घड़ी | Bal kavita

घड़ी

( Ghadi )

 

टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती
इसके भीतर अलग-अलग तीन छड़ी घूमतीं
सेकेंड, मिनट, घंटे से जो समय तोलतीं
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

बच्चों झटपट हो जाओ तुम सब तैयार
मात-पिता, बड़ों को करो नमस्कार
जल्दी पहुँचो स्कूल-तुमसे ये घड़ी बोलती
शिक्षा ही सबकी उन्नति के मार्ग खोलती
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

सूरज उगने से पहले, जग जाओ किसान
अन्न उपजाकर ही तुम बने-इतने महान
आँगन में तुम्हारे रहें, सदा फसलें झूमतीं
तुम्हारे श्रम से ही ये धरती सोना उगलती
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

धन्य है ! वह सीमा पर बैठा-वीर जवान
रक्षा में हमारी दिन-रात कर दिए एक समान
जिसकी रग-रग में देश प्रेम की गंगा बहती
यूँही डटे रहो ! उससे ये इतना कहती ।
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

पथिक ! पथ का सौंदर्य देखता ना चल
लक्ष्य को शीघ्र पाने की मचा दे हलचल
सैंकड़ों बाधाएँ,भले ही तेरा रास्ता रोकतीं
पर तू निर्भय हो बढ़ा चल, ये तुझे बोलती
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

जीवन से हारे मानव ! अधिक मत सोच
जो सत्य छिपा है – उसको भी ले खोज
इस जीवन का क्षण-क्षण है बहुत कीमती
सारी दुनियाँ को ये दिन-रात चेतती ।
टिक टिक टिक कर यह घड़ी बोलती ।

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कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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