दबी दबी सी आह है

Hindi Kavita | Hindi Poetry -दबी दबी सी आह है

दबी दबी सी आह है

( Dabi Dabi Si  Aah Hai )

 

कही  मगर सुनी नही, सुनी  थी  पर दिखी नही।

दबी दबी सी आह थी,  जगी  थी जो बुझी नही।

 

बताया था उसे मगर, वो  सुन  के अनसुनी रही,

वो चाहतों का दौर था, जो प्यास थी बुझी नही।

 

मचलते मन में शोर था,खामोश लब ये मौन था।

बताए कैसे दास्ताँ, कि उसके मन कोई और था।

 

मै जान कर भी चुप रही, वो बेवफा का दौर था।

हुंकार हूंक लिख रहा, जो दिल  मे मेरे आह था।

 

जो ना कहाँ था लिख दिया, वो हूबहू सी दास्ताँ।

लहू से सुर्ख रंग में, लिखा था कल भी आज सा।

 

कही मगर सुनी नही, सुनी  थी  पर  दिखी नही।

दबी  दबी सी आह थी, जगी थी जो बुझी नही।

 

 

✍?

कवि :  शेर सिंह हुंकार

देवरिया ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें : 

Hindu Nababarsha par Kavita || चैत्र नववर्ष, हिन्दू नववर्ष

Similar Posts

  • सुदेश दीक्षित की कविताएं | Sudesh Dixit Poetry

    आयेगा बुलावा तो जाना पड़ेगा आयेगा बुलावा तो जाना पड़ेगा।माया मोह से हाथ छुड़ाना पड़ेगा। मस्त हो नींद गहरी में होंगे तब हम।तुम्हें बार बार ना हमें बुलाना पड़ेगा। जो मरजी हो बेफिक्र हो करते रहना।सब ये देख हमें दिल ना दुखाना पड़ेगा। गिर जाएंगे जब अपनी ही नज़रों से हम।अपना जनाजा हमें तब खुद…

  • हिंदी से ही हिंदुस्तान | Hindi Se Hi Hindustan

    हिंदी से ही हिंदुस्तान ( Hindi Se Hi Hindustan ) हिंदी से ही हिंदुस्तान का जन्म है,इसका सम्मान हम सभी का धर्म है। है यही हम सबकी अपनी मातृभाषा,रहे सदा अखंड यही हमारी अभिलाषा। हिंदी में ही वर्णित है मर्म ज्ञान काहिंदी मे ही धर्म है मानवता का भारत माँ के माथे पर सजी जो…

  • जड़ें | Jaden

    जड़ें ( Jaden )   जानता हूं , अपनी जरूरत मे तुम्ही तलाशते हो भगवान को भी इन्ही पत्थरों मे…. कूड़े के ढेर भी आते हैं काम खाई पाटने के गिरती हुई शाख को लाठी का सहारा भी चाहिए….. ये कंधे ही उठाए हैं बोझ तुम्हारी शानो शौकत के तुम्हे तो यह भी नही मालूम…

  • चांद में चांद | Chand Kavita

    चांद में चांद  ( Chand mein chand )   दोषारोपण चाँद को स्वयं बनी चकोर है अवसर की तलाश में ताकति चहुओर है   प्रियतम रिझाने को सजने-संवरने लगी आभा लखि आपनी हुई आत्मविभोर है।   पायजेब की घुघरू छनकाती छन-छन चूड़ियाँ कलाईयों की खनक बेजोर है।   बिंदिया ललाट की चमकती सितारों सी गुलाबी…

  • सफाई

    सफाई   आज तक ये बात मेरी समझ में न आई। तुम करो गन्दगी और मैं करूं सफाई।। मानवता खातिर काल ब्याल है यह, तृणवत न लेना बहुत विकराल है यह, अगर नहीं सम्भले पछताओगे भाई।।तुम करो० गांव गली कस्बा संसद तक फैली, स्वच्छ रखो चादर न होजाये मैली, तन और मन की अब रखो…

  • आत्मनिर्भर भारत | Aatmanirbhar Bharat Par Kavita

    आत्मनिर्भर भारत! ( Aatmanirbhar Bharat ) ***** भारत के लोग अब, सचमुच आत्मनिर्भर हो गए हैं, अपार कष्ट सहकर भी- सरकारों से छोड़ दिए हैं आशा, मन में उपजी है उनकी घोर निराशा। सब सह लेते हैं, पर मुंह नहीं खोलते हैं। ना कोई विरोध प्रदर्शन- ना ही कोई धरना, जबकि लोकतंत्र में होता है,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *