Bahu par Kavita

साक्षात लक्ष्मी घर आई | Bahu par Kavita

साक्षात लक्ष्मी घर आई

( Sakshat laxmi ghar aayi ) 

 

घर-परिवार में हमारे अनेंको खुशियाॅं लाई,
वो बहु नही हमारे घर साक्षात लक्ष्मी आई।
किया मान सम्मान एवं सबका रखा ध्यान,
एक बेटी गयी तो दूसरी बेटी बनकर आई।।

माताजी-बाबूजी इस तरह होने लगे तैयार,
जैसे थे ही नही कभी वे इस घर में बीमार।
चाय नाश्ता व खाना मिलता था समय पर,
खिल गये थे चेहरे उसने सेवा की भरमार।।

बना लिया जिसने सभी के हृदय में जगह,
नहलाना-घुमाना रोज़ करती सुबह-सुबह।
कम किया धीरे-धीरे चिकनाहट एवं चीनी,
कराया उनको योग बिठाकर खुली जगह।।

जाना था बहू को पीहर माॅं-बाप से मिलने,
कहा पति ने मिल आवो पीहर तुम अपने।
मेरी भी हो गयी है गर्मियों की यह छुट्टियाॅं,
गाॅंव तुम मिल आवों भाई-बहन से अपने।।

देख लूॅंगा सारा काम एवं बना लूॅंगा खाना,
कई दिन से तुम्हारा माईके न हुआ जाना।
प्रथम दिन से याद आ गई थी जिन्हें नानी,
करने लगे फोन कब आओगे जाने जाना।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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