आभा गुप्ता की कविताएं | Abha Gupta Poetry
श्री गणेश
श्री गणेश, प्रथमेश, गजानन,
करूँ तुम्हारे चरण मे वंदन,
करते दूर दुखियों के क्रंदन,
तन, मन, धन हम करें समर्पन,
हे शिव पुत्र, पार्वती दुलारे,
धन्य नयन दर्शन से तिहारे,
जब तेरा हम नाम पुकारें,
कट जाऐ सब विघ्न हमारे,
कर जोड़ नमन कर जोड़ नमन
चरणों में नमन करती हूँ,
श्री गणेश, प्रथमेश, गजानन,
करूँ तुम्हारे चरण मे वंदन,
मूसक वाहन मे हैं विराजे,
एक दंत भुजा चार हैं साजे,
गजमुख तुम्हरे वदन सुहावे,
दूर्वा, मोदक तुमको भावे,
कर जोड़ नमन कर जोड़ नमन
चरणों में नमन करती हूँ,
श्री गणेश, प्रथमेश, गजानन,
करूँ तुम्हारे चरण मे वंदन,
श्री गणेश रिद्धि-सिद्धि के दाता,
श्री गणेश सब वेदों के ज्ञाता,
जो कोई तुम्हारी शरण मे आता,
वो मनवांछित फल है पाता,
कर जोड़ नमन कर जोड़ नमन
चरणों में नमन करती हूँ,
श्री गणेश, प्रथमेश, गजानन,
करूँ तुम्हारे चरण मे वंदन।
कृपा करने वाले
महादेवा शंभू, विराजे शिवाले,
किया मैने खुद को, तुम्हारे हवाले,
सुनो मेरी विनती, सुनो मेरे नाले,
कृपा करने वाले, कृपा करने वाले
धरे शीश गंगा, विराजे है चंदा,
त्रिशूल हाँथ धारे, गले में भुजंगा,
डमाडम डमाडम, अरे डमरू वाले,
कृपा करने वाले, कृपा करने वाले,
नही अब सम्हलती, है मन की ये नगरी,
बहुत ही विचरती, ये विचलित है ठहरी,
जगत रखवाले, हमें तू सम्हाले,
कृपा करने वाले, कृपा करने वाले,
यहाँ भक्ति करता, तेरा भक्त ऐंठा,
भभूती लगाए तु श्मशान बैठा,
इधर भी नजर कर, शिव भोले भाले,
कृपा करने वाले, कृपा करने वाले,
नहीं देर करना, महादेव मेरे,
करो दूर आकर, दिलों के अँधेरे,
भरो भक्ति गागर, अरे जोग वाले,
कृपा करने वाले, कृपा करने वाले।
चूड़ियों की खनक
गीत गाती रही चूड़ियों की खनक,
गुनगुनाती रही चूड़ियों की खनक,
ये नई दुल्हनें हैं बताती रही,
हाँथ में जो सजी चूड़ियों की खनक,
प्रेम श्रंगार की हैं कथा चूड़ियाँ,
विरहनी की कहे हैं व्यथा चूड़ियाँ,
प्रेम से बाँध ले ज्यों प्रिये को पिया,
बाँध लेती कलाई यथा चूड़ियाँ,
चमचमाती कई रंग की चूड़ियाँ,
गोल चौकोर के ढंग की चूड़ियाँ,
रंज मे ना रहें ये रहें शांति में,
खनखनाती रहें जंग की चूड़ियाँ,
दे रही ये दुआएँ जिए चूड़ियाँ,
झूमती हैं नशे सा पिए चूड़ियाँ,
लड़ पड़ी वक्त आया तो हक के लिए,
हैं निशानी सुहागिन लिए चूड़ियाँ,
चूड़ियों की खनक का है अपना मज़ा,
होठ चुप जो रहे तो जताती रज़ा,
टूट जाती जरा सी लगे चोंट तो,
चुभ अगर ये गईं तो हैं देती सज़ा।
फटते बादल/उफनती नदियाँ
भुगते मानव परिणाम उफनती नदियाँ हैं,
फटते बादल का काम उफनती नदियाँ हैं,
धरती सहती आई अब तक मानव हठ को,
कहती लेगीं प्रतिकार उफनती नदियाँ हैं,
घन बरसे अब ना खेतों में खलिहानों मे,
जब बरसे लेती जान उफनती नदियाँ हैं,
रे मानव क्यों ना समझे प्रकृति रूठी है,
महंगा पड़ता खिलवाड़ उफनती नदियाँ हैं,
करते दूषित पर्यावरण अपना खुद ही,
देते फिर इल्जाम उफनती नदियाँ हैं,
जीवित पेड़ों को काट रहे हैं अंधाधुंध,
बिगड़ा है संतुलन उफनती नदियाँ हैं,
‘अभ्भू’ अब संकल्प उठाओ प्रकृति हित,
हरियाली बिखराओ उफनती नदियाँ हैं।
पथ निहारे नयन
पथ निहारे नयन तुम कहाँ हो सजन,
द्वार मंदिर खुला हो रहा है भजन,
साँझ की संझवाती शुरू हो गई,
घंटियाँ टनटनाती टनन टन टनन,
आरती का दिया भी अभी जल रहा,
क्या पता कब खतम हो न जाए ईधन,
ले के जयमाल हाँथों मे मै हूँ खड़ी,
बीत जाए न देखो कहीं ये लगन,
प्रीत पावन रही है भले ही सदा,
इस ज़माने को लेकिन लगी है पतन,
सामने बह रही है पतित पावनी,
जो न आओगे हो जाऊँगी जलमगन,
चाहते हैं मेरी मांग तुम ही भरो
कल न जाने हमारा कहाँ हो मिलन।
पर्यावरण विस्तार
फैशन और दिखावे का, दुनियाँ मे बड़ा प्रचार,
ऐसे मे कैसे हो पर्यावरण विस्तार,
आलस्य और मनमर्जी का, ऐसा चढ़ा बुखार,
हम गुलाम सुविधाओं के, सुविधाएँ करें प्रहार,
ऐसे मे कैसे हो………….
रोज नये साधन हों सारे, बैठे बैठे काम हो प्यारे,
मर्जी नहीं काम करने की, मर्जी नहीं मेरी चलने की लाओ मोटर कार,
ऐसे मे कैसे हो………….
फैक्ट्री और कारखाने खुलते, जलवायु मे जहर है घुलते,
पशु पक्षी और पौधे मरते, मचता हाहाकार,
ऐसे मे कैसे हो………….
बिजली पानी खूब खर्चते, बीड़ी सिगरेट खूब सुड़कते,
गली गली मे पीक उगलते, हैं आदत से लाचार,
ऐसे मे कैसे हो………….
एक कपड़ा एक बार पहनते, रोज नया गैजेट्स हैं चुनते,
देखा-देखी के चक्कर मे, रहते लापरवाह,
ऐसे मे कैसे हो………….
जब दुनियाँ मे पेड़ न होंगे, पक्षी और पर्वत न होंगे, शुद्ध वायु और जल न होगा,
जब मानव जीवन ही न होगा, फिर क्या भागेंगे तुम, रोबोट युक्त संसार,
ऐसे मे कैसे हो………….
क्यूँ निकले
शोला आग का दिल मे लेकर,
घर से साहिब क्यूँ निकले,
देखे आपके पीछे दुनियाँ,
बहता कितना धूँ निकले,
मिलजुल आपसी सब तकरारें,
बोलो क्यों ना सुलझाते,
क्या ये सोच के बैठे दिल मे,
उनके मुँह से चूँ निकले।
सिर पे हाँथ रखा तो सोचा,
युक्ति कोई सुझाएंगे,
लेकिन हाँथ जो नीचे लाए,
उनके सिर से जूँ निकले,
सीना तान के चलने वाले,
खा-खा मोटे पेट किए,
घर से बाहर आए देखा,
जैसे टम्मक टूँ निकले,
नरमाई वाले भाषण में,
ताली नही बजाई तो,
गुस्से से यूँ लाल थी आँखें,
जैसे आँख से खूँ निकले,
मुश्किल से इक ग्राहक आया,
मेरे चाय की टपरी में,
नाम पता पूछा तो मेरे,
दूर के वो मामू निकले।
संचार भर रही
मस्त पवन के झोंकों का,
आनंद ले रही है नारी,
बारिश की बूँदों को वो,
महसूस कर रही है प्यारी,
पग धरे जलाशय उर्ध्व ग्रीवा,
संचार भर रही है न्यारी,
उड़ती जुल्फें मूंदे पलकें,
तन स्वेत लिपटती है सारी,
रम्य दृश्य परिकल्प स्पृश्य,
अभिसार परखती है हारी,
बिम्ब बने जो मन-मस्तिष्क,
इस पल पर होते सब भारी,
भाव निरंतर आते-जाते,
क्षुधा-प्यास बारी-बारी,
तपन से जैसे राहत पाकर,
निखरना प्रतिपल है जारी।
अरमान जहाँ बूढ़ी माँ के
अरमान जहाँ बूढ़ी माँ के,
हरदम ही अधूरे होते,
मातृ दिवस मनाने से,
कर्तव्य नहीं पूरे होते,
लाख मनाओ देव-देवियाँ,
कर्म के बंधन यूँ नहीं टलते,
वृद्ध माँ जहाँ रहे उपेक्षित,
ईश्वर भी उस घर नहीं बसते,
इस सुंदर दुनियाँ में लाकर,
जिसने तुझपर उपकार किया,
उस माँ को वक्त में भूले तुम,
जिसने बेवक्त तुम्हें स्वीकार किया,
कहते है सब बुरा बुढ़ापा,
क्यों नहीं कहते अच्छा है,
अरे, अच्छा भी हो सकता है,
जब सेवक बनता बच्चा है।
ये वही रेशमी दुपट्टा है
जिसने हर खार को सोखा,
जिसने हर दुलार को सींचा,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जिसनें,
बचपन में तेरे चाकलेट सने,
रुखसार को पोछा,
हवाओं के रुख पे लहराता,
मेरी खूबसूरती मे चार चाँद लगाता,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जो
जवानी की दहलीज से लेकर बुढ़ापे तक,
कुदृष्टि से मुझे बचाता,
कभी छाँव बना तो कभी,
पंखे की तरह झला गया था,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जिसे
बड़े प्यार से मेरी माँ ने,
बिदाई के वक्त मुझे दिया था।
वक्त की मार ने इसे छलनी किया मगर,
आज भी इसकी छुअन में है वही कोमलता,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जिसे
खेल-खेल मे ओढ़कर माँ का किरदार बना,
याद कर तु इसी दुपट्टे की ओट पला।
ये दुपट्टा है खास बड़ा,
प्रेम और ममता का है अहसास बड़ा,
ये है तो ढेरों यादें हैं आसपास ,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जो,
देशप्रेम मे परचम बना,
अमर रहेगी इस दुपट्टे की कहानी,
इसमे माटी की खुशबू है सुहानी,
ये वही रेशमी दुपट्टा है जिसे
ओढ़कर मै बन जाती हूँ
आम से खास सदा।
~आभा गुप्ता, इंदौर
ढलकी है चुनरी ज्यों ढलती है शाम
ढलकी है चुनरी ज्यों ढलती है शाम,
हो ना जाए गोरिया तु कहीं बदनाम,
होंठ है रसीले जैसे कोई भरे जाम,
हौले-हौले चल कहीं छलके न जाम,
कोयल सी बोली तेरा कोकिला है नाम,
धुन जो सुना दे कोई लूँ मै जिया थाम,
नागिन सी लट गोरा चेहरा हे राम,
पूरी की पूरी तु गोरी लगे चारो धाम,
हो ना जाएँ निष्फल तेरे ताम-झाम,
दूर से क्यों ताके पास आ लूँ हाँथ थाम,
आ जा मै बना लूँ तुझे अपना अंग वाम,
हक्का-बक्का रह जाए सारा ये आवाम।
श्रम की गरिमा
रखिए मन में सदा आस्था,
प्रभु की महिमा बनी रहे,
श्रम ऐसा करिए जीवन मे,
श्रम की गरिमा बनी रहे,
निज स्वार्थ ह्रदय नहीं पालें,
हित औरों का किया करें,
अपनी गरिमा नहीं गंवाए,
पवित्र आचरण किया करें,
लालच, मक्कारी नहीं पनपे,
मन की शुभता बनी रहे,
श्रम ऐसा करिए जीवन मे,
श्रम की गरिमा बनी रहे,
पड़ के झूठे प्रपंचों में,
मन को काहे मलिन करें,
सच्चाई का धर्म निभाते,
पथ प्रगति के बढ़ा करें,
मंजिल पाकर बैठ न जाएँ,
सफर निरंतरता बनी रहे,
श्रम ऐसा करिए जीवन मे,
श्रम की गरिमा बनी रहे,
सेवा भावना पालें मन में,
माली बन कर रहा करें,
सम भाव गर रखें सभी पर,
मधुबन सारा खिला करें,
कोई आँच न आए तुझपर,
गर्व भी खुद पर बना रहे,
श्रम ऐसा करिए जीवन मे,
श्रम की गरिमा बनी रहे।
आम का पेड़
दादा के हिस्से मे आया ,
एक आम का पेड़ बड़ा,
जो था बागीचा मे उनके,
मुस्काते हुए खड़ा,
मौसम मे जब फल आता,
सारे मोहल्ले मे वो बँटता,
दादा दादी का बच्चों संग,
समय बहुत अच्छा कटता,
कभी पड़े अचार आम का,
कभी केरी के पने बने,
कभी मुरब्बा खट्टा मीठा,
कभी आम रस ग्लास भरे,
दादी अपने हाँथ आम के,
व्यंजन बनाए बड़े-बड़े,
एक डाल के झूले मे,
दादा भी खुश थे पड़े पड़े,
भरी दोपहर बागीचे मे,
बच्चों की टोली खेले,
गिरे आम पर शर्त लगी ये,
नजर पड़े जिसकी वो ले ले,
जब पड़ती दो की नजरें एक साथ,
तब हो जाते थे लफड़े,
निपटारा करते थे दादा,
झूले मे तब पड़े पड़े।
राम राम श्री राम
प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, राम राम श्री राम।
लिये अथर मुस्कान वो, चले अयोध्या धाम।।
नर नारी सबहि मिल के, ध्यावें सुबहो शाम।
दिन जय॔ती मना रहें, मचा रहे धूम धाम।।
हनुमत संकट कोप से, लीजै हमे बँचाय।
हम बालक नादान हैं, थोड़े मे डर जाँय।।
सकल जगत है आसरे, तुम से ही हनुमान।
सदा आस्था बनी रहे, जाए चाहे प्रान।।
फागुन का अंदाज निराला
हरा, गुलाबी, पीला काला,
कान्हा सँग रँग गई बृजबाला,
मन यौवन खिल उठे हैं दोनों,
फागुन का अंदाज निराला,
बिन काजल अँखियाँ कजरारी,
ढूँढे राधा के नैन बिहारी,
भांग छान घूमें मतवाला,
मले गुलाल मारे पिचकारी,
देखो भर-भर पी रहे सारे,
मधुमासी मौसम का प्याला,
मन का उजला तन का काला
फागुन का अंदाज निराला,
प्रेम प्यार सुख चैन की वर्षा,
जाए फागुन सबको हर्षा,
खुल जाए किस्मत का ताला,
फागुन का अंदाज निराला।
विश्व महिला दिवस
बहन बेटी नारी औ ये माता महिलाएँ हैं,
प्रेम और ममता की प्यारी सी कथाएँ हैं,
शुरू यहीं होता और अंत भी यहीं है होता,
नारी बिन कहाँ होती जग की प्रथाएँ है,
नारी के बखान मे तो कहो जो भी कम ही है,
हर युग जगह पे नारी की गाथाएँ हैं,
नारी योगदान की तो महिमा ही अनंत हैं,
नारी सम कहाँ कोई जग में जथाएँ हैं,
नारी मन समझ जो जाए कभी कोई गर,
सुनने मे सदी लगे इतनी व्यथाएँ हैं,
फिर भी सम्हालती वो धुरी परिवार की है,
कितनी कठिन चाहे भले व्यवस्थाएँ हैं।
होली आई
होली आई रस भर लाई,
जी भर मनुवा होली खेल,
रंग, गुलाल, अबीर, पिचकारी,
फूलों के रंग संग खेल,
राग द्वेष सब छोंड़ किनारे,
कर ले मन से मन का मेल,
मन मधुमास न सब दिन ठहरे,
भागी जाए जीवन रेल,
ऐसे मे क्या सोच रही हो,
ओ कुदरत की बख्शी गेल,
होली आई रस भर लाई,
जी भर मनुवा होली खेल,
भर उल्लास मन मधुर बना,
बीती अपबीती मत झेल,
बन तितली ओढ़ ले सब रंग,
खुशियों के सब रंग उड़ेल,
चाहे बन भाभी भइया की,
कान्हा की राधा बन खेल,
होली आई रस भर लाई,
जी भर मनुवा होली खेल।
महाशिवरात्रि
आज महाशिवरात्रि, शिव की महान रात्रि,
प्रकटे थे आज शिव, अवसर खास है।
जलमग्न था ब्रम्हांड, शेषनाग पर लेटे,
विष्णु जी थे एकमात्र, यही हुआ भास है।
ब्रह्म जी उत्पन्न हुए, जब विष्णु की नाभि से,
शिव जी भी प्रकटे थे, यही इतिहास है।
शिव को न पहचाने, ब्रम्हा जी थे अनजाने,
विष्णुजी के दिव्य ज्योति, से हुआ आभास है।
रूठने ना पाएँ शिव, करी शिव प्रार्थना है,
माँगा पुत्र रूप में ही, शिव पाया पास है।
यही थी कहानी प्यारी, शिव प्रकटोत्सव की,
कृपा भी मिलेगी जब, बनो शंभू दास है।
करो रुद्र अभिषेक, भोले शंभु को मनाओ,
पूजा पाठ करो और, रखो उपवास है।
ऋतुओं के राजा वसंत
ऋतुओं के राजा वसंत,
ओढ़े चोला ज्यों संत,
मै तो रह जाता हूँ दंग,
देखके उसको मस्त मलंग,
ऋतुओं……
मंद पवन इठलाती झूमें,
खुशियाँ ले खडी अनंत,
बौर बल्लरी होश गंवाए,
लहराती हवा के संग,
तब बिखरे छटा आनंद,
उगे पल्लव पेड़ों के अंग,
ऋतुओं……….
प्रकृति अपना ले यौवन,
इठलाती बड़ी प्रसन्न,
ह्दय में खिलते प्रीत पुष्प,
बिखराते मदिर सुगंध,
मन मे मचती है उमंग,
देख चहुँओर वसंती रंग,
ऋतुओं……
ज्ञान सुधा की बरस बूँद,
कहती अँखिया मूँद,
ध्यान में है कुछ बंद,
सुनाऊँ मातु शारदे छंद,
कमलासनी की पूजा कर,
करते हम सतसंग,
ऋतुओं……
आई वसंत की बहार है
आई वसंत की बहार है,
कोयल ने कूँका बार-बार है,
भँवरों के प्यारे-प्यारे गुंजन पर,
सखियों के काले-काले अंजन पर,
रीझा मन गाऐ बार-बार है,
आई वसंत की बहार है,
सखियों की लहराती इस चूनर पर,
तितली के रंग बिरंगे पंखों पर,
फूलों के रंग सारे उधार है,
आई वसंत की बहार है,
बागों की इस प्यारी अमराई पर,
खुशबू से डूबी इस बौराई पर,
छाया देखो कैसा खुमाार है,
आई वसंत की बहार है,
आई वसंत की बहार है,
कोयल ने कूंका बार बार है।

आभा गुप्ता
इंदौर (म. प्र.)
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