अद्वितीय

अद्वितीय

अद्वितीय


दर्शन की भाषा में
कहा जा सकता है
दूसरा कोई नहीं
व्यवहार की भाषा
में कहा जा सकता है
अकेला कोई नहीं
अपेक्षित सुधार व परिस्कार हो,
और उसके हर कदम के साथ
संतुलन का अनोखा उपहार हो
बाहरी दुनियां का भ्रमण
तो केवल संसार समुद्र में
आत्मा का भटकन है वह
इसी में क्यों पागल बना
हमारा यह मन और जीवन है
जिस दिन हमें अन्तर के
आनन्द का आभास होगा
उस दिन हमें निश्चित ही अपनी
आन्तरिक शक्तियों पर दृढ़
विश्वास होगा वह तब लगेगा
की मन के स्पर्श का स्वाद
सचमुच में अनोखा है बाहरी
जगत से मिलने वाला आंनद
तो बस केवल छलना
और धोखा हैं वह आत्मा
का शुद्ध रूप सही से
अद्वितीय है

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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