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बातों की समझ | Baaton ki Samajh

बातों की समझ

( Baaton ki Samajh )

 

जरूरी नहीं की
किसी की कही हर बात को
आप समझ ही लें
या आपकी बात को कोई दूसरा समझ ले

फिर भी,
कही जानेवाली बात को
यदि समय पर न कहा जाय
तो वही बात आनेवाले दिनों मे या तो आपको रुलायेगी
या सामनेवालेे को

न समझ आने मे
वैचारिक समझ की कमी
या प्रसंग की अवस्था भी हो सकती है
और एक दूसरे की मन:स्थित भी

आवाश्यकता नुसार् अपनी बात को
दोहरा देने मे भी कभी
स्वाभिमान को आड़े नही आने देना है
वक्त और हालात
समय के साथ बदलते भी रहते हैं

व्यक्ति का विवेक और धैर्य ही
उसे संयमी बनाता है
समस्यायें सुलझ भी जाती हैं
लेकिन वक्त का इंतजार भी रहता है

बातों को बातों के हिसाब से ही
महत्व देना उचित होता है..

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

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