या जीवित रह पाएगा।
बिन पानी के वो,
भी मर जायेगा।
और भू मंडल में कोई,
नजर नही आएगा।
इसलिए संजय कहता है,
नष्ट करो न प्रकृति के सनसाधनों को।।

बचा लो पानी वृक्षो
और पहाड़ों को।
लगाओ और लगवाओ,
वृक्षो को तुम अपनो से।
कर सके ऐसा कुछ हम,
तभी मानव कहलाओगे।
पानी विहीन भूमि में,
पानी को तुम पहुँचोगे।
और पड़ी बंजर भूमि को,
फिर से हराभरा कर पाओगे।
और एक महान कार्य करके,
दुनिया को दिखाओगे।।

मुलाकात

रात सुहानी बन गई
जब मिला मेरा मित।
चाँद ने भी चाँदनी
बिखेर दी उसे देखकर।
फूल पत्ती और वृक्षों ने
सहमति दे दी खिलकर।
जिससे फिर से मोहब्बत
जिंदा हो गई हमारी।।

वो ही उसका अंदाज
वो ही उसका एहासस।
वो ही उसकी आँखों का
प्यार भरा अंदाज।
आज फिर से उसने
दिखा दिया मुलाकात में।
और दिलकी धड़कनो को
फिर से धड़का दिया।।

माना की मोहब्बत कभी
किसी की भी मारती नही।
जवानी जरूर डालती है
पर दिलकी जवानी बढ़ती है।
मंजिले भरे ही बदल गई हो
पर मोहब्बत कभी बदलती नही।
इसलिए उसकी यादें हमेशा
दिल में जिंदा रहती है।।

बेटी को जन्म दिन की बधाई

बेटी को जन्मदिन की
दिल से शुभ कामनाएं
और देता हूँ शुभ आशीष।
प्रगति के पथ पर चलकर
करो नाम अपना रोशन।
सबकी प्यारी सबकी दुलारी
तभी हृदय में सबके बसती हो।
ख्याल सभी का तुम रखती हो
इसलिए राज दिलों पर करती हो।।

रोज कर्मशाला से आने पर
पत्नी धर्म निभाती हो।
स्नेह प्यार से पति पत्नी
तुम दोनों प्रेम भाव रखते हो।
एक दूसरे के प्रति भी
तुम दोनों सम्मान भाव रखते हो।
एक दूसरे के पूरक बनकर
सभी कार्य कर लेते हो।।

अपना दायित्व और कर्तव्य को
तुम दिलसे खूबी निभाती हो।
जितनी चिंता मात-पिता करती
उतनी ही सास-सुसर की करती हो।
दोनों घरों का अब बेटी तुम
मान सम्मान बढ़ती हो।
और बेटी बहू का फर्ज तुम
व-खूबी से निभाती हो।।

रोज़ समय पर माँ को
दवा की याद दिलाती हो।
और कभी-कभी अपने हाथो से
मम्मी को खिलाती हो।
उसका दुख दर्द हर लेती हो
और खूब प्यार लूटती हो।
अपनी मम्मी की प्यारी बेटी
फिर तुम बन जाती हो।।

घर को मन से और दिलसे,
फूलो सा सजाती रहती हो।
उसे सुंदर बनाकर तुम
घर को सभाँल लेती हो।
और गृहस्थ जीवन की गाड़ी को
तुम अच्छे से चलती हो।
और अपने कर्तव्यों को तुम
अच्छे से निभाती हो।।

दूर होकर भी तुम
सदा पास रहती हो।
कर्तव्य माँ-बाप के प्रति का
बेटी तुम निभाती हो।
याद जब भी आये तुम्हारी
तो हृदय में एकदम आ जाती हो।
एक बेटे का कर्तव्य तुम
बेटी होकर बेटे जैसा निभाती हो।।

मीलों दूर होकर भी बेटी
पास होने का एहसास दिलाती हो।
इसलिए तो नाना नानी और
दादी दादा को बहुत भाती हो।
मामा मामी मौसा मौसी और
चाचा चाची बुआ फूफा को
बहुत प्यारी तुम लगती हो।।

मम्मी पापा की अनमोल “हीरा”
जैसी तुम बेटी हो।
इसलिए सदा दिलमें बसी
तुम रहती हो।
इसलिए बेटी को सरस्वती,
दुर्गा और लक्ष्मी हम कहते है।
क्योंकि तुम सभी का
दिल जीत लेती हो।
ये कविता संजय अपनी
बेटी को समर्पित करता हैं।
और जन्म दिनकी ह्रदय से
उसे मुबारकबाद देता हैं।।

होली खेलो सबके संग

राम राज की होली का,
अंदाज लगाओ तुम।
राम ने खेली,
मर्यादाओं की होली।
कृष्ण ने खेली,
स्नेह प्यार की होली।
हम सब खेलें,
रंगो से होली।।

रंगो का ये देखो,
एक अनोखा त्यौहार।
जिसको खेले हर कोई,
प्यार मोहब्बत संग।
क्योंकि इसमें झलकता,
स्नेह प्यार अपार।
और सब पर चढ़ जाता,
ये रंग होली का।।

होली तुम खेलो तो,
राधा-कृष्ण के जैसी।
रखो ख्याल बस तुम,
राम राज्य जैसा ही।
तभी आनंद आयेगा,
तुम सबको होली का।
मेल मिलाप भी बढ़ेगा,
हम सब जन का।।

रंग-बिरंगे चेहरों के संग,
नाच गा रहे है।
कोई बनी है राधारानी,
कोई बना है कृष्ण।
नोक झोंक आपस में करके,
नाच गा रहे है।
मान मर्यादा और आदर का,
देखो रंग चढ़ा है।।

रंगो में रंगकर तुम,
कैसा महसूस करते हो।
अपने रिश्तों का तुम,
आनंद भी लेते हो।
देवर-भाभी जीजा-साली,
संग होली खेले हो।
अपना बनकर होली पर,
खूब आनंद लिए हो।।
खूब आनंद लिए हो..।।

होली का आनंद

राम राज की होली का
अंदाज लगाओं तुम।
राधा-कृष्ण जैसे होली को
तुम खेल के दिखाओ।
स्नेह-प्यार और आत्म-मिलन का
ये त्यौहार मनाओं तुम।
जिसमें झलकता रहे सदा ही
रंगो से भरा प्यार अटूट।।

रंग बिरंगे कपड़ो के संग
नाच गा रहे होरयारे।
कोई बनी है राधा तो
कोई बना है कृष्ण यहाँ।
नोक झोंक आपस में करके
नाच गा रहे है ये सब।
मान मर्यादों और आदर का
रंगो से भाव दिखा रहे।।

रंगो में खुदको रंगाकर
कैसा महसूस करते हो।
अपने पराये रिश्तों का भी
रंगो से आनंद तुम लेते हो।
देवर-भाभी जीजा-साली और
सराज से होली तुम खेले हो।
अपना बनकर तुम सब ने
आनंद होली का लिए हो।।
आनंद होली का लिए हो..।।

आई होली

आओ हम सब,
मिलकर मनाएं होली।
अपनो को स्नेह प्यार का,
लगाये रंग हम।
चारो ओर होली का रंग,
और है अपने संग।
तो क्यों न एकदूजे को,
लगाये हम रंग।
आओ मिलकर मनाये,
रंगो की होली हम।।

राधा का रंग और
कान्हा की पिचकारी।
प्यार के रंग से,
रंग दो ये दुनियाँ सारी।
ये रंग न जाने कोई,
जात न कोई बोली।
आओ मिला कर मनाये,
रंगो की होली हम।।

रंगों की बरसात है,
हाथों में गुलाल है।
दिलो में राधा कृष्ण,
जैसा ही प्यार है।
चारो तरफ मस्त,
रंगो की फुहार है।
हर कोई कहा रहा,
ये रंगो का त्यौहार है।।

बड़ा ही विचित्र ये,
रंगो का त्यौहार है।
जो लोगों के दिलों में,
रंग बिरंगी यादे भरता है।
देवर को भाभी से,
जीजा को साले से।
बड़े ही स्नेह प्यार से,
रंगो की होली खिलता है।
और अपना प्यार,
रंगो से बरसता है।।

होली मिलने मिलाने का,
प्यारा त्यौहार है।
शिकवे शिकायते,
भूलाने का त्यौहार है।
और दिलों को दिलों से,
मिलाने का त्यौहार है।
सच मानो और जानो,
यही होली का त्यौहार है।।

रंग बिरंगी होली

चारों तरफ रंग ही रंग है
मौज मस्ती का दौर है।
लगता यारो होली का
त्यौहार आ गया।
इसमें क्या छोटे क्या बड़े
सबके चेहरे रंगो से रंगे।
जो खुशीयों और उमंग से सबके चेहरे खिला रहे।।

गिले शिकवे और शिकायतें
जो भी हो वो भूल जाते है।
रंगों के इस त्यौहार पर
दुश्मनों को भी गले लगते है।
अपना स्नेह प्यार सभी पर
दिल से बहुत लुटाते है।
और राधा कृष्ण की जोड़ी
जैसे स्वयं को दिखाते है।।

राधा का है रंग और
कृष्ण की है पिचकारी।
लगता है रंग अंग पर
तो अंग खिल उठता है।
और अंग अंग फूलों की
तरह से खिल उठता है।
जो प्यार मोहब्बत को
दिलों में जगा देता है।।

होली का रंग

तुम्हें कैसे रंग लगाएँ,
और कैसे होली मनाएं ?
दिल कहता है होली,
एक-दूजे के दिलों में खेलो
क्योंकि बहार का रंग तो,
पानी से धुल जाता है
पर दिल का रंग दिल पर,
सदा के लिए चढ़ा जाता है॥

प्रेम-मोहब्बत से भरा,
ये रंगों का त्यौहार है।
जिसमें राधा कृष्ण का,
स्नेह प्यार बेशुमार है।
जिन्होंने स्नेह प्यार की,
अनोखी मिसाल दी है।
और रंग लगा कर,
दिलों की कड़वाहट मिटाते हैं॥

होली आपसी भाईचारे,
और प्रेमभाव को दर्शाती है।
और सात रंगों की फुहार से,
सात फेरों का रिश्ता निभाती है।
साथ ही ऊँच-नीच का,
भेदभाव मिटाती है।
और लोगों के हृदय में,
भाईचारे का रंग चढ़ाती है॥

मतलबी दुनिया

मतलब की है ये दुनिया
और मतलब के है लोग।
मतलब निकलते ही ये
पहचानते नही किसी को।
अपने पराये का भी
फर्क रखते ही नही।
लूटते है अपना बनकर
ऐसे लोग हम सभी को।।
मतलब की है ये दुनिया
और मतलब के है ये लोग।।

रिश्तों की ये परिभाषा
क्या समझायेंगे ये लोग।
मतलबी लोगों की दुनिया में
रिश्तें भी बनते है मतलबी।
अवसर मिलने पर ये सब
डस लेते है अपनो को भी।
और भूल जाते है रिश्तों को
मतलब अपना निकलते ही।।
मतलब की है ये दुनिया
और मतलब के है लोग।।

कुछ वर्षो से ये माहौल
बहुत ही पनप रहा है।
मतलब के लिए इंसान
देश समाज से खेल रहा।
और हँसता खेलता देश
क्यों आग में जल रहा।
स्वार्थ की हदों में देखो
सब कुछ मिट रहा।।
मतलब की है ये दुनिया
और मतलब के है लोग।।

खुलकर जीने वालों का
अंदाज अलग होता है।
रिश्तों की परिभाषा भी
मतलबियों से अलग होता है।
रिश्तें ये जिससे बनाते है
उन्हें दिलसे निभाते है।
फिर ता उम्र सुख-दुख में
साथ खड़े रहते है।।
मतलब की है ये दुनिया
और मतलब के है लोग।।

चाहत

चाहत बहुत रखते है
अच्छा अच्छा पाने का।
शुभ फल की चाहत में
क्या क्या हम कर जाते।
मानों जमाने से हमने
जंग जो लड़ लिया हो।
इसलिए हमारी कहानी का
कुछ तो हल मिलेगा।।

माना मेरी चाहत का
कुछ तो पता होगा।
जीवन के रंगों का
कुछ तो अंदाज होगा।
रंगो से भरी दुनिया में
वे रंग कैसे मैं रहूँगा।
रंगा रंग जीवन का
मैं आनंद तो उठाऊँगा।।

सब कुछ तो मिला है
मुझे उस परमात्मा से।
कैसे मैं भूल जाऊँगा
अपने पालन हार को।
जिसने मुझे सराहा है
जीवन के हर मोड़ पर।
खुशियों से मेरा दमन
भरकर जो उसने दिया है।।

प्यारी बेटी

जिस दिन से जन्म हुआ
घर में प्यारी बेटी का।
उस दिन से आई है
खुशियाँ घर में अपार ।
कहने और सुनने को
मेरे पास शब्द ही नही।
तुम खुद लक्ष्मी तुलसी हो
मेरे घर आंगन की बेटी।
मैं भूल नही सकता तुझे
अपने जीते जी बेटी।
तुम जान हो हमारे दिलकी।।

सब कुछ बदल गया है
घर द्वार और अंगान का।
बेटी के कदम पड़ते ही
तकदीर बदल गई।
बेटी और बेटा तुम ही हो
हमारे घर परिवार के।
मेरी जिंदगी की तुम
हो अब से पतवार।
मैं भूल नही सकता तुझे
अपने जीते जी बेटी।
तुम जान हो हमारे दिलकी।।

हम सबके दिलों की तुम
अब से जान बन गई।
आदर और सम्मान की तुम
एक पहचान बन गई।
दो पल न देखो तुम तो
सब पूँछते है बस तुम्हें।
मानों की घर की देखो
अब जान ही निकल गई।
मैं भूल नही सकता तुझे
अपने जीते जी बेटी।
तुम जान हो हमारे दिलकी।।

सोचता हूँ की मैं कैसे
बेटी तुझे विदा करूँगा।
अपने जिगर के टुकड़े को
कैसे मैं अलग करूँगा।
समाज के इस दस्तूर को
क्या मैं तोड़ पाऊँगा।
और खुद के ही अंश को
मैं कैसे जुदा करूँगा।
मैं भूल नही सकता तुझे
अपने जीते जी बेटी।
तुम जान हो हमारे दिलकी।।

महिला कर्ताधर्ता

बिना वेतन जो काम करे
न कोई छुट्टी न कोई गम।
बस समय पर काम करे
और लोगों को खुश रखे।
बता सकते हो ये कौन है
जो निस्वर्थ भाव से करती है।
ये और कोई नहीं घर की
एक महिला हो सकती है।।

हर मौसम की ये आदि है
सबसे बाद में सोती है।
पर सबसे पहले उठती है
और सबका ख्याल रखती है।
नित्य क्रियाओं से निवृत होकर
दिया भोग प्रभु को लगती है।
जिसे घर में सुख शांति
और बरकत बहुत होती है।।

यह सब अकेली महिला
हर दिन नियम से करती है।
खुद की चिन्ता कम पर
सब का ख्याल रखती है।
घर की कारंदा होकर
अपना फर्ज निभाती है।
बिना प्रबंधन की शिक्षा के भी
प्रबंध अच्छे से करती है।।
ये सब एक महिला ही
कर सकती है. . . ।।

मात-पिता का नाम

मैं जिंदगी देने वालों का
सदा ही नाम चाहता हूँ।
और उनकी इच्छाओं का
हनन मैं कर नही सकता।
इसलिए जो वो चाहते है
मैं उन्हें ही पूरा करता हूँ।
और जन्म देने वालों को
सदा ही जीवित रखता हूँ।।

मिली है जिंदगी मुझको
मेरे माता पिता के द्वारा।
इसे मैं जीना चाहूंगा
आदर और सम्मान के साथ।
दमन मैं कर नही सकता
उनके और खुदके अरमानों का।
इसलिए कोशिश करता हूँ
सभी को खुश रखने का।।

खुशी के पलों को सोचो
जो मात-पिता ने देखे है।
हँसी खुशी से जीने का
उन्हें अधिकार जो देना है।
मेरी जिंदगी का उसूल है
जियों और जीने दो का।
इसलिए जन्म देने वालों को
बहुत सम्मान दिलाना है।।

मुझे गर्व महसूस जब होगा
मिलेगी खुशी मात-पिता को।
मैं उनके पुत्र-पुत्री होने का
निभा पाऊँ जो कुछ फर्ज।
न इच्छाएं उनकी मारूंगा
न इच्छा अपनी मारूंगा।
मैं उनका और अपना भी
बचा के रखूँगा अस्तित्व।।

इच्छाएँ

मैं अपनी खुदकी जिंदगी को
जिंदा दिली से जीना चाहता हूँ।
और अपनी इच्छाओं का
हनन मैं कर नही सकता।
इसलिए जो मन कहता
मैं उन्हें ही पूरा करता हूँ।
भले इसके लिए मुझको
अधिक पुरसात करना पड़े।।

मिली है जिंदगी मुझको
मेरे अच्छे कर्मों से।
इसे मैं जीना चाहूंगा
अपनी इच्छाओं के अनुसार।
दमन मैं कर नही सकता
मैं खुदके अरमानों का।
इसलिए तो कोशिश में
खुशी की करता रहता हूँ।।

खुशी के पलओं को देखों
मैं हँसी खुशी से जीत हूँ ।
मेरी जिंदगी का हसूल है
जीओं और जीने दो का।
इसलिए मिला मुझको
सुकून से जीने का मौका।
जो सभी को नही मिलता
इस तरह जिंदगी को जीना।।

अस्तित्व

मैं अपनी जिंदगी का
सदा अस्तित्व चाहता हूँ।
और अपनी इच्छाओं का
हनन मैं कर नही सकता।
इसलिए जो मन कहता
मैं उन्हें ही पूरा करता हूँ।
और अपने अस्तित्व को
सदा ही जिंदा रखता हूँ।।

मिली है जिंदगी मुझको
मेरे अच्छे कर्मों से।
इसे मैं जीना चाहूंगा
अपनी इच्छाओं के अनुसार।
दमन मैं कर नही सकता
मैं खुदके अरमानों का।
इसलिए करता हूँ कोशिश
खुशी से जीने मरने की।।

खुशी के पलओं को देखों
मैं हँसी खुशी से जीत हूँ ।
मेरी जिंदगी का हसूल है
जीओं और जीने दो का।
इसलिए तो मिला मुझको
सुकून से जीने का मौका।
जो मेरे अस्तित्व को जिंदा
रखने के लिए काफी है।।

बहू का प्रवेश

पढ़े शुभ कदम बहू के
आज हमारे घर के अंदर।
मानों घर की लक्ष्मी तुलसी
आ गई आज हमारे घर में।
मैं देता हूँ बहू बेटे को
हृदय से शुभ आशीर्वाद।
सदा खुश और प्रसन्न रहो
अपने गृहस्थ जीवन में।।

मिले है तुम दोनों को
नये माता पिता जो आज।
मिला है तुम दोनों को
नया नया घर द्वारा।
समझना और जानना है
तुम लोगों को नया घर द्वार।
और जीवन साथी के संग
बिताना है अब ता उम्र।।

माता पिता को मिला बेटा
तो एक को मिली है बेटी।
खुशी दोनों परिवारों को
मिली है देखो तो आज।
बने है देखो नये रिश्ते
आज दो परिवारों के।
हंसी खुशी से झूमें रहे
सभी मित्र और रिश्तेदार।।

दिल का हाल

तुम्हारा और हमारा दिल
सदा बेचैन क्यों रहता है।
अगर दिलमें लगी है आग
तो पानी की जरूरत है।
मैं हूँ एक नदिया अगर
तो बहते पानी तुम हो।
जो एक संग साथ रहकर
सदा ही चलते रहते है।।

कभी उफान भरती हूँ
तो कभी शांत रहती हूँ।
शुभाव दोनों का देखो
सदा ही एक सा रहता।
इसलिए हम दोनों की
बहुत ज्यादा जमती है।
और सफर जीवन का देखो
बहुत आसानी से गुजरता है।।

मेरा मन तो मोम है
जो गर्मी से पिघलता है।
और ठंडा होने पर ये
फिर से जम जाता है।
इसी तरह से मोहब्बत
कभी हंसती और रोती है।
मगर जिंदगी के संग
सदा ही चलती रहती है।।

दिलो में प्यार न हो तो
निरसता आने लगती है।
तड़प दिलों की देखो तो
कुछ बड़ाने जो लगती है।
खजाना लूट चुका हो तो
कंगाली छाई सी रहती है।
मोहब्बत करने वालों की
दुनिया उजड़ ही जाती है।।

खुशी और गम

खुशी का गम से तो देखो
बहुत करीब का रिश्ता है।
खुशी यदि माँ है तो
गम है उसकी मौसी।
दोनों का रिश्ता तो
बस बहन के जैसा है।
इसलिए तो दोनों का
दिल बहुत कोमल है।।

दिल को पढ़ने का भी
यही तो एक मौका है।
जो दिलको पढ़ लिया
तो जिंदगी खिल उठेगी।
और जो मायूसी छाई है
वो भी मिट जायेगी तेरी।
मोहब्बत में तो ये सब
निरंतर चलता रहता है।।

अगर मोहब्बत जिंदा रखना है
तो कुछ करके दिखाओं तुम।
अपनी और मेहबूब की तुम
अलग एक पहचान बनाओं।
और उन स्थानों को भी
अमर कर जाओ तुम दोनों।
जहाँ मिलते जुलते थे तुम
और बहाते थे प्यार की गंगा।।

मोहब्बत की जंग

न हम हारे न तुम जीते
न तुम हारे न हम जीते।
मोहब्बत की इस जंग का
परिणाम कुछ निकला ही नही।
मगर जंग हम दोनों की
अभी भी जारी है देखो।
करें तो क्या करें अब हम
जो ये जंग रुक जाये।।

भले ही हम दोनों देखो
आपस में लड़ते रहते है।
और एक दूसरे से हम
रोज मिलते जुलते है।
आँखो और जुबा की जंग
सदा ही होती रहती है।
जिसमें हम दोनों का प्यार
बहुत ज्यादा ही झलकता है।।

प्यार मोहब्बत की जंग में
प्यार ही प्यार होता है।
फर्क समझने वालों की
निगाह नियत में होता है।
और इसका दोष जमाने को
कुछ ज्यादा ही जाता है।
जो मोहब्बत का मजाक
बनाकर मजा लेते है।।

महाशिवरात्रि

शिव है सबके कर्ताधर्ता।
शिव है भक्तों के वरदानकर्ता।
इसलिए पाते सुख शांति हम।
शिव के बिना जग है सुना सुना।
इसलिए हर कोई कहते
सुबह शाम ॐ नमशिवाय।।

जो रखते है महाशिवरात्रि का व्रत,
और करते शिवजी की पूजा।
तो हो जाती सारी इच्छाएं पूरी।
शिव जैसा दयालु कोई नहीं है दूजा।
इसलिए घर घर में शिवजी पूजे जाते।।

शिवजी के साथ न लिया जाये
नाम अगर मां पार्वती का।
तो महाशिवरात्रि का अर्थ है अधूरा।
भक्तों की सिपारिशकर्ता
सदा ही मां पार्वती होती।
इसलिए तो सबसे ज्यादा
नारीयाँ पूजे शिव पार्वती को।।

बीना

सागर जिले की तहसील है
जिस का नाम बीना है।
बहुत सारी इस शहर की
देखो तो है विशेषताएं।
बीना की होली दुर्गा उत्सव
और अखाड़े बहुत फेमस है।
स्नेह और प्यार का माहौल
शहर की सबसे बड़ी विशेषता है।।

कृषि प्रधान ये तहसील है
कृषि ही मूल व्यवसाय इसका।
सभी जाती धर्म के लोग
यहाँ रहते है हिल मिल के।
और सभी तीज त्यौहारों को
मनाते हर्ष उल्लास से।
तभी तो मध्यप्रदेश में भी
अलग पहचान है बीना की।।

जहाँ जन्में गणनाचार्य व्याकरणचर्या
और जन्में ज्योतिषचार्य आदि।
साथ ही प्रदेश में व्याख्यात है
बीना की राम बारात भी।
सभी धर्म जाती के लोग
शामिल होते बारात में।
और ऐसा लगता है की
बीना में स्थापित है राम राज्य।।

प्रणाम में करता हूँ उनको
जिन्होंने ये सब दिया बीना को।
स्वयं को गौरांवित् करता हूँ
जो मेरी भी मातृभूमि है।
हजारों मील दूरी होकर भी
दिल लगा रहता बीना में।
कर्म-भूमि मेरी मुंबई है
पर मातृभूमि तो बीना है।।

मन मीत

मन भावन का साथ मिला
व्याह अभी तक हुआ नहीं।
दिल की बातें कहने का
मौका अब तक मिला नहीं।
दूर रहे या पास रहे हो
हम तो करीब बने रहे।
कल तक सपनों में जीते थे
पर अब हम दोनों साथ है।।

लड़क पचोड़ की मस्ती में
दिल हम दोनों दे बैठे।
पढ़ाई लिखाई के दिनों में
प्यार मोहब्बत जो कर बैठे।
समझ नही पाये तब हम
होती है ये क्या बला ?
जिसके चक्कर में फसकर
लक्ष्य जीवन का भूल गये।।

अब दरवाजे पर करते हैं
उनका रोज इंतजार हम।
जब तक घर नहीं आते वो
तब तक रहते बेचैंन हम।
प्यार मोहब्बत का मतलब
अब सच में हम जान सके।
बनकर पति पत्नी हम दोनों
सत्य जीवन का पहचान सकें।।

मेरा नसीब

चक्र संसार का चलता रहता।
आते जाते जीवन में सुख दुख।
कैसे उनमें जिया जाता है।
ये सच में तुमने सिखाया दिया।।

पग पग पर कांटे बिछे थे।
तुमने आकर हटा दिये।
अपने राम के पथ पर तुमने।
फूलों को कैसे बिछा दिया।।

तेरी तकदीर से बदल गया।
मेरा जो ये नसीब आज।
सच में तुम कोई अवतारी हो।
या हो दुर्गा-लक्ष्मी का रूप।।

बचपन की आदतें

बचपन की तेरी आदतें
देखो अब तक गई नहीं।
देखना देखी करने की
ये आदत है पुरानी तेरी।
दुनिया की नजरों से
बचना आदत है तेरी।
कही कोई न टोक दे
तेरी इन आदतों पर।।

रोज रोज तुम अपनी
खूबसूरती दिखाती हो।
कसम देकर अपनी तुम
कभी नही आती हो।
अपनी मनगणंत बातें तुम
हमको खूब सुनाती हो।
पर मिलने से अब भी तुम
न जाने क्यों घबराती हो।।

सुबह से लेकर रात तक
पैगाम भेजते हो तुम।
फिर अपनी तस्वीरें भेजकर
मुझको तुम लूभाती हो।
जिन्हें लगाकर सीने से
मैं पूरी रात सोता हूँ।
सुबह उठते ही देखता हूँ
तुम्हारी उन्हीं अदाओं को।।

शायद मुझे आती नहीं
मोहब्बत करने को।
इसलिए शर्माता हूँ
मैं बातें तुमसे करने को।
बहुत कुछ सिखाना है
मुझे अब तुमसे प्रिये।
होती है क्या मोहब्बत
हमारी जिंदगी के लिये।।

जिंदगी के मायनें

पलटकर देखना मुझको
पुरानी आदत है तेरी।
जमाने की नजरों से
बचना आदत है तेरी।
कही कोई देख न ले
ऐसा तुम सोचती हो।
मोहब्बत करने का अंदाज
अलग ही तुम रखती हो।।

हर दिन तुम अपनी
सूरत खूब दिखाती हो।
कसम खाकर भी तुम
बहाना खूब बनाती हो।
और अपनी मनगणंत बातें
हमें खूब सुनाती हो।
पर मिलने से तुम देखो
न जाने क्यों घबराती हो।।

सुबह से लेकर रात तक
भेजते रहते हो संदेश।
कभी कभी तुम अपनी
लूभानी तस्वीर भेजते हो।
जिसे लगाकर सीने से
मैं पूरी रात सोता हूँ।
सुबह होते ही देखता हूँ
तुम्हारी वो ही अदायें।।

मुझे आती नहीं शायद
मोहब्बत तुमसे करने को।
इसलिए शर्माता हूँ
मैं बातें तुमसे करने को।
बहुत कुछ सिखाना है
मुझे हे प्रिये तुम से।
मोहब्बत के क्या मयाने है
हमारी जिंदगी में।।

इंसान जोकर है

जिंदगी हर किसी की
एक जोकर जैसी है।
जो कभी हंसती है तो
कभी लोगों को हंसती है।
पर जोकर के दर्द को
समझ नही पाती है।
उसे देखकर सब हँसते है
पर दर्द उसका बढ़ाते है।।

खूब-सूरत होते हुए भी
बद-सूरत होने को मजबूर हूँ।
दिल की आकृति दिखता
पर दिलो से बहुत दूर रहता।
अंदर से हँस रहा हूँ पर
बाहर से रोते हुए दिखा रहा हूँ।
यही तो मानव जोकर की
बहुत बड़ी विशेषता है।।

शो है ये हमारी जिंदगी का
जो कुछ ही वर्षो का है।
जिस में न जाने कितने किरदार
अपने जीवन में निभाना है।
कितनो से हमें आँखे मिलना है
और कितनो से आँखे चुराना है।
पर सच में इंसान की भूमिका को
एक जोकर बनकर दिखाना है।।

पेट के लिए क्या कुछ नही करता
भूखे रहने से अच्छा है जोकर बनना।
कुछ तो पापी पेट को मिलेगा
और शरीर से जिंदा रहेगा।।

थाम लिया

लोग मिलते रहे और हम चलते रहे।
पर साथ चलने को तुम्हीं मिले हो।
इसलिए मेरी हिम्मत बढ़ती गई।
क्योंकि मुझे सभंलने वाली तुम हो।।

आते जाते रहे मिलने मिलाने को
पर अपना बनकर तुम्हीं आये हो।
लोगों ने तो उपयोग ही किया है।
पर तुमने दिलसे साथ दिया है।।

उथल पुथल मचा हुआ था।
जब मेरी इस जिंदगी में।
तो तुमने थमा लिया था।
उस समय आकर हाथ मेरा।।

जिंदगी तुम हो

जिंदगी अब तो तुम्हारी हो गई।
जीने मरने की कहानी बन गई।
अब प्यार दो या कुछ और दो।
जो भी दोगी वो कहानी बनेगी।।

सफर वहीं तक है जहाँ तक तुम हो।
नजर वहीं तक है जहाँ तक तुम हो।
दूर रहकर भी तुम मुझको देखते हो।
सच कहे तो मेरी जिंदगी भी तुम हो।।

हजारों फूल देखे हैं गुलशन में मगर।
खुशबू वहीं तक है जहाँ तक तुम हो।
दूर-दूर से आते है यहाँ देखने तुम्हें।
वो कौनसी खुशबू है जो महकती है।।

बहुत मिले सफर में मुसाफिर हमें।
पर हमसफर तो तुम ही मिले हो।
इसलिए मंजिलों को छु पा रहा हूँ।
और इसके लिए तुम्हारा आभारी हूँ।।

दुनिया का रंग

दुनिया बहुत रंगीन है
मगर रंग दिखता नही।
शोले बहुत है इसमें
मगर वो दिखते नही।
रखते है इरादा हम भी
दुनिया को समझने का।
और रंग इसमें भरना है
इसको रंगीन करने को।।

दुनियादारी के चक्करों को
कैसे कोई समझ सके।
बहुत झोल झमेले है
हम सबके जीवन में।
इसलिए सब भाग रहे
कुछ न कुछ करने को।
जिससे रंगीन बना सके
अपने इस जीवन को।।

अंतर मन की कल्पनाएँ
उछल रही है जोरों से।
सब कुछ तो रंगीन है
पर खुदके रंग अधूरे है।
खुल्लकर तुम जीना सीखो
और अपनी बात कहो तुम।
तेरा रंग रूप खिल जायेगा
जब तुम इसमें भरोगे रंग।।

अंजान बना

नदी किनारे बैठकर
सोच रही हूँ मैं।
कैसा होगा प्रीतम
सोच रही हूँ मैं।
कभी देखूँ पानी में
कभी देखूँ आकाश।
कोई छवि दिख जाये
उस प्रीतम की मुझे।।

दिल में पीड़ा बहुत है
प्रीतम को लेकर।
लगन समय भी आ रहा
देखो तो मेरा।
पर मुझको पता नही
कौन और कैसा है वो।
ऐसे कितने सवालो से
उलझ रहा मन मेरा।।

जब से मेरा योवन
खिलने जो लगा।
तरह तरह के प्रश्नों ने
दिलको झकजोर दिया।
खोज रही हूँ उनके उत्तर
खुद के अंदर मैं।
अब तक तो मिले नहीं
प्रश्नों के उत्तर हमको।।

एक अंजाने इंसान से
हो जाता गठबंधन।
फिर जीवन भर उसके
रहना पड़ता संग।
मानों उसे था मेरा
जन्म-जन्म का रिश्ता।
कैसे बन जाते है वो
अंजाने अपने।।

मोहब्बत मेरा आधार

मेरे लिखने का आधार तुम हो।
मेरे जीवन की प्रेरणा तुम हो।
मेरी मोहब्बत भी तुम हो।
सच कहे तो तुम ही सब कुछ हो।।

जब भी याद करता हूँ तुम्हें।
तुम नया करने को कहते हो।
इसलिए नई कविता लिख देता हूँ।
जिसका श्रेय मैं तुमको देता हूँ।।

इसे मैं सरस्वती का वरदान कहूँ।
या तेरे साथ होने के एहसान कहूँ।
मैं तो दोनों का ही एहसान बंध हूँ।
जो आप दोनों मेरे साथ हो।।

जिस दिन एक भी रूठ गये मुझसे।
उस दिन से लिखना बंद हो जायेगा।
और इस लेखक का अंत हो जायेगा।
इसलिए अपना साथ बनाये रखना।।

गुरुदेव ने बना दिया

गुरुदेव मिले सारी दुनिया मिली।
खिल उठा मेरा जीवन, बगिया की तरह।।

तुम ज्ञानी हो मैं अज्ञानी गुरुवर।
न ज्ञान पाऊँ तो दुखी रहता है मन।
तेरे रंग में मुझे बस अब रंगे दो तुम।
ज्ञान गंगा में गोते लगाने दो तुम..।।
गुरुदेव मिले सारी दुनिया मिली।
खिल उठा मेरा जीवन, बगिया की तरह।।

अनोखा है बंधन गुरु शिष्य का।
बिना डोर के बंध गया मेरा मन।
तू जिधर ले चले मैं उधर ही चालू।
तेरे बिन मेरा जीवन कुछ भी नही..।।
गुरुदेव मिले सारी दुनिया मिली।
खिल उठा मेरा जीवन, बगिया की तरह।।

कभी जो ना भूलू वो शिष्य हूँ मैं।
तू मेरा दीया गुरु तेरा बाती हूँ मैं।
जो तो चाहा बुझे जलाये जलूँ।
तेरी आज्ञा बिना मैं तो कुछ न करू..।।
गुरुदेव मिले सारी दुनिया मिली।
खिल उठा मेरा जीवन, बगिया की तरह।

वक्त का खेल

दिल का रोग छुपाये नही छुपता।
मन के भाव छुपाये नही छुपते।
कहने सुनने को बहुत कुछ है।
पर कहने का साहस नही है।।

ये दुनियां बहुत स्वार्थी है।
जो किसी को नही छोड़ती।
मौका मिले यदि अपनों को।
तो वो लूटे बिना नही रहते।।

कब तक तकदीर साथ देगी।
हर मुसीबत से उभार दे देगी।
पर कभी न कभी तो फसेगी।
फिर अपने पराये की परीक्षा होगी।।

सच में वक्त ने उसे और हमें।
बहुत कुछ तो दिया है।
पर इसी वक्त ने हम से।
सब कुछ छीन भी लिया।।

मेरा प्यार तुम हो

रात क्या देख तुमने सपना।
प्यार कुछ उसमें पनपा क्या।
नींद तो आई बहुत मुझे पर।
प्रिये तुम नजरो से हटी नही।।

अच्छा हुआ जो पास नही थे।
वरना कुछ अनहोनी हो जाती।
और बिना रिश्ते के ही फिर।
रिश्तों का फल मिल जाता।।

दिलमें लबालब भरा हुआ है।
हम दोनों का प्यार जहां।
तेरी मंजिल संजय है।
पर मेरी चाहत तुम हो।।

डोर बहुत ही नजुक है।
पर गठबंधन तो पक्का है।
मित्र मिला है जैसे देखो।
कोई पूर्व जन्म जन्म का।।

नाम सुनकर प्रसन्न होती हो।
दिल देखकर क्या होगा।
देख जो लोगे मुझे तुम तो।
कही घायल मत हो जाना।।

दूर रहकर भी तुम
करते हो प्यार की बातें।
इसलिए तो ये दिल अब
तेरे बिना लगता नही।
जान ले लोगे क्या अब मेरी।
हल्की सी मुस्कान दिखा के।।

हमारा अटूट प्यार

हर दिन करता हूँ
मैं प्रभु से प्रार्थना।
की मेरे जाने से पहले
तू निकल जाए।
क्योंकि बड़ा बेदर्दी है
ये कलयुग वाला जमाना।
मेरे जाने के बाद तुझे
जीने और न मरने देगा।।

पग पग पर तेरे को
अब बिछे मिलेंगे काँटे।
फूलों पर चलने वाली
काँटों पर चलना पड़ेगा।
इसलिए तो मुझे तेरे को
कहना पड़ रहा है।
की मेरे मरने से पहले
तेरा जाना हो जाये।।

दिलकी दुआओं का कुछ तो
तेरे जीवन पर असर होगा।
मेरी प्रभु से कही बातों का
प्रभु पर कुछ असर पड़ेगा।
क्योंकि प्रभु के घर में देर है
पर अंधेर तो बिल्कुल नही।
इसलिए तो सारी दुनियां
आस्था और श्रद्धा रखती है।।

मोहब्बत से जीने का हमारा
अंदाज बहुत अलग है।
दिल की दिल से बातें
कहने का अंदाज अलग है।
इसलिए तो एक दूसरे बिन
हम जी नही सकते।
क्योंकि हम दो जान और
एक आत्मा जो है।।

बातों बातों में हुआ ( गीत )

कुछ उन्होंने कहाँ,
कुछ हमने कहाँ।
बातों का सिलसिला,
यही से शुरू हो गया।
अब तो रोज बातें,
हम लोग करते है।
दिलकी लगी को,
दिलसे मिलते है।
और अपास में,
प्यार बहाते है।
अब हाल ये है,
की उन्हें देखे बिना ?
दोनों रह नही सकते,
इसलिए रोज मिलते है।
और डूब जाते है,
प्यार के सागर में।
जहां प्यार ही प्यार,
दिन रात बरसता है।
और मालूम ही नही,
कब दिन ढल गया।
दिलमें चाँद जैसे,
फूल खिलते है।
और मोहब्बत के दीप,
दिलों में जलते है।
और प्यार की रोशनी,
चाँद जैसी चमकती है।
जिससे जगमगा उठाते है
मुरझाए हुए चेहरे।
फिर वही राधा-कृष्ण,
जैसे दिखाई देते है।।

पैगाम

शीतल हवाओं के हाथों
आपको एक अरमान भेजा है।
सुबह की रोशनी के ज़रिए
आपको एक पैगाम भेजा है।
व्यस्ता के बीच फुरसत मिले तो
कबूल कर लेना मेरा पैगाम।
इस नाचीज ने अपनो को
सुबह का सलाम भेजा है..।।

कभी हँसते हुए छोड़
देती है ये जिंदगी।
कभी कभी रोते हुए
छोड़ देती है ये जिंदगी।
न पूर्ण विराम सुख में है
न पूर्ण विराम दुःख में है।
जहाँ देखो वहाँ अल्पविराम
छोड़ देती है ये जिंदगी।।

जिंदगी में प्यार की
डोर को सजाये रखना।
अपनो को दिलो से
जिंदगी में मिलाये रखना।
क्या कुछ लेकर आये थे
इस दुनियां में हम लोग।
और क्या साथ लेकर
जाना है इस दुनिया से।
जैसे कर्म करके जाओगें
दुनियां से वैसा ही पाओगें।।

मीठे और मधुर बोलो से
अच्छे रिश्ते बनते है।
रिश्तों से ही तो जिंदगी
बड़े आराम से चलती है।
जिंदगी बहुत छोटी होती है
जीने के लिए यारों।
जो भी इनको समझता है
जिंदगी को आराम से जीता है।।

क्या सोचते हो

मेरे दिल कि सरहद को,
पार न करना I
नाजुक है दिल मेरा,
वार न करना I
खुद से बढ़कर भरोसा है,
मुझे तुम पर I
इस भरोसे को तुम,
बेकार न करना।।

दूरियों की ना परवाह कीजिये I
दिल जब भी पुकारे बुला लीजिये I
कहीं दूर नहीं हैं हम आपसे I
बस पलकों को बंद कर लीजिये lI

दिलमें हो आप तो कोई,
और ख़ास कैसे होगा ?
यादों में आपके सिवा,
कोई पास कैसे होगा ?
हिचकियां कहती है
आप याद करते हो…I
पर बोलोगे नहीं तो हमें
अहसास कैसे होगा ?

आरज़ू होनी चाहिए
किसी को याद करने की……!
लम्हें तो अपने आप ही
मिल जाते हैं I
कौन पूछता है पिंजरे में
बंद पंछियों को I
याद वही आते है
जो उड़ जाते है…!!

प्रथम स्मृति दिवस

आज फिर याद आ गये
हमको गुरु विद्यासागर।
नमन करू विद्यासागर को
उनके प्रथम स्मृति दिवस पर।
चरण वंदना करू मैं
उनके पावन चरणों को।
संजय उनको देता है
अपनी विनायंजलि।।

कितना कुछ देकर गये
आचार्यश्री अपने भारत को।
हर जाति धर्म में उन्हें
सदा मिला उच्च स्थान।
इसलिए लोग कहते थे
छोटे बाबा जी सदा।
और कुछ कहते थे
उन्हें वर्तमान के वर्धमान।।

कितना कुछ लिखकर गये
अपने इस भारत देश पर।
काव्य कविता और उपदेशों से
किया विश्लेषण इस श्रृष्टि का।
ज्ञान ध्यान और तप की थे वो
एक जिती जाती चलती सी तस्वीर।
इसलिए तो लोग रखते थे
श्रृध्दा भक्ति सदा उनके प्रति।।

आगम का अनुसरण करते थे
और जीते थे उसके अनुसार।
बातें भी वो बहुत करते थे
बस जैन आगम की सदा।
अपवादो से दूर रहे वो
अपने पूरे जीवन भर।
जिसके कारण राज किया
करोड़ों अपने भक्तो पर।।

मुनियों की प्रार्थना आचार्यश्री से

आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
कही छूट जाये ना, संग तुम्हारा …२।।

तेरे सिवा दिलमें, बसा न कोई।
लगन की ये ज्योत, बुझाये ना कोई।
तुम्ही मेरी कश्ती, तुम्ही हो किनारा।
आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
कही छूट जाये ना, संग तुम्हारा।।

तेरे नाम की मैं, माला करू और।
सुबह शाम तुमसे, ज्ञान भी पाऊँ।
तेरा नाम है मुझको, प्राणों से प्यारा।
आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
कही छूट जाये न, संग तुम्हारा।।

तेरे बताये मार्ग पे, चलता रहूँ मैं।
धर्म ध्वजा की, फेरता रहूँ मैं।
रखो दो पीछी गुरुवर, हम पर अपनी।
आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
कही छूट जाये ना, संग तुम्हारा।।

पुण्य किये थे जो, मनुष्य जन्म पाया।
फिर अपना शिष्य मुझे, अपना बनाया।
मूल भी पाया गुरुवर, ब्याज भी पाया।
शरण आपकी में रहकर, सब कुछ पाया।
आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
कही छूट जाये ना, संग तुम्हारा।।

आचार्यश्री मुझको, तुम देना सहारा।
आचार्य श्री मुझको, तुम देना सहारा
कही छूट जाये न, संग तुम्हारा।।

अजनबी हो या

जरा सी दोस्ती कर लो..,
जरा सा साथ निभाये।
थोड़ा तो साथ दे मेरा …,
फिर चाहे अजनबी बन जा।
मिलें किसी मोड़ पर यदि,
तो उस वक्त पहचान लेना।
और दोस्ती को उस वक्त,
दिल से निभा देना।।

वो वक़्त वो लम्हें,
कुछ अजीब होंगे।
दुनिया में हम शायद,
खुश नसीब होंगे।
जो दूर से भी आपको,
दिलसे याद करते है।
क्या होता जब आप,
हमारे करीब होते..।।

कुछ बातें हमारी सुना करो,
कुच बातें हमसे किया करो..।
दिलकी बात बता डालो,
मत होंठों को सीकर रखो।
जो बात लंबो तक ना आये,
उन्हें आँखों से कह दो तुम।
फिर भी कहना मुश्किल हो,
तो चहरे से पढ़ लिया करो।।

जब तन्हा तन्हा मेहसूस करो।
तब मुझे आवाज दे देना।
मैं तुम्हारी तन्हाई दूरकर दूंगा।
हाँ बस दिलसे याद करना।।

आचार्यश्री से मुनियों की प्रार्थना

विद्या सागरजी मुझको देना सहारा।
कही छूट जाये ना साथ तुम्हारा …२।।

तेरे सिवा दिलमें समाये न कोई।
लगन का ये दीपक बुझाये ना कोई।
तुम्ही मेरी कश्ती तुम्ही हो किनारा।
कही छूट जाये ना साथ तुम्हारा।
विद्या सागरजी मुझको देना सहारा।
कही छूट जाये ना दामन तुम्हारा।।

तेरे नाम की मैं जाप करू और।
सुबह शाम तुमसे ज्ञान भी पाऊँ।
तेरा नाम है मुझको प्राणों से प्यारा।
कही छूट जाये न साथ तुम्हारा।
विद्या सागरजी मुझको देना सहारा।
कही छूट जाये न साथ तुम्हारा।।

तेरे बताये मार्ग पे चलता रहूँ मै।
धर्म ध्वजा की फेरता रहूँ मै।
दे दो मुझको आशर्वाद गुरुवर अपना।
भटकू न दुनिया में हरगिज कही पर।
विद्या सागरजी मुझको देना सहारा
कही छूट जाये ना साथ तुम्हारा।।

बड़ा पुण्य किया जो मनुष्य जन्म पाया।
फिर अपना शिष्य मुझे तुमने बनाया।
मूल भी पाया गुरुवर ब्याज भी पाया।
शरण आपकी में रहकर सब कुछ पाया।
विद्या सागरजी मुझको देना सहारा।
कही छूट जाये ना साथ तुम्हारा।।

विद्या सागरजी मुझको देना सहारा।
विद्या सागरजी मुझको देना सहारा
कही छूट जाये न साथ तुम्हारा।।

हुस्न और इश्क

हुस्न और इश्क का
मिलन होने के लिए।
देखो तो मौसम कैसे
आज खिल उठा है।
हवाएं ठंडी चल कर
घटाये बिखर दिया है।
और मोहब्बत करने को
बादियाँ ये बुला रही है।।

देखो प्यार मोहब्बत का
जो मौसम आ गया।
युवाओं के मिलन का
देखो मौसम आ गया।
नदी तालाब और पर्वत
भी भूमिकायें निभा रहे।
और इश्क और हुस्न को
आपस में मिला रहे।।

बाग बगीचें पेड़ पत्ती
फूल फल और हरियाली।
चाँद सितारों आदि ने
देखो विखेर दिये मोती।
जिसके चलते ही देखो
मौसम लुभाना हो गया।
और जबा दिलों में देखो
मोहब्बत को जगा दिया।।

विद्या की माता शारदे

वो ज्ञान की माता है
सरस्वती नाम है उनका-२।
वो विद्या की माता है।
शारदा माता नाम उनका।
वो ज्ञान की माता है।।

हाय रे मनका पागलपन
मुझ से लिखवाता है।
क्या मुझे लिखना
क्या वो लिखवता
ये तो वो ही जाने-२।
मन में मेरे वो आकर
लिखवाते है मुझसे।।
वो ज्ञान की माता है..।।

इधर जिंदगी झूम रही है
उधर मौत खड़ी।
कोई क्या जाने कब आ जाये
मेरा बुलावा जी-२।
और क्या लिखना
मुझको रह गया है अब बाकी।
वो ज्ञान की माता है…।।

मेरे दिल और ध्यान में सदा
रहती है माता जी।
जो कुछ भी मैं लिखता और गाता
उनके कृपा दृष्टि से-२।
मैं उनके चरणो में
वंदन बराम्बार करता।
वो ज्ञान की माता है..।

पीना छोड़ दो

कसम दी उसने मुझको
तो मैंने छोड़ दिया पीना।
उसे भी और ने दी थी
तो उसने छोड़वा दिया पीना।
जो पीने और पिलाने का
तब दौर जो चलता था।
उसे छोड़े हुए हम को
बहुत ही दिन हो गया।।

उसे पीने से शिकायत
तो नही थी बिल्कुल भी।
शिकायत थी तो बस
पीकर बोलने वाली बातें से।
क्योंकि वो पीकर अक्सर
सत्य ही बोल देता था।
जिसे मैं बिल्कुल भी सहन
नही कर पाती थी।।

वो दिल से करता था
प्यार मोहब्बत बहुत।
और अपने बाहों में भी
सदा ही दिलसे रखता था।
मगर मुझको दिलों से
खेलने की आदत थी बहुत।
इसलिए वो पीकर के
बोलता था वो चुभता था।।

मगर अब हालत भी मेरी
पहले के जैसी नही रही।
उम्र के साथ मेरा भी
यौवन अब ढल गया है।
इसलिए जवानी की
गलतियों पर शर्मीदा है।
मगर उसके पीकर के
बोलने से हमें बचना है।।

भूल मत कर देना

नारी को होता है
रंग रूप पर गुमान।
कर दे कोई तारीफ
तो इतराने वो लगती।
हँसने खिल खिलाना से
चेहरा उनका खिल उठता।
यही सब तो होते है
देखो नारी के आभूषण।।

हर कोई सुंदरता की
करते है तारीफ।
पर मत कर तू गुमान
खुदके रंग रूप पर।
टूट जायेगा एक दिन
तेरा ये बड़ा भ्रम।
जिस पर तू इतना
करती रहती है घमंड।।

आता है उम्र के अनुसार
रंग रूप यौवन में निखार।
होते है ये सब कुछ
हर किसी के संग।
संभल संभल कर सबको
रखना पड़ता यहाँ पर कदम।
भूल न कोई हो जाये
तुझसे इस पड़ाव पर आकर।।

प्रभु से जुड़ो

मन मन्दिर में प्रभु बैठाओं।
मन्दिर में तुम ज्योत जलाओं।
तेरी काया बदलेगी एक दिन।
बस ध्यान लगाओं प्रभु में तुम।।

कितनों ने इस कलयुग में भी।
प्रभु से जीवन अपना जोड़ा।
तब जाकर ही उसको शांति
मिल पाई है इस कलयुग में।।

मानव का स्वभाव है चंचल।
इसलिए वो आशांत रहता है।
जबकि उसको मिलना है।
खुदके कर्मो का ही फल।।

अगर पवित्र हो तेरा मन तो।
नाता प्रभु से जोड़ जायेगा।
फिर तेरे मन के विकारो का।
अंत निश्चित ही हो जायेगा।।

गांधी जी के विचार

नदियाँ खुद अपनी चाल से
रास्ते बना लेती है।
बड़े बड़े पहाड़ों को भी चीर
कर आगे निकल जाती है।
क्योंकि उन्हें अपनी आप पर
विश्वास होता है।
इसलिए उन्हें अदार से
पूजा जाता है।।

हो इरादे अगर नेक तो
मंजिले स्वयं रास्ता दिखती है।
और मुसाफिर को उसकी
मंजिल तक पहुँचाती है।
मत डर रास्तो के काँटों से
ये तेरा कुछ नहीं कर पाएँगे।
और तेरी मंजिल तुझे
अवश्य ही मिल जायेगी।।

अंधेरे घरों में कभी
रोशनी करके देखो।
उजड़े हुए बागो को
कभी आवाद करके देखो।
आशा की एक किरण
तुझे दिख जायेगी।
और मूरझाए हुये चेहरो पर
फिरसे चमक आ जायेगी।।

है अगर हौसलें बुलंद तो
पानी पत्थरों में से निकलता है।
खंडर पड़े घरों को भी
रहने योग बना लिया जाता है।
करनी और करने में
जो विश्वास रखता है।
जिंदगी को जीने का वो
स्वयं मार्ग बना लेता है।।

इसी तरह की सोच से
गाँधी जी ने देश से।
अंग्रेजो को देश छोड़ने पर
मजबूर कर दिया था।
और हिंदुस्तान को आजाद
अहिंसा से करवा दिया था।
ये महात्मा गांधीजी को
उनकी पुण्य तिथि पर मैं।
आज श्रध्दा सुमन उनके
चरणो में अर्पित करता हूँ।।

रिश्तों के मायाने

देवर और भाभी का रिश्ता
बहुत ही प्यारा होता है।
जिसमें भाभी कभी देवर की
माँ जैसी बन जाती है।
तो कभी भाभी देवर की
दोस्त ही बन जाती है।
समझने और देखने वालें
रिश्तों का अलग अर्थ लगाते है।।

बड़ी भाभी का दर्जा घर में
सदा ही माँ जैसा होता है।
देवर नंद भाभी के लिए
भाई बहिन जैसे ही होते है।
देखो तुम इतिहास उठाकर
समझ तुम्हें सब आ जायेगा।
फिर भी अंधे-गूँगो और बैहरो जैसा
क्योंकि व्यवहार भाभी से करते।।

मान मर्यादों और सम्मान की
बात समझना भी चाहिए।
देख दूर से और कानों की सुनके
चरित्र पर सीधा हमला करते हो।
और देवर भाभी और माँ बेटे के
रिश्ते पर तुम बार करते हो।
और खुदकी पत्नी को तुम बस
शक की निगाहों से देखते हो।।

जिसके सहारे साथ आई वो
छोड़ माँ बाप का घर अपना।
अपना सब कुछ तुम पर लुटाया
और सौप दिया उसने खुदको।
नया घर परिवार मिला उसको
मात पिता जैसे सांस सुसर जी।
भाई बहिन जैसे मिले नंद देवर।।

हालात

देश समाज का हाल तो देखो।
चारों तरफ बर्बादी ही बर्बादी है।
बड़ा अजीब सा दौर चल रहा।
जिसमें अमन और न शांति है।।

क्या सच में है ये देश हमारा।
या फिर से गुलामी का दौर है।
जिसमें शासक तो है यहाँ का।
पर नीतियाँ है बहरी देशों की।।

कितने साल बीत चुके है।
पर आदत गई नही गुलामी की।
फसल खराब जो करके गये है।
मिटा सके न उपज उनकी।।

घर का बेटा चोर अगर हो।
तो औरों से फिर डरना क्या।
भेद खोल रहा हो जो अपना।
फिर दुश्मनों का होना ही क्या।।

हालात कैसे बने पड़े है।
जिसका कोई नही रखवाला।
सब के मुँह पर ताला लगा है।
क्या फिर भी कोई मुँह खोलेगा।।

ब्याह बना व्यापार

गोरा सुंदर रूप है तेरा
पर दिल उतना ही काला है।
मन चंचल तेरा बहुत है
पर दिल उतना ही छोटा है।
खोट अगर हो दिलमें तेरे तो
प्यार नही तुम कर सकते हो।
मौके का फायदा उठाकर
दिलकी भावनाओं से खेलते हो।।

आज के युग में देखो तो
प्यार-मोहब्बत खेल बन है।
शादी-ब्याह जैसे पवित्र बंधन भी
एक व्यवसाय जैसा बन गया है।
शर्तों के आधार पर देखो
विवाह आदि हो रहे है।
पैसे पहले लेकर दलाल आदि
शादी ब्याह करवा रहे है।।

कलयुग का ये खेल निराला
जिसमें लड़के ही फस रहे है।
मोटी रकम लेकर लड़कियाँ
देखो लड़को को छल रही है।
प्यार का नाटक कुछ दिन करके
जान उन पर लूटाती है।
फिर दिल पर घाव देकर उनके
जीवन बर्बाद वो कर रही है।।

कुछ दिन साथ व्यता कर वो
आरोप लगाना शुरु करती है।
कभी सास तो कभी नंद और
कभी पति पर आरोप लगती है।
अपने अनुरूप महौल बनाकर
खेल शुरू ये करती है।
ताकि सम्पैथी मिलने लगे इनको
अपने मोहाल्ला और पड़ोसियों की।।

कभी मम्मी-पापा को फोन करती है
तो कभी भैया-भाभी को बतलाती है।
अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का
बिना बजह के खूब बखान करती है।
ताकि इनका मकसत पूरा हो जाये
जिसके लिए ब्याह करके आई है।
और धमकी देकर और फसाकर
फिर पैसों में समझौता करती है।।

तिरंगा प्यारा ( गीत )

सुनो मेरे देशवासियों,
मनाने जा रहे,
76व गणतंत्र दिवस,
कुछ संकल्प ले लो।
नहीं करेंगे कोई भेदभाव,
हम जाती और धर्म पर।
समान भाव सबके प्रति,
हम सब मिलकर रखेंगे।
तभी हमारा ये देश,
दिखेगा विश्व में विशेष।।

हमें इस पर है अभिमान,
और इसे बहुत है हमें प्यार।
इसलिए नहीं गिरने देंगे
कभी इसका स्वभिमान।
लड़ेंगे इसके लिए एक साथ,
नहीं आने देंगे कोई आंच।
ये हमारा देश है हिंदुस्तान,
जिसे हम करते
प्राणो से ज्यादा प्यार।
इसे हम कैसे अकेला छोड़ दे।।

हम दे देंगे चाहे अपनी प्राण,
पर तिरंगे को झुकने नहीं देंगे।
चाहे कोई भी हो वो शैतान,
यदि करेगा गद्दारी देश से।
तो देंगे उसको मृत्यु दंड।
इसलिए संजय कहता है
की दिलसे करो इसे प्यार।
और निभाओ अपना सब फर्ज।
ये हमारा देश है हिंदुस्तान।
जिसे हम करते
प्राणों से ज्यादा प्यार।
इसे कैसे हम अकेला छोड़ दे।।

अपनों ने लूटा

अपनों ने लूटा मुझे अपने बनकर।
इस लायक मुझे समझा अपनों।
गैरों में कहाँ इतनी हिम्मत थी।
जो लूट पाए हम कैसे भी करके।।

रहते है हम सब एक साथ जो।
एक ही छत के नीचे जो।
इसलिए मेरा लगाओं है सबसे।
जिनके लिए हम जीते मरते है।।

दुख दर्द अपना कह सकते हो।
तुम अपनों से ही सदा।
जो कुछ तो मरहम लगाएंगे।
तेरे उन घावों पर ये सब।।

जो बन जाते है कुछ नासूर।
हमारे मानव जीवन में कुछ।
उन्हें मिलकर सुलझा लेते है।
घर में एक साथ सब बैठकर।।

अपनों पर ही भरोसा दर्शाते है हम।
माना की इन्होंने भीतरी घात किया।
पर गैरों के लूटने से तो अच्छा है।
जो अपनों ने अपना बनकर लूटा लिया।।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सोच

नेताजी को याद करके
श्रध्दा सुमन अर्पित करता हूँ।
उन की बोली बातों को
जन जन तक पहूँचना है।
और देशप्रेम की ज्वाला को
युवाओं में फिर से जलाना है।
और भारत को फिर से
आजाद कराना है।।

नेताजी का वो कथन
युवाओं को तब भाया था।
जब उन्होंने आजाद हिंद
फौज को बनाया था।
और कहा था की तुम हमें
खून दो मैं आजादी दूंगा।
और अपने हिंदुस्तान को
अंग्रेजों से मुक्त करा लेंगे।।

नेताजी खुदसे और अपने
साथीयों से कहते थे कि।
कमीयां तो मुझमें बहुत है
पर मैं बेईमान नही हूँ।
सबको अपना मानता हूँ
फायदा या नुकसान नही सोचता।
शौक है बलिदान देने का
जिसका मुझे गुमान नही।
छोड़ दूँ संकट में अपनो का
साथ वैसा तो मैं इंसान नही।
सबसे आगे मैं ही चलूँगा
आप लोगों को पीछे चलना हैं।।

मौका दीजिये अपने खून को
औरों की रागों में बहने का।
ये लाजवाब तरीका है हिंदुस्तानियों के
दिलों में जिंदा रहने का।
क्योंकि ये रिश्ते बड़े प्यारे होते है
जिनमें न हक हो न शक हो।
न दूर हो न पास हो
न जात हो न जज्बात हो।
सिर्फ अपनेपन का हर दिल में
बस देश प्रेम का एहसास हो।
और हमारा हिंदुस्तान हमेशा
आजाद हो आजाद हो।।

मोहब्बत का होना

मेरे मुस्कराने भर से ही
तेरा दिल क्यों खिल उठता है।
तेरे दिल में मेरे लिये
क्या कोई दीपक जलता है।
अगर ऐसा कुछ है तो
बता दो अपनी आँखों से।
और अपने दिलकी बातों को
तुम कह दो आके मुझसे।।

देखा और देखी से अगर
दिल में प्यार पनपता है।
जमाने में इसी तरह का
प्यार का दौर चलता है।
किसी को मिल जाती है
अपनी वो प्यारी मेहबूबा।
जिस से वो रोज लड़ते थे
अपनी प्यारी आँखो को।।

खुशी का और मोहब्बत का
कभी इंतजार मत करना।
अगर मिल जाएँ मौका तो
तुरंत इजहार तुम करना।
सुनहरे अवसर को तुम
कभी बेकार मत करना।
नही तो हाथ मलते तुम
जीवन में रह जाओगें।।

दिल की बातें

तेरे होने न होने का
मुझे एहसास होता है।
तेरे दिल में मेरा होना
कोई इतफाक है क्या।
दिलों की बात का तुझे
कोई आभास है प्रिये।
हमारा साथ बस होना
खुशी का राज है क्या।।

मिले है दिल से दिल
इसलिए तो दिल खुश है।
तेरे मेरे दिलों का भी
मुझे आभास बहुत है।
इसलिए तो तुझे लेकर
सदा ही साथ चलते है।
मोहब्बत की नाव को
चलाते है हम सागर में।।

प्यार मोहब्बत करना भी
दिलों की आस होती है।
दिलों की फरयादों का
जिसमें एहसास होता है।
हमारी सांसो का सांसो से
मिलन भी खास होता है।
इसलिए तो जीवन में
मोहब्बत बहुत जरूरी है।।

संघर्ष की राह

सुनता हूँ आज मैं
मानव जीवन की सच्चाई।
न जीवन में हुआ
कभी गमो का अंत।
न खुशियों में आई
कभी भी कोई कमी।
गुजरा है मेरा जीवन
खुशियों और गमों से।।

इसी तरह से जीवन
बना रहा संघर्षमय।
हकीकत जीवन की में
सदा समझता रहा।
कदम कदम पर मिली
मुझे प्रभुजी की कृपा।
इसलिए सफलता की
मैं सीढ़ी चढ़ता गया।।

जब भी याद आते है
मुझे वो पुराने दिन।
तो आँसू गिरने लगते है
मेरे इन आँखो से।
और खो जाता हूँ माँफ
पुराने मित्रों के ख्यालों में।
जो मेरे सुख दुख में
सदा ही साथ देते थे।।

लगन और मेहनत के द्वारा
इंसान बनता है महान।
तभी तो छु पाता है
जीवन की ऊँचाइयों को।
अकेला चलकर भी वो
नया निर्माण करता है।
और अपने हौसलों को भी
सदा ही जिंदा रखता है।।

फूलों की महक

नजारा देखकर यहाँ का
दिल रुकने को कहता है।
फूलों के बाग में देखो
भवरा कुछ कहता है।
तभी तो झूलतें फूलों से
महक बहुत आती है।
जो मोहब्बत करने वालों
को बहुत ही लूभाती है।।

देखो तो फूलों की किस्मत
मोहब्बत हम करते है।
पर देखो होठों का स्पर्श
इन फूलों को मिलता है।
और क्यों दिलमें हमारे
एक हलचल सी होती है।
मोहब्बत का प्रतीक है
गुलाब का फूल तुम देखो।।

झूलतें फूल डोलते भवरें
मोहब्बत को खोजते है।
और मोहब्बत करने वालें
फूलों के बाग चुनते है।
बड़े ही किस्मत वाले है
ये बगीचे फूल के देखो।
मोहब्बत हम करते है
श्रेय पर फूलों को मिलता।।

फूलों की किस्मत का हम
अंदाज लगा नही सकते।
बहुत कोमल होकर भी
कभी खिलने से नही रोकते।
और अपना फर्ज निभाने से
कभी पीछे नही हटते।
इसलिए देकर फूलों को
मना लेते है रूठों को।।

पावन और पवित्र देश

कही पर राम पूजते है
कही पर श्याम पूजते है।
कही पर बुध्द पूजते है
कही महावीर पूजते है।
अनोखा देश है अपना
जहाँ ये सब ही जन्में है।।

अनेकता में एकता का
सदा दिखता है समावेश।
खंड-खंड होकर भी देखो
अखण्ड भारत है एक।
दुनिया के मान चित्र पर
नही है कोई ऐसा देश।।

कितनी आस्था और श्रध्दा
बसती है लोगों के दिलों में।
जहाँ के पत्थरो से देखो
बनाये जाते है भगवान।
यहाँ के कण-कण में देखो
महसूस होते है भगवान।।

अनादि काल से देखो
पूजता आ रहा भारत।
यहाँ की संस्कृति सभ्यता
झलाकती है मन्दिर मस्जिद में।
और गंगा यमुना नदियों का
मिलन भी यहाँ पर होता।।
ऐसे संगम में नहाकर के
धूल जाते है सारे पाप।।

गुरु शिष्यों का मिलन

आज देखो बहुत ही गजब हो गया।
गुरु शिष्यों का देखो मिलन हो गया।
जिस पर श्रध्दा थी उनसे मिलन हो गया।
देखने वालों के आँसू बहने लगे।।
आज देखो बहुत ही गजब हो गया।
गुरु शिष्यों का देखो मिलन हो गया।।

आपने ही बनाया था अपना शिष्य हमें।
आप ही आज पूछते हो की कैसे हो सब।
बिन गुरु के दर्शन के कैसे हो सकते है।
आप ही अब बता दो गुरवर हमें।
आज हम धन्य हुए जो दर्शन मिल गये।।
आज देखो बहुत ही गजब हो गया।
गुरु शिष्यों का देखो मिलन हो गया।

आप भक्तो को ज्ञान सदा देते रहे।
और श्रवको को धर्म सिखाते रहे।
एक बार जब हमने किया आपसे प्रश्न।
तो उत्तर में हमे श्रवक बना दिया था।।
आज देखो बहुत ही गजब हो गया।
गुरु शिष्यों का देखो मिलन हो गया।।

भगवान कोई पत्थर की मूरत नही।
जिसको देखकर के तुम मुस्करा देते हो।
प्राण प्रतिष्ठा करके उनमें जान डालते हो।
तब कही वो पत्थर कहलाता है भगवान।।

आज देखो बहुत ही गजब हो गया।
गुरु शिष्यों का देखो मिलन हो गया।।

प्रकृति ने दिया उपहार

हम को प्रकृति ने दिये है।
देखो कितने बड़े-बड़े उपहार।
जिसके कारण खाते पीते है।
नर-नारी और पशु पक्षी जन।।

देखो विरासत में मिले है।
हमको नदी पर्वत और भूमि।
जिस पर जीते और मरते है।
हम सब संसारी प्राणी जन।।

कितना ध्यान रखा विधाता ने।
इस दुनिया को बनाने में।
सबको सब कुछ मिल जाएंं।
ऐसा किया है उसने काम।।

सब कुछ देकर भी वो।
नही लेता है इसका श्रेय।
पर पृथ्वी के मानव को देखो।
न कुछ करके भी लेता है श्रेय।।

मकर सक्रांति का संदेश

राम जपो श्याम जपो
जपो ब्रहमा विष्णु महेश को।
पर मत छीनो लोगों से
उनके अधिकारो को।
राष्ट्र चरित्र का तुम
कब करोंगे निर्माण?
बहुत हुआ खेल अब
धर्म जाती का देश में।
कुछ तो तुम शरम करो
देश के निर्माताओं।।

कितने सारे त्यौहार
एक तिथि पर पड़ते है।
अलग धर्म के होकर भी
एक जैसे ही लगते है।
चाहे हो मकरसक्रांति
या हो वो पोंगल आदि।
फिर क्यों धर्म के नाम पर
नफरत के बीज बोते हो।।

देखो कितना सुंदर है
अपना भारत देश ये।
फिर इस सुंदर देश को
क्यों मिटाने पर तुले हो।
नहीं किया जब भेदभाव
दुनियां को बनाने वाले ने।
फिर तुम कैसे मिटा पाओगें
उसकी बनाई इस दुनियाँ को।।

भारत की पावन भूमि पर
लिया जन्म देवीदेवताओं ने।
लिया नहीं क्यों जन्म उन्होंने
किसी और देश में।
गम्भीर होकर सोचो तुम
इस मूल बात को।
रघुपति राघव राजा राम
पति के पावन सीताराम।
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सभी को बुध्दि दे भगवान।।

सोच विचारकर करो यारों
एकता वाले तुम काम।
तभी अमन चैन शांति
स्थापित हो पायेगीं देश में।
फिर हिल मिलकर हम
मनापायेंगे त्योंहारो को।
और अनेकता में एकता
दिखने लगी भारत देश में।।

क्या हाल सुनाऊँ में

दिलका हाल बताऊँ क्या
कहते हुए शर्म आती है।
मन की व्यथा भी मेरी
कुछ ऐसा बताती है।
जो दिलकी बातें सुनता है
पर दिलको नही समझती है।
पर खुदकी किस्मत पर वो
सदा ही रोता रहता है।।

मानव की है कुछ विशेषताए
जो मानव ही दिखलाता है।
मन की बातें सुनकर वो
मन को ही सहलाता है।
दिल दिमाग से सोचकर
दिलको वो बहलाता है।
प्यार मोहब्बत वो करता है
पर कहने से वो डरता है।।

दिन रात सोच-सोच कर
एकाकी सा बन जाता है।
प्यार की छोटी-छोटी बातें
उससे कहने को वो डरता है।
जिससे वो करता है प्यार
पर इजहार नही कर पाता है।
बस उसके बारे में सोचकर
याद उसे ही करता है..।।

लक्ष्य में खो गया

सोच सोच कर मैं,
यहां आ गया।
पर मिला न चैन
मुझे यहां पर।
कैसे कह दू कि मैं
खुश हूँ नही।
क्योंकि बिना सोचे समझे,
निकले थे जो हम।।

कैसे मिलेंगी हमें
अपनी मंजिल।
काम करता बहुत
जो लेदिन रात मैं।
जैसा फल में चाहू
वैसा मिलता ही नही।
इसलिए दिल मेरा
अब लगता नही।।

कहते है की मेहनत
कभी खाली जाती नही।
फिर क्यों भगवान
बार बार उसकी।
लेते रहते परीक्षा
उसी कि ही।
इसलिए अपने कर्मों पर
रखो यकीन तुम।
काम तुम्हारे सारे
बन जाएंगे एक दिन।
और फिर बन जाओंगे
एक सफल इंसान तुम।।

मेरा प्यार तू है

मोहब्बत करने का मेरा
थोड़ा अंदाज निराला है।
मोहब्बत से जीने का
मेरा एक नेक इरादा है।
इसलिए स्नेह प्यार से
निभाते है दिल के रिश्तें।
और दिल की धड़कने को
हम पढ़ लेते है दिलसे।।

दिलों जी जान से ज्यादा
तुम्हें हम प्यार करते है ।
मोहब्बत के दीपक भी
दिलों में जलाया करते है।
मोहब्बत दिलमें लेकर ही
सदा हम जीया करते है।
और मोहब्बत करने वालों का
बहुत सम्मान करते है।।

मोहब्बत एक तपस्या है
जो हर कोई कर नही सकता।
सहन-शीलता भी बहुत
दिखानी पड़ती है इसमें।
और अपने भावों को भी
पवित्र रखना पड़ता है।
जो ये सब कर पाते है
वो ही मोहब्बत पाते है।।

पहली मोहब्बत

बहुत कुछ खोकर भी
बहुत कुछ पा लिया।
दर्द में जीने की अब
मेरी आदात बन गई।
रहेंगें जब तक हम जिंदा
दर्द के साथ जीयेगें।
भूलकर अपने दर्द को
औरों को खुशीयाँ हम देंगे।।

दर्द और स्नेह का रिश्ता
बहुत ही घनिष्ट होता है।
स्नेह प्यार के रास्ते में
दर्द का आना स्वभाविक है।
जो जीता है दर्द के साथ
उसे प्यार सच्चा मिलता है।
और अपने जीवन को वो
खुशी के साथ जीता है।।

दर्द देने वालों से भी
बहुत गैहरा नाता है।
खुशीयाँ छीनने वालों का
बहुत आभारी भी हूँ मैं।
जिन्होंने जिंदगी में हमें
करवाया दर्द का एहसास।
और जिंदगी को कभी खुशी
तो कभी गमों में जीना सिखाया।।

डगर प्यार मोहब्बत की
कभी आसान नही होती।
जो इस पर चलता है
उसे ही पता चलता है।
भूल जायेगें रिश्ते-नाते को
मगर पहली मोहब्बत को नही।
इसलिए मेहबूबा की याद में
जी लेते है अपना जीवन।।

पराये अपने हो जाते

हर रोज सोचता हूँ
कुछ नया करें।
या पुराने विचारों का
आज अनुसरण करें।
और कल की सोच को
आज से मिलायें।
फिर पूरी ईमानदारी से
उसका परिणाम बतायें।।

लोगों का मजाक उड़ना
दिल दुखाना अच्छा लगता है।
किसी के दिल पर मरहम
लगाकर तुम देखो।
फर्क दोनों का तुम्हें
स्वयं दिख जायेगा।
घाव देने से ज्यादा मरहम
लगाने में आनदं आयेगा।।

रखोगें दिलमें इंसानियत तो
पराये अपने बन जायेगें।
तुम्हारे दुख दर्द में वो
हर समय काम आएंगे।
पराये होते हुये भी ये
अपनो वाला रिश्ता निभायेंगे।
और संग-संबंधियों से ज्यादा
ये आपके बन जायेंगे।।

जीवन का आधार

देखो जग से नाता जोड़ा
मानवता को दिलसे जोड़ा।
मानव को मानव से मिलाया
मानवता का धर्म निभाया।
अपनो ने ठोकराया हमको
फिर भी अपनाया उनको।
अपना फर्ज निभाया हमने
सबको गले लगाया हमने।।

दूर दृष्टि से देखना हमने
तब जग को जाना हमने।
क्या रखा है मोह माया में
क्या पाया है जग से हमने।
राग द्वेष को छोड़ के हमने
प्रेम भाव जगाया हमने।
हिल मिलकर रहना ही
इस जग का मूल मंत्र ये।।

जब भी मौका मिले तुम्हें तो
दीन दुखी का दर्द हरो तुम।
दया भाव दिलमें रखकर के
दान करो खुले हाथ से तुम।
दान से बढ़कर जग में
और नहीं है अब कुछ।
दान ही जीवन का है
अब सच्चा आधार।।

खुद जग गये

हालातों ने ने …
हालातो ने इंसानो को
क्या कुछ दिखा दिया।
की लोग तड़पने लगे
अपनो से मिलने को।
हालातो ने इंसानो को
क्या कुछ दिखा दिया।।

क्योंकि अब भरोसा नही है
उसे खुद की जिंदगी का।
इसलिए बची जिंदगी को
अपनो के साथ जीना चाह रहा।
ये दौर कैसा आ गया
मरने और जीने का।
हालातों ने इंसानो को
क्या कुछ दिखा दिया…।।

कितना स्वर्थी है ये इंसान
जब मौज मस्ती का दौर था।
तब अकेला अपनी बीबी
बच्चों के साथ मौज किया।
और अपनो के लिए एक
बेगाना सा बन गया था।
और छोड़कर परिजनों को
खुदके लिए जिये जा रहा था।।
हालातों ने इंसानो को
क्या कुछ दिखा दिया…।।

कैसा खेल उस ईश्वर ने
संसार में खेला।
जिसे कारण सब कुछ
दुनियाँ का बिखर गया।
और जो जहाँ था वो वही
रुक गया तो बच गया।
और अपने पराये वाली
सोच को वो भूल गया।।
और मरे हुए जमीर को
फिर से जगा लिया।।
हालातों ने इंसानो को
क्या कुछ दिखा दिया…।।

मोहब्बत पूजी जाती है

जब हम पास होते थे
तो दूर जाने को कहते थे।
जब दिलकी धड़कनों को
दिलसे सुनना होता था।
तब तुम्हें कही और
उलझ जाना पड़ता था।
और मिलने मिलाने का
मौका चला जाता था।
लाख चाहकर भी हम
तुमसे मिल नहीं पाते थे।
और दिल की बातें को
दिलमें रोकना पड़ता था।
समय निकलता गया और
हम दोनों वही रुके रहे।
हम उन्हें देखते रहे और
वो हमें देखकर चलते रहे।
इसी तरह से हम दोनों
खुदको ही ढूँढते रहे।
और संकोच के कारण
अपनी बातें कह न सके।
परंतु जमाने की नजरों में तो
लैला-मंजु समझे जाने लगे।
और साफ-पाक मोहब्बत का
नया अंदाज दिखा दिया।
की दूर होकर भी हम दोनों
मोहब्बत दिलसे कर सकते है।
और दिलों में उमंगो के
नये दीप जला सकते है।
और नये दौर में नई मोहब्बत
दुनियां को दिखा सकते है।
और श्रध्दा और आस्था से
मोहब्बत को पूजा सकते है।
और अपनी मोहब्बत को
दुनियाँ में अमर कर देते है।।

तरस रही हूँ

दिल मोम की तरह पूरी रात
रोशनी से पिघलता रहा।
पर वो इस हसीन रात को
मेरे दिल में नहीं आये।
मैं जलती रही और नीचे
फिर से जमती रही।
और इंतजार करती रही
अगली रात जलने के लिए।।

हर रात का अब यही आलम है
ये निगाहें और वो दरवाजा है।
देखती रहते है निगाहें दरवाजे को
शायद वो आज की रात आ जाये।
इसलिए सज सवरकर बैठी हूँ
चाँद के दीदार करने के लिए।
की कब उनके स्पर्श से स्वयं को
इस रात में महका सकू।।

इस सुंदर यौवन का क्या करू
जो उन्हें आकर्षित नहीं कर सका।
भले ही लोग मुझे रूप की रानी
और स्वर की कोकिला कहे।
पर अब ये मेरे किस काम का है
जो उन्हें अपनी तरफ ला न सके।
इसलिए हर शाम से रात तक
मैं रोज जलती और जमती हूँ।।

ये मोहब्बत है या वियोग है
या कुछ और ही है।
जिसे हम और आप आज तक
सही में समझ ही नही पाये है।।

जिंदगी का खेल

जिंदगी की उलझनो में उलझता रहा।
और वक्त के साथ मैं चलता रहा।
वक्त ने साथ कुछ ही दिन दिया।
अंत में वक्त ने भी धोका दे दिया।।

वक्त की रफ़्तर को पकड़ा ही था।
की साथ वालों ने हाथ छोड़ दिया।
किसको दोष देने की सोचते हम।
जब खुदका नसीब ही खोटा था।।

जीवन में सफलता पाने को
तकदीर भी अच्छी होना चाहिए।
सिर्फ कर्मों से काम नही चलता।
भाग्य भी कुछ तो हमारा होता है।।

इंसानो का खेल कुछ तो होता है
और उसकी जिंदगी का रचेता।
वो ही विधाता और खुद होता है
जिसने दुनियाँ को बनाया है।
बस उसके किरदार अलग-अलग है
पर नाटक का हीरो खुद होता है।।

अनमोल तोफा

दिया है जो तोफा तुमने
जिसे बता नही सकते।
अपनी खुशी को हम
छुपा भी नही सकते।
मना जो किया उसने
इसे बताने के लिए।
अब करें तो क्या करें हम
की बना रहे हमारा संतुलन।।

आदर और सम्मान से बनी थी
जीवन साथी तुम मेरी।
तभी से मिल रही निरंतर
मुझे खुशियाँ ही खुशीयाँ।
दिया है जो साथ तुमने
हमारे हर सुख दुख में।
और सभारा है जिंदगी को
साथ मेरा देकर तुमने।।

समझ आ गया होगा की
कौन सा तोफा मिला।
जिसे हम और वो भी
छुपाये छुपा नही सकते।
और स्वयं ही सबको पता
चल जायेगा इसका।
रखा मान उसका भी मैंने
और बिना कहे बता भी दिया।।

नया वर्ष 2025 आपको दे

नया साल दे आपको,
मन माफिक परिणाम।
सभी ख्वाब पूरी हो,
करते प्रार्थना ईश्वर से हम ।
आपको रिद्धि दे,
सिद्धि दे,
वंश में वृद्धि दे।
ह्रदय में ज्ञान दे,
चित्त में ध्यान दे।
अभय वरदान दे,
दुःख को दूर कर।
सुख भरपूर कर,
आशा को संपूर्ण कर।
सज्जन जो हित दे,
कुटुंब में प्रीत दे ।
जग में जीत दे,
माया दे, साया दे ।
और निरोगी काया दे,
मान-सम्मान दे।
सुख समृद्धि और ज्ञान दे।
शान्ति दे, शक्ति दे,
और भक्ति भरपूर दें…।
ऐसी में देता हूँ,
शुभकामनाएं दिल से।
रहे अमन और शांति
अपने इस मुल्क में।।

स्वयं को बदले

जाते हुए साल का में
हाल सुनाता हूँ।
अपने दिलकी कुछ में
बातें बताता हूँ।
कह न सका जो में
वो राज बताता हूँ।
और अपनी भूलो के लिए
दिलसे क्षमा चाह्ता हूँ।।

जो हो गया सो हो गया
उन्हें हम भूल जाते है।
अब नये सिरे से हम
फिर से शुरुआत करते है।
और दिलको दुखाने वाली
हरकतों को बंद करते है।
और तुम्हें दिलसे स्नेह प्यार
करने का संकल्प लेते है।।

नये साल का अब हमारा
एक नया लक्ष्य होगा।
दिलों को जीतने का हमारा
सबसे बड़ा काम होगा।
तभी तो स्नेह प्यार का
नया दौर शुरू होगा।
और आने वाले साल का
यही एक पैगाम होगा।।

आप सभी को नये साल की अग्रिम बहुत बहुत बधाई और शुभ कामनाएं। नये साल में आपके जीवन में स्नेह प्यार की बरसात हो।

2024 की विदाई 2025 स्वागत

दुनियां के हरता करता से
प्रार्थना करता हूँ।
क्षमा मुझे कर देना
वर्ष चौबीस की गलतियों पर।
सुख समृध्दि शांति देना
आने वाले वर्ष पचीस में।
हम सब तो बच्चें है
तेरी बनाई दुनिया के।।

ज्ञान धर्म और संस्कारों की
तुम ज्योत जला देना।
अपने सब बच्चों पर
ध्यान सदा तुम देना।
करते है निस दिन हम
तेरी पूजा और अर्चना।
हक भी हमारा बनता है
अपने पालन कर्ता पर।।

हम बच्चों का भी
फर्ज कुछ बनता है।
माता-पिता के प्रति
कुछ करना बनता है।
जिससे वो खुश रहकर
अपनी आयु जी सके।
और गर्व कर सके वो
अपने सब बच्चों पर।।

संकल्प ले नये वर्ष में
उस हरता करता से।
की करेंगे हम सब
अच्छे कर्म नये वर्ष में।
ज्ञान दान दया धर्म की
हम ज्योत जलायेंगे।
और तेरे संतान होने का
वा खूबी फर्ज निभायेंगे।।

हम आप क्या कहेंगे

जग का हाल सुनता हूँ
ध्यान लगाकर सुनो तुम।
मानवता का दृश्य भी देखो
मानव ही दिखला रहा है।।

क्या पाया और क्या खोया है
लेखा-जोखा जग का रखता है।
नफा-नुकसान का हिसाब-किताब भी
ये वा खूबी प्रस्तुत करता है।
और खुदको श्रेष्ठ सावित करने
नये नये हथकंडे अपनाता है।
और मानवता की हद से भी
बहुत नीचे चला जा रहा है।।

करता नही किसी का भी देखो
ये अभिमानी मानव सम्मान।
अभिमान के चक्कर में पड़कर
कितना बेशर्म बन सकता है ये।
अपनी सोच के आगे देखो इसको
नही किसी की सुनता है ये।
पर अंत अति होता है एक दिन
जैसे हुआ रावण कंश का देखो।।

अज्ञानी और अनपढ़ हो राजा तो
हाल राज्य का बुरा ही होगा।
खुद की अकुशलता का फल
जन-मानस को भूगतना पड़ेगा।
दर-दर पर जाकर देखो इनको
कैसे भीख मांगना पड़ रहा है।
पर फिर भी खुदको ये जनाब
सफल राजा बता रहे है।।

रात की रानी का कमाल

रात अभी आई नही और
द्वार जन्नत के खोल दिये।
जिसे सजाया है वसुंधरा ने
देखो चाँद और सितारों से।
और धरा ने भी बिछा दी है
सफेद चादर मोतीयों की।
और महका के रख दिया है
इस रात को रातरानी ने।।

बहुत शुक्र गुजार हूँ
सौंदर्य की देवी का मैं।
जिसने मेरे मेहबूब को
इतना सुंदर बनाया है।
और उससे मिलने के लिए
बाग जन्नत जैसा बनाया है।
जिसमें मिलकर हम दोनों
प्रेम के सागर में डूब सके।।

मोहब्बत का जिक्र जब भी
इस बाग में किया जायेगा।
तब-तब तुम दोनों को भी
याद किया जायेगा।
जैसे युगों-युगों के बाद भी देखो
याद राधाकृष्ण को किया जाता है।
वैसे ही प्रेमियों के द्वारा तुम्हारी
मोहब्बत को याद किया जायेगा।।

आचार्यश्री का गुण गान करे

( गीत / भजन )

विधा सागर की वाणी सुनो
मन अपना तुम प्रफुल्लित करो।
समयसागर जी के साथ चरण वंदन करे।
विद्यासागर जी के आज चरण वंदन करे।।

समयसागर जी के आने के बाद
देखो खुशीयाँ छाई अपार।
विद्यासागर के आज
गाये गुण हम सब जन।
विधासागर जी के आज
गुण गाये सभी जन।।

ज्ञान सागर जी ने
एक बालक को दीक्षा दी थी।
धर्म की ज्योत जलाई
आ के देखो बुंदेलखंड में।
विद्यासागर के हम करे चरणों को वंदन
मिलकर हम सब जन।
विद्या सागर के आज गाये गुण हम।।

दीक्षा देकर देखो समय सुधा
और प्रमाण सागर को।
क्षमा और योग सागर जी के
संग पूर्णमति दृणमति माताजी को।
ज्ञान की गंगा बहा रहे है देखो संसार में
विद्यागुरु के शिष्य जन।।
विधा सागर की वाणी सुनो
मन अपना तुम प्रफुल्लित करो।
समयसागर जी के साथ चरण वंदन करे।
विद्यासागर जी के आज चरण वंदन करे।।

जीव हत्या रोकने को खुलवाये गौशालायें।
प्रतिभाओं को तलाशने को
खुलवायें देखो प्रतिभा-स्थली आदि को।
जगह-जगह खुलवा दिया
देखो हाथकरधा क्रेंद, विद्या गुरुवर जी ने।
विद्यासागर जी के करो गुण गाना
मिलकर सभी श्रावक जन।।
विधा सागर की वाणी सुनो
मन अपना तुम प्रफुल्लित करो।
समयसागर जी के साथ चरण वंदन करे।
विद्यासागर जी के आज चरण वंदन करे।।

प्रेम रोग

एक पल भी तुम बिन रहा नही जाता।
तुम्हारा दर्द भी मुझसे सहा नही जाता।
क्यों इतना प्यार दिया तुमने मुझको।
की तुम बिन अब जिया नही जाता।।

तुम्हारी याद आना भी कमाल करती है।
कभी आकर देखना क्या हाल करती है।
रोज सपनो में आकर तुम चले जाते हो।
फिर पूरा दिन हमें बेचैन कर देते हो।।

इससे अच्छी तो तन्हाईयाँ होती है।
जो सदा ही हमें तन्हा तो रखती है।
और प्यार व्यार से हमें बचती है।
और हकीकत से रूबा-रु कराती है।।

इश्क करना कोई आसान बात नही।
मंजुनू बनकर जीना आसान नही होता।
पागल सा कर देता है ये इश्क इंसान को।
क्योंकि ये रोग होता है अलग तरह का।।

अपने भी अपने नही

दिल को दिलों से मिलाओं
मनको अपने तुम समझाओं।
लगे बात अगर कठोर तो भी
मनको अपने शांत रखे।
और जिंदगी के पहलू को
लोगों के लिए लूटाये।
कर सकेगा अगर तू ऐसा
तो तकदीर तेरी बदलेगा।।

यादों के सहारे मत जीओं
आज में जीना तुम सीखो।
भूल जाओं खुशियों को
जिन्हें पहले जी सके हो।
पर पहले के हादसो को
जीवन भर याद रखो।
कर सकेगा अगर तू ऐसा
तो तकदीर तेरी बदलेगा।।

तन मन पर लगे घावों को
ऊपर से भले सुखा लो।
पर अंदर से घावों को
तुम सुखने मत देना।
जंग जीवन की जितना है
तो मानवता को जिंदा रखना।
कर सकेगा अगर तू ऐसा
तो तकदीर तेरी बदलेगा।।

साँच को आँच नही मिलता
लूट का माल हजम नही होता।
बहुत देखे हमनें जिंदगी में दृश्य
पर खुदको लूटते आज ही देखा।
जिंदगी की सच्ची कहानी है ये
जो अपनी आँखों से देख रहे।
देख सका अगर तू धैर्य से ये
तो तकदीर तेरी बदल लेगा।

यादों में हो

हमारी यादों में सदा रहेंगे वो।
अपने कार्यों से जाने जायेंगे वो।
कितना स्नेह प्यार रखते थे वो।
इसलिए दिलों पर राज करते थे वो।।

उनके बताये मार्ग पर चल रहे हैं।
उनके कार्यों को आगे बड़ा रहे हैं।
इसलिए आज भी हमारे साथ हैं।
जिसे कारण कामयाबी पा रहे हैं।।

कोई भी दिन नहीं जाता हमारा।
जब हम उन्हें याद करते न हो।
क्योंकि हम भूल पाये ही नही।
की अब वो दुनिया में नही हैं।।

वक्त की रफ्तार को तो
हम रोक सकते नहीं।
मन के भावों को भी
हम दवा सकते नहीं।
दूर होकर भी वो
आज बहुत पास है।
सच कहे तो वो
हमारे बहुत खास है।।

नाजुक सा बंधन था
उनका और हमारा।
पल-पल का साथ था
उनका और हमारा।
कैसे भूल जाएँ उनका
जीवन में योगदान को।
क्योंकि वो ही तो थे
हमारे पथ प्रदर्शक।।

जिंदगी का सफर

पग पग पर कांटे बिछे
चलना हमें पड़ेगा।
कठिन दौर जिंदगी का
हमको संभलाना पड़ेगा।
होकर दूर अपनो से
करीब पहुंचना पड़ेगा।
लक्ष्य जीवन का अपना
हासिल करना पड़ेगा।।

चलते है जो कांटो पर
मंजिल उन्हें मिलती है।
दुख के दिन बिताकर
सुख में प्रवेश करते है।
और अपनी सफलता को
मेहनत लगन का नाम देते है।
और जिंदगी की सच्चाई को
खुद व्या करते हैं।।

चल-चल कर काँटों पर
पैरों में छाले पड़ गए है।
दर्द को सहते हुए हम
आगे बढ़ते गये है।
और लक्ष्य की खातिर
सब कुछ सह गये है।
इसलिए तो जीवन की
ऊँचाइयों को छू पाये है।।

प्रकृति से प्यार है

ऊँचे ऊँचे पर्वत देखो
नीचे बहती नदियाँ जो।
देख दृश्य ये प्रकृति का
बहुत सुहाना लगा है जो।
राग आलाप रही नदियाँ
ढोल पीट रहे पर्वत जो।
मन मन्दिर में आन बिराजे
राधा कृष्ण की जोड़ी जो।।

सैर-सपाटे करत करत देखो
कहाँ पहुँच गये हम जो।
कल-कल छल-छल करती देखो
दौड़ लगा रही नदियाँ जो।
कहीं हरियाली कही खुशहाली
देख हमें बहुत ही भाते जो।
मन खो और दिल खो भी हमरे
ये सब बहुत ही भात जो।।

प्रेम उड़ पढ़त हमरो देखो
निकलत नदी किनारे से जो।
बंधन संबंध याद करत
नदी पर्वत अपने जैसे जो।
कितनी खुशियाँ देते दोनों
देख देख खुश हो जात हम।
मनमें भाव उछल-कूद करत
जब पर्वत से गिरत पानी जो।।

कितनी सुंदर है जा प्रकृति
देख देख मन भरत नही।
व्याकुलता बढ़ती रहती है
देख देख इसखो जिऔ जो।
गिरत पानी पर्वत से जब भी
और तन पर पढ़त बूंदने जो।
खिल उठत एक दम से तन
और लिपट जात मेहबूब से जो।।

प्यार मोहब्बत तुम भी करो
पर्वत और पानी जैसो।
जीवन अपनो बनो रहेगो
एक दम हरियाली जैसो।
झूम उठेगो दिल भी अपनो
फूल पत्तियों और डालियों जैसो।
पर्वत जैसे ऊँचे बनो तुम
और पानी जैसे बनो शीतल।।

जीवन पर ये अद्भूत रचना
संजय ने लिखी है आज।।

बेटी

ओस कि एक बूँद सी होती हैं बेटियां।
स्पर्श खुरदरा हो तो रोती हैं बेटियां।।

रोशन करेगा बेटा तो एक ही कुल को।
दो दो कुल कि लाज होती हैं बेटियां।।

कोई नहीं है दोस्तों, एक दूसरे से कम।
हीरा अगर है बेटा तो, मोती हैं बेटियां।।

काँटों कि राह पे ये खुद ही चलती रहेंगी।
औरो के लिए फूल बोती है बेटियां।।

आनंद

होठों पर हँसी हो
आँखो में नमी हो।
दिल में सुकून हो।
तो खुशी झलकती है।
और चेहरा कमल सा
एक दम खिलता है।
इसलिए तो सभी से
इनका दिल मिलता है।।

जीवन तो मिला है
यहाँ हर किसी को।
पर जीने का अंदाज
सबका अलग अलग है।
कोई खुश है तो
कोई बहुत दुखी है।
पर मरने के लिए
कोई राजी नहीं है।।

हर स्थिति में जीने को
लोग यहाँ राजी है।
कुछ जिंदा दिली से
तो कुछ दवके जीते है।
पर अपने गमों और
खुशी में मस्त रहते है।
और मानव जीवन का
लुफ्त सभी उठाते है।।

बचपन की यादें

बचपन की यादों को,
मैं भूला सकती नहीं।
मां के आँचल की यादे,
कभी भूल सकती नहीं।
दादा दादी और नाना नानी,
का लाड़ प्यार हमें याद है।
वो चाची की चुगली,
चाचा से करना।
भाभी की शिकायत
भैया से करना।
बदले में पैसे पाना,
आज भी याद है।
और उस पैसे से,
चाट खाना भी याद है।
भाई बहिनों का प्यार,
और लड़ना भी याद है।
भैया की शादी का वो दृश्य,
आज भी आंखों के समाने है।
जिसमे भाभी की विदाई पर,
उनका जोर से रोना याद है।
खुदकी शादी और विदाई का,
हर लम्हा याद आ रहा है।
मां बाप के द्वारा दी गई,
हिदायते और नसियाते।
मैं आज तक नहीं भूली
और न भूलूंगी।
क्योंकि अपनी दुनिया को
मैं खोकर आई हूँ।
पर दिलमें नई उमंगे लेकर,
साथ पिया के आई हूँ।
जो अब है मेरी जिंदगी
के आधार स्तम्भ।
मानो मेरी जीवन का
यही है अब संसार।
छोड़कर माता पिता और,
भाई बहिन को मैं।
नये माता पिता नंद देवर,
भाई बहिन जैसे पाये है।
छोड़ छोटी सी दुनिया को,
मैं बड़ी दुनिया में आई हूँ।
अब जबावदारियों का बोझ,
स्वंय के कंधों पर उठाई हूँ।
क्योंकि दिया पिया ने मुझे
इतना स्नेह प्यार जो।
जिससे अब खुद की
नई दुनिया बसाई हूँ।
और जो कल तक
खुद एक बच्ची थी।
आज माँ बन के
वो सामने आई है।
और खुद का घर संसार
बसाकर नया संसार पाई हूँ।
और संसार को चलाने में
खुद की भूमिका निभा रही हूँ।।

दुनिया का हीरो

जिंदगी की उलझनो में उलझता रहा।
और वक्त के साथ मैं चलता रहा।
वक्त ने साथ कुछ ही दिन दिया।
अंत में वक्त ने भी धोका दे दिया।।

वक्त की रफ़्तर को पकड़ ही था।
की साथ वालों ने हाथ छोड़ दिया।
दोष किसको देने की सोचते हम।
जब खुदका नसीब ही खोटा निकला।।

जीवन में सफलता पाने को
तकदीर भी अच्छी होना चाहिए।
सिर्फ कर्मो से काम नही चलता।
भाग्य भी तो कुछ हमारा होता है।।

इंसानो का खेल कुछ तो होता है
और उसकी जिंदगी का रचेता।
वो ही विधाता होता है
जिसने दुनियाँ को बनाया है।
बस उसके किरदार अलग अलग है
पर नाटक का असली हीरो वो ही होता है।।

नया सबेरा

बड़ी मुददत और श्रध्दा से
चाहा है तुम्हें।
दुआओं और अच्छे
कर्मो से पाया है तुम्हें।
तुमने भूलाने का हमें
सोचा भी कैसे प्रिये।
किस्मत की लकीरों से
हमने चुराया है तुम्हें॥

जिसे निभा न सकूँ,
ऐसा वादा में कभी नहीं करता।
मैं बातें भी अपनी
हद में रहकर करता हूँ।
क्योंकि ज्यादा पाने की चाहत भी
मैं कभी नहीं करता॥

हाँ पर दिल में तमन्ना रखता हूँ।
आसमान को छू लेने की…।
लेकिन कभी भी औरों को गिराने का।
कभी भी इरादा नहीं रखता॥

हर जलते दीपक तले अँधेरा होता है।
हर रात के पीछे एक सवेरा होता है।
लोग डर जाते है मुश्किलों को देखकर।
पर मुश्किलों के पीछे नया सवेरा होता है॥

मेरी सोच

जिसे निभा न सकूँ,
ऐसा वादा नही करता..!
मैं बातें अपनी हद से,
ज्यादा नहीं करता.. ।।

तमन्ना रखता हूं
आसमान छू लेने की..।
लेकिन औरो को गिराने का।
कभी इरादा नहीं रखता..।।

जीवन के हर मोड पर,
सुनेहरी यादों को रहने दो।
जुबां पर हर वक्त,
मिठास रहने दो।
ना खुद रहो उदास।
ना दुसरों को रहने दो।
जीवन की यादो को
जीवित रहने दो।।

जिसके दिल में, प्यार नहीं।
वो आजादी का, हक़दार नहीं।
मेरा वतन, गुलज़ार है।
यहाँ ख़ारों से, इक़रार नही..।।

तेरी रहमत का असर,
दुआओं मे पाया है l
आई जब भी मुसीबत,
तूने ही साथ निभाया है l
कैसे कह दूँ मालिक के तेरा
और मेरा कोई रिश्ता नहीl
गिरा मेरा जब भी अश्क,
इसमें तेरा ही चेहरा नज़र आया है..।।

मेहबूब के लिए

कुछ तो बात है आप में।
जो महका देते हो वातावरण।
फूल भी हो और खुशबू भी।
पर खुदको तुम्हें नही पता।।

महकते हो सदा महफिल में
तो खिल उठते है दिल वहाँ।
जहाँ शामे-ए महफिल जमती है
मोहब्बत करने वालो के लिए।।

कुछ तो रूप दिखा दो।
प्यारे से चेहरा पर तुम।
देख उसे मैं लिख सकूँ।
अपने प्यारे दोस्त पर।।

वदन हो आप चन्दन सा
और होठ हो अंगरे जैसे।
हँसी हो फूलो जैसी
पर आँखे में हो शर्म हाया।।

ये सब तेरी तस्वीर में है।
जो मन दिल को लूभा रहा।
दिल तेरा क्या डोल रहा।
जैसा मेरा डोल रहा।।

लेखनी का आधार हो

आज फूल लाया था
कुछ तुम्हारे लिए।
पर वो ले गया कोई
और तुम्हारे नाम से।
मुझे पता था की तुम
ऐसा ही बोलोगें मिलने पर।
इसलिए पहले ही मांगा लिये
मैंने उनको तुम्हारे पास से।।

मुझे पता है की तुम
मुझे नही चाहते हो।
पर मेरे गीत कविताओं को
बहुत पसंद करते हो।
हाँ सच में हैरान परेशान हूँ मैं
की कैसे लिख लेते हो तुम।
प्यार मोहब्बत पर इतने
सुंदर गीत और कविता।।

मैं जानता और समझता हूँ तुम्हें।
जो कविताओं की चाह रखती हो।
इसलिए प्यार-मोहब्बत दिखा रहे हो।
पर मेरे लिए तो तुम एक प्रेरणा हो।।

ऐसा नही है प्रिय संजय जी
जो आप हमें समझ रहे हो।
सच में हम तुम्हारे है और
हमेशा ही तुम्हारी रहूँगी।
बस दिलसे विश्वास करो तुम
हम बने ही है संजय के लिए।।

आप प्यार करो या न करो
मेरे को फर्क नही पड़ता।
हाँ पर तेरे से बात करके
मुझे लिखने को मन करता।
इसलिए मेरे लिए तो
आप बहुत ही खास हो।
और मेरी लेखनी का शायद
तुम ही तो आधार हो..
तुम ही तो आधार हो।।

सपने मोहब्बत के

गीत लिखू या गजल लिखू
सब में तेरा नाम है।
प्यार मोहब्बत की बातों में
तेरा ही इकरार है।
सुनने को तेरे मुख से
क्यों अभी भी इंतजार है।
सुनकर कुछ तेरे से मैं
शायद नया कुछ लिख सकू।।

मिलना तो संभव है नही
पूर्व और पश्चिम का।
मैं सागर हूँ और तुम हो खड़ी
कैसे मिलन अब होगा।
प्यार मोहब्बत की बातों से
क्या दिल दोनों का भरेगा।
मिलन हमारा कैसे होगा
कुछ तो तुम्हें पता होगा।।

दूर से ही बिना ही देखे
कैसे प्यार में डूबे।
न आवाज़ सुनी है मैंने
न ही रूप तुम्हारा देखा।
तुमने तो शायद देखा है
मुझको कोई महफ़िल में।
पर मैं अबतक न देख सका
रूप तेरा सुंदर सलोना।।

कब तक तुम तड़पाओगी
और मुझे तरशाओगी।
प्यार-मोहब्बत के इस बंधन में
महल हवाई तुम बनाओगी।
खुद खोओगी और मुझको भी
इसी महल में ले जाओंगी।
जिसमें सपने ही सपने होगें
पर ख्याब अधूरे अपने होगें..।।

शिष्टाचार

नया और पुराना जमाना,
हमें आज याद आ रहा है।
कितने अच्छे और सच्चे
लोग होते थे तब के।
झूठ कर कोई बुलाये तो,
सच्च में सामने होते थे।
पर आज सच में बुलाये,
तो झूठकर भी आते नहीं हैं।
कितना सब-कुछ बदल दिया,
देखो लोगों के स्वार्थ ने।।

आत्मीता बदली व्यवहार बदला
और बदल गये अचार-विचार।
कलयुग में अब क्या बचा,
कहने सुनने को अब यार।
कुछ तो शर्म करो और रखो
अपनो के लिए इस जमाने।।

कैसे बदला और किसने बदला,
समाज का व्यवहार और शिष्टाचार।
किसको दे हम दोष अब,
क्योंकि सारे अपने है यार।
इसलिए दिलमें आते है
उनके प्रति ये विचार।
पर क्या वो समझे पायें
अपनो के कभी विचार।
इसलिए दिखाते रहते है,
अपनी दुर्भावनाएं देखो यार।।
कितना कुछ बदल दिया
लोगों ने अपना शिष्टाचार।।

मिलो तो सनम

आओं चले हम तुम
एक बाग में सनम।
गीत गाये प्यार के
इस बाग में सनम।
बहता जहाँ पानी और
चलती हो हवाएं नम।
ऐसे किनारे पर हम
थोड़ा बैठे जायें सनम।।

पेड़ हो हरेभरे और लगे हो
उन पर कुछ तो फल।
देख दिल झूम उठे
और खाने को करे मन।
ऐसे ही बागों में अब
मिलता है हमको सूकून।
इसलिए खोज रहा हूँ
ऐसे प्यारे बाग को।।

सूरज चाँद की किरणें देख
बाग भी आज इतरा रहा।
चारों तरफ फूल खिले है
और फैली उनकी खुशबू है।
भवरे उन पर डोल रहे
पीने को उनका रस।
हम भी कैसे पाए उन्हें
इस प्यारे से बाग में..
इस प्यारे से बाग में।।

गुरु ही भगवान है : गीत भजन

गुरु बिना ज्ञान कभी
मिलता नहीं हम क्या।
गुरु चरणो को बारंबर
हम अब नमन करे।
गुरु बिना………..।।

जो श्रध्दा और भक्ति से
पूजते है गुरुवर को।
उन श्रावक के जीवन में
कभी बाधायें नहीं आती।
गुरु की छाया उन पर
सदा ही बनी रहती है।
इसीलिए वो श्रावक गण
सदा ही खुश रहते है।।
गुरु बिना ज्ञान कभी
मिलता नहीं हम क्या।
गुरु चरणो को बारंबर
हम अब नमन करे।
गुरु बिना………..।।

गुरुओं के बताये मार्ग पर
जो भी श्रावक चलता है।
आत्म कल्याण का मार्ग
उन्हीं लोगों को मिलता है।
जीवन जीने का आनंद भी
उन सब का अलग होता है।
इसलिए तो गुरुओं की
शरण हम सबको चाहिए।।
गुरु बिना ज्ञान कभी
मिलता नहीं हम क्या।
गुरु चरणो को बारंबर
हम अब नमन करे।
गुरु बिना………..।।

गुरु दर्शन में ही अब
प्रभु दर्शन दिखते है।
गुरु विद्या सागर में
वर्तमान के वर्धमान दिखते है।
उनकी त्याग तपस्या का
कलयुग में भी सत्युग जैसा है।
इसलिए तो विद्यासागर को
जग वाले भगवान कहते है।।
गुरु बिना ज्ञान कभी
मिलता नहीं हम क्या।
गुरु चरणो को बारंबर
हम अब नमन करे।
गुरु बिना………..।।

घर परिवार किसे कहते

बिना हिल-मिलकर रहे,
कोई परिवार नहीं बनता।
बिना चर्चा के कभी कोई ,
समाधान नहीं मिलता।।

जिन घरों में माता-पिता,
को सम्मान देते हैं।
वो घर ही परिवार,
कहलाने लायक होते है ।
उन्ही घरों का माहौल,
स्वर्ग जैसा होता है।।

गुरु बिन ज्ञान किसको,
कभी मिल नहीं सकता।
ज्ञान बिना बच्चों का जीवन,
सार्थक हो नहीं सकता।
बिना माता-पिता के बच्चे,
सदा ही अनाथ कहलाएँगे।
संस्कारों के अभाव में,
घर नरक बन जाते है।।

बहू-बेटियों में शर्म-हया,
होना बहुत जरूरी है ।
संस्कारों के बिना घर,
परिवार सदा अधूरे है।
इसलिये बुजुर्गों का सम्मान,
हर घर में जरूरी है।
तभी तो दिलों में प्रेम-स्नेह,
प्यार सदा जिन्दा रहेगा।।

यदि मिलता रहेगा आशीर्वाद,
हमें सदा उन लोगो का।
तो हमारा घर भी सभी को,
स्वर्ग जैसा हमेशा ही लगेगा।
और लोग बोलेंगे कि कलयुग में भी,
सतयुग जैसा अपना घर परिवार है ।।

दुनिया मेला है ( गीत )

दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को।
कुछ हम सब अब करके ही
इस दुनिया से जायेंगे।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

मुझसे पहले इस दुनिया में
कितने आये और कितने चले गये।
कुछ ने तो अच्छे कर्म किये
पर कुछ बदनाम होकर चले गये।
वो भी दुनिया का एक सच था
ये भी दुनिया का एक सच है।
जो दुनिया ने हमको दिखा दिया
हम भी दुनिया का हिस्सा है।।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

कल और आज के अंतर को
दुनिया को अब समझना है।
दुनिया की हकीकत को अब
दुनिया को ही बतलाना है।
कल भी ऐसा होता था
आज भी ऐसा होता है।
दुनिया वालों की करनी का
दुनिया को ही फल मिलना है।।
दुनिया के मेले में हम सब
आये है कुछ तो करने को..।।

मोहब्बत अनमोल

सीने से लगाकर तुमसे
बस इतना ही कहना है।
जिंदगी भर अब तुम मुझे
रखना बाहों में अपनी।।

साँसों में तुम बसे हो मेरे
दिल पर लिखा तेरा नाम।
मैं हूँ अगर खुश आज तो
ये है तेरा एहसान।।

आँखो में हरपल तेरी ही
दिखती है एक तस्वीर।
दिल और दिमाग पर मेरे
बस छाएँ हुए हो तुम।।

भूलकर भी छोड़ने का मुझे
मत करना इरादा भी तुम।
वरना मेरी मौत का तुम्हें
जल्दी मिल जायेगा पैग़ाम ।।

देख सकता नहीं मैं तुझे
किसी और के बाहों में।
क्योंकि ये दिल अब तेरे बिना
कही और लगता ही नही।।

हर सांसो पर तेरा जो
अब नाम लिखा गया।
जीती और मारती हूँ बस
अब मैं सिर्फ तेरे लिए।।

जीवन का रस पान किये
तुम जो मेरे संग।
हर अंग पर लिखा है
तब ही से तेरा नाम।।

मानव जीवन की रातें वो
सब लिखी है तेरे नाम।
आंगन में अपने अब एक
फूल भी खिल उठा।
जीवन भर की ये अब
मानों धरोहर है ये।।

पिया मिले : गीत

हमको मिले हो तुम..तुम..
हमको मिले हो तुम जो
एक साथी बनके।
शायद जनम हुआ है मेरा
बस मानो तेरे लिए।।
हमको मिले हो तुम..तुम.।।

दुनिया की इस भीड़ में
तुम मुझको आज मिले।
जी भर के देख लो मुझे
तुम अब करीब से।
फिर कोई शिकवा शिकायत
मत करना नसीब से।
शायद ये जीवन गुजरेगा अब
दोनों के नसीब से।
हमको मिले हो तुम जो
एक साथी बनके।
शायद जनम हुआ है मेरा
बस मानो तेरे लिए।।

खुशियों के पल आयेंगे अब
जीवन में बार बार।
खुलकर जीओ तुम जीवन
जैसा चाहो अब यार।
हूँ मैं तुम्हारी संगनी अब
जीवन परयंत तक।
बस साथ मत छोड़ना तुम
मुझे गैर समझकर।।
हमको मिले हो तुम जो
एक साथी बनके।
शायद जनम हुआ है मेरा
बस मानो तेरे लिए।।

तुमको को मैं अब से
देखती हूँ खुद में।
मेरे रोम रोम में अब
तुम ही समा गये।
तेरे सिवा अब दुनिया में
और कोई है नहीं।
सब कुछ मैंने अपना
तुमको किया अर्पण।।
हमको मिले हो तुम जो
एक साथी बनके।
शायद जनम हुआ है मेरा
बस मानो तेरे लिए।।

साँसे मेरी अब कुछ ही
जीवन की शेष बची।
जी भर के तुझको देख लू
पहले की ही तरह।
फिर से मिलन हमारा अब
शायद हो न हो।
मिलकर गले हम दोनों अब
कुछ पल तो गुजर ले।।
हमको मिले हो तुम जो
एक साथी बनके।
शायद जनम हुआ है मेरा
बस मानो तेरे लिए।।
हमको मिले हो तुम..तुम..।।

विद्यासागर गुरु मिल गये

मिल गये विद्यागुरु..गुरु…
मिल गये गुरु कलयुग में
सत् युग जैसे ।
मिला है मनुष्य जन्म हमें
देखो इस युग में।
मिल गये गुरु कलयुग में
सत् युग जैसे हमें।
मिल गये विद्या गुरु….।।

हमको मिला है जनम ये
अच्छे कर्मों से।
जी भर के जी लूंगा मैं
कुछ अच्छा करके।
शायद फिर से मनुष्य जनम
हमें मिल न पायें।
इसलिए इस जनम को हम
सार्थक बना ले।
मिल गये गुरु कलयुग में
सत् युग जैसे हमें।।

कहते है गुरुवर कलयुग में
आप पास आईयें तो।
सुनकर गुरुओं की वाणी को
सत्य जान लीजियें।
आँखो से फिर तेरे को ये
दुनिया दिखेगी सही।
शायद फिर से मनुष्य जनम
तुम्हें मिल न पायें।
मिल गये गुरु कलयुग में
सत् युग जैसे हमें।
मिला है मनुष्य जन्म हमें
देखो इस युग में।।
मिल गये विद्यागुरु…गुरु..।।

दुनिया रंगीन है

दिलों की प्यास दिल ही बुझाते हैं।
प्यार की राह प्यार वाले दिखाते हैं।
दोस्त ही दोस्त का हाल जानते हैं।
इसलिए तो लोग दोस्ती करते हैं।।

जमाने में हर तरह के लोग होते है।
जो हमें खुशी और गम भी देते है।
बाँटने वाले बहुत कम मिलते है।
क्योंकि दुनिया के रंगठंग अलग होते है।।

प्यार के रंग तो अनेक होते है।
कुछ तो दिलके करीब होते है।
और कुछ हमारे दिल जैसे होते है।
जो दिलको रंगीन बनाये रखते है।।

जो रंग बिरंगी दुनिया को समझते है।
चाँदनी रात में तारों को महत्व देते है।
ऐसी दिलदार जोड़ी दुनिया में कम है।
पर इनका विवरण किताबों में मिलता है।।

बेटी की विदाई

बेटी की विदाई क्या होती है
एक बाप से पूछो ।
शान ए घर की विदाई क्या होती है
एक माँ से पूछो।
साथ खड़ी रहने वाली की जुदाई
क्या होती है परिवार वालो से पूछो।
दादा-दादी भाई-बहिन और दोस्तों से
बिछड़ना क्या होता है बेटी से पूछो।।

बेटी क्यों प्यारी होती है माँ बाप को
वो ही बता सकते है जिनकी बेटी है।
हर बात को आसानी से समझती है
तभी तो घर की शान कहलाती है।
खुद के दुख दर्द को छुपाकर
सभी के साथ खड़ी हो जाती है।
ये सब कुछ बेटी ही करती है
इसलिए परिवार का मान बढ़ती है।।

बंद कर दो अब तो लोगों
भेदभाव लड़का लड़की में करना।
अगर लड़के को हीरा कहते हो
तो लड़की भी मोती होती है।
ये बात अपने दिल से तुम
आज के युग को देखकर सोचो।
बेटीयां ज्यादा पढ़ी लिखी और
समझदार है बेटो की अपेक्षा।।

इसलिए बाबूल कहता है की
बेटी ह्रदय की धड़कन होती है।
जो अनादिकाल से अपना धर्म
बिना स्वार्थ के निभाए जा रही है।
और दो कुलो का मान समान
अपने कामों से निभा रही है।
बेटी होते हुये भी वो बेटा
बनकर अपना धर्म निभा रही है।।

अपना कोई नहीं

जमाना देखो आज कल का।
कितना ज्यादा बदल गया है।
समयानुसार लोगों का आज कल।
दिल दिमाग आदि बदल गया है।।

बहुत बुरा तब लगता है हमें।
जब अपने हाथ जोड़ लेता है।
और वर्षो के संबंधो को वो।
एक दम तार-तार कर देते है।।

बहुत बुरा लगता है तब हमें।
जब अपने हाथ जोड़ लेते है।
और वर्षो तक साथ चलने वाले।
अपना क्यों पल्ला झाड़ लेते है।।

जीवन भर जिसको आगे किया।
आज उसने ही उसको रुला दिया।
जिसका दर्द उसके चेहरे पर।
आज कल बहुत झलक रहा है।।

इस तरह की घटनाओं के कारण।
दिल दिमाग पर असर हो रहा है।
और अपनापन उसका छिड़ हो गया है।
जिसे न किसी से कह रहा न सुन रहा है।।

अब में और तब में बहुत अंतर होता है।
अपने पराये का खेल भी ऐसे ही होता है।
जैसे कल का आज से मिलन नही होता।
वैसे ही इंसान का इंसान दुश्मन होता है।।

अकेलापन : गीत

अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।
मेरा घर सूना सूना है, चले आओ।
अकेले है हम अकेले हो तुम चले आओ।।

ये तन्हाई मेरी और बढ़ती मेरी उम्र।
ये ढलते हुए दिन और आती हुई रातें।
मुझे अब इनसे बहुत लगता है डर।
अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।
मेरा घर सूना सूना है, चले आओ।।

तुम्हें हम देखते है क्या तुम भी ढूँढते हो।
ये हैं दिल जो मेरा कही लगता नही है।
इसलिए तेरी मुझे याद आती रहती।
अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।
मेरा घर सूना सूना है, चले आओ।।

मुझे क्यों छोड़ दिये तुम
क्या मैंने की खता कुछ।
तुझे मालूम नहीं क्या
तेरे बिना हम अधूरे।
मुझे तेरी जरूरत तुझे क्या नही जरूरत।
अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।
मेरा घर सूना सूना है, चले आओ।।

अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।
मेरा घर सूना सूना है, चले आओ।
अकेले हैं हम अकेले हो तुम चले आओ।।

जरूरी है

तेरे होने न होने का
मुझे एहसास होता है।
तेरे दिलमें मेरा होना
कोई इतफाक है क्या।
दिलों की बात का तुझे
कोई आभास है प्रिये।
हमारा साथ बस होना
खुशी का राज है क्या।।

मिले है दिल से दिल
इसलिए तो दिल खुश है।
तेरे मेरे दिलों का भी
मुझे आभास बहुत है।
इसलिए तो तुझे लेकर
सदा ही साथ चलते है।
मोहब्बत की नाव को
चलाते है हम सागर में।।

प्यार मोहब्बत करना भी
दिलों की आस होती है।
दिलों की फरयादों का
जिसमें एहसास होता है।
हमारी सांसो का सांसो से
मिलन भी खास होता है।
इसलिए तो जीवन में
मोहब्बत बहुत जरूरी है।।

इंतजार

आज मन उदास है।
दिलकी कुछ फरयाद है।
कल रहे न रहे हम।
इसलिए आज को जीते है।।
और तेरा इंतजार करते है।।

कुछ तो है तुम में।
जो मुझे याद आते हो।
दिन-रात तुम दिखते हो।
और प्यार को बढ़ते हो।
इसलिए तेरा इंतजार करते है।।

संसारिक रिश्ते को निभाते हो।
कभी हँसकर तो कभी रोकर।
अपने पास तुम बुलाते हो।
और रिश्ते को निभाते हो।
इसलिए तेरा इंतजार करते है।।

जितना जीवन बीता गया।
उतने को ही याद करते है।
कल कल में न फंसकर हम।
आज का लूफ़्ट उठाते है।
इसलिए तेरा इंतजार करते है।।

मां बाप के भाव बेटी के प्रति : गीत

जिनको है बेटियां,
वो ये कहते है।
परियो के देश में,
हम तो रहते है।
घर को, मंदिर
का नाम देते है।
जिनको है बेटियां
वो ये कहते है।।

हंसती है तो बेटियां
तो मोती झरते है।
चलती है लहरके
तो फूल खिलते है।
पलके उठती तो
उजाले होते है।
परियो के देश में,
हम तो रहते है।
घर को, मंदिर,
का नाम देते है।
जिनको है बेटियां,
वो ये कहते है।।

लाखो फरयादो में से,
होती एक बेटी कबूल।
बेटी तुलसी आँगन
की न है वो बबूल।
उनके कुम कुम कदम,
शुभ फल देते है।
परियो के देश में ,
हम तो रहते है।
घर को मंदिर
का नाम देते है।
जिनको है बेटियां ,
वो ये कहते है।।

बेटियो से होते है दो
आँगन खुश हाल।
मात पिता की शोभा ,
सुसराल का श्रृंगार।
बड़े नसीब वाले,
होते है वो लोग,
जिनको बेटियो का
सुख मिलता है।
घरको, मंदिर
का नाम देते है।
जिनको है बेटियां ,
उनका कहना है।।

जिनको है बेटियां ,
वो ये कहते है।
परियो के देश में,
वो तो रहते है।
घरको मंदिर,
का नाम देते है।
जिनको है बेटियां ,
वो ये कहते है।।

स्वयं का जन्म दिन

खुदका जन्म दिन मनाना रहा हूँ।
देखो दुनियां वालो तुम।
कितना हर्षित और प्रफुल्लित हूँ।
अपने इस जन्म दिन पर मैं।।

एक वर्ष और कम हो गया।
अपनी आयु के वर्षो में से।
फिर भी देखो कितना खुश हूँ।
अपनी घटती हुई उम्र पर मैं।।

खुश नसीब मानता हूँ खुदको।
इसलिए आया दुनियां में।
कर्मो के बंधन के कारण ही।
पाया है मैंने मानव जन्म।।

खुदके जन्म को सार्थक करना है।
इसलिए मैं लिखता और गाता हूँ ।
और दुनियां की कु-रीतियों को।
मिटाने का प्रयास निरंतर करता हूँ।।

करना है मुझको दुनियां में।
मानव सेवा वाले काम।
जिससे खुदको जिंदा रख सकूँ।
दुनियां के इस मान चित्र पर।।

तुम हो

जिंदगी अब तो मेरी,
तुम्हारी हो गई है।
अब प्यार दो या,
दो कुछ और तुम।।

सफर वहीं तक है,
जहाँ तक तुम हो।
नजर वहीं तक है,
जहाँ तक तुम हो।।

हजारों फूल देखे हैं,
इस गुलशन में मगर।
खुशबू वहीं तक है,
जहाँ तक तुम हो..।।

बहुत मिले सफर में,
हमें मुसाफिर तो।
पर हमसफर तो,
तुम ही मिले हो।।

लोग मिलते रहे,
और चलते रहे।
पर साथ चलने को,
तुम ही मिले हो।।

आते जाते है लोग,
मिलने और मिलाने।
पर अपना बनकर,
तुम ही आये हो।।

उथल पुथल जब,
मचा हुआ था।
तब तुमने आकर,
मुझे थमा लिया था।।

दुख सुख जीवन में,
आते जाते है।
पर साथ कैसे निभाना,
ये तो तुमसे सिखा।।

पग पग पर कांटे,
लाख बिछे थे।
पर उनको कैसे,
तुमने हटा दिये।।

तकदीर बदल जाती है,
किसी के नसीब से।
पर मेरा नसीब तो,
सिर्फ तुम हो प्रिये।।

यादों का सहारा

याद तन्हाईयों में आते हो।
तो कभी दिलमें शमाते हो।
सच कहे तो मुझे भाते हो।
फिर भी मुझे रुलाते हो।।

प्यार की डोर नाजुक है।
दिलकी आवाज भी भावुक है।
जो हर समय महसूस कराती है।
इसलिए ही मिलने बुलाती हो।।

रिश्ते नातों से बढ़कर प्यार होता है।
इंसानी जज्बातों से प्यार होता है।
आना जाना तो लगा रहता है।
पर तेरा सदा इंतजार रहता है।।

मौसम का महत्व

हवाएं गर्म होकर के
चली जो जा रही है।
दवाब इसका मौसम पर
बढ़ाये जा रहा है।
कही गर्मी है तो
कही है नरमी देखो।
बदलते मौसम का भी
निराला सा अंदाज देखो।।

मौसम का पृथ्वी पर
बड़ा ही महत्व होता है।
मौसम से ही जीवन में
बहुत आनंद आता है।
कही पृथ्वी गर्म ठंडी
कही होती है हरीभरी।
इसलिए तो जीवन में
मौसम का बदलना जरूरी है।।

कभी पड़ती है मौसम की मार
तो मचता है हा हा कार।
तबाही का तब दृश्य
बहुत भयानक होता है।
छलकते बनते है आँसू
सभी की आँखों से तब।
दर्द की तब पराकाष्ठा का
कोई मापदंड नही होता।।

मौसम का बदलना लोगों
अच्छा और बुरा होता है।
लाभ हानि जैसा ही
इसका फल मिलता है।
अगर सच कहे हम तो
मौसम का बदलना जरूरी है।
तभी संसारिक जीवन का
चलना संभव होता है।।

बाल दिवस

पूर्व में किये थे अच्छे कर्म
तभी तो पाया मनुष्य जन्म।
क्या मनुष्य जन्म मिलना ही
इस दुनियाँ में काफी है ?
सोचो समझो और करो विचार
फिर निभाओं अपना दायित्व यार।
क्या हम दे पा रहे है
अपने बच्चों को अच्छे संस्कार।।

पेटकी भूख मासूम बच्चों से
क्या कुछ नहीं करवाती है।
जब खिलौनो से खेलने के दिन थे
तब उनसे खिलौने बिकवाती है।
मैदान में खेलने कूदने के दिनों में
उनसे मैदान साफ करवाती है।
स्वर्थी इंसान अपने सुख के लिए
मासूमो के बचपन को छीन लेती है।।

होना था शिक्षा के मंदिर में उन्हें
तब मंदिर के बाहर फूलमाला बेच रहा।
औरो की दुआओ के लिए खुदका
भविष्य ईश्वर के समाने मिटा रहा।
होनी थी जब किताबे हाथ में तब
भूख मिटाने के लिए किताबे बेच रहा।
और देश के निर्माताओं को सच का
दर्पण बिना शिक्षित होकर दिखा रहा।।

शर्म आती नहीं देशकी सरकार को
बालनिषेध कानून बनाना काफी हैं।
बच्चों को शिक्षित करने के लिए
भरपेट खाना के साथ शिक्षा दिलाये।
और बाल मजदूरी से उन्हें बचाये
और उनका बचपन उन्हें लौटाये।
और इस नेक काम में हम आप
मिलकर अपनी भूमिका निभाये।।

नये पुराने का मेल जोल

न हम बदले न तुम बदले
बदला तो जमाना है।
जमाने के सुर ताल
के अनुसार चलना है।
तो जमाने की रफ्तार को
तुम्हें पकड़ना पड़ेगा।
उसी में फिर तुमको
स्वयं को ढलना पड़ेगा।।

तुम्हारे जीने का अंदाज
वो ही पुराने वाला है।
नये जमाने से तुम्हें
नहीं है कोई समस्या।
फिर क्यों तुम पुराने को
सजाये बैठे हो दिलमें।
और नये लोगों को भी
सीख देते हो पुरानी।।

हम अपनी सभ्यता और
संस्कारों को नहीं भूले।
नये युग वालों को भी
शामिल करते है पुराने में।
यही अदा तुम्हारी तो
सभी खूब भाती है।
इसलिए तुम्हें हम सब
खूब चाहते है।।

अमर कर दो

खुशी की उम्मीदें लेकर
चले थे सेर करने को।
चिरागे दिलमें मोहब्बत के
जलाने को हम निकले।
अगर मोहब्बत सच्ची है
तो चिराग जल उठेगें।
मोहब्बत के दीपक फिर
दिल में जल उठेगें।।

तजुर्बा अब तक का मेरा
कहता है कुछ नया नया।
जो दिलमें बसते है लम्हें
खुशी उनसे मिलती है।
तमन्नाएँ है जो दिल में
उन्हें तुम पूरा कर लो।
बुझा दो आग दिलकी तुम
मिलकर अपने मेहबूब से।।

कभी खाई थी कसम
तुम्हें बहुत प्यार करेंगे।
अपने दिल के अंदर
तुम्हें हम बैठा के रहेंगे।
मिला है अब जो मौका
उसे तुम पूरा कर लो।
मोहब्बत तुम अपनी अब
जामाने में अमर कर दो।।

बेवफा मत कहना

गुजरी हुई मोहब्बत,
आती नहीं दुबारा।
कहता है दिल हमारा।।

थी खुशियाँ कुछ दिनों की,
और गम है उम्र भर का।
तन्हाइयों में रहकर,
रोयेंगे उम्र भर अब।
कुछ दिन गुजारे थे
इक साथ रहकर हमने।।
कहता है दिल हमारा
गुजरी हुई मोहब्बत,
आती नहीं दुबारा।
कहता है दिल हमारा।।

थे मुझसे तुम्हें मोहब्बत,
तो बेवफा न कहना मुझको।
हालात ऐसे हो गए थे,
की छोड़ना तुम्हें पड़ा था।
पर हर मेरी सांस पर,
लिखा था नाम तुम्हारा।।
कहता है दिल हमारा।
गुजरी हुई मोहब्बत,
आती नहीं दुबारा।
कहता है दिल हमारा।।

मेरे लिए ये जीना,
था मरने ही जैसा।
निकलेगा अब जनाजा
मेरी बारात बन के।
अच्छा है जो तुमने,
देखा नही ये नजारा।
कहता है दिल हमारा।
गुजरी हुई मोहब्बत,
आती नहीं दुबारा।
कहता है दिल हमारा।।

तुम मेरी हो

चाँदनी रात में खिल उठा दिल मेरा।
आज फिर से आ के बाग में।
अपने मेहबूब की यादों में।
खो गये आ के फिर हम यहाँ।।

हम तुम्हें याद करते रहते है
तुम हमें याद करते हो की नही।
दिलकी गैहराइयों में समाई हो तुम।
तुमसे बड़कर और कोई है ही नही।
चाँदनी रात में…….।।

तुमसे मेरा बहुत गैहरा नाता जो है।
दो दिल एक जान होते थे हम।
डर गये उस समय हम जामने से।
इसलिए हम एक हो पाए नही।
अब हाल दोनों का एक जैसा है।
न तुम सुखी हो न हम है सुखी।।
चाँदनी रात में……….।।

प्यार मोहब्बत कोई खेल होता नही।
दिलसे दिलका मिलन कोई खेल नही।
है मेरे बहुत आरमान दिल के सुनो।
मौत आने से पहले एक बार मिलो।
है अगर तुमको मुझसे प्यार सच्चा।
तो आकर के तुम बस मिलो।।

चाँदनी रात में खिल उठा दिल मेरा।
आज फिर से आ के बाग में।
अपने मेहबूब की यादों में।
खो गये आ के फिर हम यहाँ।।

रिश्तों का मोल

पुराने रिश्तें नातो का
नये से मेल नही होता।
पुरानी दोस्ती का भी
नये से मोल नही होता।
नये नये षडयंत्रों से
जीवन में बचना पड़ेगा।
नये और पुराने रिश्तों का
फर्क समझना पड़ेगा।।

सिलाई करने वाला यंत्र
पुराना हो या हो नया।
सिलाई करने के लिए
धागा तो लेना पड़ेगा।
अगर फट जाएँ कपड़ा
रफू तो करना पड़ेगा।
तभी पहनने लायक
शायद वो बन पायेगा।।

सिलाई पुरानी हो या नई
धागा तो निश्चित टूटेगा।
इसी तरह से रिश्तों का
कोई धागा तो टूटेगा।
फिर टूटे हुए धागे को
लगाना गाँठ पड़ेगा।
इसी तरह से जीवन की
डोरी को बंधना पड़ेगा।।

राम का नाम

राम कृष्ण हनुमान का
करते है हम गुणगान।
नित्य दिन मन्दिर जा के
भजे राम का नाम।
पर उनके कथनों का
नहीं करे पालन।
झूठे दिखावा में हम
सदा रहे बस मस्त।।

रोज जपे हम राम को
राम राम कहकर।
धारण करे हम वस्त्र को
राम राम लिखकर।
ऐसा करने से क्या
मिल जायेंगे हमें राम।
जीवन की सत्यता को
कुछ तो समझो तुम।।

राम कृष्ण हनुमान को
मन में बसाओं तुम।
दया धर्म की बातों को
दिलसे लगाओं तुम।
जीवन बदलेगा हे मानव
एक दिन तेरा।
कर्म प्रधान जीवन है
जो निश्चित बदलेगा।।

राम कृष्ण हनुमान का
करते है हम गुणगान।
नित्य दिन मन्दिर जा के
भजे राम का नाम,
भजे राम का नाम।।

प्रभु के अवतार

एक राज की हम सबको
बताते है एक बात।
जो राम है वो श्याम को
रोज याद करते है।
सीताराम और राधाकृष्ण जो है
दोनों ही एक के है अवतार।
इसलिए ही दोनों के युगो का
होता है संसार में गुणगान।।

लीलाएँ सब रची विष्णुजी ने
वरदान दिये थे सबको प्रभुजी ने।
पाकर के वो वरदान सब
बन गये थे अहंकारी जब।
फिर अंत उनका करने को
नारायण ने लिया अवतार।
फिर किया उन सब का
राम-कृष्ण ने देखो संहार।।

जब-जब आया था संकट
देखो इस संसार पर।
तब-तब नारायण ने फिर
लिये पृथ्वी पर अवतार।
और स्थापित किया उन्होंने
फिर अमन शांति का राज्य।
जिसे लोग कहने लगे थे की
अब आ गया राम राज्य,
अब आ गया राम राज्य।।

बेटी की याद

बेटी की याद दिलसे निकलती ही नही।
जिस दिन से ब्याह किया हम लोगों तेरा।
उस दिन से ही घर सुना-सुना हो गया मेरा।
कितना और तुम मुझे रुलाओगें पापाजी,
रुलाओगें पापाजी।
मैं भी कहाँ भूल पाई हूँ तुम्हें।।

जिस रोज घर में आई थी लक्ष्मी बनकर।
घर द्वार और आंगन तब खिल उठा था।
तेरी किलकारीयों से गूंज उठा था तब घर।
वो याद मेरे दिलसे बेटी निकलती ही नहीं,
निकलती ही नहीं।
बस याद तेरी आते रहती है।।

अब हाल मेरा बेटी बहुत हो गया बुरा।
तेरी माँ के जाने से हो गया हूँ अकेला।
बेटा और बहू तो विदेश में रहने लगे है।
बस बातचीत उनसे होती है फोन पे,
होती है फोन पे।।
मैं अब चार दिवारी में बंद होकर रह गया।।

बस या ही अब मेरे साथ रहती है।
सुखदुख के पल को मैं याद करता हूँ।
तेरी कमी मुझे सबसे ज्यादा खलती है।
दफ्तर से घर आते ही सुनता था मैं तेरी,
सुनता था मैं तेरी।
अब याद बहुत आती हो बेटी तुम।।

भाई दूज

रिश्तों में सबसे प्यारा है
भाई दूज त्यौहार हमारा।
बना रहे स्नेह प्यार,
भाई-बहिन में सदा सदा।
भाई-दूज के कारण बहिन
मिलने आती भाई से।
और याद करा देती है
भाई बहिन के रिश्तों को।।

संबंध हमेशा बना रहे,
डोर रिश्तों की बंधे रहे।
बना रहे अपास में प्यार
मायके के सब जनो से।
इन्हीं सबको जोड़ने तो
आता है भाई-दूज का त्योहार।
मिलना मिलाप हो जाता है
हर साल में देखो एक बार।
हर साल में देखो एक बार।।

कैसे रक्षा की थी कृष्ण ने
अपनी बहिन द्रोपती की।
सबकी आंखों में वो दृश्य
झलकता है आज भी।
धागे के बंध से ही कृष्ण
बहिन रक्षा को आये थे।
और दिया वचन था रक्षा का,
तो बहिन प्रति निभाये थे।।

भाई बहिन के स्नेह प्यार का
कैसा है ये अनूठा बंध।
जिसको के कहते है लोग
भाई दूज भाई दूज भाई दूज।।

जीवन उलझा सुलझा हुआ

उलझी किस्मत सुलझी जिंदगी
किसको क्या दे सकती है।
जीने मरने में भी तो
किस्मत साथ देती है।
पर करना तुझे पड़ेगा
इसके लिए परिश्रम।
छोड़ दे तू चिंता
फल मेहनत का मिलेगा।।

खुदके कर्मों से बढ़कर
नहीं आधार जीवन का।
लेकर संकल्प जीवन में
तुझको चलना पड़ेगा।
मिट जायेगा अंधेरा
जब तू अच्छा सोचेगा।
और इसका प्रमाण तुझे
फिर दर्पण दिखायेगा।।

सुख दुख मन की सोच है
करे विचार इस पर।
जो सोचे सिर्फ सुख को
उस पर ही दुख आये।
इसलिए कहता संजय
जो दुख को अपनाये।
वही सुख शांति यारो
इस संसार में पाये।।

दीपावली का दिन

जग मग जग मग ज्योत जले
चारो तरफ प्रकाश फैले।
देख के दृश्य ये मन मेरा
अंदर अंदर खुश होवे।
जग मग जग मग ज्योत जले….।।

दिल पर पड़े जब कोई छाया
अंदर से तब वो मचलने उठे।
और डूबने लगे फिर ख्यावों में
सपने जिस संग देख रहा।
अपनी दुनियाँ अपने ख्याव
जी रहा हूँ इसमें ही आज।
क्या कोई कर सकता मेरा
मेरी जिंदगी मेरा सबेरा।।
जग मग जग मग ज्योत जले….।।

धुनी रमा के बैठे है
और प्यार की बंशी बाजा रहे।
मन कोमल और आँखे गीली
जो दीप प्यार का जला रही।
तब चंचल मन भी मेरा
भटक रहा प्यार के सागर में।
और नाप रहा कल्पनाओं में
इस प्यार भरे सागर को।।
जग मग जग मग ज्योत जले….।।

जीना लगता है अब बेकार
सच में उनके जाने के बाद।
जब वो होती थी आसपास
तो दिल खिल उठता था ।
पर अब न दिल खिलता है
और न मन मचलता है।
बस अपनी बारी आने का
अब कर रहा इंतजार।।
जग मग जग मग ज्योत जले….।।

लक्ष्मी जी की पूजा

देखो देखो लोगों अब तुम
आ गया लक्ष्मी पूजन का दिन।
कैसे कैसे और क्यों हम सब
मनाते आ रहे दीपावली को।
अनेक मान्यता है देखो इसकी
और सब का है राज अलग।
पर हर जाति समूहदाय के लोग
दीपावली को मनाते हैं अलग अलग।

खुशियों का इजहार करने को
दीप जलाते है घर आंगन में।
देख रोशनी को जब लक्ष्मीजी
करती है प्रवेश घरों में।
क्योंकि लक्ष्मी तो चंचल है
इसलिए घूमने निकलती है रात में।
देख रोशनी और स्वच्छता को वो
तब कर जाती है प्रवेश उधर।।

इसलिए सबसे कहता हूँ
मन के भावों को करो निर्मल।
पूजा आदि की कर तैयारी
शुध्द भावों से स्मरण करो।
तेरे मन और घर में लक्ष्मीजी
फिर निश्चित प्रवेश करेंगी।।

दीपावली के शुभ अवसर पर
कुछ तो तुम अच्छा काम करो।
स्नेह प्यार और आदर देकर के
ले लो बड़े बढ़ो का आशीष तुम।
चरण वंदना करो तुम सब की
और पा लो आशीर्वाद तुम।
देकर अपना आशीष तुझे वो
धन्य स्वयं को भी मानेंगे।।

धनतेरस

चहात तो रखते है
धन की सभी जन ।
पर उस धन का वो
उपयोग नही करते।
धन आने पर बंद,
तिजोरी में करते है।
पर लक्ष्मीजी तो लोगों
चंचल होती है।
तो उन्हें कैद तुम
कैसे कर सकते हो।।

धन और विद्या में
बहुत अंतर होता है।
दोनों का मिलन भी
बहुत कम होता है।
वास जहाँ लक्ष्मीजी करती है
अभाव वहाँ सरास्वती का होता है।
बड़ा ही अजीब खेल,
उस विद्यता ने रचा है।
जहाँ दोनों का साथ
कम ही रहता है।।

विद्या से जो करते है,
धन का उपयोग।
वही पुण्यात्मा और
दानवीर कहलाते है।
इसलिए समाज में,
उच्च स्थान पाते है।
और जरूरत मंदो को,
उच्च शिक्षा दिलाते है।
और शिक्षित समाज का
निर्माण कर पाते है।।

दीपावली मनाने का उद्देश्य

चलो लेते है हम संकल्प
इस दीपावली पर कुछ।
नही चलाएंगे अब से
फटके और आतिशबाजी।
और रोकेंगे हम मिलकर
जीव हिंसा को इस बार।
करेंगे भावों को निर्मल
और पूजेंगे ईश्वर को।।

हमारे ग्रंथो में मिलता है
दीपावली का वर्णन।
मनाते क्यों है हम सब
इस त्यौहार को मिलकर।
अलग अलग मान्यताएँ है
दीपावली को मनाने की।
जैनों के चौबीसवे तीर्थंकर
गये थे इस दिन मोक्ष।।

राक्षसो का अंत करके
जब लौटे थे जानकी श्रीराम।
तो स्वागत में अयोध्यावासीयों ने
जलाये थे उस समय दीपक।
और हिंसा पर अहिंसा का
मनाया था ये दिवस।
जिसे हम सब कहते है
दीपावली का त्यौहार।।

कुछ लोगों की मान्यताएँ है
की धन की देवी लक्ष्मीजी।
कार्तिक माह में अक्सर
गमन करती रहती है।
इसलिए उन्हें बुलाने को
घरों में जलाते है दीपक।
की रोशनी देखकर देवी
करें हमारे घर में प्रवेश।।

जिसे जो जो समझना है
उसे वो ही जाने माने।
हमें तो श्रृध्दा भक्ति का
मिलता है इस दिन मौका।
इसलिए मनाते है हम
दीपावली के त्यौहार को।
और अपने अपने धर्मानुसार
बस करते है पूजा और भक्ति।।

दीप जलाओं

दीप जलाओ मिलकर सबजन।
दूर करो अंधकार को तुम।
घर में रोशनी कर लो अपने।
इस दीपावली पर सबजन।।

घर का कचड़ा साफ करो तुम।
और मनको भी तुम शुध्द करो।
जगमग कर दो गली मौहल्ले।
और रोशन कर लो अपने घरको।
खुशीयाँ भर दो दिलों में सबके।।
इस दिपावली पर सबजन।।

घर-घर जाकर खुशीयाँ बाटो
और देते जाओं बधाईयाँ तुम।
तुम्हें मिलेगा सदा ही आशीष
अपने बड़े बूढ़े और गुरुजन का।
मिलजुल कर तुम रहो सभी जन
दीपावली के इस त्यौहार पर।
तभी मिलेगी धन संपदा तुमको
इस दिपावली के अवसर पर।।

दीप जलाओ मिलकर सबजन
दूर करो अंधकार को तुम।
घर में रोशनी कर लो अपने।
इस दीपावली पर सबजन।।

फिल्मी दुनियाँ

आज फिर से मिला मुझको
एक यात्रा करने का मौका।
इस बार साथ मिले मुझको
कुछ फिल्मी दुनियाँ के लोग।
जो भोपाल जा रहे थे
किसी फिल्म सूटिंग के लिए।
जो करते है हीरो हीरोईन और
अन्यो के कपड़ो का डिजाइन ।।

बातों बातों में बताया उन्होंने
फिल्मी दुनियाँ के बारे में।
कैसे क्या क्या होता है
मुंबई की फिल्मी दुनियाँ में।
किस तरह से करते है
फिल्म बनाने की तैयारी।
कितने लोगों की होती है
इस कार्य में भागेदारी।।

छोटे बड़े और आधुनिक यंत्रों की
होती है इसमें भागेदारी।
इसी तरह से लोगों की भी
होती है इसमें जिम्मेदारी।
सबको मिलकर करना पड़ता
अपना अपना रोल अदा।
तब जाकर बन पाती है
एक मनोरंजक फिल्म ।।

शोषण भी सबका होता है
चाहे हो हीरो और हीरोइन।

नीचे से ऊपर तक का
ऊपर से नीचे तक का।
सबका यहा पर होता है
कुछ न कुछ तो शोषण।
चाहे क्यों न हो फिल्म में
वो हीरो और हीरोइन।
पर काम की खातिर सबको
सब कुछ सहना पड़ता है।।

कर्म-भूमि

बहुत सुहाना मौसम है।
देखो तुम महाराष्ट्र का।
कही है सर्दी गर्मी तो।
कही है वर्षा और ठंडी।।

जन जीवन अस्त व्यस्त हुआ है।
देखो नर-नारी पशु-पक्षी का।
इधर उधर को भाग रहे है।
अपनी अपनी सुविधा अनुसार।।

कोई खुश है कोई दुखी है।
इस मानव संसार में देखो।
सोच समझ सबकी भिन है।
इस दुनियाँ के लोगों की।।

पापी पेट की खातिर देखो।
भटक रहा है वो यहाँ वहाँ।
जहाँ मिले उसको काम-धाम।
वही बन जाती उसकी कर्म-भूमि।।

पर्यावरण को सुरक्षित रखे : गीत

कदम से कदम मिलते चलो।
देश के पर्यावरण को बचाते चलो।
राह में जो भी मिले लोग।
उन्हें पर्यावरण के बारे में बताते चलो।
कदम से कदम……..।।

अभी न बचाओगे, पर्यवरण को तो।
बहुत देर फिर हो जाएगी।
दिल से वृक्षारोपण करने का,
जज्बा तुम जगाओ।
इससे ही हरयाली आएगी,
वातावरण हो जाएगा ठंडा।
कदम से कदम मिलते चलो..…..।।

जो भी करे भारत माँ से प्यार।
उसे वृक्षारोपण खुद और
लोगो को लगाने हेतु प्रेरीत करना ।
इस संदेह को सबके दिलों में बैठते चलो ।
देश का पर्यावरण…….।।

जैसे घर के बच्चों को पालो,
इसको भी साथ में पालो।
ये वो फल है,
जो आगे चल कर देंगे,
तुम्हारे बच्चो को बहुत ठंडक।
इसलिए संजय कहता तुम सब से,
इसको दिल से अपनाते चलो।
देश के पर्यावरण को ….।।
कदम से कदम मिलाकर ….।।

हमारी वेदना

बताता हूँ सभी को आज।
इस दुनियां की परिभाषा।
जिसे सुनकर सभी जन।
बहुत हैरान हो जाते है।।

अगर मिल जाए वजह तो
बहुत मुस्कराते है हम सब।
किसी की हालत पर तब
नही करते हम कोई रहम
उड़ते है खिल्ली तब हम
जब कोई मिल जाये दुश्मन।।

जमाना आज का देखो
किसी सगे का है नही।
मिले जिसको भी मौका
लूट लेता बनकर अपना।
इसी तरह से पहले भी
होता रहता था घरों में।
पर कुछ मर्यादों के कारण
नही कुछ कहते थे वो।।

पुराने समय का देखो
अगल अंदाज होता था।
सभी एक छत के नीचे
रहते थे हिल मिलकर।
टकराते थे तब भी वर्तन
हमारे संयुक्त परिवार में।
पर घर का मुखिया तब
संभाल लेते था सबको।।

प्यार अमर है

चाँद सितारे चमक उठे है।
देखो तुम आकाश में।
रात की रानी बुला रही है।
आ जाओ तुम बाग में।।

महक उठा घर का आँगन।
रात रानी के फूलो से।
झूम रही रात की रानी
तेरे बस आ जाने से।।

कैसे अपने दिलको समझाए।
हम अब ऐसे मौहल में।
डोल रहा है इधर-उधर मन।
कैसे इसको शांत करे हम।।

रखा कदम जब से तुमने
मेरे घर के आँगन में।
काया ही बदल गई है।
देखो घर के आँगन की।

कर्ज तुम्हारा चढ़ गया है।
देखो आज से मेरे ऊपर।
कैसे इसको उतार पाऊँगा।
अपने इस मानव जीवन में।।

जन्म द्वारा लेना पडे़गा।
तेरा कर्ज उतारने को।
बनकर फिर से तेरा मेहबूब।
प्यार तुझसे करना पड़ेगा।।

करवा चौथा

करवा चौथ का ये
त्यौहार बहुत प्यारा है।
जो पत्नी पति के
आयु के लिए व्रत रखती है।
और साथ पति भी पत्नी के
साथ व्रत रखते है।
और दोनों लम्बी आयु के
के लिए पूजा करते है।।

रिश्तो का बंधन
कही छूट न जाये।
और डोर रिश्तों की
कही टूट न जाये।
रिश्ते होते है बहुत
जीवन में अनमोल।
इसलिए रिश्तो को
दिलमें सजा के रखना।।

बदल जाए परिस्थितियां
भले ही जिंदगी में।
थाम के रखना डोर
अपने रिश्तों की।
पैसा तो आता जाता है
सबके जीवन में।
पर काम आते है
विपत्तियों में रिश्ते ही।।

जीवन की डोर
बहुत नाजुक होती है।
जो किसी भी समय
टूट सकती है।
इसलिए कहता हूँ में
रिश्तो में आंनद बरसाए।
और पति पत्नी के
रिश्ते में बाहर लाये।
और एकदूजे के लिए जीकर
दम्पतिक धर्म निभाते है।।

प्यार का कर्ज

चाँद सितारे चमक रहे है।
नीले गगन में देखो तुम।
प्रीतम प्यारे को बुलाने।
महक उठा है घर आँगन।।

सहज लग रहा है हमको।
आज हमारा घर आँगन।
फूल-पत्ती और डालियाँ से
झूम उठा है घर आँगन।।

रखे कदम जब से तुमने
मेरी घर आँगन में प्रीतम।
महक उठा है मेरा जीवन
देखो अपनी आँखो से प्रीतम।।

कर्ज तुम्हारा है हम पर।
जिसको उतार न पाऊँगा।
अगले जीवन में मिलकर के।
शायद इस कर्ज उतार पाऊँगा।।

पति की आयु का व्रत

दर्द सहने की अब
आदत सी हो गई है।
प्यार किया है तो
इसे सहना पड़ेगा।
कांटो पर चलकर
मोहब्बत को पाना पड़ेगा।
बीत जायेंगे दुखभरे दिन
कांटो पर चलचल कर।
और मोहब्बत करने वाली को
समाने आना पड़ेगा।।

जब प्रेमी प्रेमिका थे
तब की बात अगल थी।
जिंदगी जीने का तबका
अंदाज भी अलग था।
अब पति पत्नी बनकर
दम्पतिक जीवन जी रहे है।
हर धार्मिक रीति रिवाज
और त्यौहारों को मान रहे है।

इसी श्रृंखला में पत्नी
करवाचौथ को समझ रही है।
और पति की लम्बी
आयु का व्रत रखकर।
पत्नी अपना धर्म
आज निभा रही है।
मानो सावित्री की याद
हमे दिला रही है।।

कितने तीज त्यौहार और व्रत
सिर्फ पत्नियाँ ही करती है।
और अपने परिवार का
सुरक्षा कवच स्वयं बनती है।
कभी ये सीता दुर्गा बनकर
अपना रूप दिखती है।
और रक्षा करने अपने घर की
पुरुषों जैसी बन जाती है।।

आने वाले करवा चौथ के पवन
त्यौहार पर सभी पाठकों को अग्रिम
बधाई और शुभकामनाएं।

आचार्यश्री विद्या सागर की महिमा

गुरु की महिमा
गुरु ही जाने।
भक्त उन्हें तो
भगवान पुकारे।
जो भी श्रध्दा
भाव से पुकारे।
दर्शन वो सब पावे।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

कितने पावन
चरण है उनके।
जहाँ जहाँ पड़ते
तीर्थ क्षैत्र वो बनते।।
ऐसे ज्ञान के सागर को।
सब श्रध्दा से
वंदन है करते।।
ऐसे आचार्यश्री की
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

क्षमा सुधा और
योगसागर जैसे।
प्रतिभाशाली शिष्य है
गुरुवर के।
चारो दिशाओं में
ये विखरे है।
धर्म प्रभावना ये
बड़ा रहे है।।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

जिन वाणी के
प्राण है गुरुवर।
ज्ञान की गंगा
बहती मुख से।
जो भी शरण
इनके है आता।
धर्म मार्ग को
वो समझ जाता।।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

बुन्देखण्ड की
जान है गुरुवर।
घर घर में
बसते है मुनिवर।
धर्म प्रभावना बहाते
शान बुन्देखण्ड की कहलाते।
मोक्ष मार्ग का
पथ दिखला कर।
आत्म कल्याण के
पथ पर चलाते।।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

कितने पशुओं की
हत्या रुकवाये।
जीव दया केंद
अनेक खुलवाये।
स्वभिलंबी बनाने को
कितने हस्तकरधा लगवाए।
इंसानों के प्राण बचाने
भाग्यादोय आदि खुलवाये।।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

शिक्षा दीक्षा के लिए
ब्रह्मचारी आश्रम और
प्रतिभा स्थली खुलवाये।
ज्ञान ध्यान पाकर के
बने तपस्वी और उच्चाधिकारी।
भ्रष्टाचार को ये
लोग मिटावे।
महावीर राज ये
फिर से बसावे।।
ऐसे आचार्यश्री की
जय जय बोलो।
मुक्ति के पथ को
खुद समझ लो।।

ज्ञान के सागर विद्या सागर

हो हो हो
मुझे क्षमा करना ,
ओ मुनिराज।
मुझे क्षमा करना ,
ओ मुनिराज।
सबसे पहले लूँगा,
आचार्य श्री का नाम।
सबसे पहले लूँगा
विद्यासागर का नाम।।

त्याग और तपस्या,
कि मूरत है वो।
निश्चय और व्यवहार,
कि सूरत है वो।
ज्ञान का इतना,
भरा है भंडार ।
जितना जी चाहे
ले जाओ तुम आज।
हो हो हो
मुझे क्षमा करना,
ओ मुनिराज।
मुझे क्षमा करना,
ओ मुनिराज।।

आगम अनुसार चलते है वो।
आगम ही उनका है आधार।
अहिंसा के वो पुजारी है।
गऊ रक्षा के हितेसी है।
करते है जहां चातुर्मास,
तीर्थ बन जाता है वो क्षैत्र।।
हो हो
मुझे क्षमा करना,
ओ मुनिराज।
मुझे क्षमा करना,
ओ मुनिराज।।

नमोऽस्तु गुरुवर
उपरोक्त भजन शरद पूर्णिमा आचार्यश्री के गुरु गुण स्मृति दिवस पर उनके चरणों में संजय जैन मुंबई के द्वारा समर्पित है।

दिवाना हूँ

बहुत प्यारी है तेरी हंसी।
जिस का में दीवाने हूँ।
मुस्कराती हो हल्का सा तुम।
फूल दिल में खिल जाते है।।

कसम खुदा की क्या बनाया है।
लगता है फुरसत में तुम्हें सजाया है।
कुछ तो किया होगा तुमने ?
तभी तो खुदा ने इतना सुंदर बनाया हैं।।

बहुत नसीब वाला होगा वो।
जिसको मिलेगा प्यार तेरा।
मैं तो कब से दिवाना हूँ तेरा।
पर तेरा मुझ को कुछ पता नहीं ।।

डरता हूँ तुझे छूने से मैं।
कही कोई दाग न लग जाये।
खुदा की ये मूरत बिगड़ न जाये।
और इल्जाम इसका हम पर न आये।।

इसलिए देखकर ही प्यार करता हूँ।
दिल की बातें दिल से करता हूँ।
क्योंकि में बेपनाह मोहब्बत करता हूँ।
पर इस जमाने से डरता हूँ।।

जैन क्या होते है

जैन के घर की रोटी,
जैन के घर की दाल।
छप्पन भोग में भी
नही ऐसा कमाल।
जैन घर का आचार।
बदल देता है विचार।।

जैन घर का पानी।
शुद्ध करें वाणी।
जैन के घर के फल और फूल।
उतार देती है जन्मों -जन्मों की घूल।।

जैन की छाया,
बदल देती है काया।
जैन के घर का रायता।
मिलती है चारों ओर से सहायता।।

जैन के घर के आम।
नई सुबह नई शाम।
जैन के घर का हलवा।
दिखाता है जलवा।।

जैन की सेवा।
मिलता है मिश्री और मेवा।
जय जिनेंद्र जैन स्नान।
चारों धाम के तीर्थ के समान।।

जैन को जो पलको पर सजाऐ।
उस का कुल सवर जाये।
जैन जो हो सवाली।
उसकी हर दिन होली रात दीवाली।।

जय-जय जैन धर्म की जय,
जय-जय जैन धर्म की जय।।

दर्शन से मिल जाता

तेरे दर पर जो आता है
वो कुछ न कुछ तो पाता है।
इसलिए तेरे दर से
कोई भूखा नहीं जाता।
सभी को अपने होने का
तू एहसास कराती है।
इसलिए बुलाबा भी
सबको तुम भेजती हो।।

सभी की किस्मत में
कहाँ है माँ तेरे दर्शन।
बड़ी सौ भाग्यशाली है
जिसे मिलते तेरे दर्शन।
बड़े आभागे है वो लोग
जो पहुँचकर भी वहाँ पर।
नहीं कर पाते तेरे दर्शन
और घर को लौट जाते।।

तेरा दर का रहा इतिहास
कोई खाली नहीं लौटा।
भले ही तेरे दर्शनों से
रहा हो बिल्कुल वंचित वो।
पर उसकी इतनी श्रध्दा ने
तुझसे कुछ तो पा लिया।
और माँ होने का तू ने भी
निभा दिया अपना फर्ज।।

दशहरे पर रावण की पुकार

रावण कहता है
एक बात मेरी सुन लो।
क्यों वर्षो से मुझे यू
जलाये जा रहे हो।
फिर भी तुम मुझे जला
नहीं प् रहे हो।
हर वर्ष जलाते जलाते
थक जाओगे।
और एक दिन खुद ही
जल जाओगे।।

मैंने सीता को हरा,
हरि के लिए।
राक्षक कुल की
मुक्ति के लिये।
मैंने प्रभु दर्शन कराये
राक्षक जाती को।
तुम तो मानव होकर भी
नहीं कर पाए।।

आज रावण से
राम डरते है।
क्योंकि आज लक्ष्मण ही
सीता को हरते है।
आज घर घर में
छुपे हुए है रावण।
आग कितने रावणो को
तुम लगाओगे।।

सीता को हरना तो
एक बहाना था।
मुझको राम हाथो से
मुक्ति पाना था।
में तो मरकर भी
राम को पा गया।
तुम तो जीकर भी
राम को न पा रहे हो।।

दोस्तों वैसे तो रावण बहुत ही ज्ञानी और वीर युध्दा था। उसकी भक्ति में बहुत ही शक्ति थी जिसके कारण ही प्रभु से वरदान उसे मिलते जाते थे। क्या आज इस कलयुग में कोई व्यक्ति ऐसा है। जो अपने आप को राम मान्यता हो या उसका चरित्र राम जैसा हो ? रावण ने तो सीता को हरके भी जबरजस्ती ……। कुछ भी नहीं किया और आज के इस युग में तो क्या हो रहा है उसे बताने की जरूरत नहीं है।

माँ पर करे विश्वास

अपनी भक्ति करने का
हे माँ तुम अधिकार दे दो।
मेरी भक्ति का मुझको
हे माँ तुम प्रसाद दे दो।
मुझे धन दौलत नहीं
हे माँ बस दर्शन दे दो।
और अपना हाथ हे माँ
मेरे सिर पर रख दो।।

बहुत दौड़ा हूँ मैं
तुम्हारे दर्शन के लिए।
मगर दर्शन नहीं मिले
मेरे अभिमान के चलते।
मगर आप तो माँ है
हम सब बच्चों की।
तो कैसे भूल सकती हो
तुम अपने बच्चों को।।

समझ आया तेरा ये
दया का भाव हे माँ।
जग जननी है तू माँ
जो सब कुछ जानती है।
फिर क्यों कष्ट देती हो
तुम अपने बच्चो को।
शायद संसार को समझाने
तुम्हीं ये खेल रचती हो।।

तेरे दर से हे माँ
कोई खाली नहीं जाता।
दुआ उसकी जो भी हो
वो पूरी तुम कर देती हो।
तभी तो भक्तगण तेरा
जपा करते है तेरा नाम।
और तुम भी माँ होने का
सदा निभाती हो फर्ज।।

माँ शारदे : गीत/ भजन

वो ज्ञान की माता है
सरस्वती नाम है उनका-२।
वो विद्या की माता है।
शारदा माता नाम उनका।
वो ज्ञान की माता है।।

हाय रे मनका पागलपन
मुझ से लिखवाता है।
क्या मुझे लिखना
क्या वो लिखवता
ये तो वो ही जाने-२।
मन में मेरे वो आकर
लिखवाते है मुझसे।।
वो ज्ञान की माता है..।।

इधर जिंदगी झूम रही है
उधर मौत खड़ी।
कोई क्या जाने कब आ जाये
मेरा बुलावा जी-२।
और क्या लिखना
मुझको रह गया है अब बाकी।
वो ज्ञान की माता है…।।

मेरे दिल और ध्यान में सदा
रहती है माता जी।
जो कुछ भी मैं लिखता और गाता
उनके कृपा दृष्टि से-२।
मैं उनके चरणो में
वंदन बराम्बार करता।
वो ज्ञान की माता है..।।

इश्क बेहिसाब हो तो

न दिल मेरा लगता है
न मन मेरा लगता है।
हुआ है जब से इश्क
सब बेकार लगता है।
इसलिए तो इश्क एक
बहुत बड़ा रोग होता है।
जिसे लग जाये वो
सदा बीमार रहता है।।

जमाने में हमने बहुत
आशिक और दीवाने देखे।
जो बस एक ही धुनी
रमाते रहते है।
न जीते है न मरते है
अपने में खोये रहते है।
और इश्क को ही
अपना मसीहा समझते है।।

डगर आसान नहीं होती
इश्क को करने वालो की।
बिछे है पग पग पर कांटे
तो चुभन सहना पड़ेगा।
और अपने इश्क पर
दाग नहीं लगाने दूँगा।
और अपने प्यार को
अमर कर जाऊंगा।।

माँ आशीर्वाद दे दो

आया हूँ हे माँ तेरी
मैं ज्योत जलाने को।
दे देना आशीर्वाद तुम
अपने हाथो से।
आया हूँ हे माँ तेरी
मैं ज्योत जलाने को।
दे देना आशीर्वाद तुम
अपने हाथो से …।।

दिलमें तुम बसे हो
मन में भी तुम सजे हो।
सपने में तुम दिखते हो
पर दर्शन नही देते हो।
श्रृध्दा और भक्ति से
पूजता हूँ मैं निस दिन।
नवरात्रि में हे माँ तुम..
इस बार दे दो दर्शन।।
आया हूँ हे माँ तेरी
मैं ज्योत जलाने को…।।

हर रंग में तुम दिखती हो
हर दिलमें तुम बसती हो।
भक्तो की भी तुम बातें
बहुत ही समझती हो।
आई है देखो नवरात्रि
इस बार खास लेकर।
इसलिए हे माँ तेरे
मैं द्वारे पर खड़ा हूँ।
अब मुझको दर्शन देना..
या खाली लौटाना देना।।
आया हूँ हे माँ तेरी
मैं ज्योत जलाने को।।

झोली पड़ी है खाली
हे माँ तेरे बच्चे की।
घर में भी है सुना-सुना
तेरे बिना अधूरा।
भरो दो नवरात्रि में
हे माँ अब मेरी झोली।
गुण गान हम करेगें ..
सात जन्मों तक तेरा।।
आया हूँ हे माँ तेरी
मैं ज्योत जलाने को।
दे देना आशीर्वाद तुम
अपने हाथो से।।

यादों का सफर

बहुत दूर है तुम्हारे घर से
हमारे घर का किनारा।
इसलिए हवा के झोके से पूँछ लेते है।
रोज हालचाल कसम से तुम्हारा।।

लोग अक्सर कहते है कि
जिन्दा रहे तो फिर मिलेंगें।
पर मेरी जान कहती है।
की निरंतर मिलते रहेंगे
तो ही जिन्दा रहेंगे।।

दर्द कितना खुश नसीब है
जिसे पा कर लोग।
अपने पराये को समझकर
दिल से याद करते है।
दौलत कितनी वदनसीब है
जिसे पाकर अक्सर लोग।
अपने और अपनो को
निश्चित भूल जाते है।।

इसलिए तो छोड़ दिया हमने।
सबको बिना वजह परेशान करना।
जब कोई अपना समझता ही नहीं।
तो उन्हें याद दिलाकर क्या करना।।

जिंदगी गुजर गई, सबको खुश करने में।
जो खुश हुए वो अपने नहीं थे।
जो अपने थे मेरी जान।
वो कभी खुश हुये ही नहीं।।

इसलिए संजय कहता है।
कर्मो से डरिये, ईश्वर से नहीं।
ईश्वर माफ़ कर देता है।
परन्तु तुम्हारे खुद के कर्म नहीं।।

अपनो खो लूट रहे
( बुंदेली गीत )

अपने बनकर देखो तुम
अपनो खो ही लूट रहे।
मान सम्मान अपना खोकर
अपना ही घर क्यों फूक रहे।।

बाँट रहे हो अपने आपखो
फिर भी गलती मनात नईयों।
देश की कमजोरीयों पर तुम
खूब ही बार करत हो।
गलत बात खो भी तुम देखो
कैसे सही बातलात हो।
अपनी गलतियों खो तुम
कैसे खूब छुपात हो।।

देश हमारो सोने जैसे
और स्वर्ग जैसे सुंदर है।
फिर भी अपनो देश छोड़कर
औरों के तुम गुणगान करत।
तनक शर्म भी आत नही तुमखो
ओइ देश की करो बुराई।
जोन देश में रहत और खाऊत
ओहि देश की करो बुराई।।

अपने और अपनो खो देखो
कैसे तुमने लूट लिया।
लूटका माल रखकर अपने
दोस्तो में ही बाँट दिया।
अमन चैन से रहने वालों के
घर में आग तुमने लगा दिया।
कैसे तुम इंसान हो और
कैसी तुम्हारी इंसानियत।।

अपने बनकर देखो तुम
अपनो खो ही लूट रहे।
मान सम्मान अपना खोकर
अपना ही घर क्यों फूक रहे।।

माँ का ध्यान करो

हे माँ जगदम्बे सुन लो
मोरी एक प्रार्थना तुम।
इस दुनिया से मोहे उठा लो
मुझे पर करो एहसान तुम।
झूठे साँच के चक्कर में देखो
कितने घर द्वारा उजड़ रहे।
फिर भी माँ तुम देखो तो
कैसे माँ बाप को छोड़ रहे।।

देख दुनिया की हालत को
हम अब तो उकता गए है।
अपने मन के भावों को
बस मन में ही दवा रहे।
कहत नहीं कुछ कोऊ से
इस दुनिया के बारे में।
अपने आपको देख रहे
और अपने मनकी सुन रहे।।

कभऊ कभऊ तो देखो माँ
हमरो मन करात है की।
छोड़ चले जाये दुनियां खो
अपने मनखो शांत करन।
अपने मन के विचारो खो
हे माँ हम तुमसे कह रहे है।
और घर-घर पीड़ा खो भी
हे माँ हम तुमसे कह रहे है।।

तनक-तनक सी बातों पे
तुम क्यों रूठ जाऊत हो।
मान मनाऊआ के चक्कर में
अपने दिल खो दुखाऊत हो।
जबकि तुम्हें मालूम है कि
हमें ये सब नहीं आऊत है।
फिर भी अपनों और हमरो
दिल खो बहुत दुखाऊत हो।।

मोरे दिलखो तो तुम समझो
और अपने दिलकी बात कहो।
खुदकी और हमरे मनकी
बातों खो तुम माँ से कह दो।
दिलकी रानी तुम हो मोरी
दिलमें ही तुम राज करो।
छोड़ माँ का ध्यान तुम
क्यों औरो पर तुम ध्यान रखो।।

मानव हूँ तो…

जाने अंजान में
हुई जो भी भूल।
माफ कर देना आप
समझ मुझे नादान।
क्योंकि मैं मानव हूँ
गलतियाँ करना स्वभाव है।
इसलिए तो मांग रहा हूँ
मन वचन काय से क्षमा।।

मानवता का पाठ
बहुत पढ़ा लिखा हूँ।
पर मानवता के पथ पर
नहीं चल सका हूँ।
सोच समझ में भी
बहुत अंतर रखता हूँ।
पर वाणी पर अपनी
अंकुश नही लगा पाया हूँ।।

बातें हम सब करते
मंचों से तो बड़ी-बड़ी।
पर अमल नही कर पाते
खुदके जीवन में कभी।
यही अंतर होता है
कहनी और करनी का।
इसलिए तो मानव का
मानव दुश्मन होता है।।

देव वंदना करता हूँ
धर्म साधना करता हूँ।
सत्य अहिंसा के पथ पर
चल नही पाता हूँ।
मोह माया में देखो
कैसे उलझ रहता हूँ।
क्योंकि मैं एक मानव हूँ
इसलिए ये सब करता हूँ।।

माँ के कितने रूप

मन मंदिर में आन विराजो
मेंहर वाली मातारानी।
दर्शन की अभिलाषा लेकर
आ पहुँच है मेंहर में।
अपने दर्शन देने हे माँ
बुला लो हमें मंदिर में।
हम तो तेरे बच्चे है
काहे घूमा रहे दुनिया में।।

कितने वर्षो से मातारानी
तुम सपने में देख रही हो।
अपनी मन मोहक छवि की
आकृति हमें दिखा रही हो।
पर साक्षात दर्शन देने को
नव रात्रि में हमें बुलाएं हो।
और भक्तो को दर्शन देकर
हमें धन्य बनाये हो।।

पग-पग पर साथ दिया
हे मातारानी तुमने अबतक।
जब-जब फूली साँसे मेरी
ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने में।
तब-तब साथ आई गई
माँ मेरी तुम बनकर।
एक पल में ही बदल गई
दर्शन पाकर किस्मत मेरी।।

धन्य हुआ मैं आज सही में
माँ तेरे रूपों को देखकर।
नौ दिनों में क्या-क्या तुम
दिखाओं इस दुनिया को।
अपने हर स्वरूप का भी
तुम दोगी विवरण सबको।
और अत्याचारी पापीयों का
विनाश हे माँ तुम कर दोगी।।

दो लालो का जन्म दिन

2 अक्टूबर का दिन,
कितना महान है।
क्योकि जन्मे इस दिन
दो भारत मां के लाल है।।

सोच अलग थी दोनों की,
पर थे समर्पित भारत के लिए।
इसलिए दिन को
हम लोग याद करते है।
और दोनों के प्रति,
श्रध्दा सुमन अर्पित करते है।
और उन्हें दिल से
आज याद करते है।।

सत्य अहिंसा के बल पर,
हमे दिलाई आज़दी।
और सत्यग्रह करके,
मजबूर कर दिया अंग्रेजो को ।
और उन्हें छोड़ना पड़ा
भारत देश को।
और मिल गई हमे आज़दी,
सत्य अहिंसा के पथ पर चलकर।।

याद करो उन छोटे
कद वाले इंसान को।
जो सोच बहुत बड़ी रखते थे।
और हर कार्य भारत के
हित मे करते थे।
तभी तो उन्होंने नारा दिया था,
जय जवान जय किसान।
ये ही है भारत की
आन मान और शान ।।

दोनों के प्रति आदर भाव रखते हुए।
हम उन्हें श्रध्दांजलि अर्पित करते है।
और भारत माँ को प्रणाम करते है।
कि ऐसे लालो को आपने,
जन्म दिया हिंदुस्तान में।।

ह्रदय से दोनों महापुरुषों को
श्रध्दा सुमन अर्पित करता हूँ।
और जन मानुष तक मैं
उनके संदेशो को पहुंचाता हूँ।।

दिल मन कहता

मन मेरा कुछ कहता है।
और दिल कुछ करता है।
देखो दोनों के बीच में।
युध्द निरंतर चलता है।।

दिलकी पीढ़ा दिल जाने
मन की बात मन मानें।
देख दोनों की हालत पर।
मानव कितना बेबस है।।

जो कुछ मैं कहता हूँ
जो कुछ तुम सुनते हो।
फिर भी दिलकी बातों पर
तुम क्यों रोज रोते हो।।

हालात ऐसे बन गये है।
देखो हमारे समाज के।
अपने ही अपनो से देखो।
कैसे और क्यों रूठ रहे।।

मान मनाऊँआ को तुम समझो।
कैसे दिल ये मचलता है।
दिलकी खुशीयों पर तुम देखो।
दिल का राज ही चलता है।।

सुलझा पायेगा

वो कुछ इस तरह कह गये
मैं आज तक सोच रहा हूँ।
उनके शब्दो का हल मैं
अब तक खोज रहा हूँ।
न ही वो मिले दुवारा मुझे
न ही उनके शब्दो का अर्थ।
इसलिए जिंदगी आज तक
मेरी उलझी पड़ी है।।

सवालों के जवाब मिलते जाये
तो जिंदगी दौड़ने लगती है।
यदि कही उलझ जाये तो
जिंदगी भी रुक जाती है।
और नये सवालों को
जन्म दे देती है।
जिनको हल करने में
हम आप लगे रहते है।।

मन बहुत चंचल होता है
अवश्यकताओं का अंत नहीं है।
इसी चक्र में इंसान हमेशा
उलझा उलझा सा रहता है।
और अपने आप में ही
खोया खोया सा रहता है।
न खुद सुखी रहता है और
न घर वालों को रहने देता है।।

यदि कर सको तुम
अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण।
तो जीवन सरल और सहज
तुम्हारा बन जायेगा।
आत्म कल्याण का भाव भी
मन के अंदर आयेगा।
और उलझी हुई जिंदगी को
खुद ही सुलझा लोगें।

जन्मों का साथ ( गीत )

जन्म जन्म का साथ है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।
अब आगे भी दो मुझे
अपना प्यार दुलार।
जन्म जन्म का……।।

जब से आये हो तुम
मेरी जीवन में।
जीवन ही बदल गया
साथ रहने से।
अब मैं क्या माँगू तुमसे
दिया है सब कुछ तुमने।
जन्म जन्म का साथी है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।।

प्रीत प्यार की परिभाषा
सिख लाई तुमने।
अपनी मोहब्बत को तुमने
दिख लाई हमको।
इसी तरह से साथ निभाना
जीवन भर अपना।
जन्म जन्म का साथी है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा।।

पहले पहले प्यार में
होता है कुछ अलग।
साथ जीने मरने की
खाते है कसमें।
जब परवान चढ़ती है
दोनों की मोहब्बत।
तब सब बदल जाता है
जीवन दोनों का।।

जन्म जन्म का साथी है,
हमारा तुम्हारा तुम्हारा हमारा…..।।

नंद-देवर और भौजाई

नंद भौजाई और देवर भाभी का
रिश्ता बहुत अनोखा होता है।
जब ये आपास में घुल-मिल जाये,
तो कोई कुछ नहीं कहा सकता।
क्योंकि नंद बन जाती है बहिना,
और देवर बन जाता है भाई।
फिर किसकी है क्या है मजाल
जो भाभी को कुछ कहा जाये।।

नंद देवर जब हो जाते है अपने।
तो भाभी को मिल जाता है साहस।
स्नेह प्यार से इनके निभते
फिर अपास में सारे रिश्ते।
होये परेशानी यदि भाभी को कोई,
तो मिलकर कर देते ये सब हल।
और यदि पड़े जरूरत नंद देवर को,
तो भाभी बन जाती इनकी ढाल।
इसी तरह से चलता रहता
इन लोगों का प्यार रिश्ता।।
बड़ा अनोखा होता इनका रिश्ता,
जो घर-परिवार में भर देता खुशियाँ।।

आई पराये घर से वो,
बनकर बहू घर की।
स्नेह प्यार से जीत लिया,
घर-परिवार वालों का दिल।
अब तुम्हीं बतलाओं लोगों,
नारी होती कितनी सम।
सब कुछ कर लेती
वो अपने अनुरूप।
जब साथ खड़े हो जाये
नंद देवर और भौजाई।।

यात्रा का आनंद

सफर में आनंद आता है।
जब एक जैसे मिल जाए।
पता ही नहीं पड़ता है।
कब मंजिल पर पहुँच गए।

लोगों की बातें हमें
बहुत कुछ सिखाती है।
जो जिंदगी में हमारे
बहुत ही काम आती है।
कहने को सभी लोग
हमें अंजान लगते है।
पर कुछ ही समय में
अपने से लगने लगते है।।

उदासी और मायूसी
झलती है जिन चेहरे पर।
जो लोगों की बातों से
जल्दी ही दूर होती है।
फिर देखते ही देखते
वो हँसमुख हो जाते है।
और अपने होने का भी
वहाँ एहसास कराते है।।

इस तरह से सफर हमारा
हँसी खुशी से कट जाता है।
और थकान सफर की हमें
महसूस नहीं होती है।
सभी का साथ पाकर
बहुत ही अच्छा लगता है।
और लोगों से अंजानो की
परिभाषा समझ लेते है।।

कैसे जी रहा हूँ

मेरे होने का क्या तुझे एहसास है।
तेरी जिंदगी में मेरा क्या बास है।
होकर अलग भी क्या एहसास है।
तेरी-मेरी जिंदगी का यही राज है।।

तेरी मोहब्बत से जिंदगी चल रही है।
तेरे बिना ये जिंदगी मेरी अधूरी है।
दूर से भी तुम मोहब्बत करते हो।
इसलिए दिलकी तन्हाइयां दूर करते हो।।

बहुत सहारा है तेरा मेरे जीवन में।
वरना कब का मैं निकल गया होता।
अधूरी जिंदगी और अधूरे मन से।
क्या मैं अपनी जिंदगी जी पाता।।

खोज रहा खुदको

मैं खुद को ही खोज रहा।
अपने खुद के अंदर।
पर वो नहीं मिल रहा।
मुझको खुद के अंदर।।

कैसे मैं खोजू खुदको।
कोई बताओ मुझको।
क्या मेरा अस्तित्व है।
मेरे खुद के अंदर।।

अब चिंता में डूब रहा।
मेरा कोमल हृदय जो।
बैठे सोते खोज रहा हूँ।
खुदको खुदके अंदर।।

अपने भाव को लेकर
पहुँचा प्रभु की शरण में।
देख उनकी एकांत मुद्रा को ।
खोज लिया मैंने खुदको।।

बुलाकर नही मिलते

कसम देकर बुलाती हो
पर मिलने से कतराती हो।
दिलकी धड़कनों को तुम
क्यों छुपा रही हो।
और दिलकी बातें तुम
क्यों कह नहीं रही हो।
पर मोहब्बत दिलसे और
आँखों से निभा रही हो।।

मोहब्बत दूर रहकर भी
निभाई जा सकती है ।
तमन्ना उनके दिल की
दूर से सुन सकती हो।
और उन्हें नजदीक अपने
तुम बुला सकती हो।
या बस देखकर ही तुम
मोहब्बत निभाती रही हो।।

मोहब्बत करने वाले कभी
अंजाम से नही डरते।
मोहब्बत में भावनाओं का
सदा शामाभेष होता है।
लगे चोट किसी को भी
पर दर्द दोनों को होता है।
और इससे अच्छी परिभाषा
मोहब्बत की हो नही सकती।।

गठबंधन

तेरे मेरे मिलन से
हम बहुत खुश है।
जिंदगी मानों मेरी
तेरे बहुत करीब है।
हमने चाहा था तुम्हें
इसलिए मिल गये हो।
और जिंदगी में देखो
कैसे फूल खिल गये है।।

न करते प्यार मोहब्बत तो
हम दोनों मिल नहीं पाते।
जिंदगी की हकीकत को
हम समझ नहीं पाते।
जीवन साथी भी हम
दोनों बन नहीं पाते।
और हम लोग आज
एकाकी जीवन बिताते।।

संसारिक जीवन जीने को
कोई तो हम सफर चाहिए।
जिंदगी भर साथ निभाने
हमें एक साथी चाहिए।
जो जीवन संगनी बनकर
धर्म निभाने वाली चाहिए।
और पग-पग साथ जो दे
ऐसा एक गठबंधन चाहिए।।

बेटी खुशियाँ देती है

नसीब वाले होते है
वो घर परिवार।
जहाँ जन्म लेती है बेटी।
परिवारों की जान
होती है बेटी।
घर की लक्ष्मी
होती है बेटी।
सुसराल में सीता
दुर्गा होती है बेटी।
दो कुलो की शान
होती है बेटी।।

बेटी की मोहब्बत को
कभी आजमाना नहीं।
वह फूल हैं उसे
कभी रुलाना नहीं।
पिता का तो गुमान
होती हैं बेटी।
जिन्दा होने की
पहचान होती है बेटी।
उसकी आंखे कभी
नम न होने देना।
उसकी जिन्दगी से कभी,
खुशियां कम न होने देना।।

उनगलि पकड़कर कल
जिसको चलाया था तुमने।
फिर उसको ही डोली
में बिठाया था तुमने।
बहुत छोटा सा सफ़र
होता हैं बेटी के साथ।
बहुत कम वक्त्त के लिए
वह होती हमारे पास।
असीम दुलार पाने की
हकदार है बेटी।
समझो तुम ईश्वर का
आशिर्वाद है बेटी।।

मैं ही हूँ

मानव जीवन का मैं
एक सत्य बताता हूँ।
अपने बारे में तुमको
मैं कुछ बतलाता हूँ।
हमसे भाग के देखो
कैसे मैं-मैं करता रहता हूँ।
भीड़-भाड़ में होकर भी
मैं अलग ही दिखता हूँ।।

मैं मैं का गुण-गान करके
मैं मैं करता रहता हूँ।
और अपने आगे किसी को
कुछ नही समझता हूँ।
इसलिए मानवता को मैं
कुछ समझ न पाया हूँ।
और कहनी करनी का
अब फल भुगत रहा हूँ।।

दुनिया की इस भीड़ में देखो।
हम अलग ही दिखते है।
मैं के चक्कर में रहकर।
बहुत अंहिन्कारी जो है।।

जीवन की तुम देखो नईया।
अब कौन पार लगवायेगा।
मानव जीवन के सत्य को।
अब कौन बतलायेगा।।

हाल बुरा है अब मेरा।
इस मानव दुनिया में।
था जब तक उच्चपद पर।
तो समझा नही मानव को।
मैं मैं ने मेरा जीवन को
अब मैं एकाकी जो बना दिया।।

पितृ दिवस में संकल्प ले…

पितृ दिवस चल रहे है
तो करो एक नेक काम।
लेकर पूर्वजो के नाम तुम
ले लो एक गौ माता को गोद।
और दे दो उसको अभय दान
तो सफल हो जायेंगे पितृ-दिवस।
और मिल जायेगी सच्ची शांति
उनकी आत्मा को।।

बनकर गौ माता के रक्षक,
बचायें कसाईयों से इन्हें।
लेकर एक गाय को गोद,
उसे जीवन दे सकते हो।
और जीव हत्या के इस,
खेल को रोक सकते हो।
और जीओ जीने दो को,
पुनः जिंदा हम कर सकते है।।

गौ माता के अंदर कितने,
देवी देवता बास करते है।
अनेको ग्रन्थों में इसके,
उदाहरण पढ़ने को मिलते है।
तभी तो हर जाती और,
धर्म में गौ पूजनीय है।
तो क्यों न इनकी हिंसा,
रोकने में हम भागीदार बने।।

तो आओं आगे बढ़कर,
करे संकल्प अब से हम।
नहीं काटने देंगे एक भी,
गौ-माता को अब आगे से।
इसी कार्य को करने का बीड़ा,
उठाया है दयोदय महासंघ ने।
इसमें हम सब शामिल होकर,
करे पुण्य का सृजन हम।।

जिंदगी के रंग

दास्ताने ए जिंदगी की
वक्त ने बदल दी धीरे-धीरे।
आशियाना मिटा दिया है
वक्त ने देखो धीरे-धीरे।
थी मोहब्बत जिससे हमें
वक्त ने भूला दिया धीरे-धीरे।
वक्त को हम समझ न सके
इसलिए भूला दिया धीरे धीरे।।

वक्त के चलते तुम देखो
कितने बाग उजड़ गये।
वक्त के कारण ही देखो
जिंदगी के रंग उड़ गये।
कर सके न कद्र वक्त की
इसलिए बेसहारा हो गये।
खो दिया सम्मान अपना
वक्त के चक्र में फसके।।

वक्त ने दिखा दिया
अपना प्रभाव सभी को।
पाना है ख्याति तुम्हें तो
कद्र करना सीख लो।
जिंदगी के पहलूओं को
वक्त से जोड़ना शुरू करो।
खुल जायेगी किस्मत तेरी
यदि वक्त साथ दे जायेगा।।

क्षमा वाणी ( गीत )

क्षमा भाव मन में धारण ,
कर ले ओ भोले प्राणी।
कर दे क्षमा तू सबको ,
खुश होगी जिंदगानी …. २।

नफरत के बीज बोये ,
काँटों से दिल लगाया।
सोचा न एक पल भी,
अपनों का दिल दुखाया। …२
मैं हाथ जोड़कर के,
मानू अपनी गलती।
कर दे क्षमा तू मुझको,
खुश होगी जिंदगानी।।
क्षमा भाव मन में धारण ,
कर ले ओ भोले प्राणी।
कर दे क्षमा तू सबको ,
खुश होगी जिंदगानी।

क्यों करता मेरा तेरा,
कुछ भी नहीं है तेरा।
जब नींद से तुम जागो,
समझो तभी सबेरा ….2
करके क्षमा तू सबको ,
खुश कर ले जिंदगानी।।
क्षमा भाव मन में धारण ,
कर ले ओ भोले प्राणी।

कर दे क्षमा तू सबको ,
खुश होगी जिंदगानी।
ये जिंदगी गमों की,
खुश रहना तुम सीखो।
अपनों से प्रेम करके,
अपनो का दिल जीतो। ….२
ये मूल मंत्र जीवन का,
तुम सबको ये बता दो।
करके क्षमा तू सबको,
खुश कर ले जिंदगानी।।

संजय का ये भजन ,
सब याद अब तुम रखना।
कर दे क्षमा तू सबको ,
खुश होगी जिंदगानी।।

उत्तम क्षमा
क्षमा वाणी के अवसर पर एक संदेश।
मानव अहंकार को त्याग कर सच्चे मन से अपने अंदर क्षमा का भाव बना ले, तो संसार और उसमें रहने वाले लोगों का जीवन ही बादल जायेंगा। क्योंकि क्षमा से बढ़ाकर दूसरा कोई भी त्याग धर्म नहीं हो सकता। इसलिए मैंने अपने भावों को इस गीत के द्वारा आप लोगों के सामने प्रगट किये है। आशा करता हूँ की आप लोगों को ये गीत भजन पसंद आएगा।

आशीर्वाद से

तेरा आशीष पाकर,
सब कुछ पा लिया हैं।
तेरे चरणों में हमने,
सिर को झुका दिया हैं।
तेरा आशीष पाकर …….।

आवागमन गालियाँ
न हत रुला रहे हैं।
जीवन मरण का झूला
हमको झूला रहे हैं।
आज्ञानता निंद्रा
हमको सुला रही हैं।
नजरें पड़ी जो तेरी,
मेरे पापा धूल गए हैं।
तेरा आशीष पाकर……।।

तेरे आशीष वाले बादल
जिस दिन से छा रहे हैं।
निर्दोष निसंग के पर्वत
उस दिन से गिर रहे हैं।
रहमत मिली जो तेरी,
मेरे दिन बदल गये है।
तेरी रोशनी में विद्यागुरु,
सुख शांति पा रहे हैं।।
तेरा आशीष पाकर …..।।

आज पर्युषण महापर्वराज के दसवां दिवस “उत्तम ब्रह्मचर्य किसी किसी धर्म के अवसर पर आचार्यश्री के चरणों में उपरोक्त संजय जैन मुम्बई का भजन समर्पित है।

हमसब जैन है

मेरा कर्मा तू, मेरा धर्मा तू,
मेरा जैनधर्म,सब कुछ है तू।

हर कर्म अपना करेंगे,
जैन धर्म के अनुसार।
जैनकुल में जन्म लिया है,
जैनी होने का अभिमान।
हम जीयेंगे हम मरेंगे,
जैन धर्म के अनुसार।
जैनकुल में जन्म लिया है,
जैनी होने का अभिमान।।

तू में कर्मा, तू मेरा धर्मा,
तू मेरा अभिमान है।
जैन धर्म तुम पर,
मेरा जीवन कुर्बान है।
हम जिएंगे हम मरेंगे,
जैन धर्म के अनुसार ।
जैनकुल में जन्म लिया है।
जैनी होने का अभिमान है।।

दिगम्बर, श्रेताम्बर, स्थानकवासी,
हम सब जैन है, बस हम जैन है।
जो करे पंथवाद की बाते,
वो महावीर का भक्त है ही नहीं।
हम जीएंगे हम मरेंगे,
जैन धर्म के अनुसार ।
जैनकुल में जन्म लिया है।
जैनी होने का अभिमान है।।

आज महापर्वराज पर्यूषण का नौवा दिवस उत्तम आकिंचन धर्म के उपलक्ष्य में मेरा उपरोक्त गीत भजन सभी जैन श्रावक और जैन समाज को समर्पित है।

मुंबई वालों की भावना

समयसागर जी की राह निहार के।
मुंबई वाले कब से खड़े है इंतजार में।
सब की अँखियों के नूर, सब के दिलो के सुरूर।
चाहे रहो कितनी दूर,लाना है मुंबई में ज़रूर।।
समयसागर जी की राह निहार के।
मुंबई वाले कब से खड़े है इंतजार में।

ज्ञान बरसे, दुनिया जाने।
मुंबई तरसे कोई न जाने।
दिल में लगी है मुंबई लाने।
इसलिए मुंबई वाले,आये है श्रीफल चढ़ाने।
चाहे रहो कितनी दूर,लाना है मुंबई में ज़रूर।।
समयसागर जी की राह निहार के।
मुंबई वाले कब से खड़े है इंतजार में।।

जिस दिन मुंबई को मिलेगा मौका।
ज्ञान की गंगा बहेगी यहाँ पर।
देखेगी सारी दुनिया ये चौमासा।
बस गुरुवार की हाँ का इंतजार है।
हम लोग खड़े है तेरे द्वार पर।।
समयसागर जी की राह निहार के।
मुंबई वाले कब से खड़े है इंतजार में।

सभी साधर्मप्रेमी बंधुओ को, संजय जैन, मुंबई का सदर जय जिनेन्द्र देव, आज महापर्व पर्यूषण का आठवा दिन उत्तम त्याग धर्म के उपलक्षय में उपरोक्त भजन मैंने गुरू भक्त मुंबई, कल्याण एवंम समस्त दिगम्बर जैन समाज मुंबई वालों की भावनाओं को महसूस करते हुए लिखा है।मैं आचार्य श्री समय सागर जी के चरणों में समर्पित करता हूँ।

हिन्दी मेरी माँ है

मैं हिन्दी का बेटा हूँ
हिन्दी के लिए जीत हूँ।
हिन्दी में ही लिखता हूँ
हिन्दी को ही पढ़ता हूँ।
मेरी हर एक सांस पर
हिन्दी का ही साया है।
इसलिए मैं हिन्दी पर
समर्पित करता ये जीवन।।
मैं हिंदी का ………..।।

करें हिन्दी से सही में प्यार
तो कैसे करे लिखने से इंकार।
अगर मातृभाषा है हिंदी तो
बोलने से क्यों करते हो इंकार।
हिंदी बस्ती है हिंदुस्तानीयों के
दिलकी हर धड़कनों में।
इसलिए तो प्रेम-भक्त गीत
लिखे जाते है हिंदी में।
जो हर भारतीयों का
सदा गौरव बढ़ते है।।
मै हिंदी का…….।

करो हिन्दी का प्रचार-प्रसार
तभी बन पायेगी राष्ट्रभाषा।
और भारतीयों के दिलों में
ये बस पायेगी।
चलों आज लेते हैं
हम सब एक शपथ।
की करेंगे आज से हमसब
सारा कामकाज हिंदी में।
तभी तो मातृभाषा का
उतार पाएंगे हम कर्ज।।
मैं हिंदी का……….।।

अगर सच्चे और अच्छे
हम भारतीय कहलाना है।
तो हिंदी भाषा को ही
हमें अब आगे बड़ना है।
संजय की ये रचना
समर्पित है हिंदी को।
करो उपयोग हिंदी का
तुम सब अपने जीवन में।
बहुत उपकार होगा तब
हमारी हिंदीभाषा पर।।
मैं हिंदी का बेटा हूँ
हिंदी के लिए जीता हूँ।।

गुरु भक्ति

जय जय जय जय गुरु देव ,
मुझे दर्शन दो।
अपनी शरण में तुम,
मुझको ले लो।
जय जय जय जय गुरु देव ,
मुझे दर्शन दो।।

कल रात सपने में,
मैंने तुमको देखा था।
जैसे कह रहे थे तुम,
आ जाओं मेरी शरण।
ये कैसा सपना था,
क्या सच्च हो सकता है।
यदि ये सच हो जाये,
मेरा जीवन साभर जाये।
जय जय जय जय गुरु देव ,
मुझे दर्शन दो।
अपनी शरण में तुम,
मुझको ले लो।।

हर शाम सबेरे,
संजय तुम्हें जपता है।
हर सुबह उठाते ही,
तेरी पूजा करता है।
श्रध्दा और भक्ति का,
मुझे इतना फल तो दो।
मेरे दीक्षा गुरुवार,
तेरे कर कमलो से हो।
जय जय जय जय गुरु देव ,
मुझे दर्शन दो।
अपनी शरण में तुम,
मुझको ले लो।।

गुरुदेव की चरणों मे नामोस्तु
आज महापर्व पर्यूषण राज का सातवा दिवस “उत्तम तप धर्म” पर आचार्यश्री १०८ विद्यासागर जी के चरणों में संजय जैन, मुम्बई का भजन समर्पित है।

वाणी सुनों

विद्यासागर की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।
ज्ञानसागर की दिव्य ध्वनि सुनो।
उत्तम संयम धर्म का पालन करो।
विद्यासागर की वाणी सुनो।।

आज हम सबका यह पुण्य है।
मिला है हमें मनुष्य जन्म ..।
किये पूर्व में अच्छे कर्म।
इसलिए मिला मनुष्य जन्म।
गुरुवर के मुख्य बिंदु से।
जिनवाणी का ज्ञान प्राप्त करो।।
विद्यासागर की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।

वीर प्रभुजी की एक छवि।
सदा दिखती है उनमें …. ।
वीर प्रभु के कथनों को।
साकार करने आये धरती पर।
कलयुग में मिले है हमें ।
सतयुग जैसे गुरु विद्यासागर।।
विद्यासागर की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।

सदा आगम का अनुसरण करे।
उसके अनुसार ही वो चले … ।
बाल ब्रह्मचारियों को ही।
देते है वो मुनि दीक्षा।
पहले भट्टी में उन्हें तपते है।
सोना बनाकर ही छोड़ते है।।
विद्यासागर की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।।

गुरुदेव की चरणों मे नामोस्तु आज महापर्व पर्यूषण का छठवा दिवस “उत्तम संयम धर्म” पर आचार्यश्री १०८ विद्यासागर जी के चरणों में संजय जैन, मुम्बई का भजन समर्पित है।

मोक्ष पथ को जाने

छोड़ दो मिथ्या दुनियां,
सार्थक जीवन के लिए।
इससे बड़ा सत्य कुछ,
और हो सकता नहीं।
चाहत अगर प्रभु को पाने की हो ।
तो ये मार्ग से अच्छा कुछ,
और हो सकता नहीं।।
छोड़ दो…….।।

मन में हो उमंग प्रभु को पाने की।
करना पड़ेगा कठिन तपस्या तुम्हें।
मिल जाएंगे तुमको प्रभु एक दिन।
बस सच्ची श्रध्दा से उन्हें याद करो।।
छोड़ दो……..।।

आत्म कल्याण का पथ ये ही हैं।
बस इस पर चलने की तुम कोशिश करो।
मोक्ष का द्वार तुम को मिल जाएगा।
और जीवन सफल तेरा हो जाएगा।।
छोड़ दो…….।।

पर्युषण महापार्व राज का पांचवा दिन “उत्तम सत्य धर्म” के अवसर पर संजय जैन मुम्बई का भजन आप सभी लोगो के लिए समर्पित है।

नियमित मंदिर जाए

जब भोर हुए आना,
जब शाम ढले आना।
संकेत प्रभु का,
तुम भूलना जाना,
जिनेन्द्रालाय चले आना।
जब भोर हुए आना,
जब शाम ढले आना।।

मैं पल छीन डगर बुहारूंगा,
तेरी राह निहारूंगा।
आना तुम जिनेन्द्रालाय दर्शन को ,
करना पूजा भक्ति यहां।।
जब भोर हुए आना,
जब शाम ढले आना।।

नित साँझ सबेरे मंदिर में,
पूंजा भक्ति में करता हूँ।
और करता हूँ स्वाध्य, जिनवाणी का।
आत्म शुध्दि के महापर्व पर।।
जब भोर हुए आना,
जब शाम ढ़ले आना।।

जन्म जन्म से भाव सजोये थे,
मुनि दीक्षा हम अब पाएंगे।
श्रध्दा भक्ति विनय समर्णपण का,
कुछ तो दे दो फल।
मेरी दीक्षा विद्या गुरुवर के,
हाथो से बस अब हो।
ऐसा आशीर्वाद हे मुनिवर ,
मुझे आप ये दे दो।।
जब भोर हुए आना,
जब शाम ढ़ले आना।।

श्री चन्द्रप्रभु भगवान

थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चन्द्राप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।
आरती के दियो से करो आरती।
और पावन सा कर लो ह्रदय अपना।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।

मन में उमड़ रही है ज्योत धर्म की।
उसको यूही दबाने से क्या फायदा।
प्रभु के बुलावे पर भी न जाये वहां।
ऐसे नास्तिक बनाने से क्या फायदा।।
डग मगाते कदमो से जाओगे फिर तुम।
तब तक तो बहुत देर हो जायेगा।।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चन्द्राप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।
नाव जीवन की तेरी मझधारा में पड़ी।
झूठ फरेब लोभ माया को तूने अपनाया था।
जब तुम को मिला ये मनुष्य जन्म।
क्यों न सार्थक इसे तू अब कर रहा।।
जाकर जिनेन्द्रालय में पूजा अभिषेक करो।
और अपने पाप कर्मो को तुम नष्ट करो।।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।

थाल पूजा का लेकर चले आइये।
चन्द्राप्रभु का जिनेन्द्रालय यहाँ पर बना।
आरती के दियो से करो आरती।
और पावन सा कर लो ह्रदय अपना।
थाल पूजा का लेकर चले आइये।

जय जिनेन्द्र देव की आज उत्तम आर्जव धर्म पर्युषण महापर्व का तीसरा दिन श्री 1008 चन्द्रप्रभु भगवान, कल्याण के दर्शन की भावना जगाने हेतु भजन आप सभी धर्मप्रेमी बंधुओ के लिए समर्पित है।

गुरुदेव की भक्ति

भक्ति मैं करता तेरे
साझ और सबेरे।
चरण पखारू तेरे
साझ और सबरे।
चरण पखारू तेरे
साझा और सबरे।
तेरे मंद मंद दो नैन
मेरे मनको दे रहे चैन।
तेरे मंद मंद दो नैन…।

क्या ज्ञान क्या अज्ञानी जन,
आते है निश दिन मंदिर में।
एक समान दृष्टि तेरी
पड़ती है उन सब जन पर।
पड़ती है दृष्टि तेरे उन सब पर।
तेरे कर्णना भर दो नैन
मेरे मनको दे रहे चैन।
तेरी कर्णना भरे दो नैन
मेरे मनको दे रहे चैन।।

त्याग तपस्या की
ऐसे सूरत हो।
चलते फिरते
तुम भगवान हो।
दर्शन जिसको
मिल जाये बस।
जीवन उनका धन्य होता।
जीवन उनका धन्य होता।
तेरा जिसको मिले आशीर्वाद।
उसका जीवन हो जाये कामयाब।
तेरा जिसको मिले आशीर्वाद।
उसका जीवन हो जाये कामयाब।।

ऐसे गुरुवर विद्यासागर के चरणों में
संजय करता उन्हें वंदन,
करता उन्हें शत शत वंदन।।

( पर्यूषण महापर्वराज का आज दूसरा दिन उत्तम मार्दव धर्म के उपलक्ष्य में मेरा गुरुभक्ति का भजन आप सभी को समर्पित है। )

वर्तमान के वर्धमान थे

तुम हो कलयुग के भगवान गुरु विद्यासागर।
तुम हो ज्ञान के भंडार
गुरु विद्यासागर।
हम नित्य करें गुण गान
गुरु विद्यासागर।।

बाल ब्रह्मचारी के व्रतधारी
सयंम नियम के महाव्रतधारी।
तुम हो जिनवाणी के प्राण
गुरु विद्यासागर।
हम नित्य करे गुण गान
गुरु विद्यासागर।।

दया उदय से पशु बचाते
भाग्योदय से प्राण बचाते
मेरे मातपिता भगवान
गुरु विद्यासागर ।
हम नित्य करे गुण गान
गुरु विद्यासागर।।

जैन पथ हमको चलाते
खुद आगम के अनुसार चलते।
वो सब को देते विद्या ज्ञान
गुरु विद्या सागर।
हम नित्य करे गुण गान
गुरु विद्यासागर।
तुम हो कलयुग के भगवान
गुरु विद्यासागर।
ज्ञान के सागर विद्यासागर
हम नित्य करे गुण गान
गुरु विद्या सागर।।

लाल बाग़ के राजा की महिमा

मन मोहक प्रतीमा है तेरी,
मजबूर करे लाल बाग़ आने के लिए,दर्शन के लिए ।
मन मोहक प्रतीमा है
तेरी ……….।।
हर कोई तरसता रहता है,
तेरी एक झलक दर्शन के लिए ,दर्शन के लिए ,
मन मोहक प्रतीमा है तेरी ………. ।।

तस्वीर बनाए क्या कोई।
क्या कोई करे तेरा वर्णन।
रंगो छन्दो में समाये ना,
किस तरह तेरी मन मोहिकिता, मोहिकिता।
मन मोहक प्रतीमा है तेरी ……….।
एक आस है आत्मा में मेरी।
कोई जान न सके इस भेद के लिए।
मन मोहक प्रतीमा है तेरी ,
मजबूर करे लाल बाग़ आने के लिए ,
राजा के दर्शन के लिए,
लाल बाग जाने के लिए ,
दर्शन के लिए।
मन मोहक प्रतीमा है तेरी,
मजबूर करे लाल बाग़ आने के लिए ,दर्शन के लिए ,
मन मोहक प्रतीमा है तेरी।।

क्यों बुलाती : गीत

खनकती चूड़ियाँ तेरी
हमें क्यों बुलाती है।
खनक पायल की तेरी
हमें लुभाती है।
हँसती हो जब तुम
तो दिल खिल जाता है।
और मोहब्बत करने को
ये दिल ललचाता है।।

कमर की करधौनी भी
तेरी कुछ कहती है।
जो प्यास दिलकी
बहुत बढ़ाती है।
और होठो की लाली
हँसकर लुभाती है।
फिर आँखे आँखो से
मिलाने को कहती है।।

पहनती हो जो भी
तुम रोज परिधान।
तुम्हारी खूब सूरती
और भी बढ़ाती है।
अंधेरे में भी पूनम के
चांद सी बिखर जाती हो।
और रात की रानी की
तरह महक जाते हो।।

तभी तो जवां दिलो में
मोहब्बत की आग लगाते हो।
और शरद पूर्णिमा की रात में
मेहबूब को बुलाते हो।
और अपनी मोहब्बत को
ताजमहल जैसी दिलमें शामाते हो।
और अमावस्या की रात को भी
पूर्णिमा की रात बन देते हो।।

तभी तो शरद पूर्णिमा की
गाथाएँ ग्रंथ अनेक है।
शिव पार्वती राधा कृष्ण की
महिमायें भी अनेक है।
युवा दिलो में मोहब्बत की
ज्योति जला देती है।
और एक नया आशियाना
ताज जैसा दिलमें बना देती है।।

चरणों में शीश झूका ( भजन )

तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।
गुरु चरणों में शीश झुका के तो देखो।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।
प्रभु चरणों में सीस झुका के तो देखो।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।
णमोकार मंत्र को जपके तो देखो।
तुम्हारे पाप कर्म धूल जायेंगे सारे।
ये अपने जीवन में उतार के तो देखो।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।।

निश दिन मंदिर में पूजा करो तुम।
तुम्हे शांति दिल में महसूस होगी।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।
देव दर्शन निश दिन करके तो देखो।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।।

दया और धर्म तुम करके तो देखो।
ये माया सभी यही रह जाएगी सारी।
तेरे अच्छे कर्म ही तेरे संग जायेगे।
बाकि अब यही पड़ा रह जायेगा सारा।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।
दान धर्म तुम करके तो देखो।।

गुरु और प्रभु जी शरण में तो जाओ।
संतो की वाणी जा सुनकर तो देखो।
तुम्हे धर्म चेतना का आनंद यही पर मिलेगा।
गुरु और प्रभु की सेवा कर के देखो।
तुम्हे दिल लगी भूल जाने पड़ेगी।।

प्रभु चरणों में सीस झुका के तो देखो।
आचार्यश्री के चरणों मे शीश झुका के तो देखो।।

शिक्षकों का आभार

शिक्षकों ने दिया मुझे,
बचपन से बहुत ज्ञान।
तभी तो पढ़ लिखकर,
बन पाया हूँ कुछ।
इसलिए मेरे दिलमें,
श्रध्दा के भाव रहते है।
और मात पिता जैसा
देता उन्हें सम्मान।
जो कुछ भी हूँ आज मैं,
बना उन्ही के कारण।
इसलिए उनके चरणों में,
अपना शीश झुकता हूँ।।

शिक्षा का जीवन में लोगों,
बहुत महत्त्व होता है।
जो इससे वंचित रहता है
उनका जीवन अधूरा है।
शिक्षा को न बाट सका
और न ही छिन सकता है।
जीवन का ये सबसे
अनमोल रत्न जो होता है।
धन दौलत तो जीवन में
आती जाती रहती है।
पर ज्ञान हमारा संग देता
जीवन की अंतिम सांसों तक।।

जितना तुम पूजते हो
अपने मात पिता को।
उतना ही तुम पूजो
अपने-अपने गुरुओं को।
देकर आदर दोनों को
एक तराजू में तौलो।
क्योंकि ये ही आधार स्तंम्भ है,
तेरे इस जीवन के।।
इसलिए तो हमसब मातापिता
और शिक्षक दिवस मानते है।।

मैं हूँ ” जैन “

मैं हूँ “जैन ” …।
न छुरी रखता हूँ
न पिस्तौल रखता हूँ।
“जैन” का बेटा हूँ,
दिलमें जिगर रखता हूँ।
इरादों में तेज़ धार रखता हूँ।
इस लिए हमेशा
अकेला ही निकलता हूँ।।

बंगले गाड़ी तो जैनियों की
घर-घर की कहानी है..।
तभी तो दुनिया
“जैनियों” की दिवानी है।
अरे मिट गये हम
जैनीयों को मिटाने वाले।
क्योंकि आग में तपती
जैनीयों की जवानी है।।

ये आवाज नही शेर कि दहाड़ है….।
हम खड़े हो जाये तो पहाड़ है….।
हम इतिहास के वो सुनहरे पन्ने है…।
जो भगवान महावीर ने ही चुने है…।
दिलदार और दमदार है “जैनी”।।

रण भुमि में तेज तलवार है “जैनी”।
पता नही कितनो की जान है “जैनी”।
सच्चे प्यार पर कुरबान है “जैनी”।
यारी करे तो यारों के यार है जैनी।।

दुशमन के लिये तुफान है “जैनी”।
तभी तो दुनिया कहती है
बाप रे खतरनाक है “जैनी”।
शेरों के बेटे शेर ही ज़ाने जाते है।
लाखों के बीच “जैन” पहचाने जाते है।।

मौत देखकर पीछे छुपते नही।
हम “जैन” मरने से कभी डरते नही।
हम अपने आप पर गर्व करते है।
दुशमनों को प्यार से समझाने का
जिगरा हम रखते है।।

कोई न दे हमें खुश रहने की दुआ।
तो भी कोई बात नही…।
वैसे भी हम खुशीयाँ रखते नही
बाँट दिया करते है।
क्योंकि मैं हूँ “जैन”।।

मोहब्बत अमर है

रूप तेरा देखकर, हम फिदा हो गये।
तेरी आँखों में हम, एकदम खो गये।
एक मुस्कान पर, हम घायल हुए।
और चाहत में, हम दिवाने हुये।।
रूप तेरा देखकर, हम फिदा हो गये।
तेरी आँखों में हम, एकदम खो गये।।

है मोहब्बत अगर, तुमको मुझे सनम।
दिलकी धड़कनो को, तुम महसूस करो।
एक आवाज़ दिलमें, निश्चित ही गूंजेगी।
जिसको दिलमें तुम्हें, बस सुनना है।।
रूप तेरा देखकर, हम फिदा हो गये।
तेरी आँखों में हम, एकदम खो गये।।

प्यार मोहब्बत बड़ी, नाजुक होती है।
जिस पे दिल आये, उसी से होती है।
इसमें पैसों का तो, प्रश्न है ही नही।
दो दिलों का मिलन, बस जरूरी है।।
रूप तेरा देखकर, हम फिदा हो गये।
तेरी आँखों में हम, एकदम खो गये।।

आओ मिलकर हम, प्यार मोहब्बत करें।
उम्र भर साथ, रहने का वादा करें।
भूलकर भी न होंगे, एक दूजे से अलग।
सारी दुनिया में, मोहब्बत को जिंदा रखे।।
हमनें महसूस किया, बस उतना लिखा।
अब ये पन्ना, यही मोड़ दे।।

रूप तेरा देखकर, हम फिदा हो गये।
तेरी आँखों में हम, एकदम खो गये।।

दिल क्या सोचता है

मेरे दिल कि सरहद को
पार न करना I
नाजुक है दिल मेरा
वार न करना I
खुद से बढ़कर भरोसा है
मुझे तुम पर I
इस भरोसे को तुम
बेकार न करना I

दूरियों की ना
परवाह कीजिये I
दिल जब भी पुकारे
बुला लीजिये I
कहीं दूर नहीं हैं
हम आपसे I
बस अपनी पलकों को
आँखों से मिला लीजिये lI

दिल में हो आप तो कोई
और ख़ास कैसे होगा I
यादों में आपके सिवा कोई
पास कैसे होगा I
हिचकियां केहती है आप
याद करते हो…I
पर बोलोगे नहीं तो हमें
अहसास कैसे होगा ?

आरजू होनी चाहिए किसी
को याद करने की……!
लम्हें तो अपने आप ही
मिल जाते हैं I
कौन पूछता है पिंजरे में
बंद पंछियों को I
याद वही आते है
जो उड़ जाते है…!!

चाहत अनमोल है

चाहत के मामले में
सबसे अमीर हूँ।
पैसे के मामले में
सबसे गरीब हूँ।
चाहत का वैसे पैसे
लेना-देना नही होता।
जिससे दिल मिले
उसी से प्यार होता है।।

मिलन हो जाये चाहत का
चाहाने वाले से।
तो चाहत का रंग
दिल पर चड़ने लगता है।
बड़ा अजीब किस्सा है
चाहत और दिल का।
जिसे पैसे के कारण
भूलाया नही जा सकता।।

देखकर सुंदर रूप को
पाने की चाहत होती है।
क्योंकि उसकी खूब सूरती
दिल पर छाने लगती है।
इसलिए हमारी आँखे
उसी को खोजती रहती है।
और अपनी चाहत को
पाने की कोशिश करते है।।

वक्त ने मिटा दिया

दास्ताने ए जिंदगी की
वक्त ने बदल दी धीरे-धीरे।
आशियाना मिटा दिया है
वक्त ने देखो धीरे-धीरे।
थी मोहब्बत जिससे हमें
वक्त ने भूला दिया धीरे-धीरे।
वक्त को हम समझ न सके
इसलिए भूला दिया धीरे धीरे।।

वक्त के चलते तुम देखो
कितने बाग उजड़ गये।
वक्त के कारण ही देखो
घर-संसार उजड़ गये।
कर सके न कद्र वक्त की
इसलिए बेसहारा हो गये।
खो दिया सम्मान अपना
वक्त के चक्र में फसके।।

वक्त ने दिखा दिया
अपना प्रभाव सभी को।
पाना है ख्याति तुम्हें तो
कद्र करना सीख लो।
जिंदगी के पहलूओं को
वक्त से जोड़ना शुरू करो।
खुल जायेगी किस्मत तेरी
यदि वक्त साथ दे जायेगा।।

तुम्हें पाने की चाहत

तेरे चाहाने वालो के,
किस्से बहुत मशहूर है।
तेरी एक झलक के लिए,
खड़े रहते है लाइन से।
चेहरा छुपाना दुपट्टे से
लोगों की समझ से परे है।
कैसे देख सकेंगे तुझे वो,
खुले आसमान के नीचे।।

किसी पर तो तुम्हारा,
दिल आ रहा होगा।
धड़कने दिल की तेरी,
निश्चित बड़ा रहा होगा।
पर बात दिल की तुम,
व्या कर नही पा रहे हो।
मन ही मन जिसे चाह रहे हो,
क्या चाहत उसे बता पा रहे हो।।

देखते देखते भी प्यार होता है।
पत्थर दिल भी प्यार के लिए पिघलता है।
ये कमबख्त दिल भी ऐसा होता है,
जो किसी न किसी पर तो फिसलता है।
तभी तो विधाता की बनाई जोड़ीयों का,
स्वयं की चाहत से मिलन हो जाता है।।

वक्त के कारण

दर्द दिल में लेकर
भटकता रहा जिंदगी में।
मिला न मुझे सुकून
पूरी जिंदगी में।
पहले वक्त से लड़ता था
अब वक्त मुझसे लड़ रहा है।
और जिंदगी का लुप्त
वक्त के साथ उठा रहा।।

यादों का एहसास काफी है
जिंदगी जीने के लिए।
मुद्दत से चाहत थी मेरी
तुम्हें पाने की।
पर वक्त धोखा दे गया
तुम्हें देखते देखते।
और तुम गैरों के साथ
जीने लगे हमें छोड़कर।।

मोहब्बत वक्त के
अनुसार नहीं होती।
ये तो दिलों के
मिलने से होती है।
जिस पर दिल
आ जाता है।
मोहब्बत उसे ही
हो जाती है।।

अपना भारत देश

हम सबका अपना देश है
जिसको कहते भारत हम।।

हम हिल मिलकर रहने में
विश्वास बहुत करते है।
सबके अरमानों को भी
हम साकार करते है।
देश प्रेम के भावों को
जग वालों को समझता हूँ।
और देश-प्रेम की ज्योति को
घर-घर में जलता हूँ।।

कितना प्यार कितना न्यारा
ये देश हमारा भारत है।
लोकतंत्र को मानने वाला
देश हमारा भारत है।
दुनिया को दर्पण दिखता
ये देश हमारा भारत है।
लाखों महापुरुषो और भगवानों ने
जन्म लिया है भारत में।।

राम कृष्ण तुलसी सूर आदि
भी जन्में है इस भारत में।
भक्ति संगीत का भी बड़ा
उदहारण हमारा भारत है।
दुनिया की नजरों में धर्मनिपेक्ष
देश हमारा भारत है।
इसलिए मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारे..
फैले हुये है भारत में।।

भारत के कण-कण में बसते
लाखों देवी देवता।
चारों दिशाओं में फैले है
लाखों वीर योध्दा भारत में।
भगत चंद्रशेखर मांग पांडे
दुर्गा लक्ष्मी अहिला जैसी
महिलायें जन्मी है भारत में।
इसलिए योध्दाओं का देश
कहते है हमसब भारत को।।

हम सबका अपना देश है
जिसको कहते भारत हम।।

जय हिंद जय भारत

कृष्ण अवतार

( गीत भजन )

हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।
सिर्फ एक बार मुझे चरण को छू लेने दो।
हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।।

रोज सपने में दिखते हो मुझे प्यारे कृष्ण।
कहाँ है पर है नहीं तेरा ठिकाना मेरे कृष्ण।
किस जगह की छवि मुझे रोज दिखते हो।
उस जगह पर मुझे तुम बुला लो कृष्ण।।
हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।।

अपनी आँखों से तुम देखते हो जग से।
हर किसी पर तेरे दृष्टि रहती है कृष्ण।
मेरे आँखों में भी दिव ज्योति दे दो।
ताकि मैं सुबह शाम तेरे दर्शन कर सकूँ।।
हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।।

अपनी लीलाएं दिखाकर सबको लूभाते हैं।
खेल खेल में अंत राक्षको का कर दिया।
और कंसमामा को भी संदेश देते गए।
फिर एक दिन कीड़ा के द्वारा ही कृष्ण ने।
कंस का वध करके मथुरा को मुक्त किया।।
हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।।

हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।
सिर्फ एक बार मुझे चरण को छू लेने दो।
हम तेरे दर्शन को आये है बहुत दूर से कृष्ण।।

जन्माष्टमी

कितना पवन दिन आया है।
सबके मन को बहुत भाया है।
कंस का अंत करने वाले ने,
आज जन्म जो लिया है।
जिसको कहते है जन्माष्टमी।।

काली अंधेरी रात में नारायण लेते।
देवकी की कोक से जन्म।
जिन्हें प्यार से कहते है।
कान्हा कन्हैया श्याम कृष्ण हम।।

लिया जन्म काली राती में,
तब बदल गई धरा।
और बैठा दिया मृत्युभय,
कंस के दिल दिमाग में।
भागा भागा आया जेल में,
पर ढूढ़ न पाया बालक को।
रचा खेल नारायण ने ऐसा,
जिसको भेद न पाया कंस।।

फिर लीलाएं कुछ ऐसी खेली।
मंथमुक्त हुए गोकुल के वासी।
माता यशोदा आगे पीछे भागे।
नंदजी देखे तमाशा मां बेटा का।।

सारे गांव को करते परेशान,
फिर भी सबके मन भाते है।
गोपियाँ ग्वाले और क्या गाये,
बन्सी की धुन पर थिरकते है।
और मौज मस्ती करके,
लीलाएं वो दिख लाते है।
और कंस मामा को,
सपने में बहुत सताते है।।

प्रेम भाव दिल में रखते थे,
तभी तो राधा से मिल पाए।
नन्द यशोदा भी राधा को,
पसंद बहुत किया करते थे।
गोकुल वासियों को भी,
राधा कृष्ण बहुत भाते थे।
और प्रेमी युगलों को भी,
कृष्ण राधा का प्यार भाता है।।

सभी पाठको के लिए जन्माष्टमी
की शुभ कामनाएं और बधाई।

तुम हो

जिंदगी अब तो तुम्हारी हो गई है।
अब प्यार दो या दो कुछ और।
सफर वहीं तक है जहाँ तक तुम हो।
नजर वहीं तक है जहाँ तक तुम हो।।

हजारो फूल देखे हैं
इस गुलशन में मगर।
खुशबू वहीं तक है
जहाँ तक तुम हो..।।

बहुत मिले सफर में हमें मुसाफिर।
पर हमसफर तो तुम ही मिले हो।
लोग मिलते रहे और चलते रहे।
पर साथ चलने को तुम्हीं मिले हो।।

कितने लोग आते जाते है।
मिलने और मिलाने को यहाँ।
पर अपना बनकर तो देखो।
सिर्फ मेरे जीवन में तुम आये हो।।

उथल पुथल जब मचा हुआ था।
तुमने आकर थमा लिया था।
आते जाते सुख दुख में भी।
तुमने साथ निभाना सिखा दिया।।

पग पग पर कांटे बिछे थे।
पर चलना तुमने सिखा दिया।
और जीवन के काँटों को
तुमने कैसे देखो हटा दिये।।

तकदीर बदल जाती है नसीब से,
पर मेरा नसीब तो सिर्फ तुम हो।
सच कहे अगर तुमसे प्रिये तो
मेरे जीवन का आधार तुम हो।
बस तुम हो बस तुम हो।।

हमारा आपका दर्द

मेरे दिलमें जो होता है
वो ही बात कहता हूँ।
कहकर दिलकी बातों को
सुकून बहुत मिलता है।
इसलिए इस जमाने में
मुझे कम पसंद करते है।
पर जो पसंद करते है
वो बहुत अच्छे होते है।।

मैं खुद को बदल नहीं सकता
तो जमाने को कैसे बदलूगा।
और अपनी बातों को मैं
जमाने को कैसे कहूंगा।
जबकी खुदका दिल नहीं
रहता है स्वयं के बस में।
तो औरों से क्या उम्मीदें
हम आप कर सकते है।।

बड़ा ही दर्द है लोगों
जमाने की सोच में।
जो न खुद जीते है
न औरो को जीने देता।
लगा है घाव दिल पर जो
उसे वो और खुरोंदेगे।
पर उस पर महलम वो
कभी नहीं लगाएंगे।।

द्रोपदी का कसूर भी
कुछ इसी तरह का था।
जो खुदको रोक न पाई
और जुबान से कह दिया।
और फिर किस तरह का
युध्द हुआ था उस युग में।
पूरा वंश उजड़ गया
उसके कहने भर से।।

देखो फिर हालात ऐसे ही
आज बन रहे है।
सच में हमसब कलयुग में
ही जी रहे है।
कहना सुनना अब बचा नही
प्रत्यक्ष जो देख रहे है।
क्योंकि रावण राज से भी
बत्तर हालात हो गया है।।

बदलता मौसम

बदलते हुए मौसम का
स्वभाव अलग होता है।
कही गर्मी कही सर्दी
उसके स्वभाव में आता है।
इसलिए हर किसी का
स्वभाव बदलता रहता है।
जो प्रकृति के अनुसार
सदा ही चलता रहता है।।

सभी के जीवन में देखों
बहुत बदलाव आता है।
क्या पेड़ पौधे और पक्षी
सभी बदलने लगते है।
इसी तरह से जीव-जंतु
और नर-नारी बदलते है।
जो मौसम को ही अपना
आधार मानकर जीते है।।

अगर मौसम खुश मिजाज हो
तो प्रेम उमड़ पड़ता है।
सभी को मौका मिल जाता
प्रेम मोहब्बत करने का।
घटायें कालि हो या
हो वो चाँद सी सुंदर।
लूभाति है सभी को
ये अपने-अपने अनुसार।।

मौसम का और धरा का
बड़ा ही गैहरा नाता है।
जो बदलते हुए मौसम में
दिखाई सबको पड़ता है।
इसलिए धरा और
मौसम साथ रहते है।
जिस की संरचना भी
बनाने वाले ने की है।।

भारतीय होने का गर्व

पीड़ा का समंदर तू जाने
दर्द की हर लहर तू जाने
अरे तू जाने तेरा काम
सबको राम राम राम।।

हौसले बुलंद हो अगर
तो बुलंदी को छू लेंगे।
साथ रहेगा आप सबका
तो आकाश को छू लेंगे।
और स्वयं का नाम हम
भारत में अमर कर देंगे।।

गर्व होगा सच में तुम्हें
अपने भारतीय होने पर।
जब तुम सफलता के झंडे
फहरा दोगे देश के हर कोने में।।

हम भारत वालों ने
बहुत खोकर पाया है।
अपनी मेहनत लगन के
बल बूते पर यारो।
तभी तो पत्थरो में से पानी
निकाल दिया हम लोगो ने।।

बहुत ही सुंदर और प्यारा है
देखो भारत देश हमारा
कला संस्कृति का देखों
कितना भरा है भंडार।
इसलिए तो भारत को
कला का देश कहते है।।

कितने प्यारे कितने न्यारे
नर नारी है भारत के।
मिल जुलकर कैसे रहते
देखो पूरे भारत देश में।
इसलिए मनाते रहते है
हर महोत्सव को भारत में।।

स्वर ताल संगीत के
देखो सब दिवाने है।
खूब सूरती के भी देखो
कितने लोग पूजारी है।
इसलिए मर मिटते है
भारत वाले हुस्न पर।।

हम भरतवासीयों का तो
सदा ये कहना होता है।
छोटा हों या हो बड़ा
आपस में हो प्यार बहुत।
इसलिए तो हम सब के
दिलो में रहता सद्भावना।।

जय भारत के नारों से
कैसे गूँज उठा अपना देश।
क्योंकि इसमें दिख रहा
अखंड भारत का दृश्य।
जो अपनी लोक कला
और संस्कृति को बिखर रहा।।

राम भक्त हनुमान

राम कृष्ण हनुमान की
करते सब बातें।
करे नहीं अमल पर
उनके आचरणों को।।

आये जब संकट तो
याद आये हनुमान।
हे संकट मोरचन तुम
हरो हमारे कष्ट।
मैं अर्पित करूँगा
तुम्हें घी और सिंदूर।
सुख शांति मुझे दो
मेरे पालन हार।।

बात करे जब भी
हम मर्यादाओं की।
याद आ जाते है
श्रीराम चंद्र जी।
उन जैसा कोई और
नहीं हैं मर्यादापुरूषोत्तम।
इसलिए हर नारी पूजे
उन्हें श्रध्दाभक्ति से।।

मोहब्बत होना

तुम्हें रोज देखकर के
मेरा दिल मचलने लगा।
तुम्हारा रूप देखकर के
मैं अब बहकने लगा।
मुझे शायद तुमसे अब
मोहब्बत होने लगी है।
इसलिए मेरी आँखे
तेरा इंतजार करती है।।

तुम्हारे दिल के बारे में
मुझे कुछ भी खबर नही।
मुझे अपने ही दिल की
सुनाई पड़ती है धड़कन।
तुम्हारी आँखे भी क्या
मुझे रोज देखती है ?
जैसे मैं देखता तुमको
वैसे क्या देखती मुझको।।

मोहब्बत हम भी करते है
मोहब्बत वो भी करती है।
मगर हम इस जमाने के
लोगों से बहुत डरते है।
इसलिए मोहब्बत को
कबूल कर नही पाते।
और दिलकी बातों को
हम दिलमें ही रखते है।।

मेरी आँखों में तेरी
सदा तस्वीर दिखती है।
मिलन आँखो का हो या
मिलन हो अपने दिलका।
यहाँ करबट बदलते हम
वहाँ वो सो नही पाते।
यही होता है प्यार में
जब हो जाये किसी से।।

रक्षा बंधन

रिश्तों में सबसे प्यारा,
है राखी त्यौहार हमारा।
बना रहे स्नेह प्यार,
भाई-बहिन में सदा।
राखी के कारण ही बहिना,
मिलने आती भाई से।
और याद दिला देती
रक्षा के उन वचनों को।
रक्षा के उन वचनों को।।

संबंध हमेशा बना रहे,
रिश्तों की डोर से बंधे रहे।
बना रहे अपास में प्यार
मायके के सब जनो से।
इन्ही सब को जोड़ने
आता है रक्षाबंधन।
मिलना मिलाप हो जाता
हर साल में एक बार।
हर साल में एक बार।।

कैसे रक्षा की थी कृष्ण ने
अपनी बहिन द्रोपती की।
सब की आंखों में वो
दृश्य झलकता आज भी।
धागे के बंध से ही कृष्ण
बहिन रक्षा को आये थे।
और दिया वचन रक्षा का,
बहिन प्रति निभाये थे।
तभी से रक्षा बंधन का,
हम सब त्यौहार मानाते।
हम सब त्यौहार मानाते।।

डगर बड़ी कठिन है

पग पग पर कांटे बिछे
चलना तुम्हें पड़ेगा।
दौर कठिन जीवन का
तुमको संभालना पड़ेगा।
रहकर दूर अपनो से
नजदीक पहुँचना पड़ेगा।
लक्ष्य तुम्हें जीवन का
हासिल करना पड़ेगा।।

चलते है जो कांटो पर
मंजिल उन्हें मिलती है।
दु:ख के दिन बिताकर
सुख में प्रवेश करते है।
और अपनी सफलता का तब
श्रेय मेहनत को देते है।
और सच्चाई जिंदगी की
खुद व्या करते है।।

चलाते हुए क्यों न
पावों में छाले पड़ गए हो।
और दर्द सहते हुए भी
आगे बढ़ते गये हो।
और लक्ष्य की खातिर तुम
सब कुछ सह गये हो।
इसलिए तुम जीवन की
ऊँचाइयों को छू पाये हो।।

Sanjay Jain Bina

जय जिनेंद्र
संजय जैन “बीना” मुंबई

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  • अब चली आओ

    अब चली आओ तेरी राहों में हर दिन गुजरता है,तेरी यादों में हर पल सिसकता है,दिल को समझाऊँ कैसे,अब तुम ही बताओ,अब नहीं सहा जाता, बस जल्दी से चली आओ। सपनों में आकर फिर दूर चली जाती हो,दिल की पुकार को अनसुना कर जाती हो,बेकरार दिल को अब और ना तड़पाओ,अब नहीं सहा जाता, बस…

  • दरिद्रता | Daridrata

    दरिद्रता ( Daridrata )   सुबह सबेरे तड़तड़ाहट की आवाज कानों में पड़ते ही नीद टूटी,मैं जाग पड़ा, देखा कि लोग सूप पीट पीट कर दरिद्र” भगा रहे थे घर के कोने-कोने से आंगन बाग बगीचे से, मैं समझ न पाया दरिद्र कहां है? कौन है? भागा या नहीं! दरिद्र मनुष्य खुद अपने कर्म से…

  • गांव की झोपड़ी | Gaon ki Jhopdi

    गांव की झोपड़ी ( Gaon ki jhopdi )    गांव की झोपड़ी हो गई आज बदहाल है। सूना हुआ आंगन सारा बदल गई चाल है। बहती बयार प्यारी सी किलकारी गूंजती। टूट गए तार सारे अब बदला सुर ताल है। लगता था जमघट जहां गांव के लोगों का। बुजुर्गों का दबदबा था इलाज हर रोगों…

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