कहेगा कौन | Ghazal Kahega Kaun

कहेगा कौन

( Kahega Kaun )

ग़ज़ल में क़ाफ़िया उम्दा न शेरों में रवानी है
कहेगा कौन तेरी शायरी ये ख़ानदानी है

रखी है बाँध के सिर पे वही पगड़ी पुरानी है
कहें क्या आपसे ये तो बुज़ुर्गों की निशानी है

गया बचपन सुहाना आई है रंगी जवानी ये
न जादू की छड़ी कोई न परियों की कहानी है

न दिन में चैन ही मिलता न आती नींद रातों को
बड़ी है फ़िक्र वालिद को हुई बेटी सयानी है

गए जब से फ़िराक़-ओ-मीर इस दुनिया-ए-फानी से
सुख़न में पहले सी रौनक़ न ग़ज़लों में बयानी है

बिना उसकी रज़ा के शाख़ का पत्ता नहीं हिलता
ज़मीं में देखिए हर सू ख़ुदा की हुक्मरानी है

सुख़न की हर गली में चर्चा है मीना तुम्हारा पर
मियाँ ग़ालिब की ग़ज़लों का नहीं कोई भी सानी है

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

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