Chhand Satrangi Fag

सतरंगी फाग | Chhand Satrangi Fag

सतरंगी फाग

( Satrangi fag ) 

 

इंद्रधनुषी रंगों का, सतरंगी फाग छाया।
बसंत बहारें चली, मस्त लहर लहर।

प्रियतम भीगा सारा, सजनी भी भीग गई।
रंगीला फागुन आया, बरसा पहर पहर।

गाल गुलाबी महके, रंग गुलाल लगाके।
फाग गाते नर नारी, गांव शहर शहर।

झूमके नाचे रसिया, सुरीली धमाल बाजे।
बांसुरी की तान छेड़े, चंग ठहर ठहर।

 

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

लाल-लाल आंखें तेरी | Aankh par Kavita

Similar Posts

  • चुगली रस | Chhand in Hindi

    चुगली रस ( Chugli Ras ) मनहरण घनाक्षरी   चुगलखोर कान में, भरते रहते बात। चुगली रस का सदा, रसपान वो करें।   कैकई कान की कच्ची, मंथरा की मानी बात। चौदह वर्ष राम को, वनवास जो करें।   चिकनी चुपड़ी बातें, मीठी मीठी बोलकर। कानाफूसी पारंगत, चुगलियां वो करें।   चुगली निंदा जो करे,…

  • कुंठायें जीवन का अवसान | Kuntha par chhand

    कुंठायें जीवन का अवसान ( Kunthaye jeevan ka avsan )      चिंता चिता समान है, कुंठायें हैं अवसान। जीवन को आनंद से, जरा भर लीजिए।   सब को खुशी बांटिये, नेह मोती अनमोल। घुटन भरे कुंठाएं, थोड़ा प्रेम कीजिए।   हर्ष मौज आनंद की, गर चाहो बरसात। ईर्ष्या द्वेष लोभ मद, जरा त्याग दीजिए।…

  • मानव तन | Manav tan | Chhand

    मानव तन ( Manav tan ) मनहरण घनाक्षरी     नश्वर सी यह काया, तन को हमने पाया। देह गात स्वरूप को, दाग ना लगाइए।   कंचन सी काया मिली, पंचतत्वों का शरीर। मानव तन भाग्य से, हरि कृपा पाइए।   चंद सांसों का खेल है, आत्मा का जुड़ा है तार। मानुष जन्म में मिला,…

  • भीनी भीनी चांदनी | Chhand bhini bhini chandni

    भीनी भीनी चांदनी ( Bhini bhini chandni ) विधा मनहरण घनाक्षरी     उज्जवल उज्जवल, भीनी भीनी मद्धम सी। दूधिया सी भीगो रही, दिव्य भीनी चांदनी।   धवल आभा बरस, सुधा रस बांट रही। आनंद का अहसास, देती भीनी चांदनी।   चांद यूं छलका रहा, अमृत रस भंडार। हर्ष खुशी मोद करे, दुलार भीनी चांदनी‌।…

  • बुढ़ापे की देहरी | Budhape ki dehri | Chhand

    बुढ़ापे की देहरी ( Budhape ki dehri ) मनहरण घनाक्षरी बुढ़ापे की देहरी पे, पग जब रख दिया। हाथों में लकड़ी आई, समय का खेल है।   बचपन याद आया, गुजरा जमाना सारा। बालपन की वो यादे, सुहानी सी रेल है।   भागदौड़ जिंदगी की, वक्त की मार सहते। लो आया बुढ़ापा देखो, नज़रो का…

  • शालीनता | देव घनाक्षरी | Chhand Shalinta

    शालीनता ( Shalinta )   शालीनता सुशीलता सौम्य स्वभाव बनाए संस्कार हमारे शुभ हो कीर्ति पताका गगन   विनय धीरज धर भाव विमल धार लो उर आनंद बरसे हरसे मन का चमन   बहती पावन गंगा प्रेम सिंधु ले हिलोरे सत्कार मिले सबको, कर जोड़ करें नमन   सुंदर सी सोच रख विनम्र हो भाव…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *