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धीरे-धीरे | Poem Dhire Dhire
ByAdminधीरे-धीरे ( Dhire Dhire ) धीरे-धीरे शम्मा जलती रही, रफ्ता-रफ्ता पिंघलती रही ! दिल तड़पता रहा पल पल, रूह रह-रह मचलती रही ! शोला-जिस्म सुलगता रहा, शैनेः शैनेः रात ढलती रही ! ख़्वाब परवान चढ़ते रहे, ख़्यालो में उम्र टलती रही ! धड़कने रफ्तार में थी ‘धर्म’ सांसे रुक-रुक चलती रही !! डी के निवातिया…
मूर्ख दिवस | Kavita Murkh Divas
ByAdminमूर्ख दिवस ( Murkh Divas ) हम मुर्ख बने मुर्ख रहे आज भी मुर्ख बनें हैं मुर्ख हैं सोचे हि नहीं कभी तात्पर्य इस मूर्खता का कर लिए स्वीकार्य हंसकर चली गई चाल थी यह हमारी संस्कृत्ति के तोड़े जाने की पावन पुनीत चैत्र प्रतिपदा को मुर्ख दिवस साबित करने की हा, हम मुर्ख…
मन की पुकार | Man ki Pukar
ByAdminमन की पुकार हर धड़कन तेरे नाम से धड़कती है,तेरी यादों की लौ दिल में चमकती है।आज भी तेरी हंसी का दीवाना हूँ मैं,तुझसे बेशुमार प्यार निभाना चाहता हूँ मैं। तेरे कदमों की आहट अब भी सुनाई देती है,मेरे ख्वाबों में हर रात तू ही दिखाई देती है।तेरे बिना हर लम्हा अधूरा सा है मेरा,आज…
लागत | Laagat
ByAdminलागत ( Laagat ) महज कामयाबी के स्वप्न से ही कामयाबी नहीं मिलती जीवन तो सफर है गाड़ी सा जो बिना ईंधन नही चलती.. माना की ख्वाब आपके ऊंचे हैं सोच और विचार भी उज्जवल जुनून और प्रयास के अभाव मे रेत के महल से अधिक कुछ नहीं… सुंदरता मे आकर्षण तो है किंतु,पाने…
मैं पेड़ हूँ | Ped par Kavita
ByAdminमैं पेड़ हूँ ( Main ped hoon ) मैं हूॅं एक जंगल का पेड़, फैला हूँ दुनिया और देश। निर्धन या कोई हो धनवान, सेवा देता में सबको समान।। जीवन सबका मुझसे चलता, सांस सभी का मुझसे चलता। बदले में किसी से कुछ ना लेता, सारी उम्र सबको देता ही रहता।। पहले मेरा जंगल…
पुनर्जन्म | Kavita Punarjanm
ByAdminपुनर्जन्म ( Punarjanm ) मैंने सबसे कीमती वस्तु को, तलाशना चाहा, हीरे-जवाहरात , मणि माणिक , सभी लगे मिट्टी के धूल समान, मैं अपनी धुन में, खोजता चला जा रहा था , दिन, महीने में बदलने लगे , महीने वर्ष में , लेकिन नहीं मिल सकी, वह कीमती तोहफा, जो संसार में सबसे कीमती हो।…

