कविताएँ

  • ऐ सर्द हवा

    ऐ सर्द हवा ऐ सर्द हवा का झोंका,अब तो,शांत हो जा,तू भी कहीं जाकर और आराम से सो जा।। जग को क्यों इतना परेशान कर रहा है,काहे जग के लिए तू शैतान बन रहा है।। बूढ़े, बच्चे सब तो परेशान हो गए हैं,बताओ, आप किसकी सुध में खो गए हैं।। पेड़ पौधे भी तो अब…

  • एक चने ने

    एक चने ने मेरे आँगन नित्य सवेरे बुलबुल आती एकसच्च बोलो-सच बोलो की मधुर लगाती टेक मधुर लगाकर टेक मुझे हैरान करेकैसी खोटी बातें ये नादान करे झूठा और बेईमान भला सच कैसे बोलेज़हर बेचने वाला अमृत कैसे तौले मूरख पंछी मुझको कैसी सीख दे रहानहीं चाहिए बिन मांगे क्यों भीख दे रहा तेरी मीठी…

  • नव ऊर्जा का उत्सव

    नव ऊर्जा का उत्सव युवाओं का यह दिन अनमोल,बनाता है हर सपने को गोल।जोश, जुनून, और हौसलों का संग,युवाओं के दम पर बढ़ता ये रंग। देश की ताकत, नई उमंग,युवाओं में दिखता हर तरंग।ज्ञान की गंगा, साहस की धारा,युवा ही तो हैं भारत का सहारा। स्वामी विवेकानंद के शब्दों का असर,युवाओं में जलता है प्रेरणा…

  • आइना जिन्दगी का

    आइना जिन्दगी का ना पैसों का गुरुर , ना बोले रुदबा lआप अगर नेकी है , तो नेकी क्या है ll ख़ुशियों का आंचल बनकर , उल्लास को छापा है lदिनचर्या की चाह बनकर , जीना सिखाया है ll चमक सूर्य – चंद्र के सम , दया प्रभु के सम lदिया नाम और शहोरत ,…

  • सुनील कुमार “खुराना” की कविताएँ | Suneel Kumar Khurana Poetry

    जग गोकुल में आनंद भयों देते सब बधाई जग गोकुल में आनंद भयों देते सब बधाई,सारी सृष्टि में सब खुश हैं बहना क्या भाई। काली-काली रात में कान्हा गोकुल आएं,गोकुल में नन्दलाल यशोदा के मन भाए,आने से कान्हा के दूर हुई सबकी तन्हाई। निराला रूप सब जन के मन को भाया,सब खुशियों को कान्हा अपने…

  • मन की पीड़ा

    मन की पीड़ा मन की पीड़ा से जब कांपीं उंगली तो ये शब्द निचोड़ेअक्षर-अक्षर दर्द भरा हो तो प्रस्फुटन कहाँ पर होगा अभिशापों के शब्दबाण लेकर दुर्वासा खड़े हुए हैंकैसे कह दूँ शकुन्तला का फ़िर अनुकरण कहाँ पर होगा नया रूप धर धोबी आए मन में मैल आज भी उनकेईश्वर ही जाने सीता का नव…

  • मानवीय संवेदना ख़त्म हो गई!

    मानवीय संवेदना ख़त्म हो गई! हे ईश्वर ! आज तेरे मनुष्यों में,दयाभाव एवं मनुष्यता न रही।एक दूसरे के प्रति इन मनुष्यों में,बस! घृणा व शत्रुता समा रही है।मानवीय संवेदना ख़त्म हो गई!हैवानियत, हिंसा खूब बढ़ रही है।पति पत्नी की हत्या कर रहा है।आजकल मनुष्य पशु समान है।चंद पैसे हेतु हत्याएँ भी होती हैं।आज मनुष्य का,…

  • क़लम की ताकत: एक लेखिका की जुबानी

    क़लम की ताकत मेरी क़लम है मेरी जुबां,जिससे कहती हूँ हर दास्तां।हर दर्द, हर खुशी के रंग,इसी से रचती हूँ मैं जीवन के ढंग। यह स्याही नहीं, यह भावना है,जो दिल से निकल, कागज पर थामना है।हर अक्षर में बसती है एक सदी,यह कलम तो मेरे सपनों की नदी। कभी चुप रहकर चीखती है,अन्याय पर…

  • नेह शब्द नही | Neh Shabd Nahi

    नेह शब्द नहीप्रसंग का विषय नहीयह दृष्टिगोचर नही होतायह कहा भी नही जातायह सिर्फ और सिर्फअनुभूत करने का माध्यम हैयह अन्तरतम मेंउठा ज्वार हैनितान्त गहराजिसमें केवल समाहित होना हैउसके बाद फिर होश ही कहाँ रहता हैयह एक ऐसा आल्हाद हैजिसको शब्दातीत, वर्णातीतनही किया जा सकता।यह शब्दों के बंधनों में नहीं बंधतासिर्फ अनुभूत किया जा सकता…

  • छत पर चाँद बुलाने से अच्छा

    छत पर चाँद बुलाने से अच्छा छत पर चाँद बुलाने से अच्छा,उसपर टहला जाए तो अच्छा, मिलता ना कोई इन्सां से इन्सां,खुद से मिलन हो जाए तो अच्छा, होती है अब ना कोई खातिरदारी,कोई मन ही सहला जाए तो अच्छा, होता ना हमसे चहरे पे लेपन,सेहत सम्हाली जाए तो अच्छा, इस जग में कितनी है…