चले आइए

चले आइए | Chale Aaiye

चले आइए

आपको दिल पुकारे चले आइए
राह पलके बुहारे चले आइए

क्या हँसी हैं नजारे चले आइए
चल पड़े नैन धारे चले आइए

यार छत पर कभी आप आये नज़र
तो करें हम इशारे चले आइए

पास बैठो कभी तो घड़ी दो घड़ी
आपको हम निहारे चले आइए

होश बाकी रहा आपको देखकर
जुल्फ़ फिर हम सँवारे चले आइए

चाह है आपको इक झलक देखना
प्राण से आप प्यारे चले आइए

लूट कर ले गई दिल हसीना वही
कर रही जो इशारे चले आइए

शाम तंहा यहां यार अपनी लगे
बाँह फिर हम पसारे चले आइए

दर्द का आज मारा प्रखर है पड़ा
आपके हैं सहारे चले आइए

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • ग़ज़ल सम्राट विनय साग़र जी

    विनय साग़र जी वही उस्ताद हैं मेरे ग़ज़ल लेखक विनय साग़रजिन्हें है जानती दुनिया ग़ज़ल सम्राट साग़र जी हमारी भी ग़ज़ल की तो करें इस्लाह साग़र जीउसी पथ पर सदा चलता करें जो चाह साग़र जी बड़ा अनभिज्ञ हूँ मैं है नहीं कुछ ज्ञान भी मुझकोमगर हर पथ की बतलाते मुझे हैं थाह साग़र जी…

  • वो नहीं | Ghazal Wo Nahi

    वो नहीं ( Wo Nahi ) ये असल है वो नहीं ये नकल है वो नहीं घास वो गेहूं है ये ये फ़सल है वो नहीं आदमी दोनों हैं पर ये सरल है वो नहीं फर्क दोनों में है क्या ये तरल है वो नहीं फूल हैं दोनों “कुमार” ये कमल है वो नहीं कुमार…

  • जानते हैं | Ghazal Jante Hain

    जानते हैं ( Jante Hain ) वो रहते कहाँ हैं पता जानते हैं । कि उनकी सभी हम अदा जानते हैं ।।१ लगा जो अभी रोग दिल को हमारे ।। न मिलती है इसकी दवा जानते हैं ।।२ मनाएं उन्हें हम भला आज कैसे । जिन्हें आज अपना खुदा जानते हैं ।।३ मिटेगा नहीं ये…

  • ह़ाजत तुम्हारी | Ghazal Hajat Tumhari

    ह़ाजत तुम्हारी ( Hajat Tumhari ) मयस्सर हो गर हमको उल्फ़त तुम्हारी। करेंं हर घड़ी दिल से मिदह़त तुम्हारी। न छूटेगी अब हमसे संगत तुम्हारी। हमें हर क़दम पर है ह़ाजत तुम्हारी। हमारी शिकस्ता सी इस अन्जुमन में। मसर्रत की बाइ़स है शिरकत तुम्हारी। जहां भर की दौलत का हम क्या करें,जब। ख़ुशी दिल को…

  • इंसान | Insaan

    इंसान ( Insaan )    हर सू हैं झूठे इंसान अब कम हैं सच्चे इंसान मेरी मुट्ठी में भगवान करता है दावे इंसान अपनी ख़ुदग़र्ज़ी में अब भूल गया रिश्ते इंसान सोच समझ के कर विश्वास अब कम हैं अच्छे इंसान लोगों को जो चुभ जाये शौक़ न वो पाले इंसान जिस रस्ते पर दाग़…

  • देखा इक दिन | Ghazal Dekha ek Din

    देखा इक दिन ( Dekha ek Din ) आंख दुश्मन की लाल कर रख दी हेकड़ी सब निकाल कर रख दी हाल आलस का ये हमारे है आज की कल पे टाल कर रख दी सच का परचम लगा है लहराने फिर हक़ीक़त निकाल कर रख दी हाथ उसके लगा नहीं कुछ पर सारी पेटी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *