Krishna diwani

सबके संग रम जाते कृष्ण

सबके संग रम जाते कृष्ण

अँखियन मिचत रोवत आवे कृष्ण,
नटखट कन्हा खूब ही भावे कृष्ण ।
माँ पुकार से जियरा हरसाये कृष्ण,
घुटुरन बकैया-बकैया मनभावे कृष्ण ।।

माटी मुंह, रज चंदन देह में लपेटे कृष्ण,
क्रीड़ा करत मित्र ब्रज वीर समेटे कृष्ण ।
मुग्ध गोपियन, मुग्ध मैया, बाबा है, कृष्ण,
पशु पक्षी मुग्ध हो हरि से लिपटे कृष्ण ।।

मामा कंस को बहुत खिझाते कृष्ण,
राधा गोपियों को बहुत रिझाते कृष्ण ।
कालीनाग को सबक सिखाते कृष्ण,
नटखट है, भोले कुमार दिखाते कृष्ण ।।

लक्ष्मी स्वामी नाना भेष बनाते कृष्ण,
पशु पक्षी सबके संग रम जाते कृष्ण ।
गोपाल स्वरुप मन को लुभाते कृष्ण,
विपदा में सर्वप्रथम याद आते कृष्ण ।।

धन्य यमुना किनारे रास रचाते कृष्ण,
गोप, गोपीका को प्रेम में फॅसाते कृष्ण ।
बावरी राधा के विश्वास को भाते कृष्ण,
गेह-गेह चोरी कर मख्खन है खाते कृष्ण ।।

गोकुल गलियों में चरण की थाप कृष्ण,
जन-जन में प्रेम सौहार्द के छांप कृष्ण ।
ब्रह्मांड के देवि देवता करते पान कृष्ण,
प्रतिभा पुकारे आठो याम कृष्ण-कृष्ण ।।

प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”
चेन्नई

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