ज़िंदगी

ज़िंदगी

तेरे बिना ये साँझ भी वीरान लगी,
हर सुबह भी अब तो अनजान लगी,
मैं मुस्कराया पर दिल रो दिया,
दिकु, तूने इतनी गहराई से क्यों प्रेम किया?

तन्हा हुआ तो वक़्त भी थम गया,
हर रास्ता जैसे मुझसे छिन गया,
जब तू थी, हर मोड़ पे तूने हौंसला दिया,
दिकु, तूने इतनी गहराई से क्यों प्रेम किया?

बातें अधूरी, ख्वाब भी चुपचाप हुए,
तेरे बिना लम्हे कितने बेहिसाब हुए,
तुझसे बिछड़ कर हर पल को मैं मर-सा जिया,
दिकु, तूने इतनी गहराई से क्यों प्रेम किया?

आज भी भरोसा है की लौटेगी तू,
हर साँस में फिर से मुझे खोजेगी तू,
तेरी जुदाई ने सुकून मुझसे मेरा छीन लिया,
दिकु, तूने इतनी गहराई से क्यों प्रेम किया?

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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