प्रियंका सौरभ की कविताएं | Priyanka Saurabh Poetry
“मनीषा की अरदास”
मत रो माँ, अब मत रो,
तेरी बेटी की आवाज़ हम सब हैं,
न्याय की राह पर चल पड़े,
अब जाग उठा हर जन-जन है…।
गूँजे धरती, गगन गवाह,
अन्याय के विरुद्ध उठे निगाह।
“भाग गई होगी” कहना भूल,
अब टूट चुका हर झूठा फूल।
मनीषा तेरी कसम हमें,
लड़ेगे जब तक साँस है।
न्याय की ज्वाला जलती रहे,
हर दिल में अब विश्वास है।
मोमबत्तियों का यह सागर,
बन जाए अग्नि का दरिया,
क़ातिलों को सज़ा मिले,
नारी फिर हो न दु:खिया।
मत रो माँ, अब मत रो,
तेरी बेटी की आवाज़ हम सब हैं,
न्याय की राह पर चल पड़े,
अब जाग उठा हर जन-जन है…।
मैं बिंदी हूँ, मौन की ज्वाला
माथे पर चुप बैठी मैं,
जैसे चाँदनी का एक बिंब –
किंतु पूछते हो मुझसे,
“तुम हो कौन, इस रंग में लिपटी?”
मैं तो चुप थी वर्षों से,
मौन की ज्वाला बनकर –
ना किया प्रतिकार कभी,
ना तोड़ी कोई परंपरा।
मैं बिंदी हूँ –
स्त्री की उस पहली पुकार की जो किसी आरती की थाली से नहीं,
उसकी चुप पीड़ा से जन्मी।
तुम्हारी आंखों को खटकती क्यों है मेरी धड़कन की यह लालिमा?
क्या अस्तित्व का कोई रंग नहीं होता?
मेरे माथे पर जो बिंदी है,
वह माँ की गोद से उठी आभा है,
वह दादी की कहानियों से गूंथी गई भाषा है।
क्या इसलिए मुझे विदेशी कह दोगे?
क्योंकि मैं अपनी चुप्पियों के साथ भी
अपनी संस्कृति से मुखर हूँ?
क्या अमेरिकन होने के लिए
स्वप्नों का रंग बदलना ज़रूरी है?
या अपना नाम, अपनी माँ की भाषा छोड़ देना ही कर्तव्य है?
मैं तो जलती रही एक दीपक की तरह,
जिसने तुम्हारी अदालतों में न्याय को ऊष्मा दी।
तुमने मेरा न्याय नहीं देखा,
केवल मेरे माथे की बिंदी को जज किया।
मैंने प्रश्न नहीं किया तुम्हारे सूट-बूट से,
तो तुम क्यों कांप उठे मेरी परंपरा से?
मैं बिंदी हूँ –
मौन की वह सुलगती हुई रेखा
जो हर अपमान में भी सौंदर्य ढूंढ लेती है।
मैं बिंदी हूँ –
स्त्री की वह पहचान जो तुम्हारे तानों से नहीं,
अपने मौन प्रतिरोध से संवरती है।
मैं बिंदी हूँ –
जिसे मिटाया जा सकता है शरीर से,
पर आत्मा से नहीं।
“ख़ामोश रिश्तों की चीख़”
तुम कहते रहे —
“तुम तो हमेशा ज़्यादा सोचती हो…”
मैं हर बार कम बोलती गई,
हर बार थोड़ा और खोती गई।
तुमने कहा —
“तुम बातों को बढ़ा देती हो…”
मैंने हर घाव को छोटा मान लिया,
अपने आँसुओं को तकिए में छिपा लिया।
तुमने जताया —
“मैंने वो मतलब नहीं निकाला…”
और मैं अपने अर्थ को
अपने ही अंदर गुम करती गई।
मैंने हर बार
तुम्हारे शब्दों से ज़्यादा
तुम्हारे मौन को पढ़ा।
मैंने हर तर्क को
प्यार की तरह समझा।
पर जब खामोशी भी
अब संवाद नहीं रही,
तो मैंने खुद से कहा —
“अब और नहीं…”
अब मैं
किसी की सही होने की परिभाषा में
गलत नहीं बनूंगी।
अब मैं
अपने भीतर के आइने से
मुलाक़ात करूंगी।
सावन को आने दो
सावन को आने दो, बूँदों को गाने दो,
मन के सूने कोनों में हरियाली छाने दो।
भीगी धूप में खिलती मुस्कानें हों,
तन क्या, मन भी तनिक भीग जाने दो।
झूले की पींगों में बचपन पुकारे,
मेंहदी की ख़ुशबू से सपने सँवारे।
घुँघुरुओं की छम-छम में राग बरसने दो,
छज्जों से उतरते गीतों को सजने दो।
कजरी की तान में व्यथा है छिपी,
प्रेमिका की आँखों में सावन की नमी।
संदेश हो पिया का या हो रूठी बहार,
हर बूँद कहे – “अब लौट आओ यार।”
धरती के माथे पर बूंदों का तिलक,
पत्तों पे लहराए आस्था की झलक।
पेड़ कहें – “थोड़ी देर और ठहरो”,
बादल कहें – “अब अश्रु बन बहो।”
सावन को आने दो, भीतर उतरने दो,
भीतर के मरुथल को हरियाने दो।
इस बार सिर्फ़ छाते मत खोलो,
दिल के दरवाज़े भी खुल जाने दो।
“अधूरी उड़ान”
उड़े थे कुछ सपने, हथेलियों पे रौशनी लिए,
हर आँख में मंज़िल थी, हर दिल में दुआ लिए।
कोई लौट रहा था अपनों की बाहों में,
कोई उम्मीद ले गया था दफ्तर की राहों में।
आसमान ने बाँहें खोलीं थीं स्वागत को,
पर किसे पता था, काल खड़ा था आघात को।
एक पल में सब शांतियाँ चीख़ बन गईं,
हँसती ज़िंदगियाँ राख की राख़ बन गईं।
ना आख़िरी अल्फ़ाज़, ना कोई निशानी,
जो कल थे मुस्कान, आज बस कहानी।
बचपन, जवानी, बुज़ुर्गी — सब साथ थे,
एक ही उड़ान में कई जज़्बात थे।
फटे बैग, जलती तस्वीरें, अधूरी चिट्ठियाँ,
ज़मीन पर बिखरीं रह गईं सब इच्छाएँ मिट्ठियाँ।
वो माँ जो कह रही थी “जाना, फोन करना”,
अब बस उसके आँसुओं में है “तेरा लौट आना”।
जहाँ लैंड करना था, वहाँ बस सन्नाटा है,
सफर अधूरा है, दर्द का पन्ना-पन्ना काटा है।
पर तुम सितारे बन गए उस काले गगन में,
हमेशा जगमगाओगे हर टूटे हुए मन में।
क्रांति का आह्वान – अब परिवर्तन चाहिए!
अब परिवर्तन चाहिए,
हर घर से एक रक्षक चाहिए!
जो डिजिटल नहीं, वैचारिक हो;
जो वीर नायक, चरित्रवान योद्धा हो।
उसके हाथ में मोबाइल नहीं,
पर संकल्प हो!
उसकी आँखों में स्वप्न नहीं,
पर विवेक हो!
यदि भीतर बैठा भेदी ही,
किले की दीवारें तोड़ेगा
तो शत्रु को क्या दोष दूँ मैं,
जब अपना ही रक्त धोखे छोड़ेगा!
अंतिम पुकार – राष्ट्र की आत्मा से
राष्ट्र की आत्मा रो रही है,
जन-गण-मन को जगाओ!
मात्रभूमि के चरणों में
आज फिर से शीश झुकाओ!
क्योंकि यह युद्ध तलवारों से नहीं,
चरित्र से जीता जाएगा
और गद्दारी के इस अंधकार को
ओज से मिटाया जाएगा!
गद्दारी का साया
मुठ्ठी भर थे वो,
फिर भी सदियों राज किया,
अपनों की कमज़ोरी से,
उन्होंने ये खेल रचा।
स्वर्ण भूमि पर,
स्वार्थ का जाल बिछाया,
लालच की जंजीरों से,
हमको गुलाम बनाया।
जब जयचंद ने हारा स्वाभिमान,
पृथ्वीराज का टूटा अभिमान,
मीर जाफर ने बेची इज़्ज़त,
और बिछा दी पराधीनता की शमशीर।
कारगिल की चोटें ताज़ा हैं,
आज भी कुछ बेचते हैं ईमान,
मुठ्ठी भर सिक्कों में,
रखते हैं देश का स्वाभिमान।
अभी भी गद्दारों का साया है,
अपने ही बने हैं बेगाने,
कभी सीमा पर, कभी संसद में,
हर कोने में हैं ये अनजाने।
मगर याद रहे,
कभी झुकी थी, पर मिटी नहीं ये धरती,
गद्दारी की हर साज़िश को,
आखिर मिट्टी में मिलाया है।
नींद और जागृति
नींद तो हर रोज़ खुलती है,
पर क्या खुलती हैं आँखें सच में?
मन के अंधेरों में कहीं छुपी,
एक उम्मीद सी कब जागे।
जीवन सिर्फ साँसों का खेल नहीं,
यह तो एक गीत है, एक पीड़ा,
जब आँखें खुलती हैं तो देखती हैं,
कैसे टूटती हैं सपनों की दीवारें।
नींद से बढ़कर है जागरण का सुख,
जब मन में खिले नए फूल,
हर दर्द को गले लगाकर,
खुशबू दे नई राहों को।
आओ, जागें उस पल के लिए,
जब आँखें खुलें, जीवन जागृत हो,
सपनों से कहीं आगे बढ़कर,
सच की रौशनी में नहाया हो।
अनकही तकलीफें
तकलीफें, जो दिखती नहीं,
मगर भीतर चुभती रहती हैं।
कह न सके जो दिल की भाषा,
वो लहरें मद्धम-सी बहती हैं।
आँखों में छुपा हुआ समंदर,
जो कभी बह निकले न सके।
मौन से बुनी हुई एक कथा,
कोई सुन सके, कोई न सके।
मुस्कान के पर्दे के पीछे,
छुपा एक अकेला साया है।
जिसके दर्द को समझ न सका,
वो दिल का कोई माया है।
धूप में भी ठंडी छाँव सी,
कहीं ये पीड़ा छुपी रहती है।
अधरों पर अनकहे गीत,
मन की कोई पुकार सुनती है।
चुप्पी का सन्नाटा
कभी बैठ अकेले,
धुंधले चांद की परछाईं में,
सांसों की लय पर सुनना,
वक़्त की खामोश धुन,
जहां हर सफ़ेद लहर,
मौसम की थकी आह है।
वो जो नयनों के कोनों में,
सफ़ेद हो चली है आस,
वो उम्र नहीं,
बस सहमी हुई मुस्कान है,
किसी छूटे हुए स्वप्न की,
कोमल सी अनुगूंज।
तुम्हें जो बालों की सफेदी दिखी,
वो अनकही कहानियों का बोझ है,
आंधियों में जलते दीप का हठ है,
जिसने हर रात उजाले की गुहार की।
कभी देखना,
रजतरेखा की झिलमिलाहट,
हर श्वेत रेशा,
निस्वार्थ तप का अमिट स्मारक है,
जो न बूढ़ा हुआ, न झुका,
बस और अधिक उजला हुआ।
बूढ़ा हुआ संसार?
रजत के धागों से बुनी
समय की श्वेत चादर,
प्रशांत नभ की मौन गाथा,
अतीत की बिखरी मुस्कान।
सांसों की तूलिका से,
अमिट रेखाएं खींचता समय,
पलकों पर ठहरा एक सपना,
बूढ़ा नहीं होता, बस गहरा होता है।
आंखों के कोर से फिसली,
एक बूंद की कथा,
धुंधला नहीं करता दर्पण,
बस गहराई नापता है।
तुम जो आहटों में बसी हो,
श्वास की शीतल पुकार,
तुम्हारी मुस्कान से पूछो,
किस पल में बूढ़ा हुआ संसार?
अनकही परछाइयाँ
वो जो साड़ी के किनारे में,
सिहरती हैं चुप्पी की नर्म लहरें,
वो जो पायलों में खनकती हैं,
अधूरे स्वप्नों की डरी हुई दस्तकें,
उन्हें भी शायद प्रेम कहते हैं।
कभी जो झुकी थी आँखें,
किसी अनमोल पलों की चुप सहमी कसम,
हथेलियों में बंधी,
तब प्रेम ने फुसफुसाया था –
“तुम्हारा होना ही मेरा होना है।”
वो जो झुक जाता है,
हर बार तुम्हारे साड़ी के कोर से,
वो सिर्फ़ घुटने नहीं मोड़ता,
बल्कि आत्मा की गहराइयों में,
मौन की कोई अनगिनत सीढ़ियाँ उतरता है।
जब तुम आंचल सहेजती हो,
वो अपने सपनों की सलवटें संभालता है,
तुम्हारी मुस्कान की चौखट पर,
वो अपनी दुनिया की हर चिंता रख आता है।
शायद प्रेम यही है –
न घुटनों की मोहर, न शब्दों का आभूषण,
बस एक चुप्पी का विस्तार,
जो हर साड़ी की तह में छुपा है,
और हर 500 की शर्ट में संवरता है।
समर्पण की सादगी
500 की शर्ट में, संजीदा मुस्कान,
5000 की साड़ी से बुनता सम्मान।
हाथों में उसके, बिन शब्दों की बातें,
हर तह में छुपा, प्रेम का अटूट मान।
सादगी की छांव में, अपनेपन का गीत,
झुकता है जो घुटनों पर, वो नहीं कभी कमज़ोर,
चाहत की हर सलवट, वो सहेजता है चुपचाप,
सचमुच, वो प्रेम का सबसे सजीव शोर।
तुम्हारे आँचल के मोड़ में, उसकी दुनिया बसती,
तुम्हारी मुस्कान में, उसका पूरा जहान हंसता।
कभी देखा है, आँखों की उस नमी को,
जो तुमसे पहले, तुम्हारे हर दर्द को समझता?
रिश्ते वो नहीं जो सिर्फ धन से तौले जाएं,
ये तो वो इश्क़ है, जो हर आहट पे हाथ थाम ले।
500 हो या 5000, कीमत नहीं इज़्ज़त की है,
जो तुम्हारे सम्मान में हर कदम साथ चले।
आंसुओं का गीत
जब हर दर्द से टकराकर,
मन की दीवारें दरकने लगें,
और उम्मीदों की चादर,
चुपचाप सरकने लगे।
जब हँसी की परतें,
ग़म के नीचे दब जाएं,
और खामोशी की गहराई में,
राहें तकती परछाई हो जाएं।
तब वही हाथ,
जो कभी कांपे थे थकान से,
एक-एक बूंद को समेटकर,
नए सपनों की मिट्टी बन जाते हैं।
आंसुओं की नमी से,
मजबूती की जड़ें उगाते हैं,
और फिर उभरते हैं
जैसे तपते सूरज की गर्माहट,
हर ठंडे अहसास को पिघलाती है।
क्योंकि गिरने का साहस,
और खुद को उठाने का हौसला,
सिर्फ उसी के हिस्से आता है,
जिसने खुद अपने हाथों से
अपने आंसू पोंछे हों
“परछाइयां”
भूत की परछाइयों से कब तक यूं घबराओगे,
आने वाले सवेरे को कैसे फिर अपनाओगे।
छोड़ दो बीते पलों का बोझ मन की गठरी से,
वरना नए सपनों का आंगन कभी ना सजाओगे।
यादों की परतों में जो ठहर गए हैं पल,
उनमें बिखरी मुस्कानों से अब बाहर निकल।
हर आहट में नई उम्मीद की दस्तक है,
क्यों पुराने दरवाज़ों पर खामोश खड़े नतमस्तक है?
राहें बदलती हैं, मौसम भी साथ छोड़ते हैं,
दर्द के साये में कब तक यूं अकेले रोते हैं?
तुम्हारी हिम्मत की मशाल बुझी नहीं अब तक,
फिर क्यों अंधेरों से घबराकर कदमों को तोड़ते हैं?
आओ, मिटा दें वो लकीरें जो अतीत ने खींची थीं,
सपनों की तख्ती पर नई इबारतें लिखी थीं।
गुज़रे वक्त की राख से एक दीया तो जलाओ,
नए सवेरे की आगोश में खुद को फिर पाओ।
छोड़ दो शिकवे, छोड़ दो पुराने बहाने,
आंखों में बसा लो वो ख्वाब जो कल नहीं माने।
जीवन की ये बेमोल घड़ियां यूं ना गंवाओ,
आने वाले कल की बाहों में खुद को फिर समाओ।
तोड़ दो जंजीरें जो मन की गहराइयों में जकड़ी हैं,
वो आवाज़ें सुनो जो आसमान से उभरती हैं।
भूत की परछाइयों से बाहर आओ अब,
देखो, तुम्हारे हिस्से की सुबह अब खिलती है।
मौन की पंखुड़ियाँ
मैंने देखा है,
उन पत्तों को,
जो आंधी में कांपते हैं,
जिनकी जड़ें मिट्टी में हैं,
पर मन खुली हवा का सपना देखता है।
मैंने सुना है,
उस चिड़िया की पुकार,
जो अपने घोंसले से दूर,
किसी और के आंगन में
अपना बसेरा ढूंढती है।
मैंने महसूस किया है,
उन लहरों की बेचैनी,
जो सागर के सीने से उठती हैं,
पर किनारे की कैद में तड़पती हैं।
मेरे मन का हर कोना,
बस इन्हीं बंधनों में उलझा,
पिंजरों से टकराता,
खुद को आज़ाद करने की चाह में,
हर रोज़ एक नई मौत मरता है।
कैसे कह दूँ,
कि मैं एकलौती नहीं?
हर बेटी, हर बहन, हर माँ,
इस दोहरी सोच की बेड़ियों में जकड़ी है,
जो प्रेम से पहले, संपत्ति से तौली जाती है।
कभी देखा है,
उस गुलाब की पंखुड़ी को,
जो कांटों के बीच खड़ी,
अपनी महक में खोई रहती है,
पर किसी की चाहत का भार
अपने नाजुक कंधों पर लिए जीती है।
मैं भी तो वही हूँ,
एक नाजुक सपना,
जिसे रिश्तों की रेशमी डोर में,
सोने-चाँदी के बंधनों में जकड़ दिया गया।
पर अब,
मुझे खुद की महक से मिलना है,
इस दोहरी सोच से परे,
अपनी पहचान को पाना है।
अब मुझे उगना है,
उन पत्तों की तरह,
जो आंधियों से लड़ते हैं,
उन लहरों की तरह,
जो चट्टानों से टकराती हैं,
उन पंखुड़ियों की तरह,
जो कांटों के बीच भी मुस्कुराती हैं।
दिल से जुड़े
टेक्नोलॉजी का यह दौर,
जहाँ रिश्ते सिमटते जा रहे हैं,
जहाँ उंगलियों की सरसराहट में
ममता की गर्माहट खो रही है,
जहाँ नज़रों की मुलाकात,
अब स्क्रीन की रोशनी में घुल रही है।
वो छोटे-छोटे पलों का जादू,
जो कभी एक मुस्कान से झलकता था,
अब किसी नोटिफिकेशन की आहट में,
खो जाता है।
बच्चों की हंसी,
जो कभी आँगन की मिट्टी से महकती थी,
अब गेमिंग की आभासी दुनिया में,
गुम हो गई है।
रिश्ते जो कभी एक पत्ते की सरसराहट,
या एक छोटे से स्पर्श में बंध जाते थे,
अब डिवाइस की बैटरी से जुड़ गए हैं।
माँ की थपकी, पापा की पुकार,
भाई-बहन का हँसी-ठिठोली,
सब जैसे स्क्रीन के उस पार,
अजनबी बनते जा रहे हैं।
पर क्या रिश्तों की ये गूंज,
कभी वाइब्रेशन की हलचल से,
महसूस की जा सकती है?
क्या वो आँखों की नमी,
कभी ‘रिच एमोजी’ से बयां हो सकती है?
समय है, फिर से लौटने का,
उन मासूम पलों की ओर,
जहाँ रिश्ते दिल से जुड़ते थे,
न कि किसी नेटवर्क से।
जहाँ हंसी की गूंज,
मोहल्ले की गलियों में गूंजती थी,
न कि किसी हेडफोन में सिमट जाती थी।
रिश्तों की गूंज को जिंदा रखना है,
तो वक़्त है कि हम अपनों के पास,
बिना किसी नेटवर्क की बाधा के,
दिल से जुड़े।
रिश्तों की गूंज
रिश्ते – वो मौन स्पंदन,
जो न फासलों से बंधते हैं,
न ही समय की सीमाओं से,
ये तो दिल की उस गहराई में बसते हैं,
जहाँ हर एहसास की जड़ें गहरी होती हैं।
माँ की ममता – जो कभी लोरी बनकर,
तो कभी थपकी बनकर,
हमारे सपनों को संजोती है।
पिता का वो मौन संघर्ष,
जो हर जिम्मेदारी को मुस्कान से ढक देता है।
भाई – जो कभी हँसी-ठिठोली में छुपा,
तो कभी अनकही फिक्र में बसा रहता है।
बहन – जो कभी झगड़े में,
तो कभी आँखों में छलकते आंसुओं में,
अपना स्नेह उकेरती है।
ये रिश्ते समय से परे हैं,
इनका मूल्य वक़्त आने पर ही समझ आता है,
जैसे ठंडी छांव का महत्व
तब महसूस होता है,
जब जीवन की धूप तपाने लगे।
क्योंकि,
दिल से जुड़े रिश्ते कभी नहीं टूटते,
वे तो बस समय के साथ और गहरे,
और अमर हो जाते हैं
दौर ए धोखा
ऐसे दौर में हैं, जहां
मुस्कानें भी मुखौटे हो गईं,
चुप्पियाँ भी साजिशें बुनने लगीं,
जहां दोस्ती का रंग अब,
पल भर में ज़हर हो जाए।
कौन अपना, कौन पराया,
किस पर ऐतबार करें,
यहाँ हर हँसी के पीछे,
एक ख़ंजर छुपा बैठा है।
राहें तो वही हैं, मगर,
अब कदमों की आहटें बदल गईं,
साये भी साथ छोड़ने लगे,
और रिश्ते बस नाम के रह गए।
यहाँ आँखों में आँसू नहीं,
बस इरादों का तेज़ाब है,
सामने बैठा शख़्स,
दोस्त है कि सांप,
कह पाना मुश्किल है।
सिन्दूर: अब श्रृंगार नहीं, शौर्य का प्रतीक
सिन्दूर की बिंदिया, न अब बस चुप्पी का श्रृंगार,
यह ज्वाला की लाली है, नारी का जयघोष, आत्माभिमान का पुकार।
वह रक्तिम रेखा जो केवल प्रेम का वचन नहीं,
यह प्रचंड नारी का मौन विद्रोह, उसका अनमोल सम्मान है।
जब वियोमिका और सोफिया ने उठाई तलवार,
मौन बंधन टूटे, कंगनों की खनक में उठी रण की पुकार।
न चूड़ी थमी, न मांग झुकी, न पांव रुके,
यह सिन्दूर ज्वाला की लकीर, कर्तव्य की हुंकार।
यह नहीं केवल श्रृंगार की परंपरा,
यह है हर स्त्री की यात्रा, उसके अदृश्य आंसुओं का इकरार।
रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती, पद्मावती की कहानियाँ,
हर युग में यह सिन्दूर बना उनकी शक्ति का संज्ञान।
आज की नारी भी वही ज्वाला है,
उसके लहू से रंगी है इतिहास की हर कविता की माला।
यह सिन्दूर है संघर्ष का गीत, बलिदान की महागाथा,
यह है नारी के हौसले की अनुगूंज, उसकी आत्मबल की वाणी।
तो सिन्दूर न अब बस श्रृंगार,
यह स्वाभिमान, साहस और आत्मबल का श्रृंगार है।
यह है नारी की जुबां, उसकी हिम्मत की पहचान,
यह है उसके अस्तित्व की अमर कहानी।
“देह की दीवारें और आत्मा की पुकार”
मैं स्त्री हूँ – देह से परे, मन की मौन पुकार,
नमन की ज्वाला, समर्पण का उजास,
किंतु देखो, कैसी हो गई हूँ मैं,
चमकती स्क्रीन पर बिंधी एक देह भर।
जहाँ कभी चूड़ियों की खनक थी,
आज वहाँ बस लाइक्स का शोर है,
जहाँ कभी पायल की झंकार थी,
वहाँ अब फॉलोअर्स की भीड़ है।
मुझे कद नापने थे विचारों के,
मुझे परवाज़ देनी थी आत्मा को,
पर मैं उलझी हूँ उंगलियों के इशारों में,
कैमरे की ज़द में, कमेंट्स की भीख में।
मेरे कपड़ों की लंबाई पर होती है चर्चा,
मेरे हंसने-रोने पर लगते हैं दाम,
मैं औरत हूँ – मन का विस्तार हूँ,
फिर क्यों बाँध दी गई हूँ बदन की जंजीर में?
सोचो, क्या मैं सच में सशक्त हूँ?
क्या यही मेरी परिभाषा है,
या फिर मैं वही चुप्पी हूँ,
जिसे सदियों से अनसुना किया गया है?
आओ, तोड़ें इस भ्रम की दीवारें,
लाइक्स की भूख से मुक्त हो जाएं,
खुद को फिर से पहचानें,
बनें वो दीपशिखा, जो खुद को जलाकर रौशनी बिखेरती है।
आईएएस अधिकारी: ड्यूटी या डिजिटल स्टारडम?
जनता के सवालों के बीच,
खो गई है कहीं आपकी राह,
ट्विटर के तीर चलाते हो,
इंस्टाग्राम के जाल बुनते हो।
काम की बात कहो, या दिखावा,
लाइक्स के पीछे भागते हो।
रिपोर्ट नहीं, रील बनाते हो,
कागज नहीं, कैप्शन सजाते हो।
सुना है कहीं आपकी आवाज़,
पर जनता सुनती नहीं,
जब फ़ोन पर फोटो लेने में,
खो जाती है पूरी जिम्मेदारी।
जमीन पर जो ठोकर खाए,
क्या उनकी परवाह है?
या डिजिटल दर्पण में,
सिर्फ अपना अक्स तलाशते हो?
लेकिन उम्मीद बची है,
कहीं जो सच में काम करें,
मौन में भी जो सुन लें,
दर्द को समझें, ना केवल दिखाएं।
आईएएस हो या कोई भी पद,
ज़िम्मेदारी से न हो कोई छूट।
ड्यूटी को भूलो मत,
स्टारडम के पीछे न भागो।
जनता का भरोसा है,
आपके हाथों में एक किताब,
जिसे खोलो, पढ़ो, समझो,
और लिखो उनके सपनों का जवाब।
अंकों के परे, जीवन की असल पहचान
अंकों के बंधन में क्यों, जीवन को ललचाया जाए?
क्या बच्चे की असली पहचान, केवल अंकों से तय किया जाए?
क्या उसकी आत्मा, उसकी धड़कन, उसकी संवेदनाएँ,
क्या इन सबसे अधिक मूल्यवान नहीं?
हर बच्चा एक फूल है, जो अपने समय में खिलता है,
कभी सूरज की तेज़ धूप में, कभी बरसात की रिमझिम में।
लेकिन हम उसे एक ही रंग, एक ही रूप में क्यों देख रहे हैं?
क्या उसकी विविधता, उसकी असली शक्ति को हम पहचान रहे हैं?
अंकों से नहीं, सपनों से उसे परखो तुम, उसके हौसले से,
उसकी रचनात्मकता से, उसकी आँखों के गहरे झीलों से।
उसकी दुनिया को समझो, उसकी बुनियादी इच्छाओं को जानो,
क्या अंक उसे जीवन की असल राह दिखा सकते हैं?
हर बच्चे में छिपा एक आकाश है,
जो उड़ान भरने के लिए तैयार है, पर तुम उसे सीमित करते हो।
क्या उसके आंतरिक आकाश को, तुम एक अंक से समझ सकते हो?
क्या उसकी आंतरिक काबिलियत को, तुम एक संख्या में बांध सकते हो?
यह ज़रूरी नहीं, अंक उसकी पहचान बन जाए,
वह अपनी पहचान खुद बनाए, हर दिन, हर क्षण।
अंकों से परे, उसकी दुनिया में जो रंग हैं,
वो केवल वही समझ सकता है, जो उसे अपनी आँखों से देखे।
एक आख़िरी सलाम
जब भीड़ के शोर में ख़ामोशियाँ गूंज उठें,
और रुखसत होते क़दमों की आहट,
जज़्बातों के पंखों पर सवार हो जाए,
तब समझो, कहानी अपने अंजाम पर है।
तुम्हारे हर शॉट में बसता था एक युग,
हर रन में लिखी थी उम्मीद की गाथा,
वो लहराते बल्ले की ख़ामोश चीखें,
और स्टेडियम में गूंजती बेजोड़ आहट।
तुम गए, तो ऐसा लगा,
जैसे कोई घना दरख़्त गिरा हो,
जड़ें तो ज़मीन में हैं,
पर साया कहीं खो गया हो।
वो चौकों की धार, वो छक्कों का संगीत,
भीड़ की तालियाँ, हर रिकॉर्ड का साक्षी,
अब बस स्मृतियों का शोर है,
और एक ठहरी हुई सांझ का गीत।
पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती,
हर अंत एक नए आरंभ की आहट है,
शायद कल फिर उठेगी ये धूल,
और तुम्हारी क़दमों की गूंज फिर से लौटेगी।
“संकट का व्यापार”
संकट की आहट से, बाजार थरथराए,
महंगाई की लहर से, घर-घर हिल जाए।
कागजी हुक्मनामा, सख्ती के सुर गाए,
पर हकीकत की धरती, झूठ की चादर फैलाए।
राशन के थैले, खालीपन से भरे,
कालाबाजारी की चालों में, सपने टूटे, बिके, मरे।
नेताओं की घोषणाएं, जश्न की तरह गूंजती हैं,
पर दुकानों की अलमारियाँ, भूख की चीख से घबराती हैं।
जनता को बंधी पगडंडियों पर दौड़ाया जाता है,
हर बार नया नारा, हर बार नया वादा रचाया जाता है।
पर कालाबाजारी की हवाओं में, सच का दम घुट जाता है,
कानून की स्याही, मुनाफाखोरी की चालों से बिखर जाता है।
सरकारी आदेशों की तलवारें, कागज पर तेज़ होती हैं,
पर जमीनी हकीकत, इनसे आँखें चुराती हैं।
कौन पूछेगा, कौन रोकेगा, जब खुद रक्षक ही भक्षक बन जाएं,
जब सत्ता के गलियारों में, मुनाफाखोर गीत गाएं।
यह वक्त है, जब जनता को जागना होगा,
अपने हक की लड़ाई में, खुद को परखना होगा।
सिर्फ आदेशों से नहीं, इरादों से बदलाव आएगा,
वरना यह सख्ती भी, महज एक ‘खोखला नारा’ बनकर रह जाएगा।
“सीधा वार, आर या पार।”
सीने में ज्वाला, निगाहों में अंगार,
फौलाद से भी सख्त हिंद का ललकार,
अब न केवल सरहदें कांपेंगी,
दुश्मन के दिल भी थर्राएंगे बार-बार।
लहू में खौलता इतिहास का गुस्सा,
हर कतरे में बसा प्रतिशोध का झोंका,
यह न सिर्फ युद्ध, यह प्रतिशोध है,
यह इज्जत का संग्राम है,
यह हिंद का अभिमान है।।
अबकी बार न रुकेंगे, न झुकेंगे,
हर गद्दार का हिसाब लेंगे,
इस बार न कूटनीति, न समझौता,
सीधा वार, आर या पार।
मिसाइलों की गर्जना, टैंकों का शोर,
हर कोने में गूंजेगा हिंद का जोर,
उधमपुर से कराची तक,
लद्दाख से बलूचिस्तान तक,
सियाचिन की चोटी से कराची के तट तक,
हर बंकर, हर चौकी, हर मोर्चा,
गूंज उठा ‘जय हिंद’ के नारों से।
धधक उठेगी जमीन, कांप उठेगा आसमान,
हर धमाके में गूंजेगा हिंदुस्तान,
न चट्टानें रोक पाएंगी, न नदियाँ बहा पाएंगी,
हर बंकर में लहराएगा तिरंगा।
हर गोली में वंदे मातरम्,
हर सांस में भारत मां का जयकार,
मिट जाएंगे, मगर झुकेंगे नहीं,
यही है हिंद का वचन, यही है रण का इकरार।
अबकी बार इतिहास नहीं,
भविष्य का युद्ध है ये,
सिर्फ जीतेंगे, सिर्फ मिटाएंगे,
भारत की अस्मिता, हर हाल में बचाएंगे।
सीमाओं की शेरनियाँ
वे उठीं जब घने अंधेरों से,
ध्वंस की छाया से, मरुस्थल की लहरों से,
हर कण में थी बिजली की चमक,
हर सांस में था गर्जन का तड़प।
सरहदों की सलाखों पर बसी,
उनकी आँखों में बसी थी ध्रुव तारा की रोशनी,
उनके कदमों में बंधी थी,
धरती की धड़कन, पर्वतों की अटलता।
वे बसीं उस कोहरे में,
जहाँ दुश्मन की सांसें कांपें,
जहाँ बारूदी सुरंगें भी बिछ जाएं,
उनके हौसलों के आगे।
रक्त से सींचा है जिन्होंने इतिहास,
वो लहरें बनीं अभेद्य दुर्ग,
नरम दिलों में फौलाद उगा कर,
हर बार खड़ी हैं वे, एक नई परिभाषा।
सीमाओं की शेरनियाँ हैं वे,
धरती की हिम्मत, आसमान की ऊंचाई,
हर बार लिखेंगी वे नया इतिहास,
जब तक सांस है, जब तक तिरंगा है।
वीरांगनाओं की गाथा
साहस की सूरत हैं सॉफिया,
हौसलों की मिसाल है व्योमिका,
भारत की हैं ये बेटियां,
मिट्टी की अमर कहानीका।
रुख से चट्टानों को तोड़तीं,
आसमां को हौसलों से मोड़तीं,
इन्हीं से रौशन ये धरती है,
हर कदम पर विजय की गूंज बोलतीं।
ना डरीं कभी तूफानों से,
ना झुकीं किसी फरमानों से,
रण में गूंजे उनकी जयकार,
हर सीमा पर हैं वीरता के दीवाने।
माँ के आंचल की वो सुगंध हैं,
भारत की शान, उसकी बुलंद हैं,
इनके नाम से कांपे दुश्मन का ईमान,
इनकी गाथा गा रहा, पूरा हिंदुस्तान।
“ऑपरेशन सिंदूर”
नाम में एक शक्ति है,
एक गर्व, एक पहचान,
मांग का सिंदूर, रक्षा का प्रण,
धधकते सूरज सा वीरता का सम्मान।
यह सिर्फ एक शब्द नहीं,
यह हृदय की ललकार है,
यह मातृभूमि की माटी में,
शौर्य का सिंदूर भरने का अधिकार है।
जब सीमाएं पुकारें,
तो यह नाम गूंजता है,
हवा में गर्जन बनकर,
शत्रु के हौसलों को कुचलता है।
यह वो पुकार है,
जो बिछुड़ते परिवारों की आँखों में,
आंसुओं के बीच मुस्कान भरती है,
यह वो शक्ति है जो बलिदान की नींव रखती है।
नाम में एक शक्ति है,
एक ज्वाला, एक अभिमान,
यह सिर्फ ‘सिंदूर’ नहीं,
यह राष्ट्र के स्वाभिमान का ऐलान है।
“इतिहास का तराजू”
कब तक ढोएँगे बोझ पुराने,
मुग़ल सल्तनत के वीर सुबाने?
क्यों ना पढ़ें वो ज्ञान-विचार,
जो चाणक्य ने दिए अपार?
चित्रगुप्त की लेखनी भारी,
धर्म-कर्म की वो जिम्मेदारी।
शिवाजी का साहस कहता है,
राष्ट्रधर्म से बढ़कर क्या है?
गौरव गाथा छुपी पन्नों में,
नायक खो गए अंधे खंडों में।
अब समय है फिर से जागें,
अपने पुरखों के दीप जलाएँ।
हर पीढ़ी को समझाएँ यह,
हम थे, हैं और रहेंगे श्रेष्ठ।
इतिहास नहीं बस हार-जीत,
ये तो आत्मा की होती रीत।
जय सनातन, जय संस्कार,
ज्ञान-विज्ञान हमारा आधार।
नई किताबों में हो वो बात,
जो दे बच्चों को अपनी जात।
“जल और रक्त की रेखा”
जब सीमाओं पर बंदूकें बोलती हैं,
तब क्या भीतर की चुप्पियाँ मौन रहती हैं?
किसने खोला है बांधों का ताला,
जब देश ने अपने शहीदों को कंधा दिया ताज़ा?
पानी की धार में विष क्यों घुलता है?
क्या राजनीति अब नदियों की नब्ज़ पर उगता है?
सरहद पार जो गोली चलाए, वो शत्रु है,
पर जो भीतर दरार करे—वो कौन-सा पात्र है?
यह युद्ध अब दो नहीं, ढाई मोर्चों का है,
एक संगीन के पीछे, एक विचार के लोचा का है।
वो जो सत्ता की सीढ़ी चढ़ता है,
क्या उसे ध्वज का अर्थ नहीं समझ आता है?
यह नंगल का बांध नहीं, यह विश्वास का द्वार है,
इस पर ताला नहीं, सवाल लटकता भार है।
जब भगवंत नीति के नाम पर भावुकता बोता है,
तो हरियाणा का गला भी सिसकियों में रोता है।
देश जब एक स्वर में कहता है—‘बस बहुत हुआ’,
तब कोई क्यों छेड़ता है नदी की धमनियों को क्या और क्यों?
क्या यही समय था तालों की राजनीति का?
या यह वही ‘आधा मोर्चा’ है जिसे रावत ने पहचाना था?
वे न दंगों में साथ होते हैं, न दुख में दीवार,
वे विचारधारा की ओट में काटते हैं घर-परिवार।
उनकी दृष्टि में न देश है, न धर्म, न भाषा,
केवल सत्ता का खेल और स्वार्थ की भाषा।
किन्तु भूल न जाना,
भारत चुप है, पर अंधा नहीं।
जो आज ताले लगाते हैं,
कल लोकतंत्र उन्हीं पर ताले लगाएगा सही।
यह जल नहीं रुकेगा,
यह वह पुरखों की प्यास है, जो हाकिमों की धार से नहीं थमती।
और यह देश—यह कोई खेत नहीं,
जो हर फसल चुनाव के अंक में बो दी जाए।
यह देश महाभारत की स्मृति है,
यहाँ कृष्ण मौन नहीं रहते,
यहाँ अर्जुन भ्रम में नहीं डोलते,
यहाँ युद्ध न्याय का उत्सव है, और जय केवल सत्य की होती है।
“गिनती की बात”
जो गिने गए, वे कुछ थे,
जो न गिने गए, वे सब थे।
गिनती से बाहर जो छूट गए,
उनका दर्द, उनकी भूख अब तक जीवित है।
कहते हो — “जाति मत देखो”,
पर पद, परंपरा, पंचायत में
हर पग पर जाति ही तो देखी जाती है।
कहते हो — “जातिविहीन समाज बनाना है”,
मगर गुप्त सूचियों में, कुर्सियों की ऊँचाई में,
नाम, उपनाम, वंश, सब बचे रह जाते हैं।
गिनती कोई अपमान नहीं,
यह तो बस वह शीशा है,
जिसमें समाज अपना चेहरा देख सके।
कितने वंचित हैं, कितने बहिष्कृत,
कितने अब भी स्कूल की देहरी तक नहीं पहुँचे —
यह जानना शर्म की बात नहीं,
यह जानना जिम्मेदारी है।
गिनती से पहले जो अदृश्य थे,
गिनती के बाद वे नागरिक होंगे।
आँकड़ों में ही तो बसती है उम्मीद,
तथ्य ही तो तोड़ते हैं भ्रम की ज़ंजीरें।
अगर आरक्षण जाति पर आधारित है,
तो आँकड़े क्यों नहीं?
अगर शासन जातीय समीकरणों से चलता है,
तो गिनती से परहेज़ कैसा?
डर किस बात का है, साहिब?
कि कहीं सच न सामने आ जाए?
कि कहीं बहुसंख्य समाज अपनी हिस्सेदारी माँग न ले?
कि जिन्हें अधिक मिला, उन्हें थोड़ी जगह समेटनी पड़े?
यह गिनती कोई विभाजन नहीं लाएगी,
यह तो वह आईना होगी
जो सत्ता के गलियारों को स्पष्ट दिखा देगी —
कि जिन्हें तुम ‘बहुजन’ कहते हो,
वे अब बहुशब्द नहीं,
बहुबल भी हैं।
गिन लो हमें,
हमारी संख्या को मत डराओ,
हम कोई परछाईं नहीं,
हम इस लोकतंत्र की असली रौशनी हैं।
हम वह पंक्ति हैं
जिसे सदियों से पीछे रोका गया —
अब हम आगे बढ़ना चाहते हैं,
बस एक बार हमें भी
पूरा गिन लिया जाए।
“पेंशन नहीं, पराक्रम दो!”
नेताओं की मेवा बहुत हो गई,
अब सेवा की बारी है,
जो वादा करते सीमा पर जान देने का,
अब घर से शुरुआत जरूरी है।
बातें हैं बड़ी-बड़ी देशभक्ति की,
तिरंगा ओढ़कर मंच सजाते हैं,
पर उनके बच्चे एयर कंडीशनर में,
सेना के नाम से घबरा जाते हैं।
पेंशन? वो भी ज़िंदगीभर की?
किस हक से, किस मेहनत पर?
जो किसान की बेटियां बॉर्डर पर खड़ी हैं,
क्या उन्हें भी मिली इतनी शर्त?
जो बोले – “देश है पहले”,
उनका बेटा क्यों ‘विदेश’ में है?
क्यों ना उसके हाथ में भी रायफल हो,
वर्दी में गर्व का संदेश लिए हो?
नेताओं! अगर सच में देश प्यारा है,
तो बच्चों को युद्ध नीति सिखाओ,
केवल भाषण से कुछ न होगा,
अब एक मिसाल खुद बनाओ।
पेंशन नहीं, पराक्रम दो,
राजनीति नहीं, समर्पण दो,
जनता को मूर्ख समझना बंद करो,
अब खुद को भी कुछ उत्तरदायित्व दो।
“हमारी मेहनत, हमारा हक़”
पसीने की चादर ओढ़े जो,
वो सूरज से पहले जागे हैं।
ईंटों में बाँध के सपने,
शहरों के कंधे भागे हैं।
न पर्ची, न पहचान कोई,
न तनख्वाह का भरोसा है।
हर दिन सौदा जिस्म का होता,
हर साँस में एक रोषा है।
छालों में जलते फर्श मिले,
छायाएँ भी साथ न चलतीं।
फुटपाथों पर नींदे टूटीं,
रातें भी अब भाषण चलतीं।
हक़ माँगा तो थप्पड़ आया,
चुप रहना ही नियम बना।
मजदूर दिवस आया-गया,
पर जीवन कब बहार बना?
जो थामे हैं इस देश को,
वो झुककर ही क्यों जियें सदा?
अब गीत नहीं, उद्घोष करो —
“हम निर्माणकर्ता, भीख नहीं चाहते,
बस हक़ और दुआ!”
“घाटी के आँसू”
घाटी जहाँ फूल खिलते थे, अब वहाँ सिसकती शाम,
वेदना की राख पर टिकी, इंसानियत की थाम।
कहाँ गया वह शांति-सूर्य, जो पूरब से उठता था?
आज वहाँ बस मौन है, जहाँ कल गीत बहता था।
पहलगाम की घाटियाँ, रोईं बहाये नीर।
धर्म पे वार जो हुआ, मानवता अधीर।
संगिनी का चीखना, गूँजा व्याकुल शोर।
छिन गया पल एक में, उसका जीवन भोर।
हिंदुस्तानी रक्त में, साहस भरा अपार।
आतंकी के हर कदम, होंगे अब लाचार।
श्रद्धा पे जो वार है, वह कायरता जान।
ऐसे नरपिशाच की, कब होगी पहचान?
वो जो चला तीर्थ को, दिल में लिए यकीन।
मार दिया उसको वहीं, क्यूँ इतना अधीन?
आस्था के मार्ग पर, अब भय का पहरा।
कहाँ गया वो ज़मीर, कहाँ गया सवेरा?
धूप-छाँव का देश है, फिर भी सबका एक।
नफरत के सौदागरों, मत खेलो ये खेल।
चुप्पी साधे लोग जो, देख रहे तमाशा।
एक दिन पूछेगा वक्त, कहाँ थी तुम्हारी भाषा?
अब न मौन रहो, न सहो ये छद्म धर्म का दंश,
हर दिल में दीप जलाओ, करुणा से करें नवं अंश।
सत्य ही शस्त्र बने, स्वर ही अग्निवाण,
इस घाटी की पीड़ा में, छिपा है हिंदुस्तान।
“स्वतंत्रता का स्वप्न”
नारी की स्वतंत्रता की धारा,
चली हर मन में इक विचार सा।
बंधनों से बंधी नहीं वह,
स्वतंत्रता का है अब ख्वाब हमारा।
कभी कहा गया, तुम छोटी हो,
तुमसे न होगा कोई काम बड़ा।
पर भीतर की शक्ति ने कहा,
रखो ख्वाब, जियो तुम नया।
संवेदनाओं से भरी है उसकी बात,
गहरी नज़र में छुपा ज्ञान का साथ।
हर कदम पर लिखे हैं उसके गीत,
जो सच्चाई की ओर उसे ले जाए रीत।
हमें न चाहिए कोई दाम,
न कोई पुरस्कार, न कोई तमगा।
अपने विचारों से सजे-धजे,
हमें चाहिए बस अपार सवेरा।
सिर्फ़ हर बोझ को उठाना नहीं,
स्वतंत्रता की असली पहचान है —
अपनी राह खुद चुनना,
हर मुश्किल को अपने भीतर से पार करना।
हर वादा, हर विश्वास टूटे,
पर न हमारी ज़िन्दगी की राह।
हम आज़ाद हैं, हम संजीव हैं,
स्वतंत्रता से भरा है हर हमारा पक्ष।
यही हमारा संदेश है, यही है गीत,
नारी अपनी मुक्ति का ढूंढे न कोई मीत।
सच्ची स्वतंत्रता है जब मन का है विश्वास,
तब दुनिया बदलती है, हर कदम से नया प्रकाश।
धरती के देवता — बिश्नोई
रेतीली धरती के तपते आँचल में,
फूली प्रकृति, प्रेम के कंचन पल में।
जहाँ हिरण शिशु माँ के उर से लगते,
जहाँ वनों के लिए वीर प्राण त्यागते।
वृक्षों से लिपटी थीं अमृता की बाँहें,
सैनिकों के सम्मुख उठी थीं निगाहें।
तीन सौ तिरेसठ दीप बलिदान के जले,
खेजड़ी की जड़ों में अमर गाथा पले।
उनके जीवन का हर कण व्रत-सा पावन,
शाकाहार, संरक्षण, सरलता का सावन।
न जल को अपवित्र, न जीवों का वध,
संवेदन का संकल्प, करुणा का शपथ।
बिश्नोई नहीं बस एक नाम कहानी,
वे धड़कती धरा की जीवित निशानी।
जाम्भोजी के वचनों में बसा है प्रकाश,
प्रकृति का संवर्धक, मनुज का अविनाश।
जब समकालीन सभ्यता स्वार्थ में अंधी,
बिश्नोई रहे ध्वजा बन प्रकृति की सांझी।
नारा नहीं, जीवन से उपजी सच्ची भाषा,
श्वास-श्वास में बहती वनों की अभिलाषा।
आओ, इस तपस्वी समाज को करें प्रणाम,
जिनसे सीखा जाता है, जीवन का असली काम।
धरती का संरक्षण, नारा नहीं, संस्कार है,
बिश्नोई — मानवता की अंतिम पुकार है।
“आँगन में खिली छह खुशियों की बारात”

माटी की सोंधी गंध में भीगा,
धूप से तपता प्यारा आँगन,
जहाँ राजेश ने बोया सपना,
जहाँ फूटी थी उम्मीदों का चन्दन।
हल की मूठ पकड़े जब थके हाथ,
फिर भी बोते रहे मुस्कानें,
छोटे-छोटे सपनों को सींचा,
आसमान छूती रही अरमानें।
वो दिन भी आया चुपके से,
जब छह-छह घरों की थी तैयारी,
ना शहनाईयों का शोर था वहाँ,
ना था कोई बनावटी न्यारी।
एक आँगन, एक मंडप, एक आशीष,
छः वर-वधुओं का गूंजी बंधन,
छः बारातें, छः डोलियाँ उठीं,
छः सपनों ने थामा जीवन।
माँ के आँचल में भीगे आँसू,
पिता के माथे पर संतोष की रेखा,
रिश्तों की मीठी परछाइयों में,
गूँजती रही मंगल की लेखा।
गाँव के हर कोने से आए लोग,
ले आए संग अपनापन, दुआएँ,
किसी ने नहीं तौला सोने में,
सिर्फ दिलों से दीं सबने बधाइयाँ।
ना दिखावा, ना बोझ, ना कर्ज,
बस प्रेम का उत्सव, सरलता का गीत,
राजेश ने रचा वो अद्भुत क्षण,
जहाँ रिश्तों ने पहना हरियाली का मीत।
छः सपनों की उस विदाई में,
छुपा था एक पूरा जहान,
जहाँ मिट्टी से उठती सुगंध में,
झलकता था सच्चा अभिमान।
आज भी हवाओं में तैरती है,
उस आँगन की मधुर कहानी,
जहाँ किसान बना था समाज का दीप,
जहाँ सादगी ने रची थी रवानी।
छः खुशियों के उस पर्व की सौगंध,
हर गाँव में, हर घर में बहे,
रिश्तों की मिठास बनी रहे यूँ ही,
माटी से मन के दीप जले।
“कुर्सियों से उठते सवाल”
कभी शपथ थी बदलाव की,
आज सवाल बन गई है वफ़ादारी।
कुर्सियाँ सुनती हैं अब थकी आहें,
कलमों से गिरती है लाचारी।
जिन हाथों में था हुक़्म का उजाला,
वहीं आज बुझती उम्मीदें थामे।
सिस्टम ने जकड़ा ईमानदारों को,
राजनीति ने बाँधे हाथ उनके आमने-सामने।
आदेशों की जंजीर में जकड़ी सोच,
स्वायत्तता की लाशें ढोती है हर चौक।
जहाँ निर्णय स्वतंत्र थे कल,
आज चापलूसी करती है हलचल।
इस्तीफ़े गूंजते नहीं, वे फुसफुसाते हैं,
तंत्र के पतन की ख़बर सुनाते हैं।
जो उठे थे जनता की सेवा को,
वे अब स्वयं अपनी असहायता पर रोते हैं।
यह चुप्पी साधारण नहीं, यह चेतावनी है,
कि यदि न जागे, तो राजकाज बस एक कंपन बन रह जाएगी।
शासन वही टिकता है, जहाँ निष्ठा को मरने न दिया जाए,
वरना सिंहासन पर बैठेंगे केवल कटपुतलियाँ —
और कोई पूछने वाला न आए।
“चौपाल की नई सुबह”
चौपालों की धूल भरी सांझ में,
उठी एक आवाज़ — भीगी, मगर तेज़।
“ना अब घूंघट की जंजीरें,
ना सपनों पर कोई संदेश।”
धर्मपाल के होंठों से फूटा प्रण,
बुजुर्गी नहीं, भविष्य का आह्वान था वह।
सरपंच कविता ने हटाया आंचल,
बूढ़े बरगदों ने बजायी सहमति की थपकियां।
ढाणी बीरन की रातें गवाह बनीं,
जहां परंपराएं झुकीं, साहस खड़ा हुआ।
बहुएं निखरीं, बेटियां मुस्काईं,
सपनों की देहरी पर सूरज चढ़ा हुआ।
पर्दा गिरा, परंपरा नहीं गिरी,
गिरा तो भय, झिझक, अविश्वास का अंधकार।
ढाणी बीरन ने नहीं खोया सम्मान,
बल्कि पाया अपनी बेटियों का उजास अपार।
जिस चौपाल ने कभी थामे थे सिर झुके,
अब वहां आँखों में चमकती हैं दिशाएं।
घूंघट की जगह अब धूप है माथे पर,
संकोच की जगह अब गीत हैं हवाओं में।
“परंपरा के वस्त्र बदलते हैं,
सम्मान के अर्थ नहीं।
ढाणी बीरन ने उड़ते सपनों में,
स्वीकृति के रंग भरे कहीं।”
वीर जवानों को नमन
चली हवा संग तिरंगा, गूँजे रण का शोर,
सरहद पर बैठे सपूत, आँखों में है जोर।
धरती माँ का व्रत लिया, रखेंगे सम्मान,
नमन तुम्हें हे वीर सपूतों, भारत की पहचान।
गर्म रेत हो या बर्फीला, हो चाहे तूफान,
सीना ताने बढ़ते हैं, मिटने को बलिदान।
हाथों में है बंदूक, दिल में है अरमान,
शांति की खातिर लड़ रहे, करते नहीं गुमान।
चोट लगे तो मुस्काएँ, दर्द कभी न रोयें,
माँ के चरणों में अपने जीवन को वे खोयें।
रक्त से सींचे जो धरा, उसका करें गान,
वीर जवानों के चरणों में, सारा हिंदुस्तान।
सूरज भी शरमाए जब, देखे उनका तेज,
चंदा भी मुस्काए जब, लहराए उनका ध्वज।
वीर जवानों की जय हो, गूँजे आसमान,
उनकी रक्षा में अटल रहे, सारा हिंदुस्तान।
“राष्ट्रवाद का रंगमंच”
रात की चादर तले, स्क्रीन पर उठता है शोर,
लाहौर की दीवारें काँपती हैं, ऐसा चलता है ज़ोर।
धमाकों की छवियाँ, सीजीआई की चमक,
हर एंकर बना सेनापति, हर बहस में क्रुद्ध विमर्श।
वीरता बिकती है यहाँ, पैकेज बना दी गई है मौत,
शहीदों के आँसू सूखते हैं, पर टीआरपी पाती है सौगात।
अधजली चिट्ठियाँ, अधूरी पेंशन की फाइलें,
झाँकती हैं पर्दे की ओट से — “कब आएगा मेरा हक?”
बालाकोट के साये में बनती हैं फ़िल्में,
जहाँ राष्ट्रवाद का संवाद है, पर खामोश हैं आँखें।
‘हाउ इज़ द जोश’ गूंजता है सिनेमा हॉल में,
पर शहीद की माँ के आँगन में पसरा है सन्नाटा।
प्रश्न पूछने पर लगते हैं तमगे — गद्दार, देशद्रोही,
और उत्तर नहीं, मिलते हैं मीम्स, ट्रोल, मौन की तोहीनें।
सोशल मीडिया पर झंडा लगा, चल पड़ते हैं योद्धा,
मगर युद्धभूमि में अब भी अकेला खड़ा है सच्चा सिपाही।
चुनावी मौसम में उगते हैं ‘स्ट्राइक’ के फूल,
वोटों की फ़सल काटने को उछाले जाते हैं जुमले अनगिनत।
जो चुप रहे, वह राष्ट्रभक्त; जो बोले, वह शक़ के घेरे में,
सत्ता और मीडिया की यह साठगांठ लिखती है झूठ की गाथाएँ।
कश्मीर की घाटियों में जो बहता है खून,
उसकी कोई स्क्रिप्ट नहीं, कोई रीटेक नहीं,
वह मृत्यु है — निर्वस्त्र, नग्न, अनकही,
जिसे ढकते हैं राष्ट्रवाद के पर्दे।
तो पूछो —
क्या देशभक्ति अब एक ‘सीन’ है, या संवेदना की पुकार?
क्या हम तालियाँ ही बजाएँगे, या पकड़ेंगे रोते हाथों की दरकार?
वक़्त है अब,
राष्ट्रवाद को थियेटर से उतार
ज़मीन की धूल में ढूँढने का।
“मुस्कान का दान”

कभी किसी शाम की थकी हुई साँसों में,
तुम्हारा एक हल्का सा “कैसे हो?” उतरता है —
जैसे रेगिस्तान में कोई बूँद गिर जाए,
जैसे सूनी आँखों में उम्मीद फिर गहराए।
दान क्या है?
सिर्फ अन्न, जल, या स्वर्ण की गाथा नहीं,
कभी-कभी वक्त का दिया पल भी
किसी की टूटती दुनिया की परिभाषा बदल देता है।
तुम जब अनकहे दर्द को पढ़ लेते हो,
बिना माँगे सहारा बन जाते हो —
वो भी एक दान ही है,
जो किसी मंदिर की घंटी से कहीं ज़्यादा गूंजता है।
कभी किसी को चुपचाप हौसला दे देना,
बिन शब्दों के उसकी आँखों को पढ़ लेना,
यह भी तो प्रेम की भिक्षा है —
जिसे देने वाला राजा हो जाता है,
चाहे वस्त्र फटे हों या जेबें खाली।
किसी को उसकी खोई मुस्कान लौटा देना,
किसी निराश आत्मा में जीवन की लौ जगा देना —
यह दान नहीं,
मानवता का सबसे पवित्र यज्ञ है।
तो जब भी कर सको,
किसी के मन में एक दीप जला देना,
कोई तुम्हारी वजह से मुस्कराए —
समझो तुमने सृष्टि को एक नया सूर्य दे दिया।
फसलों में लगती आग
धरती की छाती पर हल की लकीरें,
जैसे माँ के माथे की चिंता की तहरीरें।
अन्न का बीज नहीं, उसने स्वप्न बोए थे,
हर बूँद पसीने की, मानो मंत्र संजोए थे।
पर देखो! एक दिन, धूप ने साँस ली लपटों में,
हवा ने नाच किया राख की घटाओं में।
कहीं एक चिनगारी, नादान-सी या साजिशी,
और जल उठी पूरी फ़सल — एक होली अघोषित।
ना कोई नाद, ना नगाड़ा, बस चुप्पी की चीखें,
किसान खड़ा था—उस राख में ढूँढता उम्मीदों की रेखें।
जिस खेत ने बुलाया था हर सुबह उसे नाम लेकर,
वही आज झुलसा पड़ा है, किसी लावारिस की तरह।
सरकारी काग़ज़ आए—कुछ आँकड़े, कुछ वादे,
बीमे की पंक्तियों में छुपे छल और साधे।
‘मुआवज़ा मिलेगा’—यह आश्वासन का शब्द,
पर क्या कोई हिसाब रख सका आँसुओं का अर्थ?
ओ नीतिनायकों! तुम जो वातानुकूलित कमरों में,
फसलों की आग को ‘डेटा’ कहते हो,
कभी चलो गाँव, उस राख पर पाँव रखो,
महसूस करो वह तपिश जो आँतों तक जाती है।
क्यों नहीं हैं ट्रैक्टर की तरह अग्निरोधक यंत्र?
क्यों नहीं है खेत के लिए सुरक्षा का मंत्र?
क्यों नहीं है नीति में किसान की साँस की गूंज?
या फिर यह अन्नदाता अब केवल चुनावी एक तंज?
यह कविता नहीं, एक याचना है, एक दस्तावेज़,
उन आँखों का जो आँसुओं से भी पहले बुझ जाती हैं।
जब खेत जलते हैं, तब केवल भूसा नहीं,
पूरा देश धीरे-धीरे राख होता है।
शब्दों से पहले चुप्पियाँ थीं
शब्दों से पहले चुप्पियाँ थीं,
सिलवटों में सिसकती बेटियाँ थीं।
किताबों में दर्ज़ थीं उम्मीदें,
मगर दीवारों में बंद इज़्ज़त की तिज़ोरियाँ थीं।
अजमेर की गलियों में कोई ताज नहीं गिरा था,
गिरे थे भरोसे, रिश्ते, और आत्माएँ।
एक शहर था जहाँ इबादत भी ख़ामोश थी,
और इश्क़, एक जाल की भूमिका में था।
वे लड़कियाँ पढ़ती थीं, सपने बुनती थीं,
लेकिन हमने उन्हें सिखाया था—
“चुप रहो, सँभल कर चलो,
अपने ही डर को पवित्र मानो।”
फिर आया इंस्टाग्राम—
एक नई मस्जिद, एक नया मंदिर
जहाँ दोस्ती फॉलो से शुरू होती थी,
और ब्लैकमेल में तब्दील हो जाती थी।
स्क्रीन की रौशनी में उजाले कम थे,
अंधेरे अब डिजिटल हो चुके थे।
झूठे प्रोफाइलों के पीछे छिपे थे
हज़ारों अशरीरी राक्षस—
बिना सींग, बिना पूँछ,
बस एक चैट और एक क्लिक से वार करते।
लड़कियाँ फँसी नहीं थीं—
वे फँसाई गई थीं—
सिस्टम की चुप्पी, समाज की नैतिकता,
और हमारी लाचार शिक्षा नीति से।
स्कूलों ने पाठ पढ़ाए, पर
ना डर से लड़ने का पाठ पढ़ाया,
ना इज़्ज़त के नाम पर
घुटने को ना कहने का साहस।
कोई पूछे उस माँ से
जिसने बेटी को हवनकुंडों की तरह पाला,
और फिर देखा—
कैसे संस्कार चुप हो गए
जब बेटी की इज़्ज़त ब्लूटूथ पर घूमने लगी।
कोई पूछे उस प्रशासन से
जो 1992 में भी सोया था,
और अब 2025 में भी
न्याय की गाड़ी वही पुरानी घिसी पटरियों पर खिसक रही है।
क्योंकि बेटियाँ ग़लती नहीं करतीं
वे भरोसा करती हैं,
और यही भरोसा उनकी सज़ा बन जाता है।
अब समय है
कि परवरिश सिर्फ पर्दा न हो,
संस्कार सिर्फ चुप्पी न हो,
और शिक्षा सिर्फ अंकों का अंबार न हो।
हमें चाहिए वो पाठ्यक्रम
जो कहे— “तुम दोषी नहीं, तुम्हारे साथ जो हुआ, वह अन्याय है।”
जब तक यह नहीं होगा—
शब्दों से पहले चुप्पियाँ होंगी,
और बेटियाँ
फँसी नहीं, फँसाई जाती रहेंगी।
ताबूत की कीलें
शब्दों की पाठशालाएँ अब सन्नाटे में हैं,
ज्ञान के दीप बुझते हैं, फीस की लौ जलती है।
चिकित्सालय में चुप है पीड़ा, बोलता है पैकेज,
संवेदना की जगह, स्लिप पर मूल्य निकलते हैं।
औषधि अब रोग नहीं, लाभ का गणित गिनती है,
संजीवनी बिकती है, ब्रांड की चमक में।
थानों के द्वार पर न्याय नहीं—नोट खड़खड़ाते हैं,
शिकायतें चुप हैं, सिफारिशें मुखर।
तहसीलें कागज़ चबाती हैं, मुहरें घूस में डूबती हैं,
जन की गुहार पड़ी है फाइलों की नींद में।
ये पाँच स्तंभ नहीं,
अब ताबूत की कीलें हैं—
धीरे-धीरे देश की आत्मा ठोंकते हुए।
“चौंच भर प्यास”
( चुपचाप मरते परिंदों की पुकार पर एक कविता )
कोई पानी रख दे, कटोरे में भरकर,
मैं भी जी लूं ज़रा, इस तपते शहर में।
ना पुकार है मेरी किसी हैडलाइन में,
ना नाम मेरा किसी एनजीओ के बैनर में।
मैं चिड़िया हूं, गोरैया या बुलबुल,
सिर्फ परों में नहीं, सांसों में भी धूप है धुल।
कभी छज्जे पे बैठती थी,
अब छज्जा भी गरम तवा है।
पेड़ नहीं, छांव नहीं,
बस तारें हैं और धुएं की परछाई।
तुम्हारे एसी की ठंडक में
मेरी जान सूखती जाती है हर दोपहर।
तुम बिल जमा करते हो,
रील बनाते हो,
पर क्या एक बर्तन भर पानी रखना
इतना मुश्किल काम है?
मैं पूछती नहीं,
बस ताकती हूं,
कभी बालकनी, कभी खिड़की की जाली।
कभी किसी बुज़ुर्ग की मिट्टी की सुराही याद आती है।
मुझे मत बचाओ किसी बड़ी योजना से,
न किसी बजट, न किसी फंड से।
बस एक कोना दे दो —
जहां मेरी प्यास, मेरी जान बच सके।
इस गर्मी में जब तुम्हें भी लगने लगे कि सांसें भारी हैं,
तो एक बार मेरी ओर देखना…
मैं चुपचाप बैठी होऊंगी,
उस सूखे कटोरे के पास —
उम्मीद में कि
कोई पानी डाल दे तो मैं भी
चौंच भर पीलूं।
“प्राईवेट मास्टर की मूक पीड़ा”
ब्लैकबोर्ड बुदबुदाया—
“यहां हर दिन उम्मीदें राख होती हैं।”
क्लास में खड़ा शिक्षक, आंखों में नींद नहीं,
जब तनख़्वाह पूछो— हंस कर कहता है, “अब आदत सी है यार…”
सुबह की असेंबली से लेकर
शाम की स्टाफ मीटिंग तक,
हर सांस में ड्यूटी है,
हर दिन एक नई जिम्मेदारी।
रजिस्टर में नाम तो है,
पर समाज में इज़्ज़त?
छुट्टी मांगी तो उत्तर—
“आप ही तो सबसे उपलब्ध हैं!”
बच्चे कहें— “सर, बोरिंग है क्लास”,
माँ बोले— “कोचिंग में दाखिला कराओ।”
टॉपर निकले तो क्रेडिट किसी और को,
फेल हुआ तो मास्टर पे हमला!
शिक्षक दिवस पर फूल,
बाकी दिन ताने और आरोप।
महिला हो तो “मैडम”, पुरुष हो तो “भैया”,
पर वेतन वही — जो सुनते ही खीज हो जाए।
अभिभावक समूहों में रात दस बजे भी संदेश —
“होमवर्क भेजिए”,
कभी पेपर सेट, कभी रैली ड्यूटी,
कभी बच्चों की फॉर्म भराई।
पूछो— “क्यों कर रहे हैं इतना?”
तो जवाब भीतर ही घुट जाता है—
“शायद इसलिए कि हमें आदर्श माना गया था।”
पर अब गुरु नहीं,
बस एक कर्मचारी हैं हम,
मंदिर वही,
पर पुजारी… थका, भूखा, और उपेक्षित।
“गोबर संवाद”
कभी रिसर्च की चुप्पी में,
दीवारों पर गोबर उतरा।
तो कभी प्रतिरोध की गर्मी में,
वही गोबर उल्टा फेरा।
मैडम बोलीं — ‘ये संस्कृति है’,
छात्र बोले — ‘ये राजनीति!’
एसी हटाओ, मिट्टी लगाओ,
सच्ची रिसर्च की चलो नीति।
डूसू का प्रेसिडेंट आया,
और हाथ में बाल्टी लाई।
क्लासरूम का उल्टा पाठ,
प्रिंसिपल पर छाया भाई।
ज्ञान की बात गई किनारे,
अब गोबर से फैले अर्थ।
कभी प्रयोगशाला बना कॉलेज,
कभी प्रतिकार का स्थल यह पर्थ।
अब कौन सही, कौन गलत
ये बहस बेमानी लगती है।
जब शिक्षा भी ट्रेंड में बिके,
तो विद्रोह भी कहानी लगती है।
“शोध अगर सत्ता को चिढ़ाए,
तो विद्रोह भी शोध बन जाएगा।
कभी दीवारों पर पोता जाएगा,
कभी कुर्सियों पर बैठाया जाएगा।”
नींबू पानी
गर्मियों में जब प्यास लगे,
नींबू पानी से आस जगे।
ठंडी-ठंडी, मीठी-मीठी,
स्वाद से भरी अहसास दे।
नींबू बनता जब साझेदार,
घोल बने तब मजेदार।
चीनी, नमक, थोड़ा-सा पानी,
बना देते है जायकेदार।
धूप की हो न परेशानी,
बस साथ हो नींबू पानी।
पीकर इसको मिलती ठंडक,
चाहे हो गर्मी रेगिस्तानी।
तो बच्चों, इस गर्मी अभी,
नींबू पानी न भूलो कभी,
ताजगी का स्वाद बढ़ाओ,
नीम्बू पानी भर लो सभी।
हर घूंट में ठंडक का एहसास,
नींबू पानी होता है खास।
गर्मी में ये जादू काम करे,
नींबू पानी रखना पास।
“जयंती का शोर, विचारों से ग़ैरहाज़िरी”
हर चौक-चौराहे पर अब, सजती है एक माला,
बाबा साहब की तस्वीरें, और सस्ती सी दीवाला।
नेता भाषण झाड़ रहा है, मंच सजा है भारी,
पर संविधान की आत्मा है, अब भी बहुत बेचारी।
टोपियाँ नीली, झंडे ऊँचे, लगती क्रांति की टोली,
लेकिन सवाल ये उठता है — कहाँ है वो भूली बोली?
जो कहती थी “हम सब एक हैं”, जो गूँज थी अधिकारों की,
आज दबा दिया है वो आवाज़ को नारों की।
मूर्ति की पूजा होती है पर, विचार नहीं अपनाते,
जिसने कड़वा सच लिखा था, उससे क्यों अब कतराते?
जाति हटे न संसद से, न स्कूलों के गलियारों से,
दलित आज भी खड़ा है, न्याय की लंबी क़तारों में।
फ्री का राशन दे देकर, सम्मान को बेच रहे,
सत्ता की कुर्सी पर बैठ, संविधान को खींच रहे।
शब्द बड़े हैं भाषण में, कामों में है खोट,
बाबा कहते “समता दो”, ये देते वोट की नोट।
बाबा का सपना था — हर जन पावे भाग,
न कोई हो छोटा-बड़ा, न हो कोई परायापन का दाग।
पर आज जयंती के दिन भी, वही दोहराव का गीत,
पिछड़ा, दलित, वंचित वर्ग — बस भाषणों की प्रीत।
नेता वही जो हाथ में माला, मन में पाखंड लिए,
बाबा के नाम पर चलते हैं, पर मन में कपट सिए।
पुस्तकें धूल खा रहीं हैं, विचारों पर ताले,
फिर भी कहते — “हमने श्रद्धा के फूल डाले।”
जातिगत गणना से डरते, प्रतिनिधित्व से भागते,
उनके नाम पे शपथ तो लेते, पर राह नहीं अपनाते।
जो कहे “हम बाबा के चेले”, उनसे मेरा एक सवाल,
क्या संविधान को जीया तुमने, या बस किया इस्तेमाल?
न बंदनवार, न भाषण चाहिए, न ही माला भारी।
बाबा की असली श्रद्धांजलि है — न्याय की जिम्मेदारी।
श्रद्धांजलि जब सच्ची होगी, जब न्याय खड़ा होगा।
बाबा का सपना तब ही, साकार बड़ा होगा।
सरकारी स्कूल की पीड़ा
जहाँ दीवारें बोली थीं,
“आओ, अक्षर की जोत जलाएँ,”
जहाँ धूप में भी छाँव मिला करती थी
मास्टर जी की टेढ़ी मुस्कान में—
वहाँ अब सन्नाटा पसरा है,
धूल भरे प्रांगण में भविष्य भटकता है।
वो स्कूल…
जो कभी गुरुकुल थे ग़रीब के,
जो बनते थे चौखट
हर भूखे सपने की,
अब आँकड़ों में डूबे हैं,
और नीति में खो गए हैं।
माटी से सने हाथों ने
जो किताबों को पकड़ा था,
अब फिर वही हाथ
ईंट ढोते नज़र आते हैं।
क्योंकि स्कूल तो ‘अप्रासंगिक’ हो गया है
सरकारी रजिस्टर की नज़रों में।
बोर्ड की पट्टी धुँधली हो गई,
पर अभिलाषा अब भी स्पष्ट है।
छत भले टपकती हो,
पर उम्मीदें अब भी सूखी नहीं हैं।
यहाँ अब भी कोई सपना
पेंसिल से ब्रह्मांड रचता है।
सरकारी स्कूल, वह केवल भवन नहीं,
वह आत्मा है उस लोकतंत्र की
जो कहता है—
हर बच्चे को शिक्षा मिले,
बिना मूल्य, बिना भेद।
मगर अब…
विलय की योजनाएँ हैं,
नक्शे पर काटी जा रही हैं संकल्पनाएँ।
शब्दकोश से मिटाया जा रहा है
‘सार्वजनिक’ का अस्तित्व।
हे नीतिकारो, मत करो यह अपराध—
एक स्कूल का बंद होना
केवल दरवाज़ा बंद होना नहीं होता।
वह उस भरोसे का अवसान है,
जिसे एक ग़रीब माँ ने
अपने बच्चे के कंधे पर टांगा था।
उसे बंद मत करो—
नदी की तरह बहने दो उसे।
विकसित करो, पोषित करो,
जैसे एक किसान करता है खेत।
क्योंकि जब एक सरकारी स्कूल
फिर से खिल उठेगा,
तब केवल बच्चा पास नहीं होगा,
हम सब—एक समाज के रूप में—
थोड़ा और मनुष्य हो जाएँगे।
ज्योतिबा फुले: क्रांति की मशाल
( समर्पित—ज्योतिराव फूले, जिन्होंने समाज को आँखें दीं )
धूप थी अज्ञान की, अंधकार था घना,
उग आया फूले-सा एक सूर्य अनमना।
ज्योति बनी वह वाणी, दीप बना विचार,
टूटे पाखंडों के जाल, जागा हर परिवार।
जन्मा वह खेतों में, पर मन था आकाश,
शूद्र कहे गए जिन्हें, उनमें भर दी प्रकाश।
पढ़ा स्वयं, फिर कहा – “सबको पढ़ना है”,
न्याय की माटी में, बीज समता बोना है।
नारी को जब बंधन ने छीन लिया अधिकार,
सावित्री संग उन्होंने लिख डाली नई बात।
पहली शिक्षिका बनी वह, घर ही बना पाठशाला,
कहा – “नारी शिक्षित हो, तभी बुझे अंधियाला।”
ब्राह्मणवाद के ढोंग से खोला सच का द्वार,
कर्मकांड से हट के फूले ने रचा विचार।
कहा – “जाति नहीं जन्म से, कर्म से हो माप”,
इंसान वही जो इंसानियत को दे पंखों का ताप।
सत्यशोधक सभा रची, सच्चाई की खोज,
धर्म नहीं हो भेद का, हो सबमें समबोध।
न राजा का अभिमान हो, न गरीब का रोना,
ऐसा हो समाज जहां हर जन को हो जीना।
न खेतों में हो बेगारी, न मंदिर में अपमान,
हर हाथ में हो शिक्षा, हर दिल में सम्मान।
दलित, शोषित, नारी के वह बन गए पुकार,
फूले की वाणी बनी, जन-जन की आवाज़।
आज भी जब कोई बच्चा, स्कूल पहली बार जाए,
जब कोई नारी बोले, जब कोई शोषण से लड़े,
तो समझो फूले अब भी ज़िंदा हैं, चलते साथ हमारे,
उनकी क्रांति अब भी गूंजे, भारत माँ के द्वारे।
महावीर की साधना
ध्यान, तपस्या, त्याग में, जिनका जीवन लीन।
उनका पावन मार्ग है, सदा रहे हसीन।।
सत्य, अहिंसा, क्षमा, तप, धर्म, ज्ञान का सार।
महावीर के वचन में, छिपा मुक्ति का द्वार।।
हटते जब अहंकार तो, शुद्ध होवे विचार।
महावीर को मानकर, रहिये सुखी अपार।।
राग-द्वेष को त्याग कर, जीये हर इंसान।
महावीर का पंथ है, सच्चा धर्म विधान।।
लोभ-मोह को त्याग कर, पाई मन पे जीत।
महावीर की साधना, बनी जगत की प्रीत।।
मौन रहकर भी कहा, जग को सच उपदेश।
महावीर के शब्द हैं, अमृत से विशेष।।
नहीं किसी को दुःख दे, यही धर्म का मर्म।
महावीर के सूत्र में, छुपा हुआ है धर्म।।
संयम जिसकी साँस में, शांति जिसका ध्यान।
उस वीर महावीर का, करें सभी गुणगान।।
मोबाइल की कैद
मोबाइल ने छीन ली, हँसी-खुशी की बात।
घर के भीतर भी नहीं, दिल से कोई साथ।।
पिता लगे संदेश में, माँ का व्यस्त फोन।
बच्चा बोला ध्यान दो, मैं भी हूँ अब कौन?
भाई-बहना पास हैं, फिर भी दूरी आज।
मोबाइल की कैद में, रिश्तों का है राज।।
बचपन भूला आँगना, खेल न छूता पाँव,
बच्चे उलझे गेम में, छूट गया अब गाँव।।
बातें हों ना चाय पर, न हो साथ-संगीत।
मोबाइल ने तोड़ दी, परिवारों की रीत।।
चलो करें अब ठान लें, थोड़ा दें आराम।
फोन नहीं, परिवार में, फिर से लाएँ काम।
रिश्तों की गर्मी गई, बातों की बरसात।
स्क्रीनें हट जाएँ जब, खिल उठे दिन-रात।
मिल बैठें सब एक संग, थी वो प्यारी चाल।
अब मोबाइल बाँटता, घर में केवल जाल।।
पहले थी चौपाल सी, घर की मीठी बात।
अब तो सब चुपचाप हैं, कहे किसे हालात।।
घर की वो रौनक गई, हँसी-ठिठोली साथ।
चुपचाप सब फोन में, रिश्ते हुए अनाथ।।
चलो करें शुरुआत अब, बदलें यह व्यवहार,
फिर से हँसे चमन सदा, जुड़े दिल-परिवार।
सांझ-सवेरे साथ में, हो फिर वो संवाद।
मोबाइल को दें जगह, पर न हो बर्बाद।।
किसी को उजाड़ कर बसे तो क्या बसे
(हैदराबाद के जंगलों की व्यथा)
कभी थे ये हरियाली के गीत,
जहाँ पंछियों की थी मधुर प्रीत।
पेड़ों की छाँव में बजता था जीवन,
अब वहाँ गूंजता है मशीनों का क्रंदन।
जहाँ हिरण नाचते थे खुले आँगन में,
वहाँ अब बिछी है सड़कें बंजर मन में।
किसे पड़ी थी इन साँसों की राह,
जब विकास का नारा बना तबाही की चाह।
कटते रहे बरगद, पीपल, साल,
गिरे शालवन जैसे टूटी कोई दीवार।
आदिवासी रोये, पशु हुए बेघर,
पर शहर को चाहिए था नया एक घर।
किसी को उजाड़ कर बसे तो क्या बसे,
अगर जड़ें ही न बचीं तो फले कौन हँसे?
जिस मिट्टी ने जीवन को पाला,
उसी को उजाड़ा, है ये तमाशा काला।
विकास की दौड़ में हमने खोया क्या-क्या,
शायद ये सवाल अब पूछेगा सवेरा।
कंक्रीट के जंगलों में क्या बचेगी हवा,
जब पेड़ों की जगह केवल छाया धुआँ?
चलो थम जाएँ, थोड़ा सोच लें,
हर काटे पेड़ के आगे झुक के रो लें।
क्योंकि जो उजाड़ कर बसते हैं राजमहल,
वहीं इतिहास में कहलाते हैं अकल का विहल।
किसी को उजाड़ कर बसे तो क्या बसे,
वो नींव ही हिलती है, जहाँ करुणा मरे।
रिश्तों की चिता
कभी एक आँगन था…
जहाँ माँ की साड़ी की ओट में
दुनिया छुप जाया करती थी।
अब उसी आँगन में,
“सीमा रेखा” खींची गई है…
जमीनी नक्शे से रिश्तों का नापा जा रहा है!
कभी जो थाली में एक साथ खाते थे
अब “हिस्से” गिने जाते हैं…
और थाली से ज़्यादा “बयान”
महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।
भाई नहीं बोलते अब— वो वकील से बात करते हैं।
माँ की रुलाई अब दीवार के उस पार नहीं सुनाई देती,
क्योंकि कानों पर कानूनी हेडफ़ोन चढ़ा है…
और दिल… दिल तो अब
स्टाम्प पेपर से ज्यादा मुलायम नहीं रहा।
जायदादें क्या बाँटी यारों…
बँट तो हम गए थे उस दिन,
जब पहली बार “मेरा” और “तेरा”
घर के भीतर बोला गया था।
वो पहला शब्द ही अंतिम वार था — भाईचारे पर।
कभी जिस ज़मीन पर
हमारे पाँवों के निशान थे,
अब उस पर जूते चलते हैं…
और दस्तख़तों से तय होता है,
कौन किसका, कितना अपना है।
अब भी अगर पूछो
“क्या मिला इस जायदाद से?”
तो जवाब बस इतना है:
“एक दीवार, चार हिस्से,
और अनगिनत रिश्तों की चिता…”
जायदादें कहाँ बँटी थीं…
जायदादों में बँट गए भाई।
जीवन का माली
जो रोकता, जो टोकता है,
वही सत्य का दीप जला है।
जो कटु वचन से राह दिखाए,
सच मानो, सच्चा सखा है।
जिस बगिया का माली जागे,
हरियाली चारों ओर आए।
स्नेह से जो सींचे जड़ को,
उसका यश जग सारा गाए।
जहाँ न कोई अंकुश होता,
मन का पौधा सूख ही जाता।
बिन मर्यादा, बिन सिखवारे,
हर पथिक बस भटक ही जाता।
माली जो कांटे हटाता,
वही फूल की रक्षा करता।
धूप-सितम से लड़कर भी,
छाँव घनी वह सदा ही करता।
जीवन में जो दिशा दिखाए,
सन्मार्गों की ज्योत जलाए।
ऐसे माली को न भूलो,
उसके ऋण में शीश झुकाए।
बिन माली जो वृक्ष पलेगा,
वह झंझा में शीघ्र ढलेगा।
संस्कार की छाँव जरूरी,
बिन इसके सब शून्य लगेगा।
इस जीवन की राह कठिन है,
हर पथ पर संघर्ष घना है।
जो संवार दे बीज-नवेली,
वही माली धन्य बना है।
चाँद अधूरा रह गया, बँट गया संसार॥
ईद हमारा पर्व है, करवा तेरा प्यार।
चाँद मगर अनजान है, किसका है अधिकार॥
बँट गया आकाश यूँ, बँट गए अरमान।
चाँद रहा फिर सोचता, किसका मैं मेहमान॥
करवा देखे प्रीत को, ईद मांगती प्यार।
चाँद अधूरा रह गया, बँट गया संसार॥
ईद के चँदे ने कही, करवा से यह बात,
एक आकाश में बसे, क्यों बँटे दिन-रात॥
करवा कहता धैर्य रख, ईद कहे त्यौहार।
चाँद मगर है मूक सा, किसको दे उपहार॥
ईद मुबारक कह दिया, करवा पर उपवास।
दोनों के अरमान पर, सौरभ चाँद उदास॥
एक ओर थी प्रीत प्रिय, एक ओर त्यौहार।
नभ का चंदा मौन था, किसका करे विचार॥
ईद का चँदा हँस पड़ा, करवा देखे राह।
बोला चंदा सोचकर, कैसे करूँ निबाह?
करवा बोली चाँद से, मुझको दे आशीष।
ईद हँसी चुपचाप फिर, दूर करें सब टीस॥
जीवन का आधार॥
भाई अगर निभा रहा, फर्ज सभी हर बार।
समझो उसकी संगिनी, पूजन की हकदार॥
जो नारी ससुराल को, देती मान अपार।
उसका गौरव गूँजता, फैले सुख संसार॥
संबल पति का जो बने, दे सबको अधिकार।
ऐसी नारी पूज्य है, सदा करे उद्धार॥
बाँधे जो परिवार को, स्नेह सुधा से लीप।
सौरभ ऐसी नारियाँ, कुल को रखे समीप॥
जो ना रोके धर्म पथ, करे नहीं व्यवधान।
ऐसी देवी संगिनी, वंदन उसको मान॥
स्वार्थ बिना जो साथ दे, रखे स्नेह संवार।
ऐसी नारी धन्य है, जीवन का आधार॥
सँग पति जो बाँट ले, सुख-दुःख का हर घाव।
ऐसी देवी के बिना, लगे अधूरे चाव॥
जो नारी हर दुख सहे, रखे सदा संतोष।
उसका जीवन फूल सा, भरते सुख के कोष॥
दे पति को हौसला, सास-ससुर को मान।
ऐसी नारी पूज्य है, सबका करे कल्याण॥
जो अपने कर्तव्य को, समझे धर्म महान।
ऐसी नारी से बने, रोशन ये जहान॥
जो ससुराल संवारती, रिश्तों को दे जान।
ऐसी नारी से बढ़े, कुल का गौरव गान॥
कुल का गौरव गान
भाई अगर निभा रहा, फर्ज सभी हर बार।
समझो उसकी संगिनी, पूजन की हकदार॥
जो नारी ससुराल को, देती मान अपार।
उसका गौरव गूँजता, फैले सुख संसार॥
संबल पति का जो बने, दे सबको अधिकार।
ऐसी नारी पूज्य है, सदा करे उद्धार॥
बाँधे जो परिवार को, स्नेह सुधा से लीप।
सौरभ ऐसी नारियाँ, कुल को रखे समीप॥
जो ना रोके धर्म पथ, करे नहीं व्यवधान।
ऐसी देवी संगिनी, वंदन उसको मान॥
स्वार्थ बिना जो साथ दे, रखे स्नेह संवार।
ऐसी नारी धन्य है, जीवन का आधार॥
सँग पति जो बाँट ले, सुख-दुःख का हर घाव।
ऐसी देवी के बिना, लगे अधूरे चाव॥
जो नारी हर दुख सहे, रखे सदा संतोष।
उसका जीवन फूल सा, भरते सुख के कोष॥
दे पति को हौसला, सास-ससुर को मान।
ऐसी नारी पूज्य है, सबका करे कल्याण॥
जो अपने कर्तव्य को, समझे धर्म महान।
ऐसी नारी से बने, रोशन ये जहान॥
जो ससुराल संवारती, रिश्तों को दे जान।
ऐसी नारी से बढ़े, कुल का गौरव गान॥
जो अपनों का मान बढ़ाए,
वही जग में मान पाए।
संघर्षों में डटे रहो तुम,
हाथ अपनों का थाम लो,
गैरों के आगे क्यों झुकना,
सम्मान अपना जान लो।
(2)
जीवन की राह कठिन सही,
पर हिम्मत को मत छोड़ो,
जो अपने सच्चे साथ खड़े,
उनसे नाता मत तोड़ो।
(3)
आंधी आए, तूफां आए,
डरकर पीछे ना हटो,
जब अपने संग खड़े रहें,
तो तुम भी साहस से डटो।
(4)
अपनों की छाँव सुकून दे,
जहाँ स्नेह का बसेरा हो,
दुनिया के छल से बच जाना,
बस प्यार भरा सवेरा हो।
(5)
सम्मान वही जो घर में मिले,
जो अपनों का मान बढ़ाए,
गैरों के आगे सिर न झुके,
परिवार का साथ निभाए।
चलो संग-संग, कदम बढ़ाएँ,
मुश्किलों से ना घबराएँ,
जो अपनों का मान बढ़ाए,
वही जग में मान पाए!
माटी अब भी पूछती
पैदा क्यों होते नहीं, भगत सिंह से वीर,
माटी अब भी पूछती, कब जागेगी पीर?
स्वप्न सिसकते रह गए, कहाँ गई वह बात,
चिंगारी तो जल रही, राख हुई सौगात।
नारे मंच पर गूंजते, हुई ज़ुबां है मौन,
जोश बिखरकर रह गया, जज़्बा लाये कौन।
होते हैं भाषण बहुत, पर खामोश ज़मीर,
शब्द बचे हैं युद्ध के, गए कहाँ रणधीर?
भारत माता पूछती, कौन बने कुर्बान,
लाल हुए थे जो कभी, लगते अब अनजान?
सबके हित की बात का, बुझने लगा उबाल,
सत्ताओं की साँकलें, बाँध रहीं भूचाल।
सत्ताओं की साँकलें, बाँध रहीं तक़दीर,
ख़ुद को ख़ुद से हारकर, भारत खड़ा अधीर।
छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना
बारिश को अब आने दो।
तपती गर्मी जाने दो॥
छोड़ो व्यर्थ पानी बहाना,
जीवन को बच जाने दो॥
ये बादल भी कुछ कह रहे।
इनको मन की गाने दो॥
कटते हुए पेड़ बचाओ।
शुद्ध हवा कुछ आने दो॥
पंछी क्या कहते है सुन लो।
उनको पंख फैलाने दो॥
फोटो में ही लगते पौधे।
सच को बाहर लाने दो॥
होती कैसे धरा प्रदूषित।
सबको पता लगाने दो॥
पौध लगाकर पानी दे हम।
सच्चा धर्म निभाने दो॥
चल चुकी है बहुत आरिया।
धरती कुछ बच जाने दो॥
कैसे अब हरियाली होगी।
सौरभ प्रश्न उठने दो॥
झुलस रही पावन धरती पर।
हरियाली तुम आने दो॥
आँगन-आँगन रंग हो

होली के त्यौहार में, ऐसी उठे तरंग।
तन-मन में जो प्यार की, भर दे ख़ूब उमंग॥
आँगन-आँगन रंग हो, हो रंगीला फाग।
बैर-भाव को छोड़कर, मिलें सभी के राग॥
झूम उठे उल्लास से, क्या बूढ़े क्या बाल।
उड़े ख़ूब इस फाग में, सौरभ रंग गुलाल॥
सड़क-गली हर चौक पर, मचे फाग की धूम।
रार बैर की छोड़कर, राग प्रीत ले चूम॥
होली के त्यौहार में, इतनी तो हो बात।
सबके गालों को मिले, रंगों की सौगात॥
आते होली फाग यूं, देते हैं सन्देश।
प्रेम परस्पर दे सदा, मिटे हृदय से क्लेश॥
फागुन में यूं प्यार से, गा होली के गीत।
पुष्प खिले बस चाह के, होकर के मनमीत॥
फागुन में यूं प्यार से
होली के त्यौहार में, ऐसी उठे तरंग।
तन-मन में जो प्यार की, भर दे ख़ूब उमंग॥
आँगन-आँगन रंग हो, हो रंगीला फाग।
बैर-भाव को छोड़कर, मिलें सभी के राग॥
झूम उठे उल्लास से, क्या बूढ़े क्या बाल।
उड़े ख़ूब इस फाग में, सौरभ रंग गुलाल॥
सड़क-गली हर चौक पर, मचे फाग की धूम।
रार बैर की छोड़कर, राग प्रीत ले चूम॥
होली के त्यौहार में, इतनी तो हो बात।
सबके गालों को मिले, रंगों की सौगात॥
आते होली फाग यूं, देते हैं सन्देश।
प्रेम परस्पर दे सदा, मिटे हृदय से क्लेश॥
फागुन में यूं प्यार से, गा होली के गीत।
पुष्प खिले बस चाह के, होकर के मनमीत॥
वहीं खड़ी है द्रौपदी
चीरहरण को देख कर, दरबारी सब मौन।
प्रश्न करे अँधराज पर, विदुर बने वह कौन॥
राम राज के नाम पर, कैसे हुए सुधार।
घर-घर दुःशासन खड़े, रावण है हर द्वार॥
कदम-कदम पर हैं खड़े, लपलप करें सियार।
जाये तो जाये कहाँ, हर बेटी लाचार॥
बची कहाँ है आजकल, लाज-धर्म की डोर।
पल-पल लुटती बेटियाँ, कैसा कलयुग घोर॥
वक्त बदलता दे रहा, कैसे-कैसे घाव।
माली बाग़ उजाड़ते, मांझी खोये नाव॥
नज़र झुकाये लड़कियाँ, रहती क्यों बेचैन।
उड़ती नींदें रात की, मिले न दिन में चैन॥
मछली जैसे हो गई, अब लड़की की पीर।
बाहर सांसों की पड़ी, घर में दिखे अधीर॥
लुटती हर पल द्रौपदी, जगह-जगह पर आज।
दुश्शासन नित बढ़ रहे, दिखे नहीं ब्रजराज॥
घर-घर में रावण हुए, चौराहे पर कंस।
बहू-बेटियाँ झेलती, नित शैतानी दंश॥
वहीं खड़ी है द्रौपदी और बढ़ी है पीर।
दरबारी सब मूक हैं, कौन बचाये चीर॥
छुपकर बैठे भेड़िये, लगा रहे हैं दाँव।
बच पाए कैसे सखी, अब भेड़ों का गाँव॥
वीर शिवा रण बाँकुरा
आया है शुभ जन्म दिन, वीर शिवा का आज।
मना रहा है देश सँग, पूरा सकल समाज॥
लगे सदा पहाड़ जिन्हें, बस मिट्टी का ढेर।
देख शिवा के हौसले, हट जाते थे शेर॥
वीर शिवाजी ने दिया, हमको ये स्वराज।
भारत के उस वीर को, याद करें हम आज॥
वीर शिवा की याद ही, भरती दिल में जोश।
अरि मुगल काट काटकर, ख़ूब उड़ाए होश॥
वीर शिवा रण बाँकुरा, है भारत की आन।
युगों-युगों शाश्वत रहे, उनका खूं बलिदान॥
वीर शिवा के गौरव को, करें हम आत्मसात।
मिट पाएंगे देश से, सौरभ तब आघात॥
धर्म सनातन पूछता, रोकर अब चुपचाप।
वीर शिवा की भूमि पर, क्यों है भीषण पाप॥
दीमक लगे गुलाब
लोग अपने में
जीने लग गए है।
अपने कहलाने वाले
लोग कहाँ रह गए है?
पराये दुख को पीना।
एक-दूजे हेतु जीना॥
पुराने चर्चे बन गए है।
धोखा खा खाकर
पाक टूट मन गए है॥
वो प्यार भरे गाने।
वो मिलन के तराने॥
आज ख़ामोश हो गए हैं।
न जाने कहाँ खो गए है?
सदियों से पलते जाते।
अपनेपन के रिश्ते नाते॥
जलकर के राख हो गए हैं।
बीती हुई बात हो गए है॥
माँ का छलकता हुआ दुलार।
प्रिया का उमड़ता अनुपम प्यार॥
मानो- दीमक लगे गुलाब हो गए है।
हर चेहरे पर नकाब हो गए है॥
प्रेम से सरोबार जहाँ।
आज बचा है कहाँ?
सब लोग व्यस्त हो गए हैं।
अपने में मस्त हो गए हैं॥
स्वार्थ की बहती वायु।
कर रही है शुष्क स्नायु॥
हृदय चेतना शून्य हो गए हैं।
चेहरे भाव शून्य हो गए हैं॥
वो प्यार भरे नगमें।
जो जोश भर दे दिल में॥
आज अनबोल हो गए हैं।
रिश्तों के मोल हो गए हैं॥
खड़े ख़ामोश फैलाए बाहें।
चौपाल-चबूतरे सब चौराहें॥
कह रहे हैं सिसक-सिसक कर-
अपनेपन के दिन लद गए हैं।
लोग अपने में जीने लग गए हैं॥
शीलहरण की कहे कथाएँ
महाभारत हो रहा फिर से अविराम।
आओ मेरे कृष्णा, आओ मेरे श्याम॥
शकुनि चालें चल रहा है,
पाण्डुपुत्रों को छल रहा है।
अधर्म की बढ़ती ज्वाला में,
संसार सारा जल रहा है। ।
बुझा डालो जो आग लगी है,
प्रेम-धारा बरसाओ मेरे श्याम॥
शासक आज बने शैतान,
मूक, विवश है संविधान।
झूठ तिलक करवा रहा,
खतरे में है सच की जान।।
गूंज उठे फिर आदर्शी स्वर,
मोहक बांसुरी बजाओ मेरे श्याम॥
दु: शासन की क्रूर निगाहें,
भरती हर पल कामुक आहें।।
कदम-कदम पर खड़े लुटेरे,
शीलहरण की कहे कथाएँ।।
खोए न लाज कोई पांचाली,
आकर चीर बढ़ाओ मेरे श्याम॥
आग लगी नंदन वन में,
रूदन हो रहा वृंदावन में।
नित जन्मते रावण-कंस,
बढ़ रहा पाप भुवन में।।
मिटे अनीति, अधर्म, अंधकार सारे,
आकर आशादीप जलाओ मेरे श्याम॥
नई कहानी बन
बस दिल से सच्चा हिंदुस्तानी बन।
आये देश के काम वह जवानी बन॥
क्यों जला रहा ख़ुद से ही ख़ुद को,
अगर वह आग तो तू पानी बन।
क्या हुआ जो उन्होंने भुला दिया,
तेरी याद सताए वह निशानी बन।
वक़्त के साथ बदलेंगे सभी रिश्ते,
तू दिल में रहे सदा वह रवानी बन।
ग़ज़लें बहुत लिखी गयी मोहब्बत की,
ये नया दौर है तू नई कहानी बन।
क्या बिगाड़ लेगी पतझड़ सौरभ का,
तू सावन की फुहार मस्तानी बन।
निज रक्त से नई इबारत लिखकर,
देशहित की इतिहासिक कुर्बानी बन।
सरस्वती वंदना
●●●
माँ वीणा वादिनी मधुर स्वर दो,
हर जिह्वा वैभवयुक्त कर दो ।
मन सारे स्नेहमय हो जाए,
ऐसे गुणों का अमृत भर दो ।।
●●●
माँ वीणा की झंकार भर दो,
जीवन में नवल संचार कर दो ।
हर डाली खुशबुमय हो जाए,
ऐसे सब गुलजार कर दो ।।
●●●
अंतस तम को दूर कर दो,
अंधकार को नूर कर दो ।
मन से मन का हो मिलन,
भेद सारे चूर कर दो ।।
●●●
गान कर माँ रागिनी का,
भान कर माँ वादिनी का ।
पूरी हो सब कामनाएं,
दो सुर माँ रागिनी का ।।
●●●
कहता है गणतंत्र
बात एक ही यूँ सदा, कहता है गणतंत्र।
बने रहे वो मूल्य सब, जन- मन हो स्वतंत्र।
संसद में मचता गदर, है चिंतन की बात।
हँसी उड़े संविधान की, जनता पर आघात।।
भाषा पर संयम नहीं, मर्यादा से दूर।
संविधान को कर रहे, सांसद चकनाचूर।।
दागी संसद में घुसे, करते रोज मखौल।
देश लुटे लुटता रहे, खूब पीटते ढोल।।
जन जीवन बेहाल है, संसद में बस शोर।
हित सौरभ बस सोचते, सांसद अपनी ओर।।
संसद में श्रीमान जब, कलुषित हो परिवेश।
कैसे सौरभ सोचिए, बच पायेगा देश।।
लोकतंत्र अब रो रहा, देख बुरे हालात।
संसद में चलने लगे, थप्पड़, घूसे, लात।।
जनता की आवाज का, जिन्हें नहीं संज्ञान।
प्रजातंत्र का मंत्र है, उन्हें नहीं मतदान।।
हमें आज है सोचना, दूर करे ये कीच।
अपराधी नेता नहीं, पहुंचे संसद बीच।।
अपराधी सब छूटते, तोड़े सभी विधान।
निर्दोषी है जेल में, रो रहा संविधान।।
प्रजातंत्र का तंत्र
भारत के गणतंत्र की,
ये कैसी है शान।
भूखे को रोटी नहीं,
बेघर को पहचान॥
सब धर्मों के मान की,
बात लगे इतिहास।
एक-दूजे को काटते,
ये कैसा परिहास॥
प्रजातंत्र का तंत्र अब,
लिए खून का रंग।
धरम-जात के नाम पर,
छिड़ती देखो जंग॥
पहले जैसे कहाँ रहे,
संविधान के मीत।
न्यारा-न्यारा गा रहा,
हर कोई अब गीत॥
विश्व पटल पर था कभी
भारत का सम्मान।
लोभी नेता देश के,
लूट रहे वह मान॥
रग-रग में पानी हुआ,
सोये सारे वीर।
कौन हरे अब देश में
भारत माँ की पीर॥
मुरझाये से अब लगे,
उत्थानो के फूल।
बिखरे है हर राह में,
बस शूल ही शूल॥
आये दिन ही बढ़ रहा,
देखो भ्रष्टाचार।
वैद्य ही जब लूटते,
करे कौन उपचार॥
कैसे जागे चेतना,
कैसे हो उद्घोष।
कर्णधार ही देश के,
लेटे हो बेहोश॥
जने नहीं क्यों बोस॥
●●●
कैसे भूले बोस को, ‘सौरभ’ हिन्दुस्तान।
कतरा-कतरा खून का, उनका है कुर्बान॥
●●●
बच्चा-बच्चा बोस का, ऐसा हुआ मुरीद।
शामिल होकर फ़ौज में, होने चला शहीद॥
●●●
भारत के उस बोस की, गाथा बड़ी महान।
अपनी मिट्टी के लिए, छोड़ा सकल जहान॥
●●●
कब दुश्मन से थे झुके, जीए बोस प्रचंड।
नहीं गुलामी को सहा, सहा न कोई दंड॥
●●●
भारत उनकी आन था, भारत पहला धर्म।
भारत ही था बोस का, सबसे पहला कर्म॥
●●●
एक सभी से बात ये, पूछे आज सुभाष।
‘सौरभ’ क्यों है दिख रही, भारत मात उदास॥
●●●
भारत माँ की कोख पर, होता अब अफ़सोस।
कायर, दगाबाज जने, जने नहीं क्यों बोस॥
●●●
तिथियाँ बदले और पल, बदलेंगे सब ढंग।
खो जायेगा एक दिन, ‘सौरभ’ तन का रंग॥
विवश विद्यार्थी चुन रहे, आत्महत्या की राह
भारी ट्यूशन भीड़ में, सब बच्चे एकांत।
रैंकिंग के दबाव में, रह ना पाए शांत।।
भोले बचपन पर चले, ऐसे मारक तीर।
जीवन कुंठित-सा हुआ, लिए कोचिंग पीर।।
निगल गई प्रतियोगिता, मूक हृदय के भाव।
सच में अत्याचार है, कोचिंग का लगाव।।
चलते ट्यूशन नाम पर, कागज़ के जलयान।
सौदा करती मौत का, ये ऐसी दूकान।।
बिकती शिक्षा सड़क पर, भविष्य है गुमराह।
विवश विद्यार्थी चुन रहे, आत्महत्या की राह।।
कुछ सुलगते प्रश्न हम, करे स्वयं से आज।
अगर न बच्चे ही रहे, होगा किस पर नाज़।।
सौरभ उठने आज दो, सच्ची हिय हुंकार।
मन से हर बच्चा पढ़े, हटे कोचिंग भार।।
याद रहेगा शूरमा
सच्चे वीर सपूत थे,
महाराणा प्रताप।
लेकर चेतक को बढे,
दिए मुग़ल सब नाप॥
हल्दी घाटी में लड़े,
बन दुश्मन पर काल।
मुग़ल देखते रह गए,
एक चली ना चाल॥
राणा जी की शूरता,
देख शत्रु थे चूर।
कभी गुलामी गैर की,
करी नहीं मंजूर॥
हाथ परी भाला लिए,
आये बन कर दूत।
जिए गर्व से थे सदा,
मेवाड़ी सच पूत॥
जब तक धरती ये रहे,
और सूर्य का ताप।
याद रहेगा शूरमा,
महाराणा प्रताप॥
याद रहेगा शूरमा
सच्चे वीर सपूत थे,
महाराणा प्रताप।
लेकर चेतक को बढे,
दिए मुग़ल सब नाप॥
हल्दी घाटी में लड़े,
बन दुश्मन पर काल।
मुग़ल देखते रह गए,
एक चली ना चाल॥
राणा जी की शूरता,
देख शत्रु थे चूर।
कभी गुलामी गैर की,
करी नहीं मंजूर॥
हाथ परी भाला लिए,
आये बन कर दूत।
जिए गर्व से थे सदा,
मेवाड़ी सच पूत॥
जब तक धरती ये रहे,
और सूर्य का ताप।
याद रहेगा शूरमा,
महाराणा प्रताप॥
प्रजातंत्र का तंत्र
भारत के गणतंत्र की,
ये कैसी है शान।
भूखे को रोटी नहीं,
बेघर को पहचान॥
सब धर्मों के मान की,
बात लगे इतिहास।
एक-दूजे को काटते,
ये कैसा परिहास॥
प्रजातंत्र का तंत्र अब,
लिए खून का रंग।
धरम-जात के नाम पर,
छिड़ती देखो जंग॥
पहले जैसे कहाँ रहे,
संविधान के मीत।
न्यारा-न्यारा गा रहा,
हर कोई अब गीत॥
विश्व पटल पर था कभी
भारत का सम्मान।
लोभी नेता देश के,
लूट रहे वह मान॥
रग-रग में पानी हुआ,
सोये सारे वीर।
कौन हरे अब देश में
भारत माँ की पीर॥
मुरझाये से अब लगे,
उत्थानो के फूल।
बिखरे है हर राह में,
बस शूल ही शूल॥
आये दिन ही बढ़ रहा,
देखो भ्रष्टाचार।
वैद्य ही जब लूटते,
करे कौन उपचार॥
कैसे जागे चेतना,
कैसे हो उद्घोष।
कर्णधार ही देश के,
लेटे हो बेहोश॥
उठती ऊँगली और पे…
सुन ले थोड़े सच्चे बोल,
मतकर इतनी टाल-मटोल।
सोच समझकर छूना आग,
बेमतलब ना ले पंगे मोल।
दुनिया सब कुछ जानती,
क्यों पीटता ख़ुद के ढोल।
कितने ही तू नारद नचा,
धरती रहनी आख़िर गोल।
तन उजला, चरित्र काला,
छोड़ दे प्यारे ढोंगी चोल।
दाढ़ी में तिनका चोर के,
बता रहे तेरे ही बोल।
तेरी उठती ऊँगली और पे,
कहती पहले ख़ुद को तोल।
कब तक यहाँ बदी टिकी,
मत इतरा, न इतना डोल।
सत्य सदा ही सत्य रहा,
बाकी खुलती सबकी पोल।
प्यार के बदले प्यार मिले,
भाईचारे में बैर ना घोल।
संक्रांति, लोहड़ी मने
जन जीवन खुश हो रहा, हर्षित हुआ अनंग।
संक्रांति, लोहड़ी मने, खुशियाँ छाई अंग।।
मकर संक्रांति ये कहे, रहो सजग तैयार।
हृद पराग परिपूर्ण हो, झूम उठे संसार।।
बहुत-बड़ा यह पर्व है, जग जीवन आधार।
आधि-व्याधि सब दूर हो, करे नवल संचार।।
मकर संक्रांति पर्व ये, भरता नव उमंग।
तिल-गुड़ खा पोषित हो, जीवन की पतंग।।
दान पुण्य के दिवस पर, जाऐं तीरथ धाम।
दीन दुखी को दान कर, बोलो जय श्री राम।।
स्वस्थ गुणी संस्कार से, काया रहे निरोग।
पर्व मकर संक्रांति पर, सुखद आज संयोग।।
सौरभ! प्रभु जी से करें, एक यही अरदास।
सूर्य देव अब कर कृपा, हो पूरी सब आस।।
हिंदी मेरे उर बसे
आन-बान सब शान है, और हमारा गर्व।
हिंदी से ही पर्व है, हिंदी सौरभ सर्व।।
हिंदी हृदय गान है, मृदु गुणों की खान।
आखर-आखर प्रेम है, शब्द- शब्द है ज्ञान।।
बिंदिया भारत भाल की, हिंदी एक पहचान।
सैर कराती विश्व की, बने किताबी यान।।
प्रीत प्रेम की भूमि है, हिंदी निज अभिमान।
मिला कहाँ किसको कहीं, बिन भाषा सम्मान।।
वन्दन, अभिनन्दन करे, ऐसा हो गुणगान।
ग्रंथन हिंदी का कर लो, तभी मिले सम्मान।।
हिंदी भाषा रस भरी, रखती अलग पहचान।
हिंदी वेद पुराण है, हिंदी हिन्दुस्तान।।
हिंदी की मैं दास हूँ, करूँ मैं इसकी बात।
हिंदी मेरे उर बसे, हिंदी हो जज्बात ।।
निज भाषा का धनी जो, वही सही धनवान।
अपनी भाषा सीख कर, बनता व्यक्ति महान।।
मौसम बदले रंग ज़ब, तब बदले परिवेश।
हो हिंदीमय स्वयं जब, तभी बदलता देश।।
निज भाषा बिन ज्ञान का, होता कब उत्थान।
अपनी भाषा में रचे, सौरभ छंद सुजान।।
एक दिवस में क्यों बंधे, हिन्दी का अभियान।
रचे बसे हर पल रहे, हिन्दी हिन्दुस्तान।।
अपणी बिटिया तै प्रीत जोड़ तूं
हाथ जोड़ कहूँ अम्मा मेरी
मैं हूँ बिन जन्मी नादान, इबै ना मारै मनै।
सै छह महीने का गर्भ तेरा
ना छीनै माँ तू नसीब मेरा
अम्मा मेरी मैं हूँ तेरी संतान, इबै ना मारै मनै।
मैं भी तेरै आंगण खेलूगी
तेरे दुखड़े मिलके झेलूंगी
अम्मा मेरी बात मेरी मान, इबै ना मारै मनै।
मान मनै भी धन तू अपणा
पूरा करूं तेरा हर सपना
अम्मा के तनै नुकसान, इबै ना मारै मनै।
बदल्या टेम सै लीक तोड़ तूं
अपणी बिटिया तै प्रीत जोड़ तूं
अम्मा मेरी मैं हूँ तेरी जान, इबै ना मारै मनै।
हाथों में है किताब मेरे।
उतरेंगे नकाब तेरे।
सुन तो ले जवाब मेरे॥
भरे थे तो क़द्र न जानी,
सूखे अब तालाब तेरे।
अपने खाते मत खुला,
कच्चे है हिसाब तेरे।
देख चकित रह जायेगा
मित्र है दगाबाज़ तेरे।
काँटों से पथ तू सजा,
ताज़ा है गुलाब मेरे।
रख तलवारे तू संभाले,
हाथों में है किताब मेरे।
जो चाहेगा ‘सौरभ’ बुरा,
सितारे हो ख़राब तेरे॥
आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान॥
●●●
खिली-खिली हो जिंदगी, महक उठे अरमान।
आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान॥
●●●
दर्द दुखों का अंत हो, विपदाएँ हो दूर।
कोई भी न हो कहीं, रोने को मजबूर॥
●●●
छेड़ रही है प्यार की, मीठी-मीठी तान।
नए साल के पँख पर, ख़ुशबू भरे उड़ान॥
●●●
बीत गया ये साल तो, देकर सुख-दुःख मीत।
क्या पता? क्या है बुना? नई भोर ने गीत॥
●●●
माफ़ करे सब गलतियाँ, होकर मन के मीत।
मिटे सभी की वेदना, जुड़े प्यार की रीत॥
●●●
जो खोया वह सोचकर, होना नहीं उदास।
जब तक साँसे हैं मिली, रख खुशियों की आस॥
●●●
पिंजड़े के पंछी उड़े, करते हम बस शोक।
जाने वाला जायेगा, कौन सके है रोक॥
●●●
पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव।
कैसे पहुँचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव॥
●●●
रुको नहीं चलते रहो, जीवन है संघर्ष।
नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष॥
●●●
दुःख से मत भयभीत हो, रोने की क्या बात।
सदा रात के बाद ही, हँसता नया प्रभात॥
●●●
चमकेगा सूरज अभी, भागेगा अँधियार।
चलने से कटता सफ़र, चलना जीवन सार॥
●●●
काँटें बदले फूल में, महकेंगें घर-द्वार।
तपकर दुःख की आग में, हमको मिले निखार॥
●●●
-प्रियंका सौरभ
नए साल का सूर्योदय
नए साल का सूर्योदय,
खुशियों के लिए उजाले हो॥
पल-पल खेल निराले हो,
आँखों में सपने पाले हो।
नए साल का सूर्योदय यह,
खुशियों के लिए उजाले हो॥
मानवता का संदेश फैलाते,
मस्जिद और शिवाले हो।
नीर प्रेम का भरा हो सब में,
ऐसे सब के प्याले हो॥
होली जैसे रंग हो बिखरे,
दीपों की बारात सजी हो,
अंधियारे का नाम ना हो,
सबके पास उजाले हो॥
हो श्रद्धा और विश्वास सभी में,
नैतिक मूल्य पाले हो।
संस्कृति का करे सब पूजन,
संस्कारों के रखवाले हो॥
चौराहें न लुटे अस्मत,
दु: शासन न फिर बढ़ पाए,
भूख, गरीबी, आतंक मिटे,
न देश में धंधे काले हो॥
सच्चाई को मिले आजादी,
लगे झूठ पर ताले हो।
तन को कपड़ा, सिर को साया,
सबके पास निवाले हो॥
दर्द किसी को छू न पाए,
न किसी आँख से आंसू आए,
झोंपडिय़ों के आंगन में भी,
खुशियों की फैली डाले हो॥
‘जिए और जीने दे’ सब
न चलते बरछी भाले हो।
हर दिल में हो भाईचारा
नाग न पलते काले हो॥
नगमों-सा हो जाए जीवन,
फूलों से भर जाए आंगन,
सुख ही सुख मिले सभी को,
एक दूजे को संभाले हो॥
आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान॥
●●●
खिली-खिली हो जिंदगी, महक उठे अरमान।
आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान॥
●●●
दर्द दुखों का अंत हो, विपदाएँ हो दूर।
कोई भी न हो कहीं, रोने को मजबूर॥
●●●
छेड़ रही है प्यार की, मीठी-मीठी तान।
नए साल के पँख पर, ख़ुशबू भरे उड़ान॥
●●●
बीत गया ये साल तो, देकर सुख-दुःख मीत।
क्या पता? क्या है बुना? नई भोर ने गीत॥
●●●
माफ़ करे सब गलतियाँ, होकर मन के मीत।
मिटे सभी की वेदना, जुड़े प्यार की रीत॥
●●●
जो खोया वह सोचकर, होना नहीं उदास।
जब तक साँसे हैं मिली, रख खुशियों की आस॥
●●●
पिंजड़े के पंछी उड़े, करते हम बस शोक।
जाने वाला जायेगा, कौन सके है रोक॥
●●●
पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव।
कैसे पहुँचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव॥
●●●
रुको नहीं चलते रहो, जीवन है संघर्ष।
नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष॥
●●●
दुःख से मत भयभीत हो, रोने की क्या बात।
सदा रात के बाद ही, हँसता नया प्रभात॥
●●●
चमकेगा सूरज अभी, भागेगा अँधियार।
चलने से कटता सफ़र, चलना जीवन सार॥
●●●
काँटें बदले फूल में, महकेंगें घर-द्वार।
तपकर दुःख की आग में, हमको मिले निखार॥
जाति-धर्म के नाम पर
जाति-धर्म के नाम पर,
छिड़ती देखो जंग॥
भारत के गणतंत्र की,
ये कैसी है शान।
भूखे को रोटी नहीं,
बेघर को पहचान॥
सब धर्मों के मान की,
बात लगे इतिहास।
एक-दूजे को काटते,
ये कैसा परिहास॥
प्रजातंत्र का तंत्र अब,
लिए खून का रंग।
जाति-धर्म के नाम पर,
छिड़ती देखो जंग॥
पहले जैसे कहाँ रहे,
संविधान के मीत।
न्यारा-न्यारा गा रहा,
हर कोई अब गीत॥
विश्व पटल पर था कभी
भारत का सम्मान।
लोभी नेता देश के,
लूट रहे वह मान॥
रग-रग में पानी हुआ,
सोये सारे वीर।
कौन हरे अब देश में
भारत माँ की पीर॥
मुरझाये से अब लगे,
उत्थानो के फूल।
बिखरे है हर राह में,
बस शूल ही शूल॥
आये दिन ही बढ़ रहा,
देखो भ्रष्टाचार।
वैद्य ही जब लूटते,
करे कौन उपचार॥
कैसे जागे चेतना,
कैसे हो उद्घोष।
कर्णधार ही देश के,
लेटे हो बेहोश॥
देश हुआ बेचैन।
भारत के उस पूत को,
मेरा प्रथम प्रणाम।
सरहद पर जो है मिटा,
हाथ तिरंगा थाम॥
सींच चमन ये साथियों,
खिला गए जो फूल।
उन वीरों के खून को,
जाना तुम मत भूल॥
आओ मेरे साथियों,
कर लें उनका ध्यान।
शान देश की जो बने,
देकर अपनी जान॥
फ़िल्म-खेल का ही चढ़ा,
है सब पर उन्माद।
फौजी मरता देश पर,
कौन करे अब याद॥
आज़ादी अब रो रही,
देश हुआ बेचैन।
देख शहीदों के भरे
दुःख से यारों नैन॥
मैंने उनको भेंट की
दिवाली और ईद।
सीमा पर मर मिट गए,
जितने वीर शहीद॥
काम करो इंग्लैंड में,
रहें भला जापान।
रखना दोस्त सहेजकर,
दिल में हिंदुस्तान॥
आज़ादी अब पूछती,
सबसे यही सवाल।
याद किसे है देश में,
भारत माँ के लाल॥
देकर अपनी जान जो,
गए हमे दे ताज़।
उन वीरों के खून को,
याद करे सब आज॥

प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045







