Karva chauth poem

ग़रीब स्त्री का करवाचौथ | Karva chauth poem

ग़रीब स्त्री का करवा चौथ

( Garib stree ka karva chauth )

 

 

सुबह से भूखी-प्यासी रहकर ही
पहनकर फटे-पुराने चीर,
करती बेसुहाता-सा हार-श्रृंगार,
अनमने मन से काम पर चली जाती,
दिन भर दौड़-धूप करती
फिर दोपहर बाद ही घर चली आती।

 

घर आकर
बच्चों और सास-ससुर को खाना खिलाती,
पुनः सज-संवरकर
शाम को करवा की कथा सुनती,
कथा सुनते हुए
मन में सैंकड़ों ख़्वाब सजाती ~
आएगा जब पति हमारा
उनके चरण छूकर,
पूजा करेंगी उनकी,
मन में छिपी है जो आशाएँ-उमंगे
खोल देंगी आज अगार
दिखा देगी हृदय में हमारे
उनके लिए कितना बसा है प्यार ।

 

फिर जब शाम को
पति घर आता~
शराब पीकर,
जुआ खेलकर,
वैश्वनीता पर पैसे लुटाकर,
गिरता-पड़ता-लड़खड़ाता,
दरवाज़े पर आकर कुछ बड़बड़ाता,
फिर पत्नी की तरफ़,
धुँधलाई लाल आँखों से देखता,
फिर बिन बोले ही
बिस्तर की ओर मुड़ जाता ।
अपने चांद का मुखड़ा देखकर
उसका मन हर्षोल्लास से भर जाता !…

 

अक्सर
दो घूँट आँसुओं के पीकर,
दो-चार गालियाँ खाकर ही
खोल लेती हैं करवा का व्रत
भारतीय ग़रीब स्त्रियाँ ।

 

?

कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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