निवातिया की शायरी | Nivatiya ki Shayari

उन्हें हम बना देंगे

भगत बगुले जो दिखते मोर उन्हें हम बना देंगे,
जो इज्ज़तदार बनते चोर उन्हें हम बना देंगे !

सियासतदार हिन्दुस्तां के हम नायाब जो ठहरे,
भलेमानस से रिश्वतखोर उन्हें हम बना देंगे !

जिसे आता न हो मुहँ खोलना कतई ज़माने में,
पिलाकर रस सुधा मुँहजोर उन्हें हम बना देंगे !

समझने दो उसे दुनिया का हिम्मतदार आदमी,
दिखाकर आईना कमज़ोर उन्हें हम बना देंगे !

जरूरत ही नहीं कुछ और करने की जरा सी भी,
रहे होंगे लोग सज्जन? चोर उन्हें हम बना देंगे !

ढिंढोरा पीटते है जो जमाखोरी के खिलाफत में,
लगाकर पिन मुनाफ़ाखोर उन्हें हम बना देंगे !

ज़रा आने तो दो संगत में साधू को हमारी भी,
पुजारी फिर ‘धरम’ का घोर उन्हें हम बना देंगे !!

प्रताड़ना

हर सुबह एक नई सजा,
हर साँस में घुटन बसी,
आँखों में डर, होंठों पर मौन,
ज़िंदगी क्यों इतनी फँसी?

शब्द बाण बनकर चुभते हैं,
चेहरे पर मुस्कान जली,
भीतर ही भीतर टूट रही हूँ,
पर बाहर अब तक पली।

न दिन चैन का कोई आता,
न रातों में नींद ठहरती,
जैसे कोई छाया पीछे,
हर पल मेरे संग चलती।

प्रताड़ना केवल घाव नहीं,
ये तो आत्मा पर चोट है,
जिस्म पे लगे हर निशान की,
एक अनकही सी स्याह बोत है।

पर अब समय है बोल उठने का,
इस चुप्पी को तोड़ने का,
हर आँसू को आवाज़ देने,
अपने हक़ को खोजने का।

मैं अब ना सहूँगी और कुछ भी,
ना डरूँगी, ना झुकूँगी,
इस अन्याय की हर दीवार को,
अब मैं खुद ही तोड़ूँगी।

हरियाली तीज – चौपाई में कविता

१.
सावन मास सुहावन लागे ।
हरियाली में मन अनुरागे ॥
नाचे धरती, गाए अंबर ।
खुशियाँ लाया तीज सुन्दर ॥

२.
मेंहदी रचती हाथ सुहानी ।
झूले पड़ते डाल पुरानी ॥
नारी सजे पिया के खातिर ।
संग बहिन की करती चित्तर ॥

३.
शिव-पार्वती की करे पूजा ।
मन से मांगे जीवन दूजा ॥
सात जनम तक साथ निभाएँ ।
ऐसी मंगल कामना लाएँ ॥

४.
चूड़ी छनके, गूँजे बांसुरि ।
सावन जैसी लगे मधुरि ॥
तीज पे नारी पूरन आशा ।
पाए पिया का सच्चा भाषा ॥

५:
मिलन की आशा मन लाए ।
साजन संग तीज मनाए ॥
नेत्र भरे, पर हर्ष समाया ।
पिया बिना भी गीत सुनाया ॥

६:
बिंदिया चमके ललाट प्यारा ।
सज्जा में है रूप निहारा ॥
आशिष दे शिव-पार्वती माता ।
सदा सुहागिन हो हर नारीता ॥

७:
घर-घर में हो गीत सुनाए ।
झूला पवन से ऊपर जाए ॥
रंग-बिरंगे वस्त्र सजाएँ ।
हर मन प्रेम सुधा बरसाए ॥

८:
सोलह शृंगारों से नारी ।
तीज मनाए प्यारी-प्यारी ॥
मंगल कामना मन लाए ।
पिया सदा संगिनी बन जाए ॥

“भीजत चुनरिया सावन मा”


(कजरी – शृंगार रस)

( धुन: पारंपरिक कजरी लय पर – धीमी-धीमी सरगम, कोमल सुरों संग)
……..

भीजत चुनरिया सावन मा,
मोरे सैंयां न आये रे…
बदरा घहरायें अँगना मा,
मोरे सैंयां न आये रे…॥

करे करेजवा हाय धड़कन तेज,
पिया बिन लागे ना कोऊ साज।
नैना जियत हैं झरना बनिके,
काहे न आये हो मोरे राज?

भीजत चुनरिया सावन मा,
मोरे सैंयां न आये रे…॥

मोर पायल बोले तुमरी बोली,
चूनर भीगे तोही की याद।
कचनार डारिन सों पुछे –
“कब अइहैं तोहार परनवा साज?”

घिर-घिर बदरिया अइलीं,
तन-मन अँगना भीज गवा।
जियरा कसक समुझावै कौन,
जब सैंया न संग लीन्ह गवा?॥

भीजत चुनरिया सावन मा,
मोरे सैंयां न आये रे…॥

“मगर तुम नहीं आये”

आसमान के आंसू बनकर,
बरसा सावन भी रह रहकर,
नयनों की जल धारा जलतर,
ह्रदय पुष्प भी गिरते झर-झर,
यादों के बादल दिल पर छाये
मगर तुम नहीं आये…………!
*
चुप चुप से दिन, उदास सी रातें,
तेरे बिन अब अधूरी हैं सब बातें।
हर मोड़ पर तेरी यादें खड़ी है,
जैसे रूह में सांस अटकी पड़ी है,
धड़कन भी अब रह-रह करहाये,
मगर तुम नहीं आये……………!!
*
भीगे पत्तों पर तेरा नाम लिखू दूँ
यह खामोशी सब तुझसे कह दूँ,
तू दूर होकर भी, पास लगता है,
हर सांस तेरा एहसास बसता है,
तुम्हे सोच सोचकर मन घबराये,
मगर तुम नहीं आये……………!!
*
कभी तू हवा बनकर छू जाता है,
कभी आ ख्वाबों में रूला जाता है,
दिल मासूम कुछ समझ न पाता है
तुझे भूलकर भी तुझे ही चाहता है,
न जाने तुमसे ये कैसी प्रीत लगाए,
मगर तुम नहीं आये……………!!
*
सावन भी आए लगे खाली-खाली
फूलों के रंग में दिखती ना लाली,
बिन तेरे भी है सब कुछ तो मगर,
लगे ज़िन्दगी में कुछ नहीं है,अगर,
नयनों की प्यास आकर न बुझाये,
मगर तुम नहीं आये……………!!
*
ये आँखे भी सूनी राहें है तकती
तेरे आने की कानफुसी करती,
भीगी चिट्ठियाँ, है ये मौन हवाएँ,
ये छत, दर-दीवारें, और छायाएँ
बिन तेरे कितना रह रह के रोये,
मगर तुम नहीं आये………….!!
*
मन के दीपक अब बुझते जाते,
सपनों के सब रंग भी मुरझाते,
तेरे बिना सब है, अधूरा लगता,
हर गीत हर पल सन्नाटा बुनता,
हर साँझ तेरे कदमों की सुनाये,
मगर तुम नहीं आये………….!!
*
अब भी उम्मीद की लौ जलती है,
तेरे लौट आने की बातें कहती है।
कभी कहीं से इक सदा जो आए,
ऐसे लगता मानो…अब तुम आये
कहो.. क्या तब तुम सच में आये…?
मगर तुम नहीं आये……………!!

अकेलेपन की आदत

(एक भावुक कविता)

चुपचाप रातों की चादर में,
कुछ ख़्वाब पुराने सिसकते हैं।
कोई आवाज़ नहीं आसपास,
बस दिल के ज़ख्म धड़कते हैं।
*
अब भीड़ में भी तन्हा हूँ,
मुस्कानें हैं, पर सच्ची नहीं।
ये जो चेहरे हैं सामने,
उनमें अपनी कोई तस्वीर नहीं।
*
धीरे-धीरे आदत हो गई है,
इस ख़ामोशी के साथ जीने की।
ना कोई शिकवा, ना कोई गिला,
बस उम्मीदें चुपचाप सीने की।
*
कभी-कभी मन चाहता है,
कोई समझे बिना कहे।
पर जब कहा, तो पाया यही,
लोग सुनते हैं, समझते नहीं।
*
अब अकेलापन अपना सा है,
जैसे कोई साया शामों का।
साथ तो देता है हर मोड़ पर,
पर जवाब नहीं देता सवालों का।

झुकी झुकी इन नजरों में

झुकी झुकी इन नजरों में छुपी हैं कई कहानियाँ,
हटे नक़ाब तो बेपर्दा हो जाएँगी सभी निशानिया !

न पूछो इन खामोश निगाहों में छुपी सच्चाई क्या है,
हर एक मंज़र में बसी है दिल की अनेक विरानियाँ।

छुपा रखा है दर्द दिल में यूं जैसे दबी कोई दास्ताँ,
कह न पाए, कोई समझ न पाए इसकी जुबानियाँ !

तेरे बिना जो बीते हैं, वो लम्हें बस सह गए हम,
अब सांसों में भी घुल गई हैं तेरी ही मेहरबानियाँ।

आईना तक पूछ बैठा क्या बात धरम इन आंखों में,
नम हैं लेकिन नज़र आती हैं उनमें हसीन रवानियाँ !!

किसी को यहां कुछ भी कहना गलत है

किसी को यहां कुछ भी कहना गलत है,
बिना बात कुछ भी तो सहना गलत है।

नज़र से जो गिर जाए, उसे क्या उठाना,
हक़ीक़त को सच से भी रहना गलत है !

जो टूटा हुआ हो, वो ताजे़ न बाँधो,
किसी सर पे फिर से ही पहना गलत है।

कभी जुल्म को चुप नहीं देखना तुम,
हमेशा गलत को भी कहना गलत है !

जो बीते हुए हैं, वो लम्हे हैं बीते,
उन्हें सोच आंसू का बहना गलत है।

“धरम” कह रहा है ये दिल से सुनो तुम,
जुड़ा जो नहीं है वो रहना गलत है।!

हुनर तुमसे सीखे कोई

इशारों पर नचाने का हुनर तुमसे सीखे कोई,
सज़ा देकर बचाने का हुनर तुमसे सीखे कोई !

नज़र से दिल चुराना हर किसी के बस की बात नहीं,
ख़ामोशी से लगाने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

न हुस्न ओ न जवानी की तुझे दरकार है कोई,
अदाओं से लुभाने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

लबों पर मुस्कराहट हो, मगर दिल में सदा ग़म हो,
ग़मों को यूँ छुपा लेने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

ज़िंदगी में ही मौत का मंज़र तूने दिखा डाला
बांहों में यूँ सुलाने का हुनर तुमसे सीखे कोई !

लगाकर दिल मुहब्बत में दिल्लगी करना तेरा
आशीकी में सताने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

जो सजधज के भी आये तो लगे तुझ-सा नहीं कोई,
नज़ाकत में रिझाने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

नज़र झुकती है जब तू सामने बेबाक आता है,
अदब से सर झुकाने का हुनर तुमसे सीखे कोई।!

कहीं तू आरज़ू मेरी, कहीं तू इम्तहाँ कोई,
‘धरम’ को भी मिटाने का हुनर तुमसे सीखे कोई।

“तेरी महफ़िल में आए लोग मेहमां खास बनकर,”

मतला:

तेरी महफ़िल में आए लोग मेहमां खास बनकर,
बढ़ा देते हैं रौनक सब जुनूं की आस बनकर।

हर एक चेहरा सजा है जैसे कोई ख़्वाब देखे,
नज़र आता है हर इक शख़्स यहां एहसास बनकर।

तेरे लहजे में कुछ ऐसा असर होता है शायद,
हर इक जुम्ला उतरता है दिलों में रस बनकर।

जहाँ जज़्बात बिकते हों सियासत की दुकानों पर,
तेरी बातें बचा लेती हैं हमको पास बनकर।

हम तो आये थे बस एक मुद्दत के बाद तन्हा,
तेरी नज़रों ने रोका हमको जैसे त्रास बनकर।

“धरम” अब इस चिराग़-ए-हयात की बात क्या करें,
बुझा हर दीप चला तेरे बिना उदास बनकर।!

दिन का पता नहीं भरोसा नहीं एक रात का,

दिन का पता नहीं भरोसा नहीं एक रात का,
बेज़ान बदन पर करे गुमान किस बात का !

किराये का जिस्म है जान पर अख्तियार नहीं
जो कुछ भी तुमने पाया सब कुछ खैरात का !

रक्त ज़रा अंश बाप का, कोख में रखा मात ने,
रूप गढ़ा भगवान ने क्यूँ हक जताए बेबात का!

मिट्टी की ये काया है, झूठी सब मोह माया है,
प्राण तो नश्वर बन्दे क्या करेगा इस गात का!

तेरा तुझ में कुछ नहीं, सब कुछ तो बेगाना है,
रौब जमाता फिरता क्यों अपनी औक़ात का !

ये धन-दौलत, शोहरत ये जर, जोरु, जमीन,
जिसे अपना कहता, असल में सब दात का !

लाख चौरासी योनियों में सबसे ख़तरनाक है,
‘धरम’ भरोसा करना नहीं तू इंसानी जात का!!

कोई चूक तो गहरी हुई होगी

यकीं- ऐ- हाल कोई चूक तो गहरी हुई होगी,
वो शायद इसलिए थोड़ा डरी सहमी हुई होगी!

कभी आए करे वो बात तो हम मान भी लेंगे
की अनजाने में ही कोई गलतफ़हमी हुई होगी !

अकेला छोड़ दो कुछ देर तो आराम करने दो,
अभी धड़कन दिल की ज़रा बहकी हुई होगी !

वो आए सामने तो पर्दा उठेगा इस हक़ीक़त से,
अगर आँखों में आंखे डालकर ठहरी हुई होगी !

मुहब्बत है उसे हमसे, या उसका ये फ़साना है,
करे इज़हार जब रमज़ान में शहरी हुई होगी!

करोगे तुम अगर दीदार उस हुस्नो परी का जब,
गला तर सूख जाएगा, सांसे लहरी हुई होगी!!

शिकायत अब करेगा भी क्यों तेरा धरम तुझसे,
ख़ुदा की भी अदालत यार अब बहरी हुई होगी!!

ग़म-ऐ-गागर पुरानी फोड़ आए हम

ग़म-ऐ-गागर पुरानी फोड़ आए हम,
गुमाँ लहरों का भी सब तोड़ आए हम!

तूफानों संग लड़ना बन गई आदत,
दिशा लहरों की यारों मोड़ आए हम!

फ़िज़ाओं ने फैलाया महकता आँचल,
गुलों ने जब पुकारा दौड़ आए हम !

डरायेगा भला कोई क्या हमको
कजा से आज रिश्ता जोड़ आए हम!

हमे अब डर नहीं लगता किसी ग़म से,
किनारे दुःख की कश्ती छोड़ आए है !!

मेरे अनुभव

बच्चा, बूढ़ा और बीमार, तीनो होते एक समान,
गुस्सा, ग़लती और ग़ुनाह, होते तीनो से अनजान,
सेवा जितनी हो सके कीजिये बनकर प्रभु के दास,
नादाँ समझकर दीजिये भरपूर प्यार और सम्मान !!

जा रहे है

नख़रे अब सनम के बढ़े जा रहे है,
बिना बात फ़बते कसे जा रहे है !

सितम का सितमगर के आलम है ऐसा,
दिनों-दिन, वो सिर पर, चढ़े जा रहे है !

बहाना हमेशा नया ढूंढकर वो,
कभी भी, कहीं भी, लड़े जा रहे है !

हक़ीक़त से नाता नहीं दूर तक पर,
फ़साने नए नित गढ़े जा रहे है !

नहीं कोई मुद्दा लड़ाई का लेकिन,
वो बेबात फिर भी अड़े जा रहे है !

शिकायत किसी से क्या अब करे हम,
बचे बाल सर के झड़े जा रहे है !

गए हार हम तो मनाते – मनाते,
‘धरम’ से मगर वो भिड़े जा रहे है !!

आएँगी बाधाएं, सफर में, आवे दो

बैरी ख़ार बोये, डगर में, बोने दो !
आएँगी बाधाएं, सफर में, आवे दो !

है मक़सद हमारा तो मंजिल को पाना,
ख़फ़ा है ज़माना, अगर, तो होने दो !

इनायत बनी बस रहे अब ख़ुदा की,
देती जो दग़ा, ये मुहब्बत, देने दो !

मनाने से ना माने, तो कोई करे क्या,
करे बे-वफाई जो कोई, करे दो !

तपस में मुहब्बत की मन रम गया है,
लगी ठेस दिल को, जरा सा रोने दो !

जगाना अभी से नहीं ठीक उसको,
वो मुश्किल से खोया, यादो में खोने दो !

‘धरम’ थक गया ज़िन्दगी के सफ़र से,
ज़रा चैन की नींद, अब तो सोने दो !!

जीजा से फूफा हो जाना

जीजा निधि खर्चते-खर्चते जब कोई इंसान बूढ़ा हो जाता है,
भविष्य में रिटायर्ड होकर शख्स वो फिर फूफा हो जाता है !

जीजा की चक्की पिसते-पिसते, फूफा हो गए घिसते-घिसते
अवहेलना सहते-सहते अंततः अब फुलकर कूपा हो जाता है!

साले-साली मजाक मज़ाक़ में, बेइज्जती करते बात बात में,
ससुराल में मेहमान से बदलकर अब बर्तन फूटा हो जाता है!

रौब-धौंस सब क्षीण हो जाती है, रही सही भी जब खो जाती,
ऐतराज़ जताने भर से ही जनाब इनका नाम रूठा हो जाता है!

घरवाली भी बन जाती है, अनजान सुनाती है ताने बेहिसाब,
हाल कौन पूछता फिर हर नज़र में पैर का जूता हो जाता है!

जो करते थे इज़्ज़त खातिरदारी अब खुद उनका हाल बुरा है,
ससुराल भटके इधर-उधर, बर्तन जैसे कोई जूठा हो जाता है!

दूल्हा बनकर आया था एक रोज़ शेर की तरह जिस घर में,
बहरहाल वो शेर अपनी इज़्ज़त बचाने को चूहा हो जाता है!

वक़्त वक़्त की बात होती, वक़्त हालत सबके बदलते है,
सदाबहार केला भी एक दिन, सड़ा खरबूजा हो जाता है !

खूब खाए शाही पनीर पूड़ी के संग काजू बादाम के हलवे,
गद्दे के बिस्तर से आसन उसका अब तख्त टूटा हो जाता है !!

हाल छुपाये बैठे है

सब अपना अपना दर्द दबाये बैठे है,
कुछ न कुछ दिल में हाल छुपाये बैठे है !

जीते है सब मुख पर झूठी मुस्कान लिए,
अन्दर सब इक तूफ़ान उठाये बैठे है !

दुशमन है सब इक दूजे के घर ही घर में,
अपने होने का भरम बनाये बैठे है !

मौका ढूंढ रहा यारो अब तो हर कोई
मन में बदले की आग जलाये बैठे है !

तन्हा होकर जीना सीख लिया हमने भी,
ईमान ‘धरम’ अरमान जगाये बैठे है !!

द्रौपदी विलाप

राज सभा में वीर घने है
बाहुबली सब मौन धरे है,
चीर-हरण कुल वधु झेल रही,
लाज बचाने को चीख रही,
करुण पुकार नयन भरे है,
पीड़ा इनकी कौन हरे है,
बैठे भुजबल सिर लटकाकर,
शब्द गले अपने अटकाकर,
आज सभी का ओज गया मर,
कृष्णा जीती कौन दया पर,
नारी तेरा अस्तित्व कच्चा,
इस जीने से मरना अच्छा,
पटरानी का ये हाल भया,
समझो राजा मर मान गया,
संकट भगिनी आज उतारो,
कान्हा आकर आप उबारो !!
*

सफर में

अकेले चले हम मुसाफ़िर सफर में,
मिलेंगे कई यार शातिर सफर में !

डरेंगे न कतई किसी हाल में हम,
भले हो अकेले मुसाफ़िर सफर में !

भरोसे के क़ाबिल न होते सभी जन,
हक़ीक़त न करना ज़ाहिर सफर में !

जरूरी है रखनी छुपाकर शिनाख्त,
मरातिब बचाने की खातिर सफ़र में ।

तुम क्या जानो किस दौर से गुज़र रहा हूँ

तुम क्या जानो किस दौर से गुज़र रहा हूँ,
डाली से टूटे फूल की तरह बिखर रहा हूँ !

ख़ाक से उठकर निखरने की कोशिश में,
जर्रा-जर्रा जोड़कर फिर से संवर रहा हूँ !

दर्द-ओ-ग़म के ज्वार भाटे डूबा कई दफा,
वक़्त की लहरों संग धीरे धीरे उबर रहा हूँ !

वक्त और हालातों ने गिराया पग-पग पर,
गिर-गिरकर हर एक बार मैं उभर रहा हूँ !

घटता हूँ, कभी बढ़ता हूँ, सुबह-शाम सा मैं,
पारे की तरह से आजकल चढ़ उतर रहा हूँ !

सीख लिया ज़माने की ताल से ताल मिलाना,
खुद को भी अब लगने लगा की सुधर रहा हूँ !!

गिले और शिकवे मिटाने बहुत है

सुनाने को यारो फ़साने बहुत है, सुने कौन सभी के बहाने बहुत है !

मुसीबत अनेको उठानी पड़ेगी, सर-ए-राह कांटे हटाने बहुत है !

बेताबी दिखाओ अभी से न इतनी, मिलन के हसीं दौर आने बहुत है !

सनम ना चुराओ निगाहें शरम से, हमें साथ मिल गुल खिलाने बहुत है !

जरा सोचना दिल लगाने से पहले जहां में फ़रेबी दिवाने बहुत है !

वो मर्ज-ऐ-दवा से किसी कम नहीं है क़िताबों रखे ख़त पुराने बहुत है !

अभी हार जाना गंवारा नहीं है, ज़माने को जलवे दिखाने बहुत है !

फिज़ाओ से कह दो ज़रा मंद महके, चमन में अभी दिन बिताने बहुत है !

ये वादा किया है ‘धरम’ ने सनम से, गिले और शिकवे मिटाने बहुत है !!

मुहब्बत में होते ठिकाने बहुत है

ख़ुदा की रज़ा के बहाने बहुत है,
लुटाने को उसके ख़जाने बहुत है ! १ !

न जाने वो कब क्या दिखा दे नज़ारे,
हयात-ऐ-म’ईशत फ़साने बहुत है ! 2 !

कहें शान में क्या तुझे अब हसीना,
तेरी इस हया के दिवाने बहुत है ! ३ !

ऐ आँखे ज़रा सा ठहरकर बरसना,
हमें खत पुराने जलाने बहुत है ! ४ !

अदायें दिखाने में माहिर बड़े है,
लबों पर सनम के तराने बहुत है ! ५ !

चलो तुम बचाकर के दामन यहां पर,
निगाहें है क़ातिल निशाने बहुत है ! ६ !

डगर में है मिलते कई मोड़ अकसर
मुहब्बत में होते ठिकाने बहुत है ! ७ !

‘धरम’ हम ने देखी ज़माने की आदत,
यहाँ लोग करते बहाने बहुत है ! ८ !

शब्दार्थ:
हयात – जिंदगी, जीवन।
म’ईशत = जीविका, रोज़गार, नौकरी

वफ़ा का सिला

वफ़ा का सिला तुम सवालों में रखना,
मेरा नाम शामिल जवाबों में रखना !

मेरे इन ख़तों को समझ कर के उलफ़त
मेरी यह निशानी क़िताबों में रखना !

हरे घाव काफी मुहब्बत के होंगे,
छुपा कर उन्हें तब हिजाबों में रखना !

मिटाना न दिल से, पुरानी जो यादें
सजा कर उन्हें तुम ख़यालों में रखना !!

लिखे है फ़साने जो दिल के सफ़े पर,
छुपा कर उन्हे तुम लिबासो में रखना !!

डी के निवातिया

डी के निवातिया

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