अद्वितीय

अद्वितीय

अद्वितीय


दर्शन की भाषा में
कहा जा सकता है
दूसरा कोई नहीं
व्यवहार की भाषा
में कहा जा सकता है
अकेला कोई नहीं
अपेक्षित सुधार व परिस्कार हो,
और उसके हर कदम के साथ
संतुलन का अनोखा उपहार हो
बाहरी दुनियां का भ्रमण
तो केवल संसार समुद्र में
आत्मा का भटकन है वह
इसी में क्यों पागल बना
हमारा यह मन और जीवन है
जिस दिन हमें अन्तर के
आनन्द का आभास होगा
उस दिन हमें निश्चित ही अपनी
आन्तरिक शक्तियों पर दृढ़
विश्वास होगा वह तब लगेगा
की मन के स्पर्श का स्वाद
सचमुच में अनोखा है बाहरी
जगत से मिलने वाला आंनद
तो बस केवल छलना
और धोखा हैं वह आत्मा
का शुद्ध रूप सही से
अद्वितीय है

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती | Dayanand Saraswati par Kavita

    महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ( Maharishi Swami Dayanand Saraswati )    यें भी उन्नीसवीं शताब्दी के समाजिक सुधारक, महान देश-भक्त व आर्य समाज के संस्थापक। बचपन का नाम माता-पिता ने रखा मूलशंकर, देशप्रेम राष्ट्रीयता भावना भरा था कूट कूटकर।। १२ फरवरी १८२४ को जन्में राजकोट गुजरात, इनके पिता लालजी तिवारी माता यशोदा बाई। वेद-शास्त्र व‌…

  • राष्ट्रीय विज्ञान दिवस | Rashtriya Vigyan Diwas

    राष्ट्रीय विज्ञान दिवस ( Vigyan se Manavta ka Bhala )   विज्ञान की अठखेलियों से, मानवता का भला हो वर्तमान विज्ञान प्रौद्योगिकी , मनुज जीवन अभिन्न अंग । अनुप्रयोग संसाधन सानिध्य, रज रज व्याप्त भौतिक रंग । हर घर सुख समृद्ध मंगल, नवाचारी प्रयोग कला हो । विज्ञान की अठखेलियों से, मानवता का भला हो…

  • आदर्श समाज एक परिकल्पना

    आदर्श समाज एक परिकल्पना आदर्श समाज की कल्पना करें,जहां हर व्यक्ति सम्मानित हो।जहां हर कोई अपने अधिकारों को जानता हो,और अपने कर्तव्यों को निभाता हो।जहां समाज में शांति और सौहार्द हो। आदर्श समाज में शिक्षा का महत्व होगा,हर व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार होगा।जहां हर कोई अपने सपनों को पूरा कर सकेगा,और अपने लक्ष्यों को…

  • नशा | Nasha

    नशा ( Nasha )  नशा मुक्ति दिवस पर एक कविता   अच्छों अच्छों को नशा कितना बिगाड़ देता हैl बसी बसाई गृहस्ती को मिनटों में उजाड़ देता हैl बच्चे का निवाला छीन बोतल में उड़ा देता हैl दूरव्यसन के आदि को हिंसक बना देता हैl बिकने लगता है मकान सड़क पर ला देता हैl आदि…

  • हिंदी हमारी मातृभाषा | Kavita Hindi hamari matrabhasha

    हिंदी हमारी मातृभाषा  ( Hindi hamari matrabhasha )   ये हिंदी हमारी ऐसी मातृ-भाषा, सरल शब्द में इसकी परिभाषा। विश्व में सारे गौरवान्वित करती, ३३ व्यंजनों से बनी राज भाषा।। हिन्द की भाषा का करो बखान, जिससे गूंजें ये सारा ही जहान। करो गुणगान और बनो विद्वान, हिन्द की हिंदी गूंजें सारे जहान।। हिंदी भाषा…

  • मेरी प्रार्थना | Meri Prarthana

    प्रार्थना ( Prarthana )    पर्वत  घाटी  ऋतु  वसंत  में नभ थल जल में दिग्दिगंत में भक्ति  भाव  और अंतर्मन में सदा  निरंतर  आदि  अंत  में             युगों युगों तक तुम्हीं अजेय हो,           कण-कण में ही  तुम्हीं बसे हो।   सृष्टि  दृष्टि  हर  दिव्य  गुणों में स्वर  अक्षर  हर  शब्द धुनों में हम …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *