सुनो..

सुनो..| Romantic Poetry In Hindi

सुनो..

( Suno )

 

सुनो…

तुम एक बार

दो कदम

घर से निकल कर

देखो तो जरा

चार क़दम चलते ही

मैं उसी चौराहे

पर खड़ा

इंतजार कर रहा होऊंगा

तुम्हारे आने का….

 

उस चौराहे से

चुन लेना कोई भी

एक रास्ता

और चल पड़ना

उस रास्ते पर

जो मुझ तक ले आएगा….

 

बस शर्त ये है कि

मुड़ कर मत देखना

बस तुम चलते चले आना

वहाँ मिलूंगा मैं तुमसे

जन्मांतर के लिए….!

?

कवि : सन्दीप चौबारा

( फतेहाबाद)

यह भी पढ़ें :-

मैं फिर आऊँगा | Kavita Main Phir Aunga

Similar Posts

  • सत्यमेव जयते | Satyameva Jayate | kavita

    सत्यमेव जयते ( Satyameva Jayate ) ***** डाॅ० कफिल की रिहाई, मीडिया में है छाई। यह बात फिर उभरकर आई, सत्य परेशान हो सकता है- पराजित नहीं भाई । यह कोई नहीं बात नहीं सैकड़ों ऐसे किस्से है सदियों सुने , सुनाए जा रहे हैं। फिर भी वही गलती सब दोहराए जा रहे हैं। ताज़ा…

  • ना नशा करो ना करने दो | Nasha par kavita

    ना नशा करो ना करने दो ( Na nasha karo na karne do )   नशा करो ना करने दो समझा दो सबको प्यार से क्यों मौत को गले लगाते क्यों खेल रहे अंगार से   जूझ रहे जो पड़े मौत से हाल जरा जाकर देखो टीबी कैंसर का कारण है गुटखा जर्दा सब फेंको…

  • शिक्षक न होते | Shikshak na Hote

    शिक्षक न होते ( Shikshak na hote ) शिक्षक ना होते तब क्या होता ? ये सुंदर , सभ्य संसार ना होता । होने को सब कुछ होता पर , विज्ञान का विस्तार ना होता । फूल भी होती , बाग भी होता , पर वो खुशबूदार ना होता । शिक्षक से ही सुगंध है…

  • नियति चक्र | Kavita Niyati Chakra

    नियति चक्र ( Niyati Chakra )   टूट जाते हैं तारे भी लगता है ग्रहण चाँद और सूरज को भी बंधे हैं सभी नियति चक्र के साथ ही रहा यही नियम कल भी आज भी हो सकते हैं कर्म और धर्म झूठे परिणाम कभी गलत नहीं होता जीवंत जगत में मिले छुट भले प्रारब्ध में…

  • ब्रह्मचारिणी | Brahmacharini Navratri Kavita

    ब्रह्मचारिणी ( Brahmacharini Navratri )   हे ब्रह्मचारिणी तपस्विनी सदाचरण की देवी करो कृपा हे जगदंबे मत करो अब देरी   आचरण को विमल कर दो निर्मल कर दो भाव शब्दों में तुम शक्ति भर दो मां दे दो चरणों की छांव   भरा रहे दरबार तुम्हारा सुख समृद्धि यश कीर्ति सृष्टि की करतार माता…

  • ये मछलियां

    ये मछलियां ! मछलियां अक्सर ज़िन्दा रह जाती हैंअपने गिल्स फड़फड़ाते,छिपा जाती है लिंब। स्त्री भी ज़िंदा रह जाती हैपलकें फड़फड़ाती अपने श्वसन तंत्र में।धरती को ही तो देख पाती है,अपने ही किसी चाँद में तैरते हुएऔरछिपा लेती है अपना स्त्री लिंग। अपने माथे की बिंदी को मानती है,मछलियों का चूमना।ये भी एक शगुन हैक्योंकि…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *