आते हैं लोग फ़क़त हमको गिराने के लिए

आते हैं लोग फ़क़त हमको गिराने के लिए

आते हैं लोग फ़क़त हमको गिराने के लिए

कोई आता ही नहीं हमको उठाने के लिए
आते हैं लोग फ़क़त हमको गिराने के लिए

जल न जाए कहीं काशाना मुहब्बत का ये
लोग बैठे हैं यहाँ आग लगाने के लिए

ग़म ही ग़म हमको मिले हैं यहां पे उल्फ़त में
चश्मे-तर दे गया है कोई नहाने के लिए

रोशनी मिलती नहीं हमको अँधेरे में कहीं
बस हवा चलती है ये शम्अ बुझाने के लिए

अब तो ईमां यहाँ बाक़ी ही नहीं लोगों में
क़त्ल कर देंगे किसी का भी ख़ज़ाने के लिए

इन ग़रीबों की यहां सोचे नहीं कोई भी
आए बारिश भी तो दीवार गिराने के लिए

अब न आशिक़ यहाँ फ़रहाद के जैसे मीना
कोई जँचता ही नहीं दिल में बिठाने के लिए

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

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