मैं चाहता हूं बस तुमसे

मैं चाहता हूं बस तुमसे | Prem kavita in Hindi

 

 मैं चाहता हूं बस तुमसे

( Main chahta hun bas tumse )

 

मैं चाहता हूं बस तुमसे
थोड़ा सा प्यार
थोड़ा-सा मन
थोड़ा-सा सुकून
थोड़ा-सा अहसास।

 

मैं तुमसे चाहता हूं बस
थोड़ी-सी हँसी
थोड़ी-सी खुशी
थोड़ी-सी बातें
थोड़ी-सी शान्ति।

 

मैं तुमसे चाहता हूं बस
थोड़ा-सा दर्द
थोड़ा-सी तकलीफ़
थोड़ी-सी बैचेनी
थोड़ी-सी दिल्लगी।

 

 

लेखक :सन्दीप चौबारा
( फतेहाबाद)
यह भी पढ़ें :-

प्यार करता हूँ | Pyar Kavita

Similar Posts

  • बेटी | Kavita

    बेटी ( Beti )   बेटी- है तो, माँ के अरमान है, बेटी- है तो, पिता को अभिमान है! बेटी- है तो, राखी का महत्त्व है, बेटी- है तो, मायका शब्द है!   बेटी- है तो, डोली है, बेटी- है तो, बागों के झुले हैं! बेटी- है तो, ननद- भाभी की ठिठोली है! बेटी- है…

  • दीपावली की जगमग | Deepawali ki Poem

    दीपावली की जगमग ( Deepawali ki jagmag )   सजी दीपमाला उजाला है घर में झालरों की रोशनी चमकती नगर में। जगमग जहां आज लगता है सारा बहारों में खुशबू दिखे हर पहर में।।   चमकते हैं जैसे गगन में सितारे कारी कारी रातें टिमटिमाते तारे। वही रूप धरती का शोभित हुआ धारा पर जब…

  • बहाना | Kavita Bahana

    बहाना ( Bahana ) पूजा बिन नहाए के, स्वीकार करो नाथ, पानी नहीं आए है, हम धोए पाॅव हाॅथ, पूजा खाए पिए की, स्वीकार करो नाथ, लो वीपी के मरीज हम, चकराए हमरा माथ, पूजा कीर्तन भजन की, स्वीकार करो नाथ, हम अकेले रहते हैं, कोई न हमरे साथ, पूजा मेरे भंडारे की, स्वीकार करो…

  • Hindi Kavita | Hindi Poem | Hindi Sahitya -शान

    शान ( Shaan ) ** शान   इंसान   की   होती   सबसे  बड़ी, शान वालों की शान पूरी प्रभु ने किया है।   शान समझे सिया की जनक जिस घड़ी, माने मन की महा प्रेरणा प्रण  लिया है।   चांप चटकाये जो भी जहां में यदि कोई, ब्याह कर बेटी ले जाये संग में सिया है।  …

  • अमर प्रेम की अमर कहानी | Poem amar prem ki amar kahani

    अमर प्रेम की अमर कहानी ( Amar prem ki amar kahani )     एक दीन साधारण सा इंसान पर इरादे थे फौलादी विशाल पर्वत का सीना चीरकर की उसने मुनादी   अथाह प्रेम की पराकाष्ठा का दिया उसने निशानी बिहार की पावन भूमि के लोगों को याद हुई जुबानी   दिन हीन दशरथ मांझी…

  • वे जीवित ही मरते

    वे जीवित ही मरते कर्मशील जीवित रह कर के, हैं आराम न करते। नहीं शिकायत करता कोई, मुर्दे काम न करते। जीवन का उद्घोष निरन्तर, कर्मशीलता होती। कर्मक्षेत्र में अपने श्रम के, बीज निरंतर बोती। है शरीर का धर्म स्वेद कण, स्निग्ध त्वचा को कर दें, अकर्मण्यता ही शय्या पर, लेटी रह कर रोती। जो…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *