विनय साग़र जायसवाल की ग़ज़लें | Vinay Sagar Jaiswal Poetry
मुक़द्दर फूट गया
उनके आने का वादा जब टूट गया
दिल बोला के आज मुक़द्दर फूट गया
इस दर्जा मदहोश किया उन आँखों ने
दिल की दौलत पल भर में ही लूट गया
कैसे बोझ सहे इतने सदमों का दिल
शीशे का बर्तन था आखिर टूट गया
वक़्त की आँधी होश कहाँ रहने देती
कौन मुसाफ़िर कितना पीछे छूट गया
उसका रस्ता देख रहा होगा कोई
जल्दी जल्दी पहिन के घर से सूट गया
साग़र कैसे मिलने जायें अब उनसे
इस गुर्बत में टूट हमारा बूट गया
हालात बदल देते हैं
खेल क़िस्मत के तो दिन रात बदल देते हैं
आदमी बदले न हालात बदल देते हैं
जब भी करता हूँ मैं इज़हारे-मुहब्बत उनसे
मुस्कुरा कर वो सदा बात बदल देते हैं
सोचिये दिल पे गुज़रती है मेरे क्या उस दम
जिस घड़ी आप मुलाकात बदल देते हैं
आज के दौर में क़ासिद पे भरोसा ही नहीं
बीच रस्ते में जवाबात बदल देते हैं
मशवरा करना किसी से तो रहे ध्यान यही
लोग शातिर हैं ख़यालात बदल देते हैं
किस तरह कोई ग़ज़ल छेड़े मुहब्बत वाली
सारा माहौल फ़सादात बदल देते
अपनी नाकामी पे रोने से भला क्या साग़र
हर नतीजे को तजुर्बात बदल देते हैं
क़ासिद – पत्र वाहक , हरकारा
अपनी जफ़ाओं में
जी भर के इज़ाफ़ा कर तू अपनी जफ़ाओं में
इक दिन तो असर होगा मेरी भी दुआओं में
चाहा तो बहुत तेरा हो ज़िक्र वफ़ाओं में
अफ़सोस तेरी फ़ितरत उर्याँ है फ़ज़ाओं में
उड़ जायेंगी आँखों से इक रोज़ तेरी नींदें
इतना तो यक़ीनन है दम मेरी सदाओं में
रंगीन तबीयत का आलम है अजब देखो
बेबाक़ निगाहों में मासूम अदाओं में
कुछ उनकी भी साज़िश है कुछ दिल के तकाज़े भी
इक राज़ है पोशीदा दोनों की ख़ताओ में
इक सादा सी आदत इक शोख शरारत है
कुछ अपनी वफ़ाओं में कुछ उनकी जफ़ाओं में
माना कि हुआ ज़ख़्मी पर सांस तो बाक़ी है
इस पर भी मुझे देखो फेंका है ख़लाओं में
हर हाल में ऐ साग़र महफ़ूज़ नशेमन है
था ज़ोर जलाने का कितना ही हवाओं में
अपने बस की बात नहीं
तेरी नज़र से आँख मिलाना अपने बस की बात नहीं
आज यहाँ से होश में जाना अपने बस की बात नहीं
प्यार तुम्हीं से करते हैं हम बस इतना ही कहना है
इन लफ़्जों को मुँह पर लाना अपने बस की बात नहीं
दूर से ही वो रोज़ इशारों में अटखेली करते हैं
आँखों आँखों प्यार जताना अपने बस की बात नहीं
इक मुद्दत से तरसे हैं हम दिल की बात बताने को
देख के उनको बस मुस्काना अपने बस की बात नहीं
साक़ी तेरी मंशा क्या है इतना तो बतला दे तू
पैमानों को अब टकराना अपने बस की बात नहीं
सहरा सहरा फूल खिलाये फिरते थे हम उल्फ़त के
जोशे-जुनूँ में अब इतराना अपने बस की बात नहीं
एक ज़माना था हम दोनो तूफां से लड़ जाते थे
अब नदियों में जश्न मनाना अपने बस की बात नहीं
अब तो रोज़ी रोटी की ही फ़िक्र सताये रहती है
उनकी ज़ुल्फ़ों को सुलझाना अपने बस की बात नहीं
मँहगाई का दौर है साग़र भूख से बच्चे रोते हैं
लौट के खाली घर को जाना अपने बस की बात नहीं
अदाकारी करेगा
दिखावे की अदाकारी करेगा
किसी की कौन ग़मख़्वारी करेगा
जिसे है ख़ौफ मुखिया का बता वो
हमारी क्या तरफ़दारी करेगा
बराबर बिक रहे ईमान हर सू
भला कब तक तू ख़ुद्दारी करेगा
बचा कर चलते हैं काँटों से दामन
तू इतनी तो समझदारी करेगा
उतारो तुम गुनाहों का लबादा
सफ़र यह और भी भारी करेगा
न घर का घाट का रह पायेगा वो
वतन से जो भी ग़द्दारी करेगा
मिले जब पेट भर रोटी न उसको
बशर वो फिर तो मक्कारी करेगा
लिखा करता हूँ पुरखों के यूँ क़िस्से
कभी कोई अमलदारी करेगा
फ़ना फ़नकार हो जायेगा जिस दिन
ज़माना तब ये गुलबारी करेगा
निभाई तुमने गर साग़र न हमसे
जहां में कौन फिर यारी करेगा
ग़मख़्वारी – सहानभूति ,हमदर्दी
हर सू – हर दिशा ,हर तरफ़
अमलदारी – अपनाना ,इख़्तियार करना ,
गुलबारी -पुष्पवर्षा
आसपास रहने दो
किसी की दरियादिली का तो पास रहने दो
हमारे हाथ में खाली गिलास रहने दो
मज़ाक कोई उड़ाये न हम ग़रीबों का
अमीरों जैसा बदन पर लिबास रहने दो
ज़माना तल्ख़ से लहजे में बात करने लगा
अज़ीज़ों तुम तो ज़ुबां पर मिठास रहने दो
हज़ार तोड़ लो तुम मुझसे राब्ता लेकिन
ज़माने भर की निगाहों में खास रहने दो
ख़ुतूत तोहफे क्या तस्वीरें माँग लो लेकिन
सुकूने-दिल के लिए कुछ तो पास रहने दो
उन्हीं के अक्स में डूबी है हर नज़र मेरी
मैं हूँ उदास तो मुझको उदास रहने दो
उन्हीं की दास्ताँ कहते हैं सब यहाँ साग़र
ये उनका ज़िक्र मेरे आसपास रहने दो
मुस्कुराने के बाद
दिल की महफ़िल से मुझको उठाने के बाद
कोई रोता रहा मुस्कुराने के बाद
उनके तीर – ए – नज़र का बड़ा शुक्रिया
ज़िन्दगी खिल उठी चोट खाने के बाद
हौसलों को नई ज़िंदगी दे गया
एक जुगनू कहीं झिलमिलाने के बाद
उसने दीवाना दिल को बना ही दिया
इक निगाह – ए – अदा आज़माने के बाद
पल में दुनिया की उसने ख़ुशी सौंप दी
मेरे काँधे पे सर को टिकाने के बाद
दिल का दरवाज़ा यूँ बंद करना पड़ा
किसका रस्ता तकूँ तेरे जाने के बाद
आज साग़र ये क्यों हिचकियां आ रहीं
याद किसने किया इक ज़माने के बाद
ग़ज़ल- बहू पर
बज उठ्ठेगी घर -घर में फिर सबके ही शहनाई
उधड़े रिश्तों की कर लें गर हम मिलकर तुरपाई
जीत लिया है मन सबका उसने अपनी बातों से
मेरे बेटे की दुल्हन इस घर में जब से आई
घर में बहू की मर्ज़ी के बिन पत्ता भी नहीं हिलता
प्यार से उसने सबके दिल पर ऐसी धाक जमाई
जिसमें बहू ख़ुश -ख़ुश दिखती उसमें ही सब ख़ुश होते
सास ससुर भी कहते हमने अच्छी बेटी पाई
ज़िम्मेदारी लेली बहू ने सब घर की रह-रह कर
वक़्त ज़रूरत पर दे देती खाना और दवाई
बेटी अपनी हीरा है तो बहू निकली है पुखराज
बेटी रुखसत होने की कर दी इसने भरपाई
साग़र मेरी बहू तो लाखों ख़ूबी की मालिक है
क्या-क्या मैं गिनवाऊँ तुमको अब उसकी अच्छाई
पछता रहे हैं
ख़ुशामद बराबर किये जा रहे हैं
ख़फ़ा मुझसे होकर वो पछता रहे हैं
निगाहें उठाकर जो देखा तो जानम
ख़िरामाँ ख़िरामाँ चले आ रहे हैं
क्या इसको मुहब्बत का इकरार समझूंँ
वो इज़हारे – उल्फ़त पे शरमा रहे हैं
तकाज़ा है मौसम का बरसेंगे बादल
उधर उनके जलवे गजब ढा रहे हैं
लिखी उनकी आँखों में है जो इबारत
मिला कर नज़र हमको पढ़वा रहे हैं
जिन्हें हम से मिलने की फ़ुर्सत नहीं थी
तराने हमारे वही गा रहे हैं
हैं वाक़िफ सभी रास्तों से ही साग़र
हमें आप ना हक़ ही समझा रहे हैं
ख़िरामाँ ख़िरामाँ – मस्ती भरी चाल,
इज़हारे उल्फ़त — प्रेम प्रकट करना
ना हक़ – व्यर्थ
काशाना मंज़ूर हुआ
तेरे दिल का अब हमको हर काशाना मंज़ूर हुआ
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में मर जाना मंज़ूर हुआ
उठने लगीं हैं काली घटायें छलके हैं जाम-ओ-साग़र
ऐसे आलम में तुझको भी बलखाना मंज़ूर हुआ
महकी महकी गुलमेंहदी है चाँद सितारे भी रौशन
ऐसे मौसम में उनको भी तरसाना मंज़ूर हुआ
लहराते हैं ज़ुल्फें हमदम हर पल अपने चेहरे पर
उनका फूलों सा हमको यह नज़राना मंज़ूर हुआ
चाहे जितनी घोल दे नफ़रत ऐ साक़ी पैमानों में
मेरी चाहत को तेरा हर पैमाना मंज़ूर हुआ
ज़हर-ए-ग़म का जाम पिया है हमने उनके हाथो से
अपनी मौत का यार हमें यह परवाना मंज़ूर हुआ
मेरे नाम के साथ महकता हो उनका भी नाम अगर
मेरे खूँ से भी लिख दो तो अफ़साना मंज़ूर हुआ
उनके चेहरे पर रौनक़ है देख लो मेरी मय्यत में
उनकी मर्ज़ी को शायद यह नज़राना मंज़ूर हुआ
लगवाते हैं बुत मेरा वो बाद मेरे मर जाने के
दुनिया वालों को अब देखो दीवाना मंज़ूर हुआ
साग़र हम भी आ जाते हैं आखिर दिल की बातों में
आज हमें पत्थर से शीशा टकराना मंज़ूर हुआ
काशाना-छोटा घर
सितम का वार है
उसकी जानिब ही सितम का वार है
आदमी जो वक़्त से लाचार है
जिसको रब की नेमतों से प्यार है
वो ख़िजाँ में भी गुल-ओ-गुलज़ार है
जिसके दम से हैं बहारें हर तरफ़
अब उसी की सिम्त हर तलवार है
लुट रही सोने की चिड़िया जा ब जा
आज का ताज़ा यही अखबार है
किस कदर बेचैन हैं अहल-ए-सितम
मेरे सर पर आज भी दस्तार है
मत उठाओ उसकी जानिब उँगलियाँ
इक वही तो साहिब-ए-किरदार है
मिल गईं उसके भी दर मजबूरियाँ
जो सुना था के मेरा ग़मख़्वार है
उसके दर से लौट तो आया मगर
दिल अभी तक माइल-ए-गुफ़्तार है
लौट जा तू ऐ तलातुम लौट जा
हाथ में मेरे अभी पतवार है
तुझसे ही मंसूब है मेरी ख़ुशी
माँग साग़र जो तुझे दरकार है
जा ब जा–जगह -जगह
तलातुम–तूफान
माइल-ए-गुफ़्तार–वार्तालाप में आकर्षित ,आसक्त (डूबा हुआ)
मंसूब-जुड़ी हुई ,
अदा के जुगनू
भर गया कोई यहाँ ऐसी अदा के जुगनू
उड़ गये जाने कहाँ ज़हने-रसा के जुगनू
रात-दिन ख़्वाबों तख़य्युल के ही बेमानी थे
दे गये रंग कई रंगे-हिना के जुगनू
चाँद निकला ही नहीं रात भी काटे न कटी
हाथ मलते ही रहे मेरी दुआ के जुगनू
उसकी आँखों में चमकते हैं हज़ारों सूरज
शर्मगीं होते रहे मेरी वफ़ा के जुगनू
ज़िन्दगी तेरे इशारों पे कहाँ ले आई
दूर तक आज हैं मेरी ही सज़ा के जुगनू
मेरे आँगन में अंधेरा था अंधेरा ही रहा
कैसे रक़्साँ हैं मगर मेरी अना के जुगनू
प्यार की राह में साग़र वो मनाज़िर देखे
शब के दामन में चमकते हैं बला के जुगनू
ज़हने रसा – तीव्र बुद्धि वाला, बात की तह तक पहुँचने वाला
हिना – मेहंदी
रक्सां – मस्ती में नृत्य करना, झूम झूम कर नृत्य करना
अपना – स्वाभिमान
मनाज़िर – दृश्य, मंज़र
शब-रात्रि
नज़रों में भगवान हैं
ऐसे ऐसे भी दुनिया में इंसान हैं
जो ग़रीबों की नज़रों में भगवान हैं
प्यार होने के क्या यह ही इम्कान हैं
जानते बूझते भी वो अंजान हैं
एक भी वो इशारा न समझे मेरा
शक्ल से तो नहीं लगते नादान हैं
देखते हैं वो नज़रें बचाकर हमें
हम इसी बात पर उन पे क़ुर्बान हैं
अपनी मर्ज़ी चलाने की ज़िद है उन्हें
हम दबाये हुए अपने अरमान हैं
एक बंदा वहांँ भूख से मर गया
रहने वाले जहाँ सब ही धनवान हैं
हमने देखे हैं साग़र बशर ऐसे भी
पास दौलत है फिर भी परेशान हैं
हद से गुज़रने वाला था
हमारा जाम मुहब्बत से भरने वाला था
कोई उमीद की हद से गुज़रने वाला था
जवाब उस से मुहब्बत का किस तरह मिलता
वो गुफ़्तगू भी सवालों में करने वाला था
ये एक बात ही ज़ाहिर है उसकी आंँखों से
ज़रा सी देर में सब कुछ बिखरने वाला था
समझ में आ गई गहराई मेरी बातों की
वो अपनी बात से वर्ना मुकरने वाला था
बहुत खली है ज़माने को बात इतनी सी
कोई ग़रीब मुक़द्दर संवरने वाला था
उसी के पीछे पड़े हैं सितम ज़माने के
जो लेके प्यार का पैकर उतरने वाला था
चला है वोही चराग़ – ए – वफ़ा जलाने को
मिज़ाज जिसका हवाओं से डरने वाला था
बचा हूँ इस लिए झुकना था मेरी आदत में
वो तीर मेरे ही सर से गुज़रने वाला था
गया है रूठ के मुझ से वही बशर साग़र
जो अंजुमन में नये रंग भरने वाला था
कोई बेहुनर नहीं
कहते हैं लोग मुझ से कि तुझको ख़बर नहीं
बस्ती में तेरे जैसा किसी का जिगर नहीं
पढ़ना मुहाल हो गया चहरों की सिलवटें
इस दौरे नौ में दोस्त कोई बेहुनर नहीं
क्या देगा वो किसी को भी राहत सुकूने दिल
जो खुशबुओं के लुत्फ़ से वाक़िफ शजर नहीं
आँखों में अक्स तैरते कानों में आहटें
बेचैन हूँ मैं उसकी मिली कुछ ख़बर नहीं
सूरज है चांँद तारे भी रहते हैं रू-ब-रू
इस रहगुज़र में वो ही मगर हमसफ़र नहीं
दौलत भी मेरे पास है शोहरत भी है बहुत
उसके बिना ये ज़ीस्त मगर मौतबर नहीं
उसके लिए सजा लूँ मैं इस दिल की अंजुमन
उसकी ही होती मुझ पे करम की नज़र नहीं
इस तीरगी के ख़ौफ का आलम है इस तरह
जैसे शब ए फ़िराक़ की होगी सहर नहीं
दुनिया ये अपने आप में खोई है इस कदर
सागर किसी की चीख का कोई असर नहीं
खुद्दार बहुत है
आँखों में अभी शोख के इनकार बहुत है
मेरी ही तरह वो भी तो ख़ुद्दार बहुत है
मिलती है सदा हार मुझे एक उसी से
वो बात पलटने में हुनरदार बहुत है
हर बार मनाता हूँ मैं यूँ रूठे सनम को
दिल उसकी अदाओं का परिस्तार बहुत है
करता ही नहीं उसकी जफ़ाओं की शिकायत
यह दिल तो उसी का ही तरफ़दार बहुत है
इस दिल के समुंदर को तू लूटेगा भी कितना
इसमें तो भरा तेरे लिए प्यार बहुत है
मैं उसको भुलाने का जतन कैसे करूँगा
वो शख़्स मेरे दिल पे असरदार बहुत है
अब तेज़ बढ़ाने हैं क़दम आप को साग़र
इस दौर के इंसान की रफ़्तार बहुत है
उस पर भी अभिमान रहेगा
मतला–
उस पर भी अभिमान रहेगा
याद जिसे अहसान रहेगा
हुस्ने-मतला–
जिस दिल में भगवान रहेगा
उस पर जग क़ुर्बान रहेगा
जिस दिल में हो तू ही तू बस
उसको क्या कुछ भान रहेगा
मेरे आँसू पोंछ भी दे अब
मेरा भी कुछ मान रहेगा
जिस पर वंशीधर मोहित हों
हर दुख से अंजान रहेगा
लीलाधर की लीलाओं में
उलझा हर इंसान रहेगा
सीख ले दुनियादारी पगले
कब तक तू नादान रहेगा
छोड़ न दामन रघुवर का तू
हर रस्ता आसान रहेगा
साग़र मुफ़लिस के ईमां से
लड़ता क्या धनवान रहेगा
इश्क़ की आबरू
इश्क़ की आबरू हम बढ़ाते रहे
अश्क पीते रहे मुस्कुराते रहे
एक मुद्दत हुई जिनसे बिछड़े हुए
हर नफ़स वो हमें याद आते रहे
यूँ तो वाबस्तगी हर क़दम पर रही
जाने क्यों हौसले डगमगाते रहे
इक ज़रा देर की रौशनी को फ़कत
अहले-दानिश भी घर को जलाते रहे
इस कदर बढ़ गयी ख़्वाहिश-ए – मयकशी
मककदे में ही हर शब बिताते रहे
इक ग़ज़ल इस कदर ख़ूबसूरत लगी
रात भर ही उसे गुनगुनाते रहे
दौरे- साग़र चला मयकदे में मगर
जश्ने-तशनालबी हम मनाते रहे
दिल लहू न करना
मेरी क़ुर्बतों के ग़म में ,कभी दिल लहू न करना
मैं जहां का हो चुका हूँ, मेरी आरज़ू न करना
ये यक़ीन कर तू मेरा, मैं न भूल पाऊं तुझको
कहीं दिल खराब कर के, मेरी जुस्तजू न करना
कहीं जल न जाये तेरा, इसी आग में बदन भी
मेरे ज़ख़्म खौलते हैं, इन्हें तू रफ़ू न करना
सरे-बज़्म आबरू का मेरी ध्यान रखना मोहसिन
किसी ग़ैर की नज़र में, मुझे तुम से तू न करना
न समझ सकेगी दुनिया तेरी मेरी असलियत को
मेरी शायरी का चर्चा कहीं कू ब कू न करना
सदा एहतियात रखना किसी वक़्त भी ये हमदम
कभी अपने घर में पैदा कोई तुम अदू न करना
बड़ी मुश्किलों से साग़र हुई है बहार हासिल
यहाँ रंजो-ग़म की कोई, कभी गुफ़्तगू न करना
उड़ाऊंगा अपने अफ़साने
हवा में ऐसे उड़ाऊँगा अपने अफ़साने
ज़माने भर का हरिक शख़्स मुझको पहचाने
मिज़ाजे-दिल भी कहाँ तक मेरा कहा माने
छलक रहे हैं निगाहों से उसकी पैमाने
मुझे सलाम यूँ करते हैं रोज़ रिंदाने
बुला बुला के पिलाते हैं मुझको मैख़ाने
मैं महवे जाम न होता तो और क्या होता
पिला रहा था निगाहों के कोई पैमाने
वफ़ा की राह में ऐसे निशान छोड़े हैं
करेंगे नाज़ हमेशा मुझी पे याराने
मेरे ख़याल की दुनिया सँवारने वाले
बुला रहे हैं तुझे कब से मेरे वीराने
तेरी जुदाई ने क्या हाल देख कर डाला
तड़प रहे हैं तेरे ग़म में दिल के काशाने
ग़रीब दिल तो अमीरों का इक खिलौना है
ग़रीब पर जो गुज़रती है कोई क्या जाने
लुटाया प्यार है उन पर तो इस तरह साग़र
चराग़े-लौ पे लुटाते हैं जैसे परवाने
रिंदाने- मयकश , मदिरापान करने वाले
काशाने – छोटे छोटे घर
मुफायलुन-फयलातुन मुफायलुन फेलुन
ग़ज़लों के दीवाने हैं
आप हमारी ग़ज़लों के दीवाने हैं
इन बातों से बन जाते अफ़साने हैं
बंद दिमाग़ों को भी हमने खोल दिया
हमको शायर दुनिया वाले माने हैं
अपने ग़म की है हमको परवाह नहीं
दुनिया भर को बाँट रहे मुस्काने हैं
हम जैसे थे मीर जिगर मीरा तुलसी
फिर भी बेघर हम जैसे परवाने हैं
दिल का ख़ून पिला डाला जब ग़ज़लों को
तब जाकर कुछ लोग हमें पहचाने हैं
हमको याद रखोगे तुम भी सदियों तक
इन ग़ज़लों के आशिक़ तो फ़रज़ाने हैं
हम हैं साग़र मीर ग़ज़ल की दुनिया के
हम जैसों से वाक़िफ़ ख़ूब ज़माने हैं
ईमां डोल रहा है
वक़्त उसी को तोल रहा है
जो पंछी पर खोल रहा है
मन की गाँठे ख़ोल रहा है
झूठा भी सच बोल रहा है
जब मैंने मुँह खोला तेरा
सिंघासन क्यों डोल रहा है
बीमारी से हारा निर्धन
ज़हर दवा में घोल रहा है
धरती उगला करती सोना
यह अपना भूगोल रहा है
जब भी उसको परखा हमने
यार नतीजा गोल रहा है
उसकी क़ीमत आँक रहे हो
जो रिश्ता अनमोल रहा है
देख पुराने अखबारों में
कविता का क्या मोल रहा है
साग़र ले चल बाज़ारों से
मेरा मन अब डोल रहा है
किसके ख़याल में
इस दर्जा पी रहे हो ये किसके ख़याल में
थे कितने ही सवाल ज़रा से सवाल में
जब से वो मुझसे करने लगे रोज़ गुफ़्तगू
होने लगा इज़ाफा भी उनके जमाल में
तुम आ गये तो रौनक़े भी घर में आ गईं
यह दिन नसीब हमको हुआ कितने साल में
आओ चलो चराग़े -मुहब्बत जलायें हम
यह शब गुज़र न जाये जवाब-ओ-सवाल में
वो जब मिला तो वक़्त के सुल्तान सा लगा
इक नूर सा चमकता है उसके जलाल में
भूखा था मैं तो प्यार का यह कैसे सोचता
सामान मौत का है मुहब्बत के जाल में
दिल कर रहा है आज मैं तौबा को तोड़ दूँ
साग़र सुराही जाम पड़े हैं मलाल में
साग़र जहान वालों से तू भी तो सीख ले
क्यों फ़र्क ढूँढता है हराम-ओ-हलाल में
जमाल–सुंदरता
जलाल–प्रताप ,तेज
तौबा–पाप न करने का संकल्प ,प्रतिज्ञा
आसमां कुछ नहीं
मेरी परवाज़ को आसमां कुछ नहीं
फिर भी दिल में है मेरे गुमां कुछ नहीं
आज़माना है तो खुल के तू आज़मा
मेरी कुव्वत को यह इम्तिहां कुछ नहीं
तुझको अपना बनाने की ज़िद है मुझे
तेरी खातिर ये कौन-ओ-मकां कुछ नहीं
अपनी उल्फ़त से रंगीन कर दे इसे
तेरे बिन ख़ूबसूरत समां कुछ नहीं
तूने भर दी है झोली मेरी प्यार से
और अब चाहिए मेहरबां कुछ नहीं
कैसे क़ातिल पे इल्ज़ाम साबित करूँ
जूर्म का उसने छोड़ा निशां कुछ नहीं
मेरे मुँह में किसी और की है ज़ुबां
बोल सकता मैं अपनी ज़ुबां कुछ नहीं
मेरी बातो पे साग़र अमल हो रहा
लफ्ज़ मेरे हुए रायगां कुछ नहीं
गुमां-अहंकार ,गर्व, कयास
कुव्वत-ताकत ,द
कौन-ओ-मकां-संसार ,जगत
अमल-व्यवहार में लाना ,अपनाना
रायगां-बेकार
चाँद रात होती है
नसीब उनकी हमें इल्तिफ़ात होती है
इसी से अपनी हसीं कायनात होती है
है तुम से प्यार कभी इतना कह नहीं पाये
हरेक रोज़ मगर उनसे बात होती है
उन्हीं का नूर छलकता है मेरी आंँखों से
उन्हीं के दम से मुनव्वर हयात होती है
ये और बात बहुत कुछ है मेरे दामन में
वो रूबरू हों तो दिल को निशात होती है
वो मेरे होश उड़ा देते हैं इशारे में
इसीलिए तो मुझे उनसे मात होती है
अमीरे- हुस्न हैं दरियादिली से मिलते हैं
किसी किसी को ये हासिल सिफ़ात होती है
निज़ाम फिर भी तो ओढ़े हुए है ख़ामोशी
कि दिन दहाड़े यहाँ वारदात होती है
करम है उनका या तासीरे – इश्क़ है साग़र
हरेक रात मिरी चाँद रात होती है
इल्तिफ़ात – कृपादृष्टि , तवज्जो
कायनात – दुनिया
मुनव्वर – प्रकाशमान, उज्जवल
हयात – जीवन, ज़िन्दगी
सिफ़ात- विशेषता
तासीर – प्रभाव , असर,गुण
रख्खा ख़याल उनका
शिकवा गिला नहीं है उन्हें यूँ किसी तरह
रख्खा ख़याल उनका जो हमने सभी तरह
इक पल में तुझको सौंप दी यूँ दिल की सल्तनत
अब तक मिला नहीं था जो कोई तिरी तरह
चाहो तो देख लेना किसी से लगा के दिल
वो प्यार दे सकेगा न तुमको मिरी तरह
जब चाहे आज़माना ये वादा हुज़ूर है
करते रहेंगे प्यार हमेशा इसी तरह
इतना न पास आओ कि दामन पकड़ लें हम
दामन छुड़ा न पाओगे फिर तुम किसी तरह
अब हार मान लो न लुभा पाओगे हमें
कोशिश तो कर के देख ली तुमने कई तरह
हर वक़्त डोलता है मिरे आस पास ही
उस पर सवार इश्क़ है गोया बुरी तरह
तुम आज हो पसंद तो कल दूसरा पसंद
करते हैं लोग प्यार भी अब तो इसी तरह
साग़र उदास होना पड़ा इसलिये मुझे
माना नहीं वो उसको मनाया सभी तरह
खास रहता हूँ
पहने उम्दा लिबास रहता हूँ
सबकी नज़रों में खास रहता हूँ
तू ही तू है ख़याल में मेरे
यूँ तिरे आसपास रहता हूँ
तुझमें पहले सी गर्मजोशी नहीं
इसलिए ही उदास रहता हूँ
आज़माता नहीं किसी को मैं
सिर्फ़ ख़ुद से शनास रहता हूँ
रूठ जाये न वो कभी मुझसे
इस सबब से हिरास रहता हूँ
कोशिशें रायगाँ हईं सारी
इसलिए महवे-यास रहता हूँ
दोस्तों से भी क्या मिलूँ साग़र
आजकल बदहवास रहता हूँ
शनास--परखने या पहचान करना
हिरास–आशंका , डर
रायगाँ–बेकार
यास–निराशा ,
आशनाई हो गई
जब से मेरे दोस्त तुझसे आशनाई हो गई
तब से मेरी ज़िन्दगी लगता पराई हो गई
मंज़िल – ए – मक़सूद पर ही मेरे ठहरेंगे क़दम
अब तो हासिल उनकी मुझ को रहनुमाई हो गई
छोड़ दे तारीफ़ करना अपने मुँह से अपनी तू
हद से बढ़कर अब तो तेरी ख़ुदनुमाई हो गई
कैसे तुझको बावफ़ा साबित करूँ तू ही बता
तेरी दुनिया को पता जब बेवफ़ाई हो गई
कैसे लिख पायेगा कोई क़हक़हों की दास्तां
अश्कों में डूबीं हुई जब रोशनाई हो गई
शैख तेरी अब हिदायत का असर होगा नहीं
तेरी दुनिया में अयाँ सब पारसाई हो गई
ज़िन्दगी जिस रोज़ से साग़र ये सौंपी है उसे
रंजो – ग़म से हर तरह मेरी रिहाई हो गई
खुलकर नहीं मिला
हमसे मुसाफिरों को कहीं घर नहीं मिला
रस्ते बहुत थे राह में रहबर नहीं मिला
वीरान रास्तों में पता किससे पूछते
राह-ए-सफ़र में मील का पत्थर नहीं मिला
दिन रात हम उसी के ख़यालों में ही उड़े
तन्हाइयों में चैन तो पल भर नहीं मिला
उसके सितम में प्यार की शामिल थीं लज़्ज़तें
उस सा करम नवाज़ सितमगर नहीं मिला
दो घूँट पीके और भी जागी है तशनगी
साग़र कभी शराब का भर कर नहीं मिला
उस पर उड़ेल दीं हैं सभी दिल की ख़्वाहिशें
वो शख़्स है कि आज भी खुलकर नहीं मिला
साग़र तलाशे-यार में भटके कहाँ कहाँ
उस हुस्ने इल्तिफ़ात सा पैकर नहीं मिला
गुलसितां मेरा हुआ
आज उसने इस तरह देखा कि यह धोखा हुआ
जैसे कुछ लम्हों को सारा गुलसितां मेरा हुआ
बस इसी इक बात से तस्कीन मिलती है मुझे
आपकी आँखों में मेरा रंग है निखरा हुआ
कहने को आये नज़र के सामने कितने हसीं
तुझको देखा तो लगा तू ख़्वाब है देखा हुआ
तेरे जलवों के सिवा अब और कुछ भाता नहीं
तेरा चेहरा ही नज़र में देख है ठहरा हुआ
तोड़ दीं रस्में सभी अहद-ए-वफ़ा के नाम पर
जीत कर भी लग रहा है जैसे हूँ हारा हुआ
इस ख़बर से उठ रहा तूफान सा दिल में मेरे
फूल सा चेहरा किसी का आज है उतरा हुआ
जुस्तुजू-ऐ-यार की साग़र कशिश तो देखिये
जिस तरफ़ देखो उधर है नूर सा फैला हुआ
बड़े मोतबर थे
सितमगर के ख़ेमे में वो सब बशर थे
जो मेरी नज़र में बड़े मोतबर थे
हुआ हादसा ही वो ऐसा यहाँ था
सवालों की ज़द में कई राहबर थे
था अंदाज़ा उनको कि तूफां उठेगा
यहाँ पर कई लोग अहल-ए-नज़र थे
पढ़ा उसको सबने न मफ़हूम समझे
लगे उसमें इतने जो ज़ेर-ओ-ज़बर थे
ग़रीबों का किसने वहाँ दर्द समझा
हुकूमत के नश्शे में सारे बशर थे
दिलासे में रख्खा था लीडर ने सबको
इसी बात से वो सभी चश्मे-तर थे
मदद करने कोई यूँ आया न साग़र
मेरे हौसले से सभी बा ख़बर थे
मोतबर नहीं होता
दिल का वो मोतबर नहीं होता
तो मेरा हमसफ़र नहीं होता
गुफ़्तगू उनसे जब भी होती है
होश शाम-ओ-सहर नहीं होता
राह लगती तवील है उस दम
जब वो जान-ए-जिगर नहीं होता
संग दिल है मियाँ हमारा सनम
वो इधर से उधर नहीं होता
जुस्तजू उसकी गर नहीं होती
मैं कभी दर ब दर नहीं होता
ढूँढ लेता मैं अपनी ख़ुद मंज़िल
साथ गर राहबर नहीं होता
दर्द उस पल बहुत अखरता है
पास जब चारागर नहीं होता
ज़िन्दगी उसको बोझ लगती है
जिस पे कोई हुनर नहीं होता
अब तो साग़र चले भी आओ तुम
मुझसे तन्हा गुज़र नहीं होता
पेड़ों ने पैरहन बदले
मिज़ाज अपना भी अब दिल की अंजुमन बदले
बहार आते ही पेड़ों ने पैरहन बदले
सबूत और मैं क्या दूँ बता मुहब्बत का
तेरे इशारे पे अपने सभी चलन बदले
तुम्हारे मन की हमेशा मुराद की पूरी
हज़ारों बार ही हमने यूँ अपने मन बदले
तलाश अपनी मुकम्मल न हो सकी अब तक
सुकूने-क़ल्ब को कितने ही हमवतन बदले
उसी के दीद की अब मुंतज़िर ये आँखें हैं
बला से रंग वो कितने ही गुलबदन बदले
नये निज़ाम का इतना असर दिखाई दिया
जो रहबरी में थे वो, ख़ुद ही राहज़न बदले
किया क़बूल हमें तब अदब की महफ़िल ने
मिसाल ,ज़ाविये जब हमने हर सुख़न बदले
ग़ज़ल की बढ़ रही मक़बूलियत भी यूँ साग़र
जदीद दौर के शायर ने फ़िक्रो-फ़न बदले
तू अपनी चाँद सी
अता मुझे भी उजाले की इक नज़र कर दे
तू अपनी चाँद सी सूरत ज़रा इधर कर दे
किसी को याद मैं आता रहूँ ज़माने तक
मेरी हयात मुझे इतना मोतबर कर दे
सुना है मैंने कि आहों में आग होती है
मेरे ख़ुदा मेरी आहों को बेअसर कर दे
वो जब मिला है तो ग़ैरों की बात ले बैठा
कोई तो शाम वो इक मेरे नाम पर कर दे
उसी घड़ी की मुझे जुस्तजू है बरसों से
जो उनको मेरी मुहब्बत का हमसफ़र कर दे
मेरे सिवा भी मेरे घर में कोई रहता है
कहीं नज़र न मेरे दिल को यह ख़बर कर दे
तमाम उम्र रहे तू ही मेरी आँखों में
तू इस यक़ीन को कुछ इतना पुर असर कर दे
सिवाय उनके किसी और की न फ़िक्र करूँ
हुजूमे ग़म से ख़ुदा मुझको बेख़बर कर दे
तमाम शहर में जाये कहीं भी तू साग़र
तू मेरे घर को मगर अपनी रहगुज़र कर दे
हरिक क़रार किया
पूरा तेरा हरिक क़रार किया
हमने पतझड़ को भी बहार किया
उसके आगे किसी की क्या चलती
वक़्त ने जिसको ताजदार किया
ज़ख़्मी होकर भी मैं रहूँ ज़िन्दा
किस हुनर से मेरा शिकार किया
दुखती रग को ही छू लिया तुमने
हाय क्या मेरे ग़मगुसार किया
बात उसकी सदा ही रखने को
सारी बातों को दरकिनार किया
प्यासा लौटा था मैकदे से मगर
ख़ुद को मशहूर मयगुसार किया
हो गये हम किसी के फिर साग़र
तेरा कितना ही इंतज़ार किया
ग़ज़ल –हिंदी में
आशाओं में बल लगता है
होगा अपना कल लगता है
एक तुम्हारे आ जाने से
यह घर राजमहल लगता है
सींच रहा जो मन मरुथल को
पावन गंगा जल लगता है
हम तुम साथ चले हैं जब से
जीवन मार्ग सरल लगता है
यह कहना आसान नहीं है
तेरा कौन बदल लगता है
इतने मीठे बोल तुम्हारे
बोल रही कोयल लगता है
घेर उदासी बैठी हमको
दूर कहीं अब चल लगता है
सहता तरुवर कितने पत्थर
जब-जब उसमें फल लगता है
इतना विष का पान किया अब
पग-पग पर ही छल लगता है
तेरे भुजबंधन में साग़र
जंगल में मंगल लगता है
बसाने आजा
फिर कोई ख़्वाब निगाहों मे बसाने आजा
फिर मेरे घर को करीने से सजाने आजा
एक मुद्दत से तरसता हूँ तेरी सूरत को
ग़मज़दा हूँ मुझे तस्कीन दिलाने आजा
तुझको लेकर हैं परेशाँ ये दर-ओ-दीवारें
अपना हमराज़ इन्हें फिर से बनाने आजा
जिसको सुनते ही ग़म-ए-दिल को सुकूँ मिल जाये
बात कुछ ऐसी मुझे आज सुनाने आजा
जाम जो तूने पिलाये थे कभी आँखों से
फिर वही जश्न उसी तौर मनाने आजा
मैंने छेड़ी है शब-ओ-रोज़ तेरी तन्हाई
यह ही इल्ज़ाम मेरे सर पे लगाने आजा
हर तरफ़ ख़ौफ अंधेरा है मेरी आँखों में
इस अमावस में मुझे चाँद दिखाने आजा
मैं वही शख़्स हूँ जीता था जिसे देख के तू
आ मुझे अपने कलेजे से लगाने आजा
हम यक़ीनन ही किसी मोड़ पे मिल जायेंगे
बस यही आस मेरे दिल को बँधाने आजा
तोड़कर क़ल्ब को रोता है तू तन्हा साग़र
बात फिर बिगड़ी हुई आज बनाने आजा
ख़ूब परेशान किया है
इस धूम से उल्फ़त का जो ऐलान किया है
यूँ तुमने मुझे ख़ूब परेशान किया है
सब पूछते हैं हमसे ये अहबाब हमारे
सहरा सा ये दिल किसने गुलिस्तान किया है
है तुमसे मुझे प्यार ये कहना भी था मुश्किल
यह मस्अला भी तुमने ही आसान किया है
उस दिन से महकते हैं दर-ओ-बाम भी घर के
जिस रोज़ से घर में उन्हें मेहमान किया है
कहते हो तकल्लुफ़ से कभी बात न करना
मिन्नत से मगर आप ने जलपान किया है
जो नूर हरिक रुख से झलकता है तुम्हारा
यूँ तुमने उजालों को भी हैरान किया है
तब जाके समझ आई उन्हें मेरी वफ़ा की
जब चाक मुहब्बत में गिरेबान किया है
लाज़िम थी समझना हमें पुरखों की रिवायत
इस सोच ने ही आज पशेमान किया है
साग़र ये तमन्ना का तकाज़ा है कि उनपर
क़ुर्बान जिगर जान क्या ईमान किया है
राजे दिल बताने को
वो बेक़रार हैं ख़ुद राज़े-दिल बताने को
सजा रहे हैं बड़े दिल से आशियाने को
मिला है साथ हमें तेरा जब से ऐ हमदम
बढ़ा दिये हैं क़दम आसमां झुकाने को
तुम्हारा फूल सा चेहरा रहे खिला हरदम
मैं तोड़ लाऊँ सितारे तुम्हें हँसाने को
ये किस ख़याल से इतना यक़ीन है मुझ पर
हमेशा मुझ को ही चुनते हो आज़माने को
ये मिलना जुलना हमेशा ही इत्तिफ़ाक़ नहीं
वो ढूँढ लेता है हर दिन नये बहाने को
बहार आई तो सब कुछ लुटा दिया उस पर
बचा ही क्या है मेरे पास मुस्कुराने को
जो तुमने साज़े-मुहब्बत पे गुनगुनाया था
सुना रहा हूँ वही गीत अब ज़माने को
ये ज़ोर कैसा तमन्ना उठा रही सागर
किसी की झील सी आँखों में डूब जाने को
हुस्न के ज़ेवर
हुस्न के ज़ेवर यूँ मत खोल
कर दे मेरी दुनिया गोल
पहले बाल-ओ- पर को तोल
फिर पिंजरे का पंछी खोल
फिर देगी गुफ़्तार मज़ा
कुछ तो इस में शीरीं घोल
मौसम करता सरगोशी
क्या है इरादा कुछ तो बोल
फिर होगी मदहोश ग़ज़ल
जाम उठा औ॓र् बोतल खोल
देख ज़रा तू ताजमहल
पीट रहा है किसका ढोल
छोड़ तराज़ू बाँट का फेर
वक़्त के हाथों सब कुछ तोल
यह बाज़ार -ए- हुस्न सही
प्यार नहीं पर बिकता मोल
एक ज़रा सी गर्दिश ने
खोली हर रिश्ते की पोल
सागर सबकी बात न कर
तुझसे रिश्ता है अनमोल
मेरी ख़ुशी को
जिसने समझा है मेरी ख़ुशी को
दी दुआ मैंने उस ज़िन्दगी को
मैंने माना है सब कुछ उसी को
कौन समझे मेरी बेबसी को
दिल ये करने लगेगा इबादत
कोई मूरत जँचे बंदगी को
मन मुताबिक तेरे कर दिया सब
छोड़ भी दे तू अब बरहमी को
उसके जलवों के जादू में फँसकर
मार डाला है अपनी ख़ुदी को
नाज़ करता हूँ मैं आज ख़ुद पर
प्यार मिलता है ऐसा किसी को
ख़ुश हैं साग़र सभी मुझ से अपने
और क्या चाहिए आदमी को
ग़रीबख़ाने का
संदेशा भेजा है उसने जो अपने आने का
जगेगा आज मुक़द्दर ग़रीबख़ाने का
खिलाये फूल हैं हमने बड़ी मुहब्बत से
वरक़ वरक़ है यूँ महका हुआ फ़साने का
हमेशा सोच समझकर यूँ चलना पड़ता है
तलाश ले न बहाना वो रूठ जाने का
किसी की याद में रोते भी कितने दिन आखिर
बहाना ढूँढ लिया फिर से मुस्कुराने का
वो रूठते हैं तो होता है अब मलाल नहीं
तरीक़ा ढूँढ लिया है उन्हें मनाने का
ग़म -ए- हयात के मंज़र ही कुछ रहे ऐसे
न देखा ख़्वाब कभी आशियां बनाने का
मलाल इतना ही साग़र है आज तक हमको
कोई तो रास्ता रखता वो आने – जाने का
ग़म दूर दूर है
शाम-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ सही यह ज़रूर है
यादें किसी की साथ हैं ग़म दूर दूर है
छेड़े थे तार दिल में मुहब्बत के आपने
इल्ज़ाम यह भी देखिये मुझ पर हुज़ूर है
मुद्दत हुई है उससे निगाहें मिले हुए
आँखों में मेरी आज भी वो रश्के-हूर है
उस चाँद जैसे मुखड़े पे टिकती है यूँ नज़र
सौ-सौ जवाहिरों में वही कोहनूर है
यह भी किसी की मस्त निगाहों का है करम
मुझको पिये बग़ैर ही रहता सुरूर है
कितनी ही मुख़्तसर सही उम्र-ए-वफ़ा मगर
इन आँधियों में दीप जलाना ज़रूर है
सब खेल हैं नसीब के बस इतना जानिये
उनका कुसूर है न हमारा कुसूर है
साग़र भुला ही देंगे वो इक रोज़ आपको
कुछ दिन ही बस दिमाग़ में रहता फ़ितूर है
फ़िराक़–वियोग ,विरह
रश्के-हूर–स्वर्ग की अप्सराओं से भी सुंदर
जवाहिरों-बहुमूल्य रत्न –माणिक मोती आदि
हँस हँस के टाल देता है
बड़ी अजीब सी उलझन में डाल देता है
मेरे सवाल को हँस हँस के टाल देता है
हुनर को अपने वो ऐसा कमाल देता है
नदी का दर्द समुंदर में डाल देता है
करो न फ़िक्र कि हम भी उसी के बंदे हैं
बड़ा रहीम है वो सब को पाल देता है
उसी की आज ख़ुशामद मैं कर के देखूँगा
वो बिगड़ी बात सुना है संभाल देता है
यक़ीं है घर का अंधेरा वो दूर कर देगा
कभी जो चाँद या सूरज निकाल देता है
जो सर झुका के कहा था किसी की आँखों ने
वो एक जुमला ही अब तक मलाल देता है
हरेक शख़्स नज़र आये मुत्मइन मुझ से
कहाँ ख़ुदा ये किसी को कमाल देता है
मेरी ग़ज़ल में झलकती है उसको अपनी ग़ज़ल
ज़माना इसलिए मेरी मिसाल देता है
मेरी ग़ज़ल तो है तुझ पर ही मुन्हसिर सागर
तेरा ख़याल भी कितने ख़याल देता है
गजब की यारी लगे
ये चंद रोज़ की यारी ग़ज़ब की यारी लगे
तमाम ज़ीस्त तेरे साथ ही गुज़ारी लगे
हरेक शय में ही आती नज़र सनम तुम हो
तुम्हारे प्यार की अब तक चढ़ी ख़ुमारी लगे
न देखो ऐसी नज़र से कि जां निकल जाये
हमारे दिल को ये चुभती हुई कटारी लगे
तुम्हारे अदना इशारे पे नाच उठती है
हमारी ज़ीस्त भी हमको तो अब तुम्हारी लगे
शदीद ग़म है जुदाई का इस क़दर हमदम
मुझे हयात की तारीकियों पे भारी लगे
यक़ीन कैसे करूँ दोस्ती पे मैं उनकी
ये आजकल की जो यारी है दुनियादारी लगे
ज़बां ख़मोश न रख्खें तो क्या करें साग़र
हरेक बात बुरी उनको जब हमारी लगे
दिल पे क़ाबू
इक नज़र तुमने जो निहारा है
दिल पे क़ाबू नहीं हमारा है
ख़्वाहिशें हो रहीं हैं सब पूरी
साथ जबसे मिला तुम्हारा है
प्यार से इक नज़र इधर देखो
कितना ख़ुशरंग यह नज़ारा है
नाख़ुदा यह तेरी बदौलत ही
मुझको हासिल हुआ किनारा है
हूक उठती है इस तरह दिल में
जैसे तुमने मुझे पुकारा है
बेवफ़ा कह के तूने ऐ ज़ालिम
दिल में खंजर सा इक उतारा है
तेरे आने से ही मेरे साग़र
चमका क़िस्मत का यह सितारा है
बाग़ दिल का
उनसे मिलने का सिलसिला होता
बाग़ दिल का हरा भरा होता
मुस्कुरा कर अगर वो कह देते
ग़म का सागर भी पी लिया होता
अपने वादे की लाज रख लेते
कोई शिकवा न कुछ गिला होता
चुगलियाँ कर दीं इन निगाहों ने
वर्ना हर सू न तज़किरा होता
क़त्ल होना ही था मुझे क़ातिल
तू न होता तो दूसरा होता
चैन आता मरीज़े-उल्फ़त को
कोई दस्त-ए-दुआ उठा होता
हम भी मंज़िल नशीन हो जाते
राहबर कोई गर मिला होता
मुद्दतों क्यों जलाते दिल साग़र
हमको अंजाम गर पता होता
सलाम करता है
मेरे सुकूँ का वो यूँ इंतज़ाम करता है
ज़ुबां बना के नज़र से सलाम करता है
वफ़ाएं और निभाता भी इससे क्या बढ़कर
वो मेरे क़ल्बो-जिगर में क़याम करता है
ख़बर उसे है मुलाक़ात हो नहीं सकती
मगर वो कोशिशें फिर भी मुदाम करता है
दुआ में ख़ैर मनाऊँ मैं क्यों नहीं उसकी
हयात कौन भला किसके नाम करता है
निकालनी हो ज़रूरत यहाँ किसी से जब
बशर दिखावे का तब एहतराम करता है
सितारे चाँद क्या सूरज भी आये बारी से
कोई तो है जो ये सारा निज़ाम करता है
मैं जाके बस्ती में साग़र की देखता क्या हूँ
वहाँ सलाम उसे ख़ासो-आम करता है
तेरा मेरा दोस्ताना
इसी बात पे है बरहम मेरे दोस्त यह ज़माना
कि ये कैसे निभ रहा है तेरा मेरा दोस्ताना
बड़ा ख़ुशगवार मंज़र यहाँ रहता हर घड़ी है
तू कहे तो हम बना लें यहीं अपना आशियाना
तुम्हें जब भी हो ज़रूरत या जी चाहे जब तुम्हारा
मैं वफ़ा शियार ही हूँ जहाँ चाहे आज़माना
है ये आरज़ू ही मोहसिन किसी रोज़ घर पे आकर
मुझे चाय अपने हाथों से बना के तुम पिलाना
भला कैसे दूँ तबस्सुम का जवाब उसको हँसकर
मुझे भारी पड़ रहा है उसे देख मुस्कुराना
मैं ये सोचता हूँ आखिर हुआ कैसे यह अचानक
तेरे हाथो मिल रहा है मुझे रोज़ आबोदाना
किया उसका आज तक है यूँ हीं इंतज़ार साग़र
उसे कैसे भूल जाऊँ मेरा दोस्त है पुराना
वफ़ा शियार – पूर्ण निष्ठा
मोहसिन – मित्र
आबोदाना- दाना-पानी
मस्ती उड़ाई
ख़ुशामद से जीवन की गाड़ी चलाई
अमीरों की दौलत से मस्ती उड़ाई
ख़ुशामद की पॉलिश ज़रा सी लगाई
जो थी नकचढ़ी वो ख़ुशामद पे आई
हुनर है ख़ुशामद का हर फ़न से आला
हमेशा ही बिगड़ी इसी से बनाई
अजब जान लेवा थी वो मुस्कुराहट
लुटा डाली मैंने उसी पर कमाई
नहीं रहता था मुझको अपने पे काबू
मुझे देखकर वो जहाँ मुस्कुराई
बराबर में उसने मकां क्या खरीदा
लगी टूटने अब मेरी पारसाई
न जा छोड़कर तू कहीं मुझको साग़र
मुझे मार डालेगी तेरी जुदाई
रईसों के वास्ते
सब काम हो रहे हैं रईसों के वास्ते
कुछ कीजिए हुज़ूर ग़रीबों के वास्ते
है ज़िम्मेदारी आपकी हर शख़्स ख़ुश रहे
हाकिम नहीं हैं सिर्फ़ अज़ीज़ों के वास्ते
गर आस रौशनी की है तो यह भी सोचना
है तेल भी ज़रूरी चिराग़ों के वास्ते
अब तक वो काम देखिए पूरा नहीं हुआ
छोड़ा था जो भी काम अदीबों के वास्ते
दिल खोल कर के लूट रहे आज डॉकटर
इल्ज़ाम क्यों हैं सारे वकीलों के वास्ते
कहना फ़कत है आज नये दौर से हमें
कुछ एहतराम रखिये ज़ईफों के वास्ते
साग़र किसी भी राह में ख़ौफ़-ओ-ख़तर न हो
इतना तो कीजिएगा हसीनों के वास्ते
मतलब निकाले हैं
तुम्हारी सोच के अंदाज़ भी कितने निराले हैं
ज़रा सी बात के तुमने कई मतलब निकाले हैं
फ़कत आँसू इन्हें कहना बड़ी तौहीन है इनकी
समुंदर से ग़मों के डूब कर मोती निकाले हैं
ये साज़िश है हवस है या सियासत है वज़ीरों की
सभी फ़िरक़ों ने आखिर क्यों अलग झंड़े संभाले हैं
जिधर देखो सियासत की नुमाइश में सजे चेहरे
ख़ुदा ही जान सकता है ये अब क्या करने वाले हैं
हमारी ही नज़र जाती नहीं घर के दरीचों पर
जिधर देखो उधर ही मकड़ियों ने जाल डाले हैं
हुनर अब आ गया है मछलियों को बच निकलने का
मछेरों ने कई तालाब के पानी खँगाले हैं
बहुत ढूँढा अंधेरों में मिली मंज़िल नहीं हमको
मगर यह हौसले अब भी नई उम्मीद पाले हैं
हसीं रुख पर बिखरती रेशमी जुल्फ़ों की रानाई
हमारे ज़हन में महफ़ूज़ वो अब तक उजाले हैं
बचाते लूटने वालों से ख़ुद को हम भला कैसे
हमें तो लूटने वाले बहुत ही भोले-भाले हैं
कहाँ जाकर भला ढूँढें सवालों के जवाबों को
भरी महफ़िल में साग़र आज जो तुमने उछाले हैं
बात बनाने वाला
जो मिला वो ही मिला बात बनाने वाला
काश मिल जाये कोई दर्द बँटाने वाला
ग़ैर ही ग़ैर ज़माने में नज़र आते हैं
कोई तो होता मुझे अपना बताने वाला
वो जिसे चाहे अता कर दे बुलंदी उसको
रोक पायेगा भला कौन ज़माने वाला
काश कुछ सोच के इंसान वो बोले हमसे
उसका हर लफ़्ज़ है इक आग लगाने वाला
तशनगी तारी है मुद्दत से मेरे होंठों पर
कौन था तेरे सिवा प्यास बुझाने वाला
इसलिए हमने हरिक बात गवारा कर ली
रूठ जायें तो है अब कौन मनाने वाला
छोड़ मौजों के हवाले दी यूँ कश्ती अपनी
अब वही एक है बस पार लगाने वाला
चाहे जितने भी करे वादे वो अब तो साग़र
उसके वादों पे भरोसा नहीं आने वाला
सलाम लिखा
किसी ने नाज़ो – अदा से हमें सलाम लिखा
किताबें – क़ल्ब पे हमने उसी का नाम लिखा
तमाम उम्र इसी जुस्तजू में बीत गई
ख़ुदा ने किस की हथेली पे मेरा नाम लिखा
ये ज़िन्दगी तो किसी और की अमानत थी
मेरे नसीब ने लेकिन नया निज़ाम लिखा
मैं जिसके कौलो – वफ़ा का रहा हूँ दीवाना
उसी ने मेरी वफ़ाओं को ना – तमाम लिखा
ये और बात ज़मीं आसमां न मिल पाये
हरेक हर्फ़े तमन्ना ने यह पयाम लिखा
ये तश्नगी तो समुंदर ही पी न जाये कहीं
जुनूं की प्यास ने अब तक नहीं क़याम लिखा
ये आज कौन सी मंज़िल पे आ गये साग़र
ज़ुबां ने कुछ तो निगाहों ने कुछ कलाम लिखा
क़ल्ब – ह्दय
निज़ाम – प्रबंध
कौलो वफ़ा – वचन निभाना
ना- तमाम – अपूर्ण
पयाम – संदेश
कलाम – बातचीत
नफ़रत की दीवारों को
तोड़ा करते हैं जो भी नफ़रत की दीवारों को
दुनिया पूजा करती है ऐसे ही किरदारों को
दुख की घड़ियों में साथी जो भी मेरे साथ रहे
भूल नहीं सकता हर्गिज़ मैं ऐसे ग़मख़्वारों को
इज़्ज़त लूटी ख़ून ख़राबा बस होती सुर्ख़ी में
डर लगता है पढ़ने से अब तो इन अखबारों को
फ़रियादी की लाज जहाँ पर बचपाना मुश्किल हो
लानत भेजूँगा मैं उन जैसे सब दरबारों को
ब्याज पे ब्याज लगा कर जो चूसे ख़ून ग़रीबों का
दंडित करना होगा उन सारे साहूकारों को
मँहगाई से टूट रहे हैं कितने इंसान यहाँ
चैन से रोटी मिलती है आखिर कब दुखियारों को
साग़र भटके फिरते हैं इस रस्ते उस रस्ते पर
कब मिल पायेगी मंज़िल हम से भी बंजारों को
निभाना पड़ता है
रिश्तों को ऐसे भी निभाना पड़ता है
झूठी क़सम का बोझ उठाना पड़ता है
अक्सर देखा दिल की सौदेबाज़ी में
हँसते – हँसते सर मुँडवाना पड़ता है
नूर नहीं घट पाये उसके चेहरे का
प्यार का साबुन रोज़ लगाना पड़ता है
अंजाने ही पड़ जाते हैं पाँव वहाँ
घर के रस्ते में मैख़ाना पड़ता है
फूलों की ख़ुशबू बिखरे घर- आँगन में
पहले हमको पेड़ लगाना पड़ता है
कब तक अपनी नीयत पर काबू रख्खूँ
मेरे आगे रोज़ ही दाना पड़ता है
हो बदनाम न अपनी मुहब्बत ऐ साग़र
आँखों में ही अश्क छुपाना पड़ता है
शामिल सब होते हैं
दुख में तन्हा हम रोते हैं
सुख में शामिल सब होते हैं
खार ही खार दिखे हैं हर सू
हम हर सू जब गुल बोते हैं
फ़सलों पर हक़ ग़ैर जतायें
खेत तो जब हमने जोते हैं
लालच के रथ पर जो बैठें
अपना भी वो धन खोते हैं
उनके आँसू कौन पढ़ेगा
जो औरों का दुख ढोते हैं
आ जाते हैं और निखर कर
दाग़ों को जितना धोते हैं
सूरज कितना चीखा साग़र
लोग पड़े अब तक सोते हैं
दिल से रोज़ाना हुआ
शोख का वादा वफ़ा जब दिल से रोज़ाना हुआ
शाम ढलते ही सजा फिर घर में मैख़ाना हुआ
साक़िया की मेहरबानी इस कदर जारी रही
नाचता हाथों में मेरे रोज़ पैमाना हुआ
धड़कने बेताब होकर हद से बाहर हो गयीं
जाम हाथों में लिए जब उनका बलखाना हुआ
होशमंदी राह में ही छूट जाती है कहीं
जलवा गाहे नाज़ में जब जब मेरा जाना हुआ
शान में उनकी क़सीदे उम्र भर मैंने लिखे
हर तरह बेकार मुझको सबका समझाना हुआ
रात दिन आगोश में जब उनकी हम डूबे रहे
दुनिया भर के दोस्तों से ख़त्म याराना हुआ
हो रहा है नाज़ साग़र अब मुक़द्दर पर मुझे
उनके जलवों से जो रौशन घर का वीराना हुआ
संभल भी सकती है
जो बिगड़ी आज है कल वो संभल भी सकती है
इसी भरोसे पे उम्मीद पल भी सकती है
है एहतियात ज़रूरी ये ध्यान में रखना
ज़रा सी चूक से सत्ता निकल भी सकती है
न फेंक कीच की जानिब तू एक पत्थर भी
ये कीच होश रहे तुझ पर उछल भी सकती है
खड़ी हो मौत किसी के भी लाख सिरहाने
नसीब कर दे इनायत तो टल भी सकती है
यक़ीन करना मगर इतना करना ठीक नहीं
कभी अज़ीज़ की नीयत बदल भी सकती है
मैं अपनी बात पे यूँ हो रहा हूँ शर्मिंदा
ज़ुबां का क्या है भरोसा फिसल भी सकती है
किया करो कभी तुम हम से गुफ़्तगू साग़र
ग़मों के बीच तबीयत बहल भी सकती है
दर ब दर फिरता रहा
जुस्तजू-ऐ-शौक लेकर दर ब दर फिरता रहा
मैं हथेली पर लिये ख़ून -ए-जिगर फिरता रहा
यह मिरे अश्आर मेरी फ़िक्र की परवाज़ थी
मुद्दतों अखबार की बनकर ख़बर फिरता रहा
जाने किस किस को थीं मेरे नाम में दिलचस्पियाँ
मेरे नक़्श-ए-पा लिये हर इक बशर फिरता रहा
हुस्न ने बेपर्दा होकर क्या दिये मुझको गुलाब
सबकी आँखों में मिरा ज़ौक-ए-हुनर फिरता रहा
तंग नज़रों की सियासत ने किया रुसवा मगर
अंजुमन दर अंजुमन मैं बेख़बर फिरता रहा
सिर्फ़ तेरी याद तेरी आरज़ू होंठो पे थी
सारी दुनिया भूलकर शाम-ओ-सहर फिरता रहा
जाने कितनी फूल सी आँखें मिरे चेहरे पे थीं
मैं दयार-ए-तशनगी में चश्मे-तर फिरता रहा
यह थी मेरे प्यार के अंदाज़ की “साग़र “कशिश
मेरी यादों में मगन वो उम्र भर फिरता रहा
इश्क़ के अंजाम से
रोज़ आ जाते हैं वो कोई न कोई काम से
हैं नहीं वाक़िफ वो शायद इश्क़ के अंजाम से
कर दिया मजबूर उसने अपनी शर्तों पर मुझे
लोग अब पहचानते हैं मुझको उसके नाम से
उसका ख़त लाकर कि मुझको जब से क़ासिद ने दिया
होश काबू में नहीं मेरा है इस पैग़ाम से
मेहरबानी उनकी मुझ पर दिन ब दिन बढ़ने लगी
कट रही है ज़िन्दगी मेरी बड़े आराम से
चढ़ गया है उसको मेरी क़ुर्बतों का अब नशा
मुंतजिर रहने लगा मेरे लिए वो शाम से
शायरी के शौक ने मशहूर इतना कर दिया
इस से पहले शहर में थे हम बहुत गुमनाम से
इसलिए उस शोख से साग़र किनारा कर लिया
उसने चाहा तोड़ लूँ रिश्ता मैं खास- ओ- आम से
दो क़ाफ़ियों में ग़ज़ल ( 4 )
मुफ़लिसी से मेरी यूँ चालाकियाँ चलता रहा
ज़हनो-दिल में वो मेरे ख़ुद्दारियाँ भरता रहा
मैं करम के वास्ते करता था जिससे मिन्नतें
वो मेरी तक़दीर में दुश्वारियाँ लिखता रहा
मोतियों के शहर में था तो मेरा भी कारवाँ
फिर भला क्यों रेत से मैं सीपियाँ चुनता रहा
कहने को मुश्किल नहीं था दोस्तो मेरा सफ़र
मेरा माज़ी राह में चिंगारियाँ रखता रहा
दिल की हर दहलीज़ पर थे नफ़रतों के ज़ाविये
मैं तो हर इक रहगुज़र के दर्मियाँ डरता रहा
ख़त के हर अल्फाज़ में थीं इस कदर चिंगारियाँ
मेरे दिल के साथ मेरा आशियाँ जलता रहा
कोई आकर छेड़़ता रहता था रोज़ाना मुझे
मैं फ़कत दामन की अपने धज्जियाँ सिलता रहा
जब भी बाँहों में समेटे चूमना चाहा उसे
मेरे होंठो पर हमेशा उंगलियाँ धरता रहा
जीत की ख़्वाहिश थी साग़र उसके दिल में इस कदर
अपनी हारों पर मेरी क़ुर्बानियाँ करता रहा
दो क़ाफ़ियों में ग़ज़ल ( 3 )
ज़मीने-दिल पे तो हम कहकशां भी ला देंगे
तमाम लोग यहाँ उंगलियां उठा देंगै
कहीं नमक तो कहीं मिर्चियां मिला देंगे
दिलों में लोग यूँ हीं दूरियां बढ़ा देंगे
ज़माना हमको भी मुजरिम क़रार दे देगा
किसी से ऐसी कोई दास्तां लिखा देंगे
किसी को सच की भी अब पैरवी नहीं भाती
ये सारे लोग तो बस हां में हां मिला देंगे
हमारी बात पे तुम ऐतबार जो कर लो
अकेले हम हैं मगर कारवां बना देंगे
ये वक़्त वक़्त की बातें हैं सोचते क्या हो
ये बेज़बान भी कल को ज़बां चला देंगे
क़सम तुम्हारी मुहब्बत की हमको है साग़र
वफ़ा के फूलों से हम आशियां सजा देंगे
दो क़ाफ़ियों में ग़ज़ल ( 2 )
अगरचे इक घड़ी को मेरी यह तक़दीर सो जाती
किसी की ज़ुल्फ़ ही मेरे लिये शमशीर हो जाती
कहीं तो चैन से रहने नहीं देती है यह हमको
ये तेरी याद जो हर दिन नई इक पीर बो जाती
ख़ुदी को मार ही लेते ज़रा गर हम जहाँ वालो
हमारी आरज़ू उस वक़्त ही दिलगीर हो जाती
ये आहों की नदी बहने न दी आँखों से यूँ हमने
किताब-ए-दिल पे वो लिक्खी हुई तहरीर धो जाती
हमें भी बोलने की छूट जो कुछ आप दे देते
यक़ीनन ही मुअम्मे की वहीं तफसीर हो जाती
किसी के हुस्न की रानाइयों में यूँ नहीं डूबे
यही था डर हमें तेरी कहीं तस्वीर खो जाती
हमीं ने तोड़ दी तक़दीर की जंज़ीर ऐ *साग़र *
वगर्ना सोचिये इंसान की तदबीर सो जाती में
शमशीर — तलवार
तहरीर — लिखी हुई बात , आलेख
दिलगीर — उदास
तफ़सीर — व्याख्या, विवेचना
तदबीर — कोशिश, प्रयास
दो क़ाफ़ियों में ग़ज़ल ( 1 )
मुझ पे कितना बड़ा अहसान किया है तुमने
मुद्दतों बाद भी पहचान लिया है तुमने
इक जुदाई ही नहीं कितने ही ग़म दे डाले
मेरे जीने को ये सामान दिया है तुमने
बाद बरसों के सही तुम को समझ तो आया
मैं जो कहता था वो सब मान लिया है तुमने
ता क़यामत ही ये अहसान रहेगा मुझ पर
चाक मेरा जो गिरेबान सिया है तुमने
बेवफ़ा कहते हुए लोग चिढ़ाते हैं तुम्हें
ज़हर कितना ये मेरी जान पिया है तुमने
सारे अहबाब यही कहते हैं मुझसे साग़र
तंगहाली में भी ईमान जिया है तुमने
बुत तराशने वाले
ख़बर हो तुझको मेरा बुत तराशने वाले
खड़े हैं लोग मुझे फिर से मारने वाले
मैं उस मुक़ाम पे सदियों खड़ा रहा कैसे
जहाँ खड़े थे मेरा सर उतारने वाले
इसे ख़ुलूस मैं समझूँ या कोई साज़िश है
मुझी को पूजने आये हैं मारने वाले
मैं अपने जिस्म को कुछ तो लिबास दे देता
ज़रा ठहर मेरा पैकर तराशने वाले
मुझे चुका तू समझने की भूल मत करना
हज़ारों हाथ हैं मुझको संवारने वाले
हवायें और मुखालिफ़ कहीं न हो जायें
डरे हुए हैं ये कश्ती संभालने वाले
ये कैसा खेल है साग़र जो तूने खेला है
बिसात फिर से बिछाते हैं हारने वाले
तमाशा करता है
मेरे ख़यालों में आकर वो रोज़ तमाशा करता है
भूली बिसरी यादों से मुझको बहलाया करता है।
मुद्दत पहले इक दूजे पर जैसे प्यार लुटाते थे
वो मंज़र आँखों में मेरी हर दिन उभरा करता है
माना अब मिलने जुलने के मौक़े हाथ नहीं आते
लेकिन फोन के ज़रिए वो बातें रोज़ाना करता है
क़िस्मत से ही ऐसी मुहब्बत मिल पाती है दुनिया में
मुश्किल घड़ियों में भी मेरी हिम्मत बाँधा करता है
प्यार जताने की कोशिश में भूल नहीं तुम यह जाना
आँखें चुगली कर देती हैं जब कोई दिखावा करता
उसकी राहें तकने को मजबूर हुआ जाता हूँ मैं
वादा निभाने का वो इतना तगड़ा दावा करता है
ऐ साग़र किरदार मेरा है उसकी नज़रों में आला
कैसा भी माहौल हो वो पर मुझ पे भरोसा करता है
अँधेरी रात को
अँधेरी रात को इक पल में जगमगा दोगे
नक़ाब चेहरे से थोड़ा भी गर हटा दोगे
ज़रूर तुमको भी आयेगा लुत्फ़ जीने में
हमारे साथ क़दम से क़दम मिला दोगे
मैं तुमको प्यार की सौग़ात ऐसी दे दूँगा
तमाम उम्र यक़ीनन मुझे दुआ दोगे
उड़ान और भी मदमस्त होगी फिर मेरी
मुझे ज़रा सा जो तुम बढ़ के हौसला दोगे
हवास अपने मैं रख्खूँगा कैसे काबू में
शराबे-हुस्न मुझे रोज़ गर पिला दोगे
मिलेगी भटके मुसाफ़िर को किस तरह मंज़िल
हमारे नक़्शे-क़फ़े -पा अगर मिटा दोगे
पता चलेगी तुम्हें जब भी असलियत साग़र
गिला या शिकवा शिकायत सभी भुला दोगे
पराई चीज़
पराई चीज़ पे अधिकार कर नहीं सकते
इसीलिए ही उसे प्यार कर नहीं सकते
क़ुबूल दिल को न जब तक ये बात हो जाये
तमाम उम्र का इक़रार कर नहीं सकते
बग़ैर उसकी निगाहों में प्यार देखे हुए
कभी भी प्यार का इज़हार कर नहीं सकते
भरोसा हम पे ही कर के यहाँ वो आया है
कि ऐसे मोड़ पे इनकार कर नहीं सकते
उमीदवार कई और तुमसे पहले हैं
यूँ ताजदार तुम्हें यार कर नहीं सकते
बड़े जतन से बनाया महल है ख़्वाबों का
शिकस्त खा के भी मिस्मार कर नहीं सकते
उसे यक़ीन है साग़र हमारी चाहत पर
दग़ीला अपना ये किरदार कर नहीं सकते
फ़साने भर तक
हम भी ज़िंदा हैं यहाँ एक फ़साने भर तक
याद रख्खेगा हमें कौन ज़माने भर तक
अब किताबों में भला कौन खपाता ख़ुद को
पूछ होती है इन्हें घर में सजाने भर तक
जिसको रोते हुए यह उम्र हमारी गुज़री
वो चला साथ मगर रस्म निभाने भर तक
फिर पलट कर तो कभी हाल न पूछा हमसे
उसने साधा था हमें एक निशाने भर तक
अब तो गाँधी ओ जवाहर पे सियासत देखो
याद करते हैं उन्हें नाम भुनाने भर तक
वो सियासी था उसे ख़ूब हुनर आता था
जी हुज़ूरी पे रहा नाम कमाने भर तक
उसके हाथों का रहे सिर्फ़ खिलौना साग़र
खेल खेला था वो बस ख़ुद को हँसाने भर तक
खाली बोतल है खाली पैमाना
कौन लिख्खेगा दिल का अफ़साना
है अजब मुश्किलों में दीवाना
हुस्ने मतला —-
ऐसा बदला निज़ामे – मैख़ाना
खाली बोतल है खाली पैमाना
दाल आटे की फ़िक्र है हम को
भाव चढ़ने लगे हैं रोज़ाना
कैसे बच्चे पलें ग़रीबों के
ग़ौर इस पर भी कुछ तो फ़रमाना
यह सियासत है कुछ वज़ीरों की
रोज़ पड़ता है हम को ग़म खाना
इन वजीरों में औ’र रईसों में
अब मुनासिब नहीं है याराना
आह निकलेगी जब ग़रीबों की
काम देगा न कुछ दवा खाना
जाति धर्मों में बाँटने वालों
बंद करिये यूँ हम को लड़वाना
हम ने सौंपा है इन को सिंघासन
कोई साग़र ये इन को समझाना
अवसर कभी कभी
मिलते हैं ऐसे ज़ीस्त में अवसर कभी -कभी
होते हैं सर निगूंँ जो सितमगर कभी-कभी
यह सोच कर ही हम भी सफ़र पर निकल पड़े
पड़ता है रास्ते में समुंदर कभी-कभी
ख़ुद पर यक़ीन तुम भी कभी तो किया करो
आते हैं इस ज़मीं पे पयम्बर कभी-कभी
है सर पे इम्तिहान ज़रा यह भी सोचिये
देता नहीं है साथ मुक़द्दर कभी-कभी
शर्मिंदा तेरी बज़्म में होकर भी हमनशीं
पीना पड़ा है ज़हर का साग़र कभी-कभी
वो छत पे आके कर दें मुकम्मल ग़ज़ल मेरी
जागा किये हैं हम भी यूँ शब भर कभी-कभी
खो जाते थे निगाहों में इक दूसरे की हम
लेकिन हुए ये लम्हे मयस्सर कभी-कभी
साग़र ये दौर भी था हमारे नसीब में
आ जाते थे करीब वो छुपकर कभी-कभी
ज़ीस्त – जीवन
निगूँ – झुकना
हमारी और कुछ
खुल गईं आँखें हमारी और कुछ
जान लीं बातें तुम्हारी और कुछ
ज़ुल्फ़ उसने जब संँवारी और कुछ
छा गई हम पर ख़ुमारी और कुछ
आपके इल्ज़ाम सर आँखों पे हैं
है ख़ता मेरी ही सारी और कुछ
हम किसी भी तौर झुक पाये न जब
कर दिये फ़रमान जारी और कुछ
हौसले मेरी वफ़ा के देखकर
कर रहे हैं जांनिसारी और कुछ
मीरा या सुकरात से होते हुए
आ गई मेरी भी बारी और कुछ
आप के हाथों में पत्थर देखकर
कर गये हैं संगबारी और कुछ
पूछते हो आलम- ए – तन्हाइयां
तारे गिन गिन शब गुज़ारी और कुछ
अब तो साग़र साथ हर पल का रहे
तोड़ दी दुनिया से यारी और कुछ
इतनी मिन्नत से
इतनी मिन्नत से उसने खिलाया मुझे
लुत्फ़ ही लुत्फ़ खाने में आया मुझे
तोड़नी ही पड़ी मुझको अपनी क़सम
देके अपनी क़सम जो बुलाया मुझे
शहर में उसके मैं एक परदेसी था
अपनी गाड़ी से उसने घुमाया मुझे
सुब्हो कब हो गई कुछ पता ही नहीं
बातों बातों में ऐसा लुभाया मुझे
इत्तिफ़ाक़न किसी बज़्म में वो मिले
पास अपने हमेशा बिठाया मुझे
लड़खड़ाये क़दम मेरे उसने वहीं
हौसला देके आगे बढ़ाया मुझे
उसका अहसान मानूँ मैं साग़र न क्यों
ज़िंदगी का सलीक़ा सिखाया मुझे
नज़ारे कभी कभी
होते हैं दिल नशीन नज़ारे कभी-कभी
आ जाते हैं वो पास हमारे कभी-कभी
जी चाहता है पहलू से उठने न दूँ उन्हें
लगते हैं इस कदर ही वो प्यारे कभी-कभी
इस बात पर वो आज भी होते हैं ख़ुश बहुत
गेसू जो हमने उनके सँवारे कभी-कभी
महफ़ूज़ हर बला से रहें ता हयात वो
सदके़ यूँ हमने उनके उतारे कभी-कभी
नखरे ये दिल फ़रेब दिखाओ न इस कदर
खलते बहुत हैं नाज़ तुम्हारे कभी-कभी
मायूसियां न उनके तबस्सुम को लील लें
हम जीत कर भी उनसे हैं हारे कभी-कभी
हसरत ये बार- बार मेरे दिल में क्यों उठी
अपना मुझे वो कह के पुकारे कभी-कभी
आये जुनूने- इश्क़ में ऐसे मुक़ाम भी
अफ़सुर्दा देखे चाँद सितारे कभी-कभी
साग़र हमारे होश बग़ावत पे आ गये
ऐसे किये हैं उसने इशारे कभी-कभी
नज़ारे – दृश्य
हयात – जीवन
मुक़ाम – स्थान ठहरने का
अफ़सुर्दा – उदास
चिकने घड़े हैं
हमारे फ़ैसले होते कड़े हैं
अगरचे फ़ायदे इसमें बड़े हैं
जहाँ तुमने कहा था फिर मिलेंगे
उसी रस्ते में हम अब तक खड़े हैं
सुनाकर भी इन्हें हासिल नहीं कुछ
हमारे रहनुमा चिकने घड़े हैं
छुड़ाया लाख पर पीछा न छूटा
गले वो इस तरह आकर पड़े हैं
किसी के तंज़ छू पाये न हमको
कि अपने क़द में हम इतने बड़े हैं
अमीरों से उन्हें डरते ही देखा
ग़रीबी से जो रात-ओ-दिन लड़े हैं
जहाँ कह दो वहाँ चल देंगे साग़र
यहाँ पर कौन से पुरखे गड़े हैं
ये शहरे इश्क़ है
ये शहरे-इश्क़ है चलती यहाँ पे आन नहीं
कहाँ पे कौन झुके इसका कहीं गुमान नहीं
ये उम्र जिसकी गुज़ारी है ख़ैरख़्वाही में
वो एक शख़्स ही दिखता है मेहरबान नहीं
मिले थे और भी चेहरे हसीन मेले में
सिवाए उसके हमें तो किसी का ध्यान नहीं
हरेक बार ये कहते हो और बैठो ज़रा
तुम्हारे जैसा दिखा हमको मेज़बान नहीं
ख़ुलूस प्यार मुहब्बत से पेश आता है
अमीरे-हुस्न है फिर भी वो बदगुमान नहीं
किया है मेरी उमीदों का ख़ून यूँ उसने
कि उसके दामां पे आया कहीं निशान नहीं
वो ज़हनो-दिल पे यूँ क़ाबिज़ हुआ है ऐ- साग़र
कभी लगा नहीं मुझको वो दर्मियान नहीं
मज़े आ रहे हैं
करम जब से हम पर हुए हैं किसी के
मज़े आ रहे हैं हमें ज़िन्दगी के
पड़े हम को मँहगे वो पल दिल्लगी के
फँसे प्यार में हम जो इक अजनबी के
किया उसने दीवाना पल भर में मुझको
हुनर उस पे शायद हैं जादूगरी के
निगाहों से साग़र पिलाने लगे वो
मुक़द्दर जगे आज तशनालबी के
किसी के भी दिल को न मायूस छोड़ा
ज़माने थे अपने भी दरियादिली के
अंधेरे भी घबरा के भागे हुए हैं
क़दम जब से घर में पड़े चाँदनी के
हुई रोज़ जम कर मुहब्बत की बारिश
निखरने लगे रंग प्यासी नदी के
वो परदेस से लौटे जिस वक़्त साग़र
जलाये तभी दीप दीपावली के
है ये रंग-ए-बहार होली का
है ये रंग-ए-बहार होली का
चल पड़ा कारोबार होली का
देखते ही मुझे कहा उसने
देखो आया शिकार होली का
उसने डाला है रंग यूँ मुझपर
चढ़ गया है ख़ुमार होली का
भूल जाओ सभी गिले शिकवे
यह तक़ाज़ा है यार होली का
इसको पानी हुज़ूर मत कहिये
इसमें शामिल है प्यार होली का
इसमें रहता बदन का होश नहीं
है ये ऐसा बुखार होली का
मेरा महबूब दूर है मुझसे
था बहुत इंतज़ार होली का
बाद मिन्नत के उनसे ऐ साग़र
हो रहा है क़रार होली का
ख़ुमार होली में
अजीब रंग का देखा ख़ुमार होली में
नशे में झूमता सारा दयार होली में
हमारे रंग में भीगे तो भीगते ही रहे
रहा न ख़ुद पे उन्हें इख़्तियार होली में
नशा था हम पे मुहब्बत का इस कदर तारी
लगाया रंग उन्हें बेशुमार होली में
इसी ख़ुशी में हूँ डूबा हुआ अभी तक मैं
हुए वो शौक से मेरा शिकार होली में
ख़ुलूस प्यार मुहब्बत सभी लुटाते हैं
बना रहे ये सदा ऐतबार होली में
उदास चेहरों पे लाकर हँसी ही मानेंगे
अहद ये हमने किया अब की यार होली में
वो आ रहे हैं लगाने को रंग ऐ- साग़र
उड़ा हुआ है यूँ सब्र-ओ-क़रार होली में
महसूस हुआ
आज हमें हर ग़म अपना ही बेगाना महसूस हुआ
उनके ख़़त का हर आँसू इक अफ़साना महसूस हुआ
प्यार भरे रंगीं वादों का ख़ून हुआ जिस बस्ती में
उन गलियों में अब तक दिल को वीराना महसूस हुआ
रफ़्ता रफ़्ता बंधते गये हम ख़ुद रेशम ज़ंजीरों में
तेरी ज़ुल्फ़ों का अब हमको बलखाना महसूस हुआ
हर चेहरा ही खींच रहा है अब तो अपनी सिम्त हमें
हर चेहरे में उनका ही इक नज़राना महसूस हुआ
कितनी मीना कितने साग़र कितने हमने जाम पिये
तेरी आँखों में हर दिन ही मैख़ाना महसूस हुआ
छलके पड़ते थे पैमाने बलखाता था साक़ी भी
महफ़िल में हर इक चेहरा ही रिन्दाना महसूस हुआ
हम ही तन्हा चढ़ते जाते प्यार की सूली पर शायद
देख के हमको उस ज़ालिम का मुस्काना महसूस हुआ
चाँद सितारे तोड़ के हम भी ला सकते थे यार मगर
उनके पहलू में तब हमको तहख़ाना महसूस हुआ
हम जो साग़र आ पहुँचे हैं इन शीशों की बस्ती में
हमको अपना दौर-ए-माज़ी दीवाना महसूस हुआ
बिल्कुल नई रदीफ़
लुटाने प्यार महीनों के बाद आता है
हमारा यार महीनों के बाद आता है
कमाले – जब्त पे मुझको भी नाज़ है ख़ुद पर
वो जांनिसार महीनों के बाद आता है
यक़ीन है वो निभायेगा अपने वादे को
ये ऐतबार महीनों के बाद आता है
उदास बैठे हैं साक़ी सुराही पैमाने
वो बादाख़्वार महीनों के बाद आता है
शराबे – इश्क़ पिला दो हुज़ूर जी भर के
हमें ख़ुमार महीनों के बाद आता है
तड़पते रहते हैं तन्हा ही दर्द में हम तो
वो ग़मगुसार महीनों के बाद आता है
करूँ गिला या शिकायत भी उस से क्या साग़र
ये इंतज़ार महीनों के बाद आता है
इज़्ज़त बनी रही
हर इक नज़र में मेरी भी इज़्ज़त बनी रही
कुछ इस तरह से उनकी इनायत बनी रही
कुछ और पास आने की चाहत बनी रही
उनसे यही तो एक शिकायत बनी रही
कुछ इस तरह से उसने बुलाया था बज़्म में
लोगों में मेरे दीद की हसरत बनी रही
जिस घर को तुमने प्यार से जन्नत बना दिया
उस घर में हर नफ़स ही मुहब्बत बनी रही
दिल के हज़ार टुकड़े हुए तो भी क्या हुआ
दिल पर तुम्हारी फिर भी हुकूमत बनी रही
जो तूने ज़िंदगी का पढ़ाया था फ़लसफ़ा
तेरी क़सम वो मेरी तो आदत बनी रही
क्या -क्या करूँ बयान मैं इस ज़िंदगी में अब
तेरी क़दम क़दम पे ज़रूरत बनी रही
ऐसे जुड़े हैं हमसे वफ़ाओं के सिलसिले
साग़र दयारे-इश्क़ में शोहरत बनी रही
इक इक करोड़ के
वो अश्क हर नज़र में थे इक-इक करोड़ के
दामन सजा रहा था कोई दिल निचोड़ के
शाम-ए-फ़िराक़ में ये बहुत काम दे रहा
तुम जामे-ग़म गये जो मिरे नाम छोड़ के
करता है बात वो तो बड़ी एहतियात से
लफ़्ज़ों को तोड़ के कभी लफ़्ज़ों को मोड़ के
इक दिन उफ़ुक़ पे होगा मिरे दिल का आफ़ताब
सीढी बना रहा हूँ हरिक दिल को जोड़ के
उसके ग़ुरूरे-हुस्न का आलम तो देखिये
क्या लुत्फ़ ले रहा है वो आईना तोड़ के
पीछे हैं इसके आज भी नफ़रत की आँधियाँ
क्यों रास्ता बनायें ये दीवार फोड़ के
साग़र शब-ए-विसाल का मंज़र था लाजवाब
माला बनाई उसने दुपट्टा मरोड़ के
शाम-ए-फ़िराक़ – जुदाई की शाम
उफ़ुक़ – क्षितिज
शब-ए-विसाल – मिलन की रात
मशहूर हो गए
कितने अजब ये आज के दस्तूर हो गये
कुछ बेहुनर से लोग भी मशहूर हो गये
जो फूल हमने सूँघ के फेंके ज़मीन पर
कुछ लोग उनको बीन के मग़रूर हो गये
हमने ख़ुशी से जाम उठाया नहीं मगर
उसने नज़र मिलाई तो मजबूर हो गये
उस हुस्ने-बेपनाह के आलम को देखकर
होश-ओ-ख़िरद से हम भी बहुत दूर हो गये
इल्ज़ाम उनपे आये न हमको ये सोचकर
नाकरदा से गुनाह भी मंज़ूर हो गये
रौशन थी जिनसे चाँद सितारों की अंजुमन
वो ज़ाविये नज़र के सभी चूर हो गये
साग़र किसी ने प्यार से देखा है इस कदर
शिकवे गिले जो दिल में थे काफूर हो गये
कोई ख़याल नहीं
ख़याले-यार से बढ़कर कोई ख़याल नहीं
शब-ए-फ़िराक़ है फिर भी ज़रा मलाल नहीं
किसी की सम्त उठा कर निगाह क्या देखें
तेरे जमाल के आगे कोई जमाल नहीं
जमाले -यार की रानाइयों में खोया हूँ
फ़ज़ा-ए-मस्त से मुझको अभी निकाल नहीं
उड़ेगी नींद तू खोयेगा चैन दिन का भी
दिमाग़ो-दिल में तसव्वुर किसी का पाल नहीं
बयान करने से पहले न अश्क़ बह निकलें
तू पूछ मुझसे परेशानियों का हाल नहीं
मैं तोड़ बैठूँ न ज़ंजीर अपने पैरों की
लहू को यार तू इतना मेरे उबाल नहीं
ये रख रखाव भी उसका है बाइस-ए-हैरत
ग़रूरे -हुस्न पे आया ज़रा ज़वाल नहीं
मैं बेख़ुदी में न ग़ुस्ताखियाँ कहीं कर दूँ
शराब और तू साग़र में मेरे डाल नहीं
शब-ए-फ़िराक़- विरह की रात
मलाल– दुख ,पश्चाताप
जमाल – अदितीय रूपवान
ज़वाल – पतन ,गिरावट ,कमी आना ,
बाइसे-हैरत -आश्चर्य का कारण
शराब की सी है
वो तो बोतल शराब की सी है
उसकी सोहबत अज़ाब की सी है
उसको अक्सर ही पढ़ता रहता हूँ
उसकी सूरत किताब की सी है
बस जुदाई है एक लम्हे की
यह घड़ी इज़्तिराब की सी है
नाज़ुकी उस बदन की क्या कहिए
हूबहू ही गुलाब की सी है
उनके आने से हर तरफ़ देखो
रौशनी माहताब की सी है
हर किसी के क़दम थिरकने लगे
धुन ये गोया रबाब की सी है
जीत कर आ रहा है वो साग़र
चाल यह कामयाब की सी है
इज़्तिराब – व्याकुलता, बेचैनी
रबाब – वाद्य यंत्र
ना ख़ुदा ही नहीं
पार अब तक सफ़ीना हुआ ही नहीं
कोई हम को मिला नाख़ुदा ही नहीं
दस्तकें लाख देता रहा मैं मगर
दिल का दरवाज़ा उसका खुला ही नहीं
साथ उसका भला कैसे मैं छोड़ दूँ
ऐब उस में मुझे कुछ दिखा ही नहीं
प्यार पाता मैं कैसे तेरा उम्र भर
ऐसा क़िस्मत में शायद लिखा ही नहीं
ऐब दूजों में सब ढूँढते हैं यहाँ
कोई अपनी कमी ढूंँढता ही नहीं
छोड़कर तुझको जाऊं कहाँ तू बता
तेरे जैसा कोई दूसरा ही नहीं
कोई वादा न उसने निभाया मगर
दिल ने माना उसे बेवफ़ा ही नहीं
रास्ते में मिलेंगे कई हमसफ़र
एक तू मेरा बस हमनवा ही नहीं
उसने कोशिश तो साग़र बहुत की मगर
फ़ासला दर्मियां का मिटा ही नहीं
कद्रदानों के थे
यह भी अहसान कुछ क़द्रदानों के थे
जो निशाने पे हम भी कमानों के थे
जो भी सीनों पे सब आसमानों के थे
वो सभी तीर अपनी कमानों के थे
ठोकरों ने भी बख़्शा हमें रास्ता
हौसले जब दिलों में चटानों के थे
.हैं निगाहों में अब भी वो रश्क-ए-चमन
जो भी जाँबाज़ ऊँची उड़नों के थे
जुगनुओं को भी डसने लगी तीरगी
हुक्म ऐसे यहाँ हुक्मरानों के थे
तितलियों को भी शर्मिंदा होना पड़ा
काग़ज़ी फूल सब फूलदानों के थे
ले गयी भूख बच्चों की किलकारियां
हम तो पुर्ज़े फ़कत कारखानों के थे
.उम्र भर हम तो साग़र चले धूप में
आसरे कब हमें सायबानों के थे
यह कहानी फिर सही
हमने कब किसको पुकारा यह कहानी फिर सही
किसको होगा यह गवारा यह कहानी फिर सही
आबरू जायेगी कितनों की तुम्हें मालूम क्या
किसने किसका हक़ है मारा यह कहानी फिर सही
रिश्तों को मीज़ान पर लाकर के जब रख ही दिया
क्या रहा मेरा तुम्हारा यह कहानी फिर सही
तेज़ था तूफान बरहम भी था हमसे नाख़ुदा
कैसे पाया था किनारा यह कहानी फिर सही
जिसने मेरा हाथ थामा ख़ुश रहे वो ऐ ख़ुदा
कौन है मेरा सहारा यह कहानी फिर सही
अपनी ग़लती का उसे अहसास शायद हो गया
लौट आया वो दुबारा यह कहानी फिर सही
उड़ रहे हैं होश मेरे इन को काबू में करूँ
जो भी देखा है नज़ारा यह कहानी फिर सही
पहले अपने दिल को बहला लूँ मैं साग़र हर तरह
इश्क़ में क्या क्या है वारा यह कहानी फिर सही
आबरू – सम्मान,लाज
नाख़ुदा – नाविक,
इशारा नहीं किया
नाकाम हमने उनका इशारा नहीं किया
दिल तोड़ना किसी का गवारा नहीं किया
दिल तोड़ कर किसी का पशेमां हैं आज तक
यह काम हमने दोस्त दुबारा नहीं किया
जब जब उन्हें हमारी ज़रूरत दिखाई दी
उस वक़्त हमने उनसे किनारा नहीं किया
जिस-जिस ने हमको अपना बनाया था राज़दाँ
उनके यक़ीं का हमने ख़सारा नहीं किया
हसरत भरी निगाहों की ज़द में हैं कब से हम
फिर भी किसी नज़र का उतारा नहीं किया
मंज़र था बेलिबास निगाहों के सामने
जी भर लगा कि फिर भी नज़ारा नहीं किया
साग़र बतायें कैसे तुम्हें राज़े-ज़िन्दगी
हमने कहाँ-कहाँ पे गुज़ारा नहीं किया
काम आना चाहिए
जज़्बा-ऐ इंसानियत सबको दिखाना चाहिए
कोई प्यासा हो उसे पानी पिलाना चाहिए
नेकियों की राह पर जो आदमी हो गामज़न
हौसला उस शख़्स का हमको बढ़ाना चाहिए
हर कहानी में यही मफ़हूम मैंने लिख दिया
आदमी को आदमी के काम आना चाहिए
इस ज़माने से नसीहत यह हमें भी मिल गई
दोस्ती करने से पहले आज़माना चाहिए
ज़िन्दगी ढोता रहा ख़ानाबदोशों की तरह
इस मुसाफ़िर को भी अब इक आशियाना चाहिए
अपने घर जैसी हिफ़ाज़त मुल्क की सब ही करें
बात यह दानिशवरों सबको बताना चाहिए
कर रहा गुमराह हर दिन हमको मीर-ए-कारवाँ
इससे बचने का हमें कोई बहाना चाहिए
कातिब-ए-तक़दीर से कहना है यह साग़र हमें
हमको भी मेहनत के बदले आबोदाना चाहिए
मफ़हूम-विषय
दानिशवरों-बुद्धिजीवियों
मीर-ए-कारवाँ-समूह या दल का नेता
कातिब-ए-तक़दीर-भाग्य लिखने वाला
जगाते हो किसलिए
गुज़रे दिनों की याद दिलाते हो किसलिए
ख़्वाबीदा हसरतों को जगाते हो किसलिए
आकर ख़याले-बाग़ में जाते हो किसलिए
अफ़सुर्दा ज़िन्दगी को बनाते हो किसलिए
बेबाक़ियों ने आपकी जब दिल ही ले लिया
फिर इतने नाज़ नखरे दिखाते हो किसलिए
बढ़कर उठा लो जामो- सुराही को हाथ में
दिन ज़िन्दगी के यूँ हीं गँवाते हो किसलिए
यह प्यार है नहीं तो बता दो तुम्ही है क्या
जब रूठता हूँ मैं तो मनाते हो किसलिए
इतना तो सोचिये कहीं डस लें न ज़ुल्मतें
रोशन चराग़ कर के बुझाते हो किसलिए
साग़र बक़द्रे ज़र्फ़ मिलेगी यहाँ तुम्हें
ख़ामोशियों में शोर मचाते हो किसलिए
अफ़सुर्दा – मायूस, उदास
ज़ुल्मतें – अंधेरे
बक़द्रे-ज़र्फ – सहनशक्ति या योग्यता अनुसार
सब्र मेरा न यूँ आज़माया करो
सब्र मेरा न यूँ आज़माया करो
रूबरू ऐसे सज कर न आया करो
इतनी बातें न हमसे बनाया करो
जामे – उल्फ़त ख़ुशी से पिलाया करो
साक़िया तुम को इस प्यासे दिल की क़सम
शाम ढलते ही महफ़िल सजाया करो
प्यार की मौजें दिल में पटकती हैं सर
इस समुंदर में आकर नहाया करो
कैसे जानें कि हमसे तुम्हें प्यार है
प्यार को बेझिझक तुम जताया करो
जिसके मिलने से होती है तुम को ख़ुशी
वो जो रूठे तो उसको मनाया करो
उसने साग़र बड़े नाज़ से कह दिया
देखते ही हमें मुस्कुराया करो
ख़ूब हंगामा हुआ
उसने जब मुझको पुकारा ख़ूब हंगामा हुआ
मैं बना उसका सहारा ख़ूब हंगामा हुआ
देखकर मायूसियां चेहरे पे तेरे,रात भर
मेरे दिल में मेरे यारा ख़ूब हंगामा हुआ
छीन ली पतवार मौजों ने मेरे हाथों से पर
जब मिला मुझको किनारा ख़ूब हंगामा हुआ
उसके जाने पर उदासी थी नज़र में हर तरफ़
आ गया जब वो दुबारा ख़ूब हंगामा हुआ
जब अमीर- ए- हुस्न ने दावत पे बुलवाया मुझे
मैंने देखा वो नज़ारा ख़ूब हंगामा हुआ
ख़ुश बहुत थे बीबी बच्चे और घर के लोग सब
चमका जब मेरा सितारा ख़ूब हंगामा हुआ
हमसे बर्बादी चमन की देखी जाती थी नहीं
देखा जब गुलचीं को हारा ख़ूब हंगामा हुआ
अहले – दुनिया ने सुना जब मुझको यह कहते हुए
जो है मेरा वो तुम्हारा ख़ूब हंगामा हुआ
दुश्मनों की सिम्त साग़र सैकड़ों अहबाब थे
था वही बस इक हमारा ख़ूब हंगामा हुआ
वहाँ आन-बान की
जब बात चल रही थी वहाँ आन-बान की
लोगों ने दी मिसाल मेरे खानदान की
मैं हूँ ज़मीन का वो परी आसमान की
कैसे मिटेगी दूरी भला दर्मियान की
देखूं मैं उसके नखरे या माँ बाप की तरफ़
सर पर खड़ी हुई है बला इम्तिहान की
कैसे यक़ीं दिलाऊं उसे अपनी बात का
धज्जी उड़ा दी उसने मेरे हर बयान की
बोते हैं वो बबूल तलब आम की करें
आफ़त में जान आ गई अब बाग़बान की
परवाह अपनी ख़ुद की करें भूलकर मुझे
मुझको कमी नहीं है यहांँ क़द्रदान की
साग़र मैं उठ के जाऊं तो जाऊं भी किस तरह
रोके हुए नज़र है मुझे मेज़बान की
रोना बहुत है
अभी आलाम का रोना बहुत है
तुम्हारा साथ में होना बहुत है
रहे क्या आरज़ू दुनिया की हमको
तुम्हारे दिल का इक कोना बहुत है
थकन तारी न हो पाये बदन पर
वफ़ाओं को अभी बोना बहुत
बरसती हैं यहाँ यादें किसी की
हमारे पास यह सोना बहुत है
तुम्हें चाँदी की हो थाली मुबारक
हमारे वास्ते दोना बहुत है
हमारे सर पे ज़िम्मेदारियां हैं
अभी इस बोझ को ढोना बहुत है
संभल के चलियेगा साग़र यहाँ पर
कि राह-ए-इश्क में खोना बहुत है
तुम्हारा इशारा हुआ
इतना दिलकश तुम्हारा इशारा हुआ
दिल हमारा था पल में तुम्हारा हुआ
दोनों टकरा के इक दूसरे पर गिरे
हादसा ऐसा क्यों यह तिबारा हुआ
दूसरा इसके जैसा कहाँ से मिले
रूप है यह ख़ुदा का सँवारा हुआ
जब से दीं हमने घर की उन्हें चाबियाँ
शान से फिर हमारा गुज़ारा हुआ
हमसफ़र जब से वो ज़िन्दगी में हुए
ख़ुशनुमा ख़ुशनुमा ही नज़ारा हुआ
दिल ने रुतबा ही ऐसा दिया है उन्हें
उनका सब कुछ ही हमको गवारा हुआ
मेहरबां वक़्त साग़र हुआ हम पे जब
वो भी हासिल हुआ जो था हारा हुआ
किसी को क्या देखा
हम बतायें किसी को क्या देखा
उनका आलम ही दूसरा देखा
मेरे आते ही उनके चेहरे को
फूल जैसा खिला हुआ देखा
वोही हँसते मिले हैं आँखों में
हमने जब जब भी आइना देखा
दो घड़ी ही नज़र मिली उनसे
चढ़ता रग-रग में इक नशा देखा
उनसे मिलने के वास्ते मैंने
अपने दिल में भी ज़लज़ला देखा
आज तक ही वो महवे-हैरत है
जिसने भी मेरा हौसला देखा
कैसे मंज़िल नशीं वो हो पाये
जिसने पैरों का आबला देखा
जब इशारा उधर से था साग़र
हमने फिर कुछ न फ़ासला देखा
होनी को तो होना है
बेजा जादू टोना है
होनी को तो होना है
प्यार के गुंचे खिल उठ्ठें
प्यार यूँ हमको बोना है
उनकी इनायत कब होगी
इसका ही बस रोना है
उनके प्यार की दौलत से
सस्ता चाँदी सोना है
उनकी तव्वजो से रंगीं
घर का कोना कोना है
दामन पर जो दाग़ लगे
सच्चे मन से धोना है
पिछली यादें बिसरा कर
चादर तान के सोना है
उनका इशारा हो साग़र
वो लम्हा नहीं खोना है
घर को संभाले
इस दिल को बता तू ही करूँ किसके हवाले
अब तेरे सिवा कौन मिरे घर को संभाले
इक बात ही कहते हैं यहाँ आके पड़ोसी
जब तुम थे बरसते थे यहाँ जैसे उजाले
मेरे ही तबस्सुम से तिरा रूप खिला है
तू अपनी निगाहों के कभी देख तो हाले
बख़्शी थी कभी टेक के सर ,तूने मसर्रत
काँधे से मिरे आज तू फिर सर को टिकाले
ताउम्र रुलायेगा तुझे मेरा बिछड़ना
बैठा हूँ तिरे दर पे मुझे अब भी मनाले
कहते हैं तुझे लोग मिरे ग़म का मसीहा
आजा कि मिरी जान मिरी जान बचाले
आऊंगा नज़र मैं ही तू देखेगा जिधर भी
तस्वीर मेरी लाख तू अब घर से हटा ले
अपने तो बहुत लोग हैं अब देखिये साग़र
इस दौरे-कशाकश से मुझे कौन निकाले
हुज़ूर आपका अंदाज़
हुज़ूर आपका अंदाज़ क्या निराला है
नज़र मिला के ही बस हमको मार डाला है
बदल रहे हैं जो मौक़े पे अपने चेहरे को
उन्हीं का आज ज़माने में बोलबाला है
ज़माना इसलिए पढ़ता है शौक से हमको
ग़ज़ल में रंग मुहब्बत का हमने ढाला है
लगे न चोट कभी माँ के दिल पे ऐ बेगम
बड़ी उमीद से माँ ने हमारी पाला है
रईस लोग तो लाये हैं फूल फल मेवा
हमारी बात यहाँ कौन सुनने वाला है
क़दम क़दम पे नुमाइश है शोख जिस्मों की
कि जैसे तैसे ही ईमान को सँभाला है
समझ में आ गयी साग़र रविश ज़माने की
हज़ारों बार पड़ा इससे अपना पाला है
आप उधर जाते हैं
अश्क़ आँखों में इसी बात से भर जाते हैं
हम इधर आते हैं तो आप उधर जाते हैं
उसके वादे पे लगे जैसे घड़ी रुक सी गयी
रास्ता तकते हुए हम तो बिखर जाते हैं
उनके वादे का कहाँ तक मैं भरोसा रख्खूँ
वो अदाओं से हमेशा ही मुकर जाते हैं
सिर्फ़ दीदार को बेताब है क्योंकर दुनिया
हम गुज़रते हैं तो सब लोग ठहर जाते हैं
जब भी कहता हूँ ग़ज़ल तेरी किसी तस्वीर पे मैं
बिगड़े अलफ़ाज़ यकायक ही संवर जाते हैं
राह में कितने अंधेरे हों या सन्नाटे हों
हम तेरे नाम से बेख़ौफ़ गुज़र जाते हैं
शहर है कैसा कोई प्यास बुझाता ही नहीं
सारे अरमान इसी प्यास से मर जाते हैं
तुझको बदनाम न कर दे ये ज़माना साग़र
उठ के कूचे से तेरे जाने-जिगर जाते हैं
हम सुब्हो- शाम की
क्या ख़ाक जुस्तजू करें हम सुब्हो-शाम की
जब फिर गईं हों नज़रें ही माह-ए-तमाम की
जो कुछ था वो तो लूट के इक शख़्स ले गया
जागीर रह गई है फ़कत एक नाम की
ख़ुद आके देख ले तू मुहब्बत के शहर में
शोहरत हरेक सम्त है किसके कलाम की
ज़ुल्फ़ें हटा के नूर अँधेरे को बख़्श दे
प्यासी है कबसे देख ये तक़दीर शाम की
खोली जो उस निगाह ने मिलकर किताबे-इश्क़
उभरीं हरेक हर्फ़ से मौजें पयाम की
मिल जायेंगे ज़रूर ज़मीं और आसमां
अब बात हो रही है सुराही से जाम की
साग़र धुआँ धुआँ है फ़ज़ाओं में हर तरफ़
शायद लगी है आग कहीं इंतकाम की
माह-ए-तमाम — पूर्णिमा का चंद्रमा
नूर— प्रकाश
इंतकाम –बदला
बेक़रा़र मैं भी था
फ़िराक़े-यार में कल बेक़रार मैं भी था
दयारे इश्क़ में इक दावेदार मैं भी था
नज़र के मिलते ही नज़रें वो फेर लेते थे
किसी को इतना कभी नागवार में भी था
ये बात और तू अब देखता नहीं मुड़कर
तेरी निगाह का हासिल क़रार मैं भी था
निशानी प्यार की हर इक गवाही देती है
तेरे अज़ीज़ों में कल तक शुमार मैं भी था
वो दिन भी याद तो होंगे तुम्हें ए-जानेजहां
तुम्हारे दुख में कभी ग़मगुसार मैं भी था
ज़फ़ाएं तेरी सही जाती अब नहीं मुझसे
वफ़ा का तेरी कभी पैरोकार मैं भी था
बदल गया हूँ तेरे रंग देखकर साग़र
तेरे ख़ुमार में कभी जांनिसार मैं भी था

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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आदरणीय सागर सर बहुत ही शानदार शेर कहते है आप
बेहद खूबसूरत ग़ज़लें गुरुवरश्री 👏
सभी 40 गज़लें एक से बढ़कर एक…..
नायाब गजल संग्रह….
गज़ल शहंशाह परम आदरणीय विनय साहेब जी…..
आदरणीय गुरुदेव जी, आपके इस संग्रह से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा मुझे।
शुक्रिया इतना खूबसूरत लिखने का
शुक्रिया मेरे तसव्वुर को जगाने का
शुक्रिया मेरे चेहरे पर स्माइल लाने का
कमल चौबे “ज़मीर”