लहर

लहर | Lahar par Kavita

लहर

( Lahar )

 

भक्ति भाव भर मन उमंग,
उठती है इक दिव्य तरंग।

 

मन प्रकाशित होता ऐसे,
झूमता ज्यों मस्त मलंग।

 

 

भाव उमंग जब लहर उठे,
झड़ी शब्दों की फुलझड़ी।

 

झुका  गगन  धरती पर यूॅ॑,
क्षितिज में खनकी हो हॅंसी।

 

 

लहराती हुई नदियाॅ॑ चली,
मधुर मिलन को बेकली।

 

सागर लहरें हिलोरे खाएं,
लगे नदियाॅ॑ मासूम लली।

 

कवयित्री: दीपिका दीप रुखमांगद
जिला बैतूल
( मध्यप्रदेश )

यह भी पढ़ें : 

Jal par kavita | जल ही जीवन

 

Similar Posts

  • नया साल आया है

    नया साल आया है स्वर्णिम आभा छाई है नए सपने लाई हैउत्साह का किरण जल रहा है नवीन सपने लेकरनया साल आया है नई खुशियां लेकर जो रीति गई वह बीत गईअब क्या पछताना उनको लेकरनया साल आया है नई खुशियां लेकर दुख की काली अधियारी थी जोवह अब बीत चुकी हैसुख की नव पुष्पित…

  • मन की उलझन | Man ki Uljhan

    मन की उलझन ( Man ki Uljhan ) मन को क्यों,उलझाना भाई ? मन से नहीं है ,कोई लड़ाई । मन की उलझन ,को सुलझायें । गांठ सभी अब ,खुल ही जायें । लायें बाहर अब, गुबार सारे । जिससे मिटें ,संताप हमारे । मन को , जितना उलझायेंगे । उतना कष्ट , हम ही…

  • अटूट बंधन राखी | Rakhi par kavita

    अटूट बंधन राखी ( Rakhi par kavita )    धागों का यह अटूट बंधन पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन सावन की पूर्णिमा आती तिलक करे भाई का बहने कलाई पर राखी बांधती भाई करें रक्षा बहन की है पवित्र प्यार का बंधन अनमोल अटूट रक्षाबंधन द्रोपदी के एक धागे की लाज बचाई थी कृष्ण ने कर्णावती ने…

  • मैं विकलांग नहीं हू | Main Viklang nahi Hoon

    मैं विकलांग नहीं हू ( Main viklang nahi hoon )   कुछ लोग हँसते हैं, जबकि अन्य बस देखते रहते हैं। कुछ लोग सहानुभूति भी रख सकते हैं, लेकिन वास्तव में किसी को परवाह नहीं है। मेरे पैर नहीं हैं, और स्थिर नहीं रह सकता. हाँ, मैं अलग हूँ, लेकिन मैं विकलांग नहीं हूं. कुछ…

  • Neend par Kavita | नींद नहीं आसां

    नींद नहीं आसां ( Neend Nahi Aasan ) चीज नई नहीं है, सहज भी नहीं है। बमुश्किल आती है, मेहनतकशों को लुभाती है। आरामतलबों को रूलाती है, बमुश्किल उन्हें आती है; अनिद्रा रोगी बनाती है। खाते औषधि दिन रात, फिर भी बनती नहीं बात। बद से बदतर जब होते हालात- तो निकलते सुबह सैर पर,…

  • आपस में करेंगे सहकार

    आपस में करेंगे सहकार ***** आपस में करेंगे सहकार, यूं न बैठेंगे थक-हार। कमियों पर करेंगे विमर्श, खोजेंगे सर्वोत्तम निष्कर्ष। मिलजुल सब करेंगे संघर्ष, चेहरे पर होगा हर्ष ही हर्ष। देखते हैं परिस्थितियां कब तक नहीं बदलतीं? कब तक खुशियों की फुलझरिया नहीं खिलती? आंखों से आंखें,गले से गले नहीं मिलती? यकीं है शीघ्र ही…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *