कविताएँ

  • मीठी वाणी मीठी बोली | Kavita

    मीठी वाणी मीठी बोली ( Mithi vani mithi boli )   एक सैलानी मुझसे बोला क्या करते हो गदेना, गुठियार में ऐसा क्या है यार तेरे गढ़वाल में। मुस्कुराते हुए मैंने कहा मीठी वाणी मिट्ठी पाणी है मेरे गढ़वाल में। हिमालय का चौखंबा बसा है मेरे पहाड़ में 52 गढ़ है मेरे गढ़वाल में। मां…

  • गर है लिखने का शौक | Kavita

    गर है लिखने का शौक ( Gar hai likhne ka shauq )   गर है लिखने का शौक तो कविता चुपचाप चली आती है। टूटे-फूटे शब्दों में भी भावनाएं निकल जाती है। हम तो मिश्रित भाषी हैं कभी हिंदी कभी सिंधी कभी पंजाबी कभी गुजराती निकल जाती है। भाषा के झरोखों से दिल की ऋतु…

  • कौन हूँ मैं | Kavita

    कौन हूँ मैं? ( Kaun hoon main kavita )   सहमी सहमी कमजोर नहीं हूं भीगी भीगी ओस नहीं हूं आसमान पर उड़ने वाली चंचल चितवन चकोर नहीं हूँ   कोमल कच्ची डोर नहीं हूं अनदेखी से उड़ने वाली शबनम सम छोटी बूँदों जैसी खुशबू भीनी हिलौर नहीं हूं   कुछ जुमलों से डर जाउंगी…

  • नैना बावरे ढूंढे मीत पुराना | Kavita

    नैना बावरे ढूंढे मीत पुराना ( Naina bawre dhoondhe meet purana )   नैना बावरे ढूंढे मीत पुराना पल-पल ढूंढे बीता सावन ढूंढे बीती रतिया नैना बावरे ढूंढे मीत पुराना ?☘️? जिन बगिया में फूल खिले थे जिनमें बीते सावन जिस घर में था संग तुम्हारा ढूंढे वोही आँगना नैना बावरे ढूंढे मीत पुराना ?☘️?…

  • पर्यावरण देता हिदायत || Kavita

    पर्यावरण देता हिदायत ( Paryavaran deta hidayat )   मैं  पर्यावरण हूं,  तुम सब का आवरण हूं। रख लोगे गर मुझे सुरक्षित , हो जाओगे तुम भी सुरक्षित। मैं करू सहन अब  कितना? होता न सहन अब इतना। तुम मानव की गलती पर , मैं कुढ़ कुढ़ रोता हूं। मेरी एक ही गलती पर,  देखो…

  • संतोष | Santosh par Kavita

    संतोष ( Santosh )   वक्त और हालात हमें सिखा रहे कई बात संतोष सुख का सागर आनंद मिले दिन रात   दमके सुंदर चेहरा होंठों की मुस्कानों से खुशियां मिलती हृदय को विरद बड़ाई कानो से   समदर्शी समभाव भरा सहनशीलता भरपूर धीरज धर्म संतोष हो घर खुशियां बरसे हजूर   जीवन में आनंद…

  • जिंदगी | Kavita

    जिंदगी ( Zindagi )   मेरी जिंदगी से पूछा मैंने एक रोज जीने का वह तरीका जो घुटन पीड़ा और दर्द से हो बिल्कुल अछूता जिंदगी के पास नहीं था कोई जवाब मुस्कुराकर वह बोली बताती हूं तुझे सलीका बहुत जिया अपने लिए जीवन जी कर देखो जीवन पराया दो कदम बढ़ाओ तुम किसी निर्बल…

  • तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें | Lambi Kavita

    तुम्हारे संतान सदैव सुखी रहें ( Tumhare santan sadaib sukhi rahe )   सभ्यता और संस्कृति के समन्वित सड़क पर निकल पड़ा हूँ शोध के लिए झाड़ियों से छिल गयी है देह थक गये हैं पाँव कुछ पहाड़ों को पार कर सफर में ठहरी है आत्मा बोध के लिए बरगद के नीचे बैठा कोई बूढ़ा…

  • हे जग के करतार | Jag ke Kartar

    हे जग के करतार ( He jag ke kartar )   हे जग के करतार, जग का पालनहारा, लौटा दो मुस्कान लबों की, सुनो सांवरा प्यारा ।   घट घटवासी अंतर्यामी, हाल पता है सारा, मंझधार में डूबी नैया, प्रभु लगा दो किनारा।   कुदरत कई रंग बदलती, क्यों लीला करते हो, सबको जीवन देने…

  • प्रेम में डूबी स्त्री | Kavita

    प्रेम में डूबी स्त्री ( Prem me dubi stree )   प्रेम में डूबी किसी स्त्री को कभी कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि तुम कितने पढ़े लिखे हो या फिर अनपढ़, तुम दिन के दो सौ रूपए कमाते हो या दो हज़ार, तुम सबसे सुंदर दिखते हो या बदसूरत !… बस, उसे तो फ़र्क सिर्फ़…